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Aadarsh Bal Vidyalaya Cast Interview

Aadarsh Bal Vidyalaya Cast Interview

2 घंटे पहले

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मार्कशीट में कितने नंबर आए थे, यह शायद वक्त के साथ याद नहीं रहता, लेकिन स्कूल की घंटी, रीसेस, दोस्तों के साथ की गई शरारतें, टीचर्स की डांट और क्लासरूम के किस्से जिंदगीभर साथ चलते हैं। प्राइम वीडियो की नई सीरीज ‘आदर्श बाल विद्यालय’ भी इन्हीं यादों के सहारे आज की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाती है।

दैनिक भास्कर से खास बातचीत में केके मेनन, नवीन कस्तूरिया, अर्चना पूरन सिंह, समीर सक्सेना और हिमांक गौर ने अपने स्कूल के दिनों की यादें ताजा कीं। बातचीत के दौरान कभी सब ठहाके लगाते नजर आए, तो कभी अच्छे टीचर्स और एजुकेशन सिस्टम को लेकर गंभीर बातें भी सामने आईं।

‘रीसेस का इंतजार रहता था, सबसे बड़ा टेंशन यूनिट टेस्ट होता था’ जब सभी कलाकारों से पूछा गया कि स्कूल की सबसे पहली याद क्या आती है, तो जवाब लगभग हर उस इंसान जैसा था जिसने स्कूल की जिंदगी जी है। नवीन कस्तूरिया ने मुस्कुराते हुए कहा कि सबसे पहले उन्हें रीसेस याद आती है। पूरा दिन उसी का इंतजार रहता था क्योंकि वही दोस्तों के साथ खुलकर मस्ती करने का समय होता था।

उस उम्र में सबसे बड़ा टेंशन यूनिट टेस्ट का होता था। लगता था कि किसी तरह टेस्ट खत्म हो जाए, फिर कुछ दिनों के लिए जिंदगी आसान हो जाएगी। वहीं केके मेनन ने बताया कि उन्हें स्कूल के दिनों में हिस्ट्री सबसे ज्यादा पसंद थी। आज भी इतिहास पढ़ना और उससे जुड़ी चीजों को जानना उन्हें उतना ही अच्छा लगता है।

किसी का सपना एयर होस्टेस, तो कोई ट्रेन ड्राइवर बनना चाहता था बात जब बचपन के सपनों पर पहुंची तो हर किसी का जवाब अलग था। अर्चना पूरन सिंह ने हंसते हुए बताया कि बचपन में वह एयर होस्टेस बनना चाहती थीं। वजह भी दिलचस्प थी। उन्हें लगता था कि एयर होस्टेस को दुनिया घूमने का मौका मिलता है और उनके पास ढेर सारी चॉकलेट होती हैं। बाद में उनका मन टीचर बनने का होने लगा।

केके मेनन ने बताया कि बचपन में वह ट्रेन ड्राइवर बनना चाहते थे। उन्हें लोकोमोटिव और बड़े-बड़े वाहनों को देखकर हमेशा हैरानी होती थी कि आखिर इन्हें चलाया कैसे जाता होगा। नवीन कस्तूरिया ने कहा कि क्लास छह तक उनका सपना एक्टर बनने का था। बाद में आईआईटी की तैयारी शुरू हो गई, लेकिन फिल्मों का आकर्षण कभी खत्म नहीं हुआ।

किसी टीचर के पास डंडा था, कोई ड्रैकुला की कहानी सुनाता था स्कूल के टीचर्स का जिक्र आते ही पूरी स्टारकास्ट अपने-अपने किस्से सुनाने लगी। समीर सक्सेना ने बताया कि उनके स्कूल में एक टीचर क्लास में आते ही शोर मचाने वाले बच्चों को लाइन में खड़ा कर एक-एक करके थप्पड़ मारते थे। आज उस घटना को याद करके हंसी आती है। केके मेनन ने कहा कि उनके समय में सजा देने के भी अलग-अलग तरीके होते थे। कोई चॉक फेंकता था, कोई डस्टर, तो कोई कान पकड़कर खड़ा कर देता था। अर्चना पूरन सिंह ने अपने इंग्लिश टीचर को याद किया, जो पढ़ाई के बीच ड्रैकुला की कहानियां सुनाने लगते थे। पूरी क्लास उनकी कहानी सुनने का इंतजार करती थी।

वहीं समीर सक्सेना ने बताया कि उनके पीटी टीचर खेल कराने के बजाय हॉरर फिल्मों की कहानियां सुनाते थे।

चीटिंग पर भी हुई खुलकर बात बातचीत के दौरान बोर्ड एग्जाम और चीटिंग के किस्से भी सामने आए। नवीन कस्तूरिया ने हंसते हुए स्वीकार किया कि 12वीं की फिजिक्स परीक्षा में वह किसी तरह पास हुए थे। वहीं केके मेनन ने एक मजेदार किस्सा सुनाया कि एक बार पीछे बैठे छात्र ने उनकी आंसर शीट देखकर पूरा जवाब उतार लिया था और आखिर में दोनों पकड़े गए। हालांकि, अर्चना पूरन सिंह ने कहा कि उनके स्कूल में चीटिंग के बारे में सोचना भी गलत माना जाता था।

‘सबसे अच्छे लोग टीचर बनेंगे, तभी देश बदलेगा’ मस्ती और यादों के बीच बातचीत शिक्षा व्यवस्था के गंभीर मुद्दों तक भी पहुंची। नवीन कस्तूरिया ने कहा कि अगर देश को आगे बढ़ाना है तो टीचर की नौकरी सबसे सम्मानित होनी चाहिए। अच्छे वेतन और सम्मान से ही सबसे काबिल लोग इस पेशे में आएंगे। केके मेनन ने भी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि भारत में गुरु की परंपरा रही है, लेकिन धीरे-धीरे हमने टीचर्स को वह सम्मान देना कम कर दिया।

उनका मानना है कि समाज में टीचर्स की इज्जत और आर्थिक स्थिति दोनों बेहतर होनी चाहिए। अर्चना पूरन सिंह ने कहा कि बच्चों को सिर्फ अच्छे मार्क्स लाने के लिए तैयार नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें अच्छा इंसान बनाने पर भी उतना ही जोर होना चाहिए।

‘लोग सिर्फ हंसेंगे नहीं, अपना बचपन भी याद करेंगे’ स्टारकास्ट का मानना है कि ‘आदर्श बाल विद्यालय’ सिर्फ एक हल्की-फुल्की कॉमेडी नहीं है। इसके जरिए शिक्षा व्यवस्था, टीचर्स, बच्चों और पेरेंट्स के रिश्तों पर कई जरूरी सवाल भी उठाए गए हैं। हिमांक गौर ने कहा कि शो में हर किसी को अपने स्कूल का कोई न कोई किरदार जरूर दिखाई देगा। वहीं समीर सक्सेना का मानना है कि इसमें दिखाए गए हालात भले ही मजाकिया लगें, लेकिन उनके पीछे जिंदगी की सच्चाइयां छिपी हैं। केके मेनन ने बातचीत खत्म करते हुए कहा कि अच्छी कहानियां सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि दर्शकों के मन में सवाल भी छोड़ जाती हैं। यही कोशिश ‘आदर्श बाल विद्यालय’ की भी है।

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मार्कशीट में कितने नंबर आए थे, यह शायद वक्त के साथ याद नहीं रहता, लेकिन स्कूल की घंटी, रीसेस, दोस्तों के साथ की गई शरारतें, टीचर्स की डांट और क्लासरूम के किस्से जिंदगीभर साथ चलते हैं। प्राइम वीडियो की नई सीरीज ‘आदर्श बाल विद्यालय’ भी इन्हीं यादों के सहारे आज की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाती है।

दैनिक भास्कर से खास बातचीत में केके मेनन, नवीन कस्तूरिया, अर्चना पूरन सिंह, समीर सक्सेना और हिमांक गौर ने अपने स्कूल के दिनों की यादें ताजा कीं। बातचीत के दौरान कभी सब ठहाके लगाते नजर आए, तो कभी अच्छे टीचर्स और एजुकेशन सिस्टम को लेकर गंभीर बातें भी सामने आईं।

‘रीसेस का इंतजार रहता था, सबसे बड़ा टेंशन यूनिट टेस्ट होता था’ जब सभी कलाकारों से पूछा गया कि स्कूल की सबसे पहली याद क्या आती है, तो जवाब लगभग हर उस इंसान जैसा था जिसने स्कूल की जिंदगी जी है। नवीन कस्तूरिया ने मुस्कुराते हुए कहा कि सबसे पहले उन्हें रीसेस याद आती है। पूरा दिन उसी का इंतजार रहता था क्योंकि वही दोस्तों के साथ खुलकर मस्ती करने का समय होता था।

उस उम्र में सबसे बड़ा टेंशन यूनिट टेस्ट का होता था। लगता था कि किसी तरह टेस्ट खत्म हो जाए, फिर कुछ दिनों के लिए जिंदगी आसान हो जाएगी। वहीं केके मेनन ने बताया कि उन्हें स्कूल के दिनों में हिस्ट्री सबसे ज्यादा पसंद थी। आज भी इतिहास पढ़ना और उससे जुड़ी चीजों को जानना उन्हें उतना ही अच्छा लगता है।

किसी का सपना एयर होस्टेस, तो कोई ट्रेन ड्राइवर बनना चाहता था बात जब बचपन के सपनों पर पहुंची तो हर किसी का जवाब अलग था। अर्चना पूरन सिंह ने हंसते हुए बताया कि बचपन में वह एयर होस्टेस बनना चाहती थीं। वजह भी दिलचस्प थी। उन्हें लगता था कि एयर होस्टेस को दुनिया घूमने का मौका मिलता है और उनके पास ढेर सारी चॉकलेट होती हैं। बाद में उनका मन टीचर बनने का होने लगा।

केके मेनन ने बताया कि बचपन में वह ट्रेन ड्राइवर बनना चाहते थे। उन्हें लोकोमोटिव और बड़े-बड़े वाहनों को देखकर हमेशा हैरानी होती थी कि आखिर इन्हें चलाया कैसे जाता होगा। नवीन कस्तूरिया ने कहा कि क्लास छह तक उनका सपना एक्टर बनने का था। बाद में आईआईटी की तैयारी शुरू हो गई, लेकिन फिल्मों का आकर्षण कभी खत्म नहीं हुआ।

किसी टीचर के पास डंडा था, कोई ड्रैकुला की कहानी सुनाता था स्कूल के टीचर्स का जिक्र आते ही पूरी स्टारकास्ट अपने-अपने किस्से सुनाने लगी। समीर सक्सेना ने बताया कि उनके स्कूल में एक टीचर क्लास में आते ही शोर मचाने वाले बच्चों को लाइन में खड़ा कर एक-एक करके थप्पड़ मारते थे। आज उस घटना को याद करके हंसी आती है। केके मेनन ने कहा कि उनके समय में सजा देने के भी अलग-अलग तरीके होते थे। कोई चॉक फेंकता था, कोई डस्टर, तो कोई कान पकड़कर खड़ा कर देता था। अर्चना पूरन सिंह ने अपने इंग्लिश टीचर को याद किया, जो पढ़ाई के बीच ड्रैकुला की कहानियां सुनाने लगते थे। पूरी क्लास उनकी कहानी सुनने का इंतजार करती थी।

वहीं समीर सक्सेना ने बताया कि उनके पीटी टीचर खेल कराने के बजाय हॉरर फिल्मों की कहानियां सुनाते थे।

चीटिंग पर भी हुई खुलकर बात बातचीत के दौरान बोर्ड एग्जाम और चीटिंग के किस्से भी सामने आए। नवीन कस्तूरिया ने हंसते हुए स्वीकार किया कि 12वीं की फिजिक्स परीक्षा में वह किसी तरह पास हुए थे। वहीं केके मेनन ने एक मजेदार किस्सा सुनाया कि एक बार पीछे बैठे छात्र ने उनकी आंसर शीट देखकर पूरा जवाब उतार लिया था और आखिर में दोनों पकड़े गए। हालांकि, अर्चना पूरन सिंह ने कहा कि उनके स्कूल में चीटिंग के बारे में सोचना भी गलत माना जाता था।

‘सबसे अच्छे लोग टीचर बनेंगे, तभी देश बदलेगा’ मस्ती और यादों के बीच बातचीत शिक्षा व्यवस्था के गंभीर मुद्दों तक भी पहुंची। नवीन कस्तूरिया ने कहा कि अगर देश को आगे बढ़ाना है तो टीचर की नौकरी सबसे सम्मानित होनी चाहिए। अच्छे वेतन और सम्मान से ही सबसे काबिल लोग इस पेशे में आएंगे। केके मेनन ने भी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि भारत में गुरु की परंपरा रही है, लेकिन धीरे-धीरे हमने टीचर्स को वह सम्मान देना कम कर दिया।

उनका मानना है कि समाज में टीचर्स की इज्जत और आर्थिक स्थिति दोनों बेहतर होनी चाहिए। अर्चना पूरन सिंह ने कहा कि बच्चों को सिर्फ अच्छे मार्क्स लाने के लिए तैयार नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें अच्छा इंसान बनाने पर भी उतना ही जोर होना चाहिए।

‘लोग सिर्फ हंसेंगे नहीं, अपना बचपन भी याद करेंगे’ स्टारकास्ट का मानना है कि ‘आदर्श बाल विद्यालय’ सिर्फ एक हल्की-फुल्की कॉमेडी नहीं है। इसके जरिए शिक्षा व्यवस्था, टीचर्स, बच्चों और पेरेंट्स के रिश्तों पर कई जरूरी सवाल भी उठाए गए हैं। हिमांक गौर ने कहा कि शो में हर किसी को अपने स्कूल का कोई न कोई किरदार जरूर दिखाई देगा। वहीं समीर सक्सेना का मानना है कि इसमें दिखाए गए हालात भले ही मजाकिया लगें, लेकिन उनके पीछे जिंदगी की सच्चाइयां छिपी हैं। केके मेनन ने बातचीत खत्म करते हुए कहा कि अच्छी कहानियां सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि दर्शकों के मन में सवाल भी छोड़ जाती हैं। यही कोशिश ‘आदर्श बाल विद्यालय’ की भी है।

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