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ipolar disorder symptoms: क्या होता है बाइपोलर डिसऑर्डर? मूड स्विंग सबसे बड़ा संकेत, न करें नजरअंदाज

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Bipolar Disorder Symptoms: यदि आपको मूड स्विंग बहुत ज्यादा होता है, तो इसे नजरअंदाज न करें. ये बाइपोलर डिसऑर्डर की शुरुआत हो सकती है, जो आपके रिश्तों और करियर को बर्बाद कर सकती हैं. इसकी तुरंत पहचान और जरूरी इलाज लेना जरूरी है.

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आज के समय में तनाव जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा बन गया है. चाहे करियर हो या फिर रिश्ते लोग कई तरह से मेंटल स्ट्रेस से गुजर रहे हैं. ऐसे में कई बार व्यवहार में अचानक बदलाव को हम नॉर्मल मूड स्विंग का नाम देकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ मामलों में यह बदलाव एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या का संकेत भी हो सकता है.

ऐसी ही एक स्थिति है बाइपोलर डिसऑर्डर, जिसे समझना और समय पर पहचानना बहुत जरूरी है. अगर सही समय पर इसका इलाज शुरू न हुआ तो यह व्यक्ति के रोजमर्रा के जीवन, रिश्तों और करियर पर गहरा असर डाल सकता है. वैश्विक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में बड़ी संख्या में लोग किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे हैं. इनमें बाइपोलर डिसऑर्डर भी एक प्रमुख स्थिति है.

क्या होता है बाइपोलर डिसऑर्डर
बाइपोलर में आमतौर पर दो तरह की अवस्थाएं देखने को मिलती हैं. पहली होती है मैनिक अवस्था और दूसरी डिप्रेसिव अवस्था. मैनिक अवस्था में व्यक्ति खुद को बेहद ऊर्जावान महसूस करता है. उसे लगता है कि वह बहुत कुछ कर सकता है और कई बार वह बिना सोचे-समझे फैसले भी ले लेता है. ऐसे समय में व्यक्ति बहुत ज्यादा बात करने लगता है, कम नींद के बावजूद सक्रिय रहता है और कई बार जोखिम भरे काम भी कर बैठता है. कुछ लोगों को ऐसा भी महसूस हो सकता है कि वे बहुत ताकतवर हैं.

दूसरी तरफ, डिप्रेसिव अवस्था में स्थिति बिल्कुल उलट होती है. इसमें व्यक्ति को लगातार उदासी, थकान और निराशा महसूस होती है. उसे पहले जिन चीजों में खुशी मिलती थी, उनमें भी दिलचस्पी कम होने लगती है. कई बार नींद और भूख के पैटर्न में भी बदलाव देखने को मिलता है. व्यक्ति को ध्यान लगाने में मुश्किल होती है और कुछ गंभीर मामलों में उसके मन में खुद को नुकसान पहुंचाने जैसे विचार भी आ सकते हैं. यही वजह है कि मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ इन लक्षणों को गंभीरता से लेने की सलाह देते हैं.

कैसे होती है ये प्रॉब्लम
बाइपोलर डिसऑर्डर के पीछे कोई एक कारण नहीं है. वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि इसके पीछे कई कारक एक साथ काम कर सकते हैं. इनमें जेनेटिक, मस्तिष्क में बदलाव और जीवन से जुड़ी परिस्थितियां शामिल हो सकती हैं. अगर परिवार में पहले किसी को इस तरह की समस्या रही हो तो जोखिम बढ़ सकता है. इसके अलावा, मस्तिष्क में मौजूद केमिकल मैसेंजर जैसे डोपामाइन और सेरोटोनिन के असंतुलन से भी मूड पर असर पड़ सकता है.

कैसे करें पहचान
डॉक्टरों के अनुसार, बाइपोलर डिसऑर्डर के शुरुआती संकेत आमतौर पर 18 से 30 वर्ष की उम्र के बीच सामने आ सकते हैं. हालांकि, कुछ मामलों में यह इससे पहले या बाद में भी हो सकता है. महिलाओं और पुरुषों में इस समस्या के लक्षण थोड़े अलग दिखाई दे सकते हैं. कई मामलों में पुरुषों में मैनिक अवस्था ज्यादा देखने को मिलती है, जबकि महिलाओं में डिप्रेसिव अवस्था की स्थिति अधिक देखी जाती है. गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के बाद हार्मोन में होने वाले बदलाव भी महिलाओं के मूड को प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए ऐसे समय में विशेष ध्यान रखने की सलाह दी जाती है.

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शारदा सिंहSenior Sub Editor

शारदा सिंह बतौर सीनियर सब एडिटर News18 Hindi से जुड़ी हैं. वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्यू पर आधारित रिपोर्ट्स बनाने में एक्सपर्ट हैं. शारदा पिछले 5 सालों से मीडिया …और पढ़ें

Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.

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आज के समय में तनाव जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा बन गया है. चाहे करियर हो या फिर रिश्ते लोग कई तरह से मेंटल स्ट्रेस से गुजर रहे हैं. ऐसे में कई बार व्यवहार में अचानक बदलाव को हम नॉर्मल मूड स्विंग का नाम देकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ मामलों में यह बदलाव एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या का संकेत भी हो सकता है.

ऐसी ही एक स्थिति है बाइपोलर डिसऑर्डर, जिसे समझना और समय पर पहचानना बहुत जरूरी है. अगर सही समय पर इसका इलाज शुरू न हुआ तो यह व्यक्ति के रोजमर्रा के जीवन, रिश्तों और करियर पर गहरा असर डाल सकता है. वैश्विक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में बड़ी संख्या में लोग किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे हैं. इनमें बाइपोलर डिसऑर्डर भी एक प्रमुख स्थिति है.

क्या होता है बाइपोलर डिसऑर्डर
बाइपोलर में आमतौर पर दो तरह की अवस्थाएं देखने को मिलती हैं. पहली होती है मैनिक अवस्था और दूसरी डिप्रेसिव अवस्था. मैनिक अवस्था में व्यक्ति खुद को बेहद ऊर्जावान महसूस करता है. उसे लगता है कि वह बहुत कुछ कर सकता है और कई बार वह बिना सोचे-समझे फैसले भी ले लेता है. ऐसे समय में व्यक्ति बहुत ज्यादा बात करने लगता है, कम नींद के बावजूद सक्रिय रहता है और कई बार जोखिम भरे काम भी कर बैठता है. कुछ लोगों को ऐसा भी महसूस हो सकता है कि वे बहुत ताकतवर हैं.

दूसरी तरफ, डिप्रेसिव अवस्था में स्थिति बिल्कुल उलट होती है. इसमें व्यक्ति को लगातार उदासी, थकान और निराशा महसूस होती है. उसे पहले जिन चीजों में खुशी मिलती थी, उनमें भी दिलचस्पी कम होने लगती है. कई बार नींद और भूख के पैटर्न में भी बदलाव देखने को मिलता है. व्यक्ति को ध्यान लगाने में मुश्किल होती है और कुछ गंभीर मामलों में उसके मन में खुद को नुकसान पहुंचाने जैसे विचार भी आ सकते हैं. यही वजह है कि मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ इन लक्षणों को गंभीरता से लेने की सलाह देते हैं.

कैसे होती है ये प्रॉब्लम
बाइपोलर डिसऑर्डर के पीछे कोई एक कारण नहीं है. वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि इसके पीछे कई कारक एक साथ काम कर सकते हैं. इनमें जेनेटिक, मस्तिष्क में बदलाव और जीवन से जुड़ी परिस्थितियां शामिल हो सकती हैं. अगर परिवार में पहले किसी को इस तरह की समस्या रही हो तो जोखिम बढ़ सकता है. इसके अलावा, मस्तिष्क में मौजूद केमिकल मैसेंजर जैसे डोपामाइन और सेरोटोनिन के असंतुलन से भी मूड पर असर पड़ सकता है.

कैसे करें पहचान
डॉक्टरों के अनुसार, बाइपोलर डिसऑर्डर के शुरुआती संकेत आमतौर पर 18 से 30 वर्ष की उम्र के बीच सामने आ सकते हैं. हालांकि, कुछ मामलों में यह इससे पहले या बाद में भी हो सकता है. महिलाओं और पुरुषों में इस समस्या के लक्षण थोड़े अलग दिखाई दे सकते हैं. कई मामलों में पुरुषों में मैनिक अवस्था ज्यादा देखने को मिलती है, जबकि महिलाओं में डिप्रेसिव अवस्था की स्थिति अधिक देखी जाती है. गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के बाद हार्मोन में होने वाले बदलाव भी महिलाओं के मूड को प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए ऐसे समय में विशेष ध्यान रखने की सलाह दी जाती है.

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शारदा सिंह बतौर सीनियर सब एडिटर News18 Hindi से जुड़ी हैं. वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्यू पर आधारित रिपोर्ट्स बनाने में एक्सपर्ट हैं. शारदा पिछले 5 सालों से मीडिया …और पढ़ें

Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.

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