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A strong woman means… one who makes her own decisions

A strong woman means... one who makes her own decisions

जावेद अख्तर- मशहूर गीतकार और लेखक16 मिनट पहले

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जावेद कहते हैं- मां की इज्जत होनी चाहिए। बिल्कुल होनी चाहिए। तो फिर सवाल यह है कि मेरे बच्चों की मां की भी उतनी ही इज्जत होनी चाहिए या नहीं?

जब अखबार में पढ़ता हूं कि एक घर में लड़की पर अत्याचार हुआ, जला दी गई तो मुझे उसके मां-बाप से नफरत हो जाती है। लगता है कि इस लड़की को उसके ससुर-सास और ननद ने नहीं जलाया, बल्कि उसके मां-बाप ने जलाया है। आपने ये कैसी लड़की पाली थी कि वो जल गई?

समाज वर्षों से महिलाओं पर होने वाली हिंसा पर वैसी सामूहिक प्रतिक्रिया नहीं दिखाता, जैसा कि किसी पुरुष की हत्या में किसी औरत का नाम आने पर चौंक जाता है। महिलाएं तो मर्दों से ज्यादा धर्म मानती हैं फिर भी दुनिया के हर धर्म में कुछ न कुछ ‘एंटी-वुमन’ है।

समाज औरतों को सेकेंडरी समझता है। इसलिए हमारे सिलेबस में शुरू से लेकर बारहवीं क्लास तक ऐसा सबक होना चाहिए जहां बच्चों को मालूम हो कि जेंडर इक्वैलिटी क्या चीज होती है।

औरतों का महिमामंडन मत कीजिए, उन्हें इंसान ही मानिए। हर रिलीजन में पत्नी को एक सहयोगी की भूमिका में लिया गया है। आप यही सब बच्चों को सिखा रही हैं और फिर कहती हैं कि हमें समानता चाहिए। क्या इससे अगली जनरेशन को समानता मिलेगी?

जबकि औरतों ने जो मुकाम हासिल किया है, वह रिलीजन की वजह से नहीं, बल्कि उसके बावजूद हासिल किया है। मेरी समझ में सशक्त औरत वह भी नहीं है, जो सिर्फ बगावत करती हुई दिखाई दे, बल्कि वह है जो अपनी ज़िंदगी के फैसले खुद ले सके, आत्मसम्मान के साथ जी सके।

जिस समाज में एक आम बच्चा 20-22 साल की उम्र तक सिर्फ अपनी मां और बहन से बात करता हो, किसी दूसरी लड़की को उसने गहराई से समझा न हो, उसके लिए तो लड़की इंसान नहीं, बल्कि कुछ अजीब ही होगी, जिसे वो दूर से देखता रहता है। हमें इसे छोड़कर एक सेहतमंद समाज बनाना होगा। यह शिक्षा से ही बन सकता है। जहां पर औरत और मर्द, बच्चा और बच्ची, लड़का और लड़की बराबर माने जाएं। उनकी पूजा न हो, बल्कि उनसे दोस्ती हो।

मैं मानता हूं कि मर्द हो या औरत उनके कपड़े सम्मानजनक होने चाहिए। अगर कोई मर्द शॉर्ट्स, स्लीवलेस टीशर्ट पहनकर ऑफिस या कॉलेज में आए तो अच्छी बात नहीं है। उसे सलीकेदार पहनावे में होना चाहिए। औरत को भी ऐसा ही होना चाहिए, लेकिन उसे अपना चेहरा ढकने की क्या जरूरत है? उसके चेहरे में ऐसा क्या अशोभनीय, अभद्र और गरिमाहीन है? ये पीयर प्रेशर है।

अगर वो ऐसा कहती है कि मैं मर्जी से कर रही हूं तो वह ब्रेनवाश्ड है क्योंकि उसे भरोसा है कि कोई है, जो उसके इस फैसले की सराहना करेगा। अगर आप उसे मुक्त छोड़ देंगे तो वह अपना चेहरा कवर क्यों करेगी! उसे अपने चेहरे से नफरत है क्या?

चीन में जैसे ही अंडे से चूजा निकलता है, उसे एक लकड़ी के केस में बैठा दिया जाता है। उसे मेवा खिलाते हैं। वो मोटा होने लगता है और एक दिन उस केस में फंसने लगता है। फिर वो चूजे को निकालकर बड़े केस में रख देते हैं।

चूजा ज़िंदगी में कभी मूव नहीं कर पाता। वो एक केस से निकल कर उससे बड़े केस में बढ़ता जाता है। जब उसे पकाया जाता है तो उसमें हड्डी नहीं होती। अपनी बेटियों को हम ऐसे ही पाल रहे हैं। बेटियों की हड्डियां ही नहीं बनने देते। वो जलेंगी नहीं तो क्या होगा।

आप कहते हैं- बेटी, अब तो तुम पराये घर जा रही हो। अब तुम पराई हो गई। पर मैं तो अपनी बेटी को यही सिखाऊंगा कि जरा-सी गड़बड़ हो तो फौरन आ जाना। औरत का सम्मान सिर्फ इसलिए मत कीजिए कि वह आपकी मां है; उसका सम्मान इसलिए कीजिए कि वह एक इंसान है।

समाज में मां के मुकाम को लेकर मैं एक दिलचस्प नतीजे पर पहुंचा हूं और वह शायद आम धारणा के बिल्कुल उलट है। दरअसल, जिस समाज में मां को लेकर बहुत ज्यादा महिमामंडन होता है, मुझे लगता है कि वहां मर्दों के रवैये में कहीं न कहीं गंभीर समस्या है।

कहा जाता है- मां की पूजा होनी चाहिए, मां के पैरों के नीचे जन्नत है, मां देवी है, पूजनीय है। लेकिन जरा सोचिए, वह कौन-सी औरत है जो पूजनीय नहीं है? जिसके पैरों के नीचे जन्नत बताई जाती है, वह औरत कौन है? वही, जो संयोग से मेरी मां है। लेकिन जो औरत मेरी मां नहीं है, बल्कि किसी और की मां है, या मेरी पत्नी है, उसके बारे में क्या?

कहते हैं, मां की इज्जत होनी चाहिए। बिल्कुल होनी चाहिए। तो फिर सवाल है कि फिर मेरे बच्चों की मां की भी उतनी ही इज्जत होनी चाहिए या नहीं? जरा सोचिए, मेरी मां तो मेरी पैदाइश से पहले भी वही इंसान थीं। मैं 17 जनवरी को पैदा हुआ। क्या 16 जनवरी तक वह सम्मान के योग्य नहीं थीं?

और 17 जनवरी को सिर्फ इसलिए कि मैं पैदा हो गया, अचानक आदरणीय हो गईं? क्या उनका सम्मान मेरी वजह से है? औरत का सम्मान इसलिए मत कीजिए कि वह आपकी मां है; उसका सम्मान इसलिए कीजिए कि वह एक इंसान है।

(संपादन और समन्वय- अरविंद मण्डलोई)

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जावेद अख्तर- मशहूर गीतकार और लेखक16 मिनट पहले

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जावेद कहते हैं- मां की इज्जत होनी चाहिए। बिल्कुल होनी चाहिए। तो फिर सवाल यह है कि मेरे बच्चों की मां की भी उतनी ही इज्जत होनी चाहिए या नहीं?

जब अखबार में पढ़ता हूं कि एक घर में लड़की पर अत्याचार हुआ, जला दी गई तो मुझे उसके मां-बाप से नफरत हो जाती है। लगता है कि इस लड़की को उसके ससुर-सास और ननद ने नहीं जलाया, बल्कि उसके मां-बाप ने जलाया है। आपने ये कैसी लड़की पाली थी कि वो जल गई?

समाज वर्षों से महिलाओं पर होने वाली हिंसा पर वैसी सामूहिक प्रतिक्रिया नहीं दिखाता, जैसा कि किसी पुरुष की हत्या में किसी औरत का नाम आने पर चौंक जाता है। महिलाएं तो मर्दों से ज्यादा धर्म मानती हैं फिर भी दुनिया के हर धर्म में कुछ न कुछ ‘एंटी-वुमन’ है।

समाज औरतों को सेकेंडरी समझता है। इसलिए हमारे सिलेबस में शुरू से लेकर बारहवीं क्लास तक ऐसा सबक होना चाहिए जहां बच्चों को मालूम हो कि जेंडर इक्वैलिटी क्या चीज होती है।

औरतों का महिमामंडन मत कीजिए, उन्हें इंसान ही मानिए। हर रिलीजन में पत्नी को एक सहयोगी की भूमिका में लिया गया है। आप यही सब बच्चों को सिखा रही हैं और फिर कहती हैं कि हमें समानता चाहिए। क्या इससे अगली जनरेशन को समानता मिलेगी?

जबकि औरतों ने जो मुकाम हासिल किया है, वह रिलीजन की वजह से नहीं, बल्कि उसके बावजूद हासिल किया है। मेरी समझ में सशक्त औरत वह भी नहीं है, जो सिर्फ बगावत करती हुई दिखाई दे, बल्कि वह है जो अपनी ज़िंदगी के फैसले खुद ले सके, आत्मसम्मान के साथ जी सके।

जिस समाज में एक आम बच्चा 20-22 साल की उम्र तक सिर्फ अपनी मां और बहन से बात करता हो, किसी दूसरी लड़की को उसने गहराई से समझा न हो, उसके लिए तो लड़की इंसान नहीं, बल्कि कुछ अजीब ही होगी, जिसे वो दूर से देखता रहता है। हमें इसे छोड़कर एक सेहतमंद समाज बनाना होगा। यह शिक्षा से ही बन सकता है। जहां पर औरत और मर्द, बच्चा और बच्ची, लड़का और लड़की बराबर माने जाएं। उनकी पूजा न हो, बल्कि उनसे दोस्ती हो।

मैं मानता हूं कि मर्द हो या औरत उनके कपड़े सम्मानजनक होने चाहिए। अगर कोई मर्द शॉर्ट्स, स्लीवलेस टीशर्ट पहनकर ऑफिस या कॉलेज में आए तो अच्छी बात नहीं है। उसे सलीकेदार पहनावे में होना चाहिए। औरत को भी ऐसा ही होना चाहिए, लेकिन उसे अपना चेहरा ढकने की क्या जरूरत है? उसके चेहरे में ऐसा क्या अशोभनीय, अभद्र और गरिमाहीन है? ये पीयर प्रेशर है।

अगर वो ऐसा कहती है कि मैं मर्जी से कर रही हूं तो वह ब्रेनवाश्ड है क्योंकि उसे भरोसा है कि कोई है, जो उसके इस फैसले की सराहना करेगा। अगर आप उसे मुक्त छोड़ देंगे तो वह अपना चेहरा कवर क्यों करेगी! उसे अपने चेहरे से नफरत है क्या?

चीन में जैसे ही अंडे से चूजा निकलता है, उसे एक लकड़ी के केस में बैठा दिया जाता है। उसे मेवा खिलाते हैं। वो मोटा होने लगता है और एक दिन उस केस में फंसने लगता है। फिर वो चूजे को निकालकर बड़े केस में रख देते हैं।

चूजा ज़िंदगी में कभी मूव नहीं कर पाता। वो एक केस से निकल कर उससे बड़े केस में बढ़ता जाता है। जब उसे पकाया जाता है तो उसमें हड्डी नहीं होती। अपनी बेटियों को हम ऐसे ही पाल रहे हैं। बेटियों की हड्डियां ही नहीं बनने देते। वो जलेंगी नहीं तो क्या होगा।

आप कहते हैं- बेटी, अब तो तुम पराये घर जा रही हो। अब तुम पराई हो गई। पर मैं तो अपनी बेटी को यही सिखाऊंगा कि जरा-सी गड़बड़ हो तो फौरन आ जाना। औरत का सम्मान सिर्फ इसलिए मत कीजिए कि वह आपकी मां है; उसका सम्मान इसलिए कीजिए कि वह एक इंसान है।

समाज में मां के मुकाम को लेकर मैं एक दिलचस्प नतीजे पर पहुंचा हूं और वह शायद आम धारणा के बिल्कुल उलट है। दरअसल, जिस समाज में मां को लेकर बहुत ज्यादा महिमामंडन होता है, मुझे लगता है कि वहां मर्दों के रवैये में कहीं न कहीं गंभीर समस्या है।

कहा जाता है- मां की पूजा होनी चाहिए, मां के पैरों के नीचे जन्नत है, मां देवी है, पूजनीय है। लेकिन जरा सोचिए, वह कौन-सी औरत है जो पूजनीय नहीं है? जिसके पैरों के नीचे जन्नत बताई जाती है, वह औरत कौन है? वही, जो संयोग से मेरी मां है। लेकिन जो औरत मेरी मां नहीं है, बल्कि किसी और की मां है, या मेरी पत्नी है, उसके बारे में क्या?

कहते हैं, मां की इज्जत होनी चाहिए। बिल्कुल होनी चाहिए। तो फिर सवाल है कि फिर मेरे बच्चों की मां की भी उतनी ही इज्जत होनी चाहिए या नहीं? जरा सोचिए, मेरी मां तो मेरी पैदाइश से पहले भी वही इंसान थीं। मैं 17 जनवरी को पैदा हुआ। क्या 16 जनवरी तक वह सम्मान के योग्य नहीं थीं?

और 17 जनवरी को सिर्फ इसलिए कि मैं पैदा हो गया, अचानक आदरणीय हो गईं? क्या उनका सम्मान मेरी वजह से है? औरत का सम्मान इसलिए मत कीजिए कि वह आपकी मां है; उसका सम्मान इसलिए कीजिए कि वह एक इंसान है।

(संपादन और समन्वय- अरविंद मण्डलोई)

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