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Cancer treatment in India: कैंसर के ये डॉक्टर हो गए बेकार! मरीजों का नहीं कर सकते इलाज,PMJAY का नया नियम बना नासूर

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PMJAY rules for Oncologist: कैंसर भारत की सबसे गंभीर बीमारियों में से एक बनता जा रहा है. फिलहाल देश में 15 लाख से ज्यादा कैंसर के मरीज हैं और एक अनुमान के मुताबिक आने वाले 20 सालों में यह संख्या करीब 25 लाख के आसपास पहुंचने वाली है, जो कि किसी बड़े शहर की आबादी जितनी होगी, लेकिन इससे भी बड़ी समस्या अब इन मरीजों के इलाज को लेकर पैदा होने वाली है और इसकी वजह है आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के नए नियम.

ऑन्कोलॉजिस्टों ने बताया कि पीएमजेएवाई के नए नियमों का हवाला देकर कई राज्य प्राइवेट सेक्टर के सैकड़ों अनुभवी, फेलोशिप-ट्रेनिंग पाए ऑन्कोलॉजिस्ट को आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY) के मरीजों का इलाज करने से रोक रहे हैं.

डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें इसलिए नहीं रोका जा रहा कि उनकी ट्रेनिंग या अनुभव कम है, बल्कि इसलिए इलाज नहीं करने दिया जा रहा है कि उनके पास एनएमसी से मान्यता प्राप्त DM, MCh या DrNB जैसी सुपर-स्पेशियलिटी डिग्रियां नहीं हैं.

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर में इस कदम से प्रभावित डॉक्टरों ने बताया कि कुछ दशक पहले तक, ऑन्कोलॉजी में आने का एकमात्र रास्ता फेलोशिप ही था. तब कोई औपचारिक कोर्स मौजूद नहीं थे. आज भी, पीजी डॉक्टरों के लिए कैंसर अस्पतालों में सिर और गर्दन की सर्जरी, स्त्री रोग-ऑन्कोलॉजी, रक्त-ऑन्कोलॉजी या बच्चों की कैंसर सर्जरी में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के लिए 2-3 साल की फेलोशिप हासिल करना बहुत प्रतिष्ठित माना जाता है.

उन्होंने कहा कि जिन लोगों को अब नए नियम के चलते अयोग्य बताया जा रहा है उनमें से कई आगे चलकर डिपार्टमेंट के हेड, मेडिकल डायरेक्टर, टीचर और सीनियर सर्जन बन चुके हैं. ये दशकों से कैंसर के मरीजों का इलाज कर रहे हैं. सूरत के डॉ. हेमिश कानिया, जिन्होंने राज्यों भर में प्रभावित ऐसे 300 से ज्यादा डॉक्टरों का डेटा इकट्ठा किया है, ने बताया कि जिन डॉक्टरों को अब रोका जा रहा है, उनमें से कुछ ने तो DM या DrNB के छात्रों को ऑन्कोलॉजी भी पढ़ाई है.

इस नियम से बढ़ रही डॉक्टरों की कमी
योग्यता के नियमों में यह बदलाव न केवल भारत में कैंसर के बढ़ते बोझ की वजह से चौंकाने वाला है, बल्कि कैंसर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की कमी की वजह से भी हैरान करने वाला है. भारत में हर दस लाख लोगों पर लगभग एक मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट है और सिर्फ 4,000 के करीब ऑन्कोसर्जन हैं. ऐसे में PMJAY से जुड़े इलाज से 300 प्रशिक्षित स्पेशलिस्ट डॉक्टरों को बाहर करने से इलाज तक पहुंच कम हो सकती है, खासकर छोटे शहरों में जहां प्राइवेट इंश्योरेंस की पहुंच कम है, और उन गरीब मरीजों के लिए तो यह बहुत बड़ी दिक्कत बन सकती है जो सरकारी मेडिकल इंश्योरेंस का लाभ उठाते हैं.

क्या फेलोशिप बेकार हैं?
डॉ. किशन(बदला हुआ नाम) UP के एक 42 साल के जनरल सर्जन ने बताया कि उन्होंने टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, परेल से सिर और गर्दन के कैंसर में तीन साल की फेलोशिप पूरी की थी, 2021 में, वह अपने टियर-II शहर में वापस लौटे, इस उम्मीद के साथ कि कैंसर देखभाल में मौजूद कमी को पूरा कर सकेंगे, लेकिन शहर में केवल छह ऑन्कोसर्जन थे, जिनमें से चार फेलोशिप-प्रशिक्षित थे. हालांकि, उन्होंने पाया कि उन्हें PMJAY के कैंसर मरीजों का ऑपरेशन करने से रोक दिया गया है. उन्होंने कहा, अगर छह में से चार निजी क्षेत्र के कैंसर सर्जनों को बाहर कर दिया जाए, तो PMJAY के मरीजों को लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता है.’

वहीं एक अन्य डॉक्टर ने बताया कि वह सुरक्षित हैं क्योंकि वह एक सरकारी अस्पताल में काम करते हैं. उन्होंने कहा,’सरकारी अस्पतालों में टीम में कम से कम एक सदस्य ऐसा होने की संभावना होती है जिसे PMJAY के तहत मान्यता प्राप्त हो, लेकिन अगर मैं निजी क्षेत्र में कदम रखता हूं, तो स्थिति अलग हो सकती है.’

कुछ डॉक्टरों ने बताया कि उनके नाम HEM 2.0 पोर्टल से हटा दिए गए हैं. इस पोर्टल का इस्तेमाल राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) द्वारा PMJAY के प्रबंधन के लिए किया जाता है. डॉक्टरों ने कहा कि अस्पताल अपने अनुबंध खत्म कर रहे हैं क्योंकि ये विशेषज्ञ अब PMJAY के तहत क्लेम (दावे) जेनरेट नहीं कर सकते.

क्यों हो रही ये दिक्कत
डॉक्टरों ने बताया कि कई मुद्दों के कारण यह मौजूदा समस्या खड़ी हुई है, विशेष रूप से राज्य के स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा एनएचए और एनएमसी के नियमों की व्याख्या का तरीका. इस समस्या की जड़ 2018 से पहले के समय में ढूंढी जा सकती है, जब तत्कालीन भारतीय चिकित्सा परिषद (MCI) ने ऑन्कोलॉजी शिक्षकों की संख्या बढ़ाने के प्रयास शुरू किए थे.

टाटा मेमोरियल सेंटर के पूर्व अकादमिक डीन, डॉ. केएस शर्मा ने कहा कि 2002 और 2010 के बीच, मेडिकल और सर्जिकल ऑन्कोलॉजी में DM और MCh की सीटें बहुत कम थीं. 2011 में, जब वह तत्कालीन MCI के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में शामिल हुए, तो उन्होंने प्रतिष्ठित कैंसर अस्पतालों में फेलोशिप कार्यक्रमों का विस्तार करके शिक्षकों की कमी को दूर करने की एक योजना बनाई. उन्होंने कहा, ‘इन फेलोशिप को MCI द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं थी, लेकिन इनका अपना एक महत्व और विश्वसनीयता थी.’

फिर एमसीआई ने लागू किया नियम
MCI ने एक नियम लागू किया जिसके तहत MS या MD की डिग्री वाले पोस्ट-ग्रेजुएट डॉक्टरों को, जिन्होंने किसी विशेष कैंसर अस्पताल में सीनियर रेजिडेंट या फेलो के तौर पर दो साल का अनुभव प्राप्त किया हो, तब तक शिक्षक माना जा सकता था जब तक कि भारत में पर्याप्त संख्या में डिग्रीधारी ऑन्कोलॉजिस्ट उपलब्ध नहीं हो जाते. इस प्रकार, कई प्रशिक्षित फेलो ने सरकारी कैंसर संस्थानों में शिक्षण के पद संभाले, और समय के साथ, उनमें से कुछ छोटे शहरों में चले गए ताकि वे अपनी स्वतंत्र प्रैक्टिस शुरू कर सकें.

लेकिन 2020 में, MCI की जगह एनएमसी ने ले ली, जिसने ऐसे दिशानिर्देश जारी किए जिनके अनुसार ऑन्कोलॉजिस्ट के पास मान्यता प्राप्त डिग्रियां होना अनिवार्य था. इन दिशानिर्देशों में फेलोशिप का कोई जिक्र नहीं किया गया था.

अब फिर से उठा है मुद्दा
एनएचए के CEO डॉ. सुनील कुमार बर्नवाल ने कहा कि NHA अस्पतालों को पैनल में शामिल करता है, डॉक्टरों को नहीं, और डॉक्टरों की योग्यता NMC तय करता है. NMC के चेयरमैन डॉ. अभिजात सेठ से संपर्क करने की कोशिशें नाकाम रहीं, लेकिन उनसे मिलने वाले डॉक्टरों ने बताया कि उन्होंने उन्हें NHA से संपर्क करने को कहा था.

इस बीच, राज्य के अधिकारियों ने डॉक्टरों से इस मामले में NHA और NMC से लिखित स्पष्टीकरण लेने को कहा है, चूंकि ऐसा कोई स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है, इसलिए गतिरोध जारी है.

इस बीच, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन समेत कई मेडिकल एसोसिएशन ने इस मुद्दे को NMC और NHA के सामने उठाया है. डॉक्टरों का तर्क है कि यह नियम पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता. इंडियन एसोसिएशन ऑफ सर्जिकल ऑन्कोलॉजी चाहता है कि पात्रता का दायरा उन ऑन्कोलॉजिस्ट तक बढ़ाया जाए जो प्रमुख संस्थानों से फेलोशिप प्राप्त हैं या जिन्होंने ऐसे केंद्रों में कम से कम दो साल की ट्रेनिंग ली है.

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ऑन्कोलॉजिस्टों ने बताया कि पीएमजेएवाई के नए नियमों का हवाला देकर कई राज्य प्राइवेट सेक्टर के सैकड़ों अनुभवी, फेलोशिप-ट्रेनिंग पाए ऑन्कोलॉजिस्ट को आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY) के मरीजों का इलाज करने से रोक रहे हैं.

डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें इसलिए नहीं रोका जा रहा कि उनकी ट्रेनिंग या अनुभव कम है, बल्कि इसलिए इलाज नहीं करने दिया जा रहा है कि उनके पास एनएमसी से मान्यता प्राप्त DM, MCh या DrNB जैसी सुपर-स्पेशियलिटी डिग्रियां नहीं हैं.

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर में इस कदम से प्रभावित डॉक्टरों ने बताया कि कुछ दशक पहले तक, ऑन्कोलॉजी में आने का एकमात्र रास्ता फेलोशिप ही था. तब कोई औपचारिक कोर्स मौजूद नहीं थे. आज भी, पीजी डॉक्टरों के लिए कैंसर अस्पतालों में सिर और गर्दन की सर्जरी, स्त्री रोग-ऑन्कोलॉजी, रक्त-ऑन्कोलॉजी या बच्चों की कैंसर सर्जरी में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के लिए 2-3 साल की फेलोशिप हासिल करना बहुत प्रतिष्ठित माना जाता है.

उन्होंने कहा कि जिन लोगों को अब नए नियम के चलते अयोग्य बताया जा रहा है उनमें से कई आगे चलकर डिपार्टमेंट के हेड, मेडिकल डायरेक्टर, टीचर और सीनियर सर्जन बन चुके हैं. ये दशकों से कैंसर के मरीजों का इलाज कर रहे हैं. सूरत के डॉ. हेमिश कानिया, जिन्होंने राज्यों भर में प्रभावित ऐसे 300 से ज्यादा डॉक्टरों का डेटा इकट्ठा किया है, ने बताया कि जिन डॉक्टरों को अब रोका जा रहा है, उनमें से कुछ ने तो DM या DrNB के छात्रों को ऑन्कोलॉजी भी पढ़ाई है.

इस नियम से बढ़ रही डॉक्टरों की कमी
योग्यता के नियमों में यह बदलाव न केवल भारत में कैंसर के बढ़ते बोझ की वजह से चौंकाने वाला है, बल्कि कैंसर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की कमी की वजह से भी हैरान करने वाला है. भारत में हर दस लाख लोगों पर लगभग एक मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट है और सिर्फ 4,000 के करीब ऑन्कोसर्जन हैं. ऐसे में PMJAY से जुड़े इलाज से 300 प्रशिक्षित स्पेशलिस्ट डॉक्टरों को बाहर करने से इलाज तक पहुंच कम हो सकती है, खासकर छोटे शहरों में जहां प्राइवेट इंश्योरेंस की पहुंच कम है, और उन गरीब मरीजों के लिए तो यह बहुत बड़ी दिक्कत बन सकती है जो सरकारी मेडिकल इंश्योरेंस का लाभ उठाते हैं.

क्या फेलोशिप बेकार हैं?
डॉ. किशन(बदला हुआ नाम) UP के एक 42 साल के जनरल सर्जन ने बताया कि उन्होंने टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, परेल से सिर और गर्दन के कैंसर में तीन साल की फेलोशिप पूरी की थी, 2021 में, वह अपने टियर-II शहर में वापस लौटे, इस उम्मीद के साथ कि कैंसर देखभाल में मौजूद कमी को पूरा कर सकेंगे, लेकिन शहर में केवल छह ऑन्कोसर्जन थे, जिनमें से चार फेलोशिप-प्रशिक्षित थे. हालांकि, उन्होंने पाया कि उन्हें PMJAY के कैंसर मरीजों का ऑपरेशन करने से रोक दिया गया है. उन्होंने कहा, अगर छह में से चार निजी क्षेत्र के कैंसर सर्जनों को बाहर कर दिया जाए, तो PMJAY के मरीजों को लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता है.’

वहीं एक अन्य डॉक्टर ने बताया कि वह सुरक्षित हैं क्योंकि वह एक सरकारी अस्पताल में काम करते हैं. उन्होंने कहा,’सरकारी अस्पतालों में टीम में कम से कम एक सदस्य ऐसा होने की संभावना होती है जिसे PMJAY के तहत मान्यता प्राप्त हो, लेकिन अगर मैं निजी क्षेत्र में कदम रखता हूं, तो स्थिति अलग हो सकती है.’

कुछ डॉक्टरों ने बताया कि उनके नाम HEM 2.0 पोर्टल से हटा दिए गए हैं. इस पोर्टल का इस्तेमाल राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) द्वारा PMJAY के प्रबंधन के लिए किया जाता है. डॉक्टरों ने कहा कि अस्पताल अपने अनुबंध खत्म कर रहे हैं क्योंकि ये विशेषज्ञ अब PMJAY के तहत क्लेम (दावे) जेनरेट नहीं कर सकते.

क्यों हो रही ये दिक्कत
डॉक्टरों ने बताया कि कई मुद्दों के कारण यह मौजूदा समस्या खड़ी हुई है, विशेष रूप से राज्य के स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा एनएचए और एनएमसी के नियमों की व्याख्या का तरीका. इस समस्या की जड़ 2018 से पहले के समय में ढूंढी जा सकती है, जब तत्कालीन भारतीय चिकित्सा परिषद (MCI) ने ऑन्कोलॉजी शिक्षकों की संख्या बढ़ाने के प्रयास शुरू किए थे.

टाटा मेमोरियल सेंटर के पूर्व अकादमिक डीन, डॉ. केएस शर्मा ने कहा कि 2002 और 2010 के बीच, मेडिकल और सर्जिकल ऑन्कोलॉजी में DM और MCh की सीटें बहुत कम थीं. 2011 में, जब वह तत्कालीन MCI के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में शामिल हुए, तो उन्होंने प्रतिष्ठित कैंसर अस्पतालों में फेलोशिप कार्यक्रमों का विस्तार करके शिक्षकों की कमी को दूर करने की एक योजना बनाई. उन्होंने कहा, ‘इन फेलोशिप को MCI द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं थी, लेकिन इनका अपना एक महत्व और विश्वसनीयता थी.’

फिर एमसीआई ने लागू किया नियम
MCI ने एक नियम लागू किया जिसके तहत MS या MD की डिग्री वाले पोस्ट-ग्रेजुएट डॉक्टरों को, जिन्होंने किसी विशेष कैंसर अस्पताल में सीनियर रेजिडेंट या फेलो के तौर पर दो साल का अनुभव प्राप्त किया हो, तब तक शिक्षक माना जा सकता था जब तक कि भारत में पर्याप्त संख्या में डिग्रीधारी ऑन्कोलॉजिस्ट उपलब्ध नहीं हो जाते. इस प्रकार, कई प्रशिक्षित फेलो ने सरकारी कैंसर संस्थानों में शिक्षण के पद संभाले, और समय के साथ, उनमें से कुछ छोटे शहरों में चले गए ताकि वे अपनी स्वतंत्र प्रैक्टिस शुरू कर सकें.

लेकिन 2020 में, MCI की जगह एनएमसी ने ले ली, जिसने ऐसे दिशानिर्देश जारी किए जिनके अनुसार ऑन्कोलॉजिस्ट के पास मान्यता प्राप्त डिग्रियां होना अनिवार्य था. इन दिशानिर्देशों में फेलोशिप का कोई जिक्र नहीं किया गया था.

अब फिर से उठा है मुद्दा
एनएचए के CEO डॉ. सुनील कुमार बर्नवाल ने कहा कि NHA अस्पतालों को पैनल में शामिल करता है, डॉक्टरों को नहीं, और डॉक्टरों की योग्यता NMC तय करता है. NMC के चेयरमैन डॉ. अभिजात सेठ से संपर्क करने की कोशिशें नाकाम रहीं, लेकिन उनसे मिलने वाले डॉक्टरों ने बताया कि उन्होंने उन्हें NHA से संपर्क करने को कहा था.

इस बीच, राज्य के अधिकारियों ने डॉक्टरों से इस मामले में NHA और NMC से लिखित स्पष्टीकरण लेने को कहा है, चूंकि ऐसा कोई स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है, इसलिए गतिरोध जारी है.

इस बीच, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन समेत कई मेडिकल एसोसिएशन ने इस मुद्दे को NMC और NHA के सामने उठाया है. डॉक्टरों का तर्क है कि यह नियम पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता. इंडियन एसोसिएशन ऑफ सर्जिकल ऑन्कोलॉजी चाहता है कि पात्रता का दायरा उन ऑन्कोलॉजिस्ट तक बढ़ाया जाए जो प्रमुख संस्थानों से फेलोशिप प्राप्त हैं या जिन्होंने ऐसे केंद्रों में कम से कम दो साल की ट्रेनिंग ली है.

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