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1970 film ‘Aranyer Din Ratri’ in news again in New York

1970 film 'Aranyer Din Ratri' in news again in New York

द न्यूयॉर्क टाइम्स8 घंटे पहले

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फिल्म की शूटिंग झारखंड के जंगलों में हुई थी, जिसे रे ने अपनी जादुई दृष्टि से ‘मोहक जादुई जंगल’ जैसा बना दिया था।

अमेरिका में 1970 की बंगाली फिल्म ‘अरण्येर दिन रात्रि’ को डिजिटल अवतार में री-लॉन्च किया गया है। मशहूर फिल्म निर्माता सत्यजित रे की इस फिल्म को नए 4के रूप में मैनहैटन के प्रसिद्ध आर्ट‑हाउस सिनेमाघर फिल्म फोरम में दो हफ्ते के लिए दोबारा दिखाया जा रहा है।

पुरानी फिल्मों को संरक्षित करने वाली संस्था ‘द फिल्म फाउंडेशन’, फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन और जानस फिल्म्स ने मिलकर इसे नए रूप में सजाया-संवारा है। इसे पिछले साल न्यूयॉर्क फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया था और अब आम दर्शकों के लिए यह खुला है।

कोलकाता के शहरी माहौल में रहे चार दोस्तों की मस्ती के पीछे छिपी पुरुष सत्ता और जातिगत अहंकार की कहानी पर आधारित अरण्येर दिन रात्रि 1970 में जितनी प्रासंगिक थी, आज भी उतनी ही सटीक है। फिल्म में कोलकाता (तब कलकत्ता) के उच्च जाति के पढ़े‑लिखे, अंग्रेजी बोलने वाले अविवाहित युवकों- अशीम, संजय, हरी और शेखर की कहानी है, जो शहर के शोर से दूर झारखंड में पलामू के जंगलों की यात्रा पर जाते हैं। यहां उनका सामना संथाल इलाके में आदिवासी समाज और गांवों से होता है। वे बिना बुकिंग सरकारी गेस्ट हाउस पर पहुंचकर चौकीदार को घूस देकर कमरे हथिया लेते हैं और हंसी उड़ाते हुए अंग्रेजी में कहते हैं- ‘भ्रष्टाचार के लिए ईश्वर को धन्यवाद।’

हॉलीवुड फिल्म समीक्षक जे. होबरमैन कहते हैं, ‘यह फिल्म केवल एक यात्रा की कहानी नहीं है, बल्कि यह बंगाल के मध्यम वर्ग का एक ऐसा चित्रण है, जो अपनी सुविधाओं के खोल में कैद है। इसका नया संस्करण आज की पीढ़ी को यह समझने में मदद करेगा कि क्यों सत्यजीत रे को विश्व सिनेमा का जादुई चितेरा कहा जाता है।’ ‘अरण्येर दिनरात्रि’ को 1970 में बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में ‘गोल्डन बियर’ के लिए नामांकित किया गया था। इस फिल्म की शूटिंग झारखंड के जंगलों में हुई थी, जिसे रे ने अपनी जादुई दृष्टि से ‘मोहक जादुई जंगल’ जैसा बना दिया था।

नई चमक के साथ पर्दे पर लौटी, आज भी जादू बरकरार

री‑रिलीज के साथ एक तरह से सवाल भी लौट आया है- क्या भारतीय सिनेमा ने आज तक रे की इस फिल्म की तरह ईमानदारी से अपने ‘कन्फर्टेबल’ मध्य वर्ग, मर्दाना हठधर्मिता और आदिवासी समुदायों के प्रति नजरिये को स्क्रीन पर पूरी शिद्दत से रखा है? न्यूयॉर्क, लॉस एंजिलिस और अन्य शहरों के शो के बाहर युवा दर्शक जिस तरह फिल्म की पॉलिटिक्स और जेंडर पर चर्चा करते दिख रहे हैं, वे बताते हैं कि 1970 की यह यात्रा सिर्फ चार दोस्तों की पिकनिक नहीं, हमारी सामाजिक स्मृति की भी एक जरूरी वापसी है। नई चमक के साथ लौटी इस क्लासिकल फिल्म का जादू 56 साल बाद भी कायम है।

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फिल्म की शूटिंग झारखंड के जंगलों में हुई थी, जिसे रे ने अपनी जादुई दृष्टि से ‘मोहक जादुई जंगल’ जैसा बना दिया था।

अमेरिका में 1970 की बंगाली फिल्म ‘अरण्येर दिन रात्रि’ को डिजिटल अवतार में री-लॉन्च किया गया है। मशहूर फिल्म निर्माता सत्यजित रे की इस फिल्म को नए 4के रूप में मैनहैटन के प्रसिद्ध आर्ट‑हाउस सिनेमाघर फिल्म फोरम में दो हफ्ते के लिए दोबारा दिखाया जा रहा है।

पुरानी फिल्मों को संरक्षित करने वाली संस्था ‘द फिल्म फाउंडेशन’, फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन और जानस फिल्म्स ने मिलकर इसे नए रूप में सजाया-संवारा है। इसे पिछले साल न्यूयॉर्क फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया था और अब आम दर्शकों के लिए यह खुला है।

कोलकाता के शहरी माहौल में रहे चार दोस्तों की मस्ती के पीछे छिपी पुरुष सत्ता और जातिगत अहंकार की कहानी पर आधारित अरण्येर दिन रात्रि 1970 में जितनी प्रासंगिक थी, आज भी उतनी ही सटीक है। फिल्म में कोलकाता (तब कलकत्ता) के उच्च जाति के पढ़े‑लिखे, अंग्रेजी बोलने वाले अविवाहित युवकों- अशीम, संजय, हरी और शेखर की कहानी है, जो शहर के शोर से दूर झारखंड में पलामू के जंगलों की यात्रा पर जाते हैं। यहां उनका सामना संथाल इलाके में आदिवासी समाज और गांवों से होता है। वे बिना बुकिंग सरकारी गेस्ट हाउस पर पहुंचकर चौकीदार को घूस देकर कमरे हथिया लेते हैं और हंसी उड़ाते हुए अंग्रेजी में कहते हैं- ‘भ्रष्टाचार के लिए ईश्वर को धन्यवाद।’

हॉलीवुड फिल्म समीक्षक जे. होबरमैन कहते हैं, ‘यह फिल्म केवल एक यात्रा की कहानी नहीं है, बल्कि यह बंगाल के मध्यम वर्ग का एक ऐसा चित्रण है, जो अपनी सुविधाओं के खोल में कैद है। इसका नया संस्करण आज की पीढ़ी को यह समझने में मदद करेगा कि क्यों सत्यजीत रे को विश्व सिनेमा का जादुई चितेरा कहा जाता है।’ ‘अरण्येर दिनरात्रि’ को 1970 में बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में ‘गोल्डन बियर’ के लिए नामांकित किया गया था। इस फिल्म की शूटिंग झारखंड के जंगलों में हुई थी, जिसे रे ने अपनी जादुई दृष्टि से ‘मोहक जादुई जंगल’ जैसा बना दिया था।

नई चमक के साथ पर्दे पर लौटी, आज भी जादू बरकरार

री‑रिलीज के साथ एक तरह से सवाल भी लौट आया है- क्या भारतीय सिनेमा ने आज तक रे की इस फिल्म की तरह ईमानदारी से अपने ‘कन्फर्टेबल’ मध्य वर्ग, मर्दाना हठधर्मिता और आदिवासी समुदायों के प्रति नजरिये को स्क्रीन पर पूरी शिद्दत से रखा है? न्यूयॉर्क, लॉस एंजिलिस और अन्य शहरों के शो के बाहर युवा दर्शक जिस तरह फिल्म की पॉलिटिक्स और जेंडर पर चर्चा करते दिख रहे हैं, वे बताते हैं कि 1970 की यह यात्रा सिर्फ चार दोस्तों की पिकनिक नहीं, हमारी सामाजिक स्मृति की भी एक जरूरी वापसी है। नई चमक के साथ लौटी इस क्लासिकल फिल्म का जादू 56 साल बाद भी कायम है।

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