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Hormuz Strait Crisis; Iran US War Impact

Hormuz Strait Crisis; Iran US War Impact

वॉशिंगटन डीसी4 घंटे पहले

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ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच चल रहा युद्ध अब इतना बढ़ गया है कि होर्मुज स्ट्रेट लगभग बंद हो गया है। इस वजह से सैकड़ों तेल टैंकर दोनों तरफ खड़े हैं और आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। इससे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर चुकी हैं। इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा है कि वह इस समुद्री रास्ते को ‘किसी भी तरह’ फिर से खोलेंगे। लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह काम इतना आसान नहीं है। अगर ईरान से कोई समझौता नहीं होता या अमेरिका कोई बड़ा मिलिट्री एक्शन नहीं लेता, तो इस रास्ते पर पूरी तरह से आवाजाही बहाल करना मुश्किल होगा।

संकरे रास्ते का फायदा उठाता है ईरान

ईरान की मजबूती की सबसे बड़ी वजह इस इलाके की भौगोलिक स्थिति है। होर्मुज स्ट्रेट बहुत संकरा और उथला है। यहां से गुजरने वाले जहाजों को ईरान के पहाड़ी तट के बहुत करीब से गुजरना पड़ता है। यही वजह है कि ईरान इस इलाके का फायदा उठाकर दुश्मनों पर हमले करता है।

ईरान के पास ऐसे हथियार हैं जो छोटे होते हैं, आसानी से छिपाए जा सकते हैं और अचानक इस्तेमाल किए जा सकते हैं। ये हथियार पहाड़ों, गुफाओं और सुरंगों में छिपे होते हैं। जरूरत पड़ने पर इन्हें तट के पास से ही लॉन्च किया जा सकता है।

इस वजह से जहाजों को हमला होने पर प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत कम समय मिलता है। जैसे ही मिसाइल या ड्रोन दिखाई देता है, उसके बाद कार्रवाई के लिए सिर्फ कुछ मिनट ही होते हैं।

ट्रम्प के लिए होर्मुज का हल ढूंढना बहुत मुश्किल

ट्रम्प ने इस रास्ते को खोलने के लिए कई बार अलग-अलग दावे कर चुके हैं। एक बार तो उन्होंने यह भी कहा कि वह ईरान के सुप्रीम लीडर के साथ मिलकर इस रास्ते को कंट्रोल कर सकते हैं। लेकिन असल में अमेरिका जिन विकल्पों पर विचार कर रहा है, उनमें ज्यादातर सैन्य कार्रवाई ही शामिल है।

अगर अमेरिका सैन्य ताकत से इस रास्ते को खोलना चाहता है, तो सबसे पहले उसे ईरान की हमले की क्षमता खत्म करनी होगी। यानी उसे मिसाइल सिस्टम, ड्रोन और उन ठिकानों को नष्ट करना होगा जहां से ईरान जहाजों पर हमला कर सकता है।

लेकिन अब तक अमेरिका और इजराइल के हजारों हमलों के बावजूद ईरान की यह क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि ईरान के पास कई जगहों पर मिसाइल बैटरी हो सकती हैं और वे मोबाइल भी होती हैं, यानी उन्हें जल्दी-जल्दी एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है। इसलिए उन्हें ढूंढना और खत्म करना बहुत मुश्किल है।

अमेरिकी वॉरशिप भी होर्मुज में सुरक्षित नहीं

ट्रम्प ने यह भी कहा है कि जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए नौसेना के जहाज उनके साथ चल सकते हैं। इसे एस्कॉर्ट ऑपरेशन कहा जाता है। इसमें वॉरशिप टैंकरों के साथ चलेंगे, ऊपर से विमान निगरानी करेंगे, ड्रोन को मार गिराएंगे और तट पर मौजूद मिसाइल ठिकानों पर हमला करेंगे।

इसके साथ ही समुद्र में अगर बारूदी सुरंगें (माइंस) बिछाई गई हैं, तो उन्हें हटाने के लिए माइंसवीपर जहाजों को लगाया जाएगा। लेकिन यह सब करना बहुत बड़ा और जटिल सैन्य अभियान होगा। इसमें काफी समय, संसाधन और जोखिम शामिल होंगे।

वॉरशिप खुद भी इस इलाके में पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि होर्मुज जैसे संकरे इलाके में जहाजों को चारों तरफ से खतरा रहता है। ड्रोन और मिसाइल से बचाव करना यहां और मुश्किल हो जाता है।

समुद्र में बिछी माइंस सबसे बड़ा खतरा

सबसे बड़ा खतरा समुद्र में बिछाई गई माइंस से है। अगर पानी में माइंस होने का जरा सा भी शक हो, तो कोई भी देश अपने बड़े जहाज वहां भेजने का जोखिम नहीं उठाएगा।

माइंस हटाने का काम बहुत धीमा होता है और इसमें कई हफ्ते लग सकते हैं। इस दौरान जो टीमें माइंस हटाती हैं, उन्हें भी सुरक्षा की जरूरत होती है, क्योंकि वे खुद हमले का आसान निशाना बन सकती हैं।

जमीन पर कार्रवाई का विकल्प भी मौजूद है। अमेरिकी मरीन सैनिक इस इलाके की तरफ भेजे जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि उन्हें स्ट्रेट के आसपास के छोटे-छोटे द्वीपों पर तैनात किया जा सकता है, जहां से वे हमले रोकने या एयर डिफेंस सिस्टम लगाने का काम कर सकते हैं।

लेकिन ईरान की बड़ी आर्मी को देखते हुए उसके मुख्य इलाके में घुसना बहुत जोखिम भरा होगा। अगर अमेरिकी सैनिक मारे गए या पकड़ लिए गए, तो इससे हालात और बिगड़ सकते हैं और युद्ध और बढ़ सकता है।

मान लें कि अमेरिका किसी तरह इस रास्ते को खोल भी देता है, तब भी समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। सिर्फ एक मिसाइल या ड्रोन हमला भी फिर से डर पैदा कर सकता है और जहाज कंपनियां दोबारा इस रास्ते से गुजरने से बचेंगी।

फारस की खाड़ी में फंसे 500 तेल टैंकर

इस समय फारस की खाड़ी में करीब 500 तेल टैंकर खड़े हैं और ज्यादातर आगे नहीं बढ़ रहे हैं। युद्ध से पहले हर दिन लगभग 80 तेल और गैस के टैंकर इस रास्ते से गुजरते थे।

अब जहाज मालिक और बीमा कंपनियां तभी तैयार होंगी जब उन्हें लगेगा कि खतरा काफी कम हो गया है। अगर जोखिम ज्यादा रहा, तो वे इस रास्ते का इस्तेमाल नहीं करेंगे।

भले ही अमेरिका बड़ा एस्कॉर्ट ऑपरेशन शुरू कर दे, लेकिन वह एक समय में सीमित जहाजों को ही सुरक्षा दे सकता है। यानी सभी टैंकरों को एक साथ सुरक्षित निकालना संभव नहीं होगा।

इसके अलावा, ईरान ने सिर्फ होर्मुज स्ट्रेट में ही नहीं, बल्कि फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी में भी जहाजों पर हमले किए हैं। इसका मतलब है कि जहाजों को पूरे रास्ते में सुरक्षा देनी होगी, जिससे यह मिशन और लंबा और जटिल हो जाता है।

इतना बड़ा सैन्य अभियान अमेरिका की बाकी सैन्य ताकत पर भी दबाव डाल सकता है, क्योंकि उसे अपने संसाधन दूसरे इलाकों से हटाने पड़ सकते हैं। आखिर में विशेषज्ञ यही मानते हैं कि जब तक ईरान की तरफ से खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता, तब तक इस स्ट्रेट में सामान्य स्थिति लौटना मुश्किल है।

और सबसे अहम बात है कि इस समस्या का स्थायी समाधान सैन्य कार्रवाई से नहीं, बल्कि बातचीत और राजनीतिक समझौते से ही निकल सकता है।

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ईरान जंग से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें…

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इनमें USS त्रिपोली, USS सैन डिएगो, USS न्यू ऑरलियंस शामिल हैं। इन पर करीब 2200 सैनिक तैनात हैं। ये सभी सैनिक 31st मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट (MEU) का हिस्सा हैं, जिसे तुरंत एक्शन के लिए तैयार रखा जाता है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

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इस वजह से जहाजों को हमला होने पर प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत कम समय मिलता है। जैसे ही मिसाइल या ड्रोन दिखाई देता है, उसके बाद कार्रवाई के लिए सिर्फ कुछ मिनट ही होते हैं।

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अगर अमेरिका सैन्य ताकत से इस रास्ते को खोलना चाहता है, तो सबसे पहले उसे ईरान की हमले की क्षमता खत्म करनी होगी। यानी उसे मिसाइल सिस्टम, ड्रोन और उन ठिकानों को नष्ट करना होगा जहां से ईरान जहाजों पर हमला कर सकता है।

लेकिन अब तक अमेरिका और इजराइल के हजारों हमलों के बावजूद ईरान की यह क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि ईरान के पास कई जगहों पर मिसाइल बैटरी हो सकती हैं और वे मोबाइल भी होती हैं, यानी उन्हें जल्दी-जल्दी एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है। इसलिए उन्हें ढूंढना और खत्म करना बहुत मुश्किल है।

अमेरिकी वॉरशिप भी होर्मुज में सुरक्षित नहीं

ट्रम्प ने यह भी कहा है कि जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए नौसेना के जहाज उनके साथ चल सकते हैं। इसे एस्कॉर्ट ऑपरेशन कहा जाता है। इसमें वॉरशिप टैंकरों के साथ चलेंगे, ऊपर से विमान निगरानी करेंगे, ड्रोन को मार गिराएंगे और तट पर मौजूद मिसाइल ठिकानों पर हमला करेंगे।

इसके साथ ही समुद्र में अगर बारूदी सुरंगें (माइंस) बिछाई गई हैं, तो उन्हें हटाने के लिए माइंसवीपर जहाजों को लगाया जाएगा। लेकिन यह सब करना बहुत बड़ा और जटिल सैन्य अभियान होगा। इसमें काफी समय, संसाधन और जोखिम शामिल होंगे।

वॉरशिप खुद भी इस इलाके में पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि होर्मुज जैसे संकरे इलाके में जहाजों को चारों तरफ से खतरा रहता है। ड्रोन और मिसाइल से बचाव करना यहां और मुश्किल हो जाता है।

समुद्र में बिछी माइंस सबसे बड़ा खतरा

सबसे बड़ा खतरा समुद्र में बिछाई गई माइंस से है। अगर पानी में माइंस होने का जरा सा भी शक हो, तो कोई भी देश अपने बड़े जहाज वहां भेजने का जोखिम नहीं उठाएगा।

माइंस हटाने का काम बहुत धीमा होता है और इसमें कई हफ्ते लग सकते हैं। इस दौरान जो टीमें माइंस हटाती हैं, उन्हें भी सुरक्षा की जरूरत होती है, क्योंकि वे खुद हमले का आसान निशाना बन सकती हैं।

जमीन पर कार्रवाई का विकल्प भी मौजूद है। अमेरिकी मरीन सैनिक इस इलाके की तरफ भेजे जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि उन्हें स्ट्रेट के आसपास के छोटे-छोटे द्वीपों पर तैनात किया जा सकता है, जहां से वे हमले रोकने या एयर डिफेंस सिस्टम लगाने का काम कर सकते हैं।

लेकिन ईरान की बड़ी आर्मी को देखते हुए उसके मुख्य इलाके में घुसना बहुत जोखिम भरा होगा। अगर अमेरिकी सैनिक मारे गए या पकड़ लिए गए, तो इससे हालात और बिगड़ सकते हैं और युद्ध और बढ़ सकता है।

मान लें कि अमेरिका किसी तरह इस रास्ते को खोल भी देता है, तब भी समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। सिर्फ एक मिसाइल या ड्रोन हमला भी फिर से डर पैदा कर सकता है और जहाज कंपनियां दोबारा इस रास्ते से गुजरने से बचेंगी।

फारस की खाड़ी में फंसे 500 तेल टैंकर

इस समय फारस की खाड़ी में करीब 500 तेल टैंकर खड़े हैं और ज्यादातर आगे नहीं बढ़ रहे हैं। युद्ध से पहले हर दिन लगभग 80 तेल और गैस के टैंकर इस रास्ते से गुजरते थे।

अब जहाज मालिक और बीमा कंपनियां तभी तैयार होंगी जब उन्हें लगेगा कि खतरा काफी कम हो गया है। अगर जोखिम ज्यादा रहा, तो वे इस रास्ते का इस्तेमाल नहीं करेंगे।

भले ही अमेरिका बड़ा एस्कॉर्ट ऑपरेशन शुरू कर दे, लेकिन वह एक समय में सीमित जहाजों को ही सुरक्षा दे सकता है। यानी सभी टैंकरों को एक साथ सुरक्षित निकालना संभव नहीं होगा।

इसके अलावा, ईरान ने सिर्फ होर्मुज स्ट्रेट में ही नहीं, बल्कि फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी में भी जहाजों पर हमले किए हैं। इसका मतलब है कि जहाजों को पूरे रास्ते में सुरक्षा देनी होगी, जिससे यह मिशन और लंबा और जटिल हो जाता है।

इतना बड़ा सैन्य अभियान अमेरिका की बाकी सैन्य ताकत पर भी दबाव डाल सकता है, क्योंकि उसे अपने संसाधन दूसरे इलाकों से हटाने पड़ सकते हैं। आखिर में विशेषज्ञ यही मानते हैं कि जब तक ईरान की तरफ से खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता, तब तक इस स्ट्रेट में सामान्य स्थिति लौटना मुश्किल है।

और सबसे अहम बात है कि इस समस्या का स्थायी समाधान सैन्य कार्रवाई से नहीं, बल्कि बातचीत और राजनीतिक समझौते से ही निकल सकता है।

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इनमें USS त्रिपोली, USS सैन डिएगो, USS न्यू ऑरलियंस शामिल हैं। इन पर करीब 2200 सैनिक तैनात हैं। ये सभी सैनिक 31st मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट (MEU) का हिस्सा हैं, जिसे तुरंत एक्शन के लिए तैयार रखा जाता है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

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