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India Eases FDI Rules for China & Neighbouring Countries: Press Note 3 Amended

India Eases FDI Rules for China & Neighbouring Countries: Press Note 3 Amended
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नई दिल्ली11 मिनट पहले

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केंद्र सरकार ने चीन सहित भारत के साथ जमीनी सीमा यानी बॉर्डर शेयर करने वाले देशों से आने वाले फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) के नियमों में ढील दी है। PM मोदी की अध्यक्षता में मंगलवार (10 मार्च) को हुई कैबिनेट मीटिंग में प्रेस नोट 3 यानी FDI पॉलिसी के प्रावधानों में संशोधन यानी बदलाव को मंजूरी दी गई।

नए नियमों के तहत अब उन निवेश प्रस्तावों को ‘ऑटोमैटिक रूट’ से मंजूरी मिल जाएगी, जिनमें पड़ोसी देश के निवेशक की हिस्सेदारी 10% से कम हो और उसका कंपनी पर कोई कंट्रोल न हो। इसके साथ ही, स्ट्रैटेजिक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में निवेश के लिए 60 दिनों की समय सीमा तय कर दी गई है।

स्टार्टअप्स और डीप टेक कंपनियों को फायदा मिलेगा

सरकार के इस फैसले का सबसे बड़ा असर भारतीय स्टार्टअप्स और डीप टेक सेक्टर पर पड़ेगा। सरकार का कहना है कि इन बदलावों का उद्देश्य ग्लोबल फंड्स से निवेश हासिल करना और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को बढ़ावा देना है।

अब तक प्रेस नोट 3 की वजह से कई ग्लोबल प्राइवेट इक्विटी (PE) और वेंचर कैपिटल (VC) फंड्स को निवेश करने में परेशानी हो रही थी, क्योंकि उनमें पड़ोसी देशों के निवेशकों का छोटा हिस्सा भी शामिल होता था। अब 10% की सीमा तय होने से फंड का फ्लो आसान हो जाएगा।

FDI के नियमों में क्या-क्या बदला

पुराने नियम नए नियम
पड़ोसी देशों से हर निवेश के लिए सरकारी मंजूरी जरूरी थी। 10% से कम ‘बेनिफिशियल ओनरशिप’ पर निवेश को ऑटोमैटिक अनुमति।
अप्रूवल मिलने में महीनों का समय लगता था, कोई डेडलाइन नहीं थी। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए 60 दिन की समय सीमा तय की गई है।
‘बेनिफिशियल ओनर’ की परिभाषा को लेकर अस्पष्टता थी। PMLA एक्ट के तहत 10% की लिमिट और स्पष्ट परिभाषा लागू की।

‘बेनिफिशियल ओनर’ की परिभाषा साफ हुई

  • सरकार ने निवेश के नियमों में पारदर्शिता लाने के लिए ‘बेनिफिशियल ओनर’ की परिभाषा को अब प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) रूल्स, 2005 के समान कर दिया है।
  • अगर किसी निवेश में लैंड बॉर्डर वाले देश के निवेशक की हिस्सेदारी 10% से कम है और वह कंपनी के फैसलों को प्रभावित नहीं करता है, तो उसे सरकारी मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होगी।
  • ऐसी स्थिति में भारतीय कंपनी को सिर्फ डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (DPIIT) यानी उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग को इसकी जानकारी देनी होगी।

60 दिन में निवेश पर फैसला, जॉइंट वेंचर बनाना आसान

कैबिनेट ने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए एक ‘फास्ट ट्रैक’ अप्रूवल सिस्टम को भी हरी झंडी दी है। अब स्पेशल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टरों में निवेश के प्रस्तावों पर सरकार को 60 दिनों के भीतर फैसला लेना होगा।

इससे भारतीय कंपनियों को विदेशी कंपनियों के साथ मिलकर टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप करने और जॉइंट वेंचर बनाने में मदद मिलेगी। सरकार का मानना है कि इससे भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बनने में आसानी होगी।

इलेक्ट्रॉनिक और सोलर सेक्टर को सबसे ज्यादा फायदा होगा

सरकार ने साफ किया है कि इन बदलावों से विशेष रूप से तीन सेक्टरों को सबसे ज्यादा फायदा होगा…

  • इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स: मोबाइल-लैपटॉप के पार्ट्स बनाने वाली कंपनियों को विदेशी निवेश और तकनीक मिल सकेगी।
  • कैपिटल गुड्स: भारी मशीनरी और इंडस्ट्रियल इक्विपमेंट के प्रोडक्शन में तेजी आएगी।
  • सोलर सेल्स: रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।

सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं, भारतीय कंट्रोल जरूरी

नियमों में ढील के बावजूद सरकार ने सुरक्षा को बरकरार रखा है। संवेदनशील सेक्टर में फास्ट-ट्रैक अप्रूवल तभी मिलेगा, जब उस कंपनी की मेजोरिटी शेयरहोल्डिंग और कंट्रोल भारतीय नागरिकों या भारतीय कंपनियों के पास ही रहे।

यह सुनिश्चित किया गया है कि किसी भी निवेश से देश की सुरक्षा को खतरा न हो और कंपनी का कमांड भारतीय हाथों में ही रहे।

FDI पॉलिसी को 2020 में लागू किया गया था

  • अप्रैल 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान केंद्र सरकार ने प्रेस नोट 3 यानी FDI पॉलिसी को लागू किया था। उस समय भारतीय कंपनियों की वैल्यूएशन काफी गिर गई थी।
  • सरकार को डर था कि चीन जैसे पड़ोसी देश की कंपनियां इस मौके का फायदा उठाकर भारतीय कंपनियों का ‘अवसरवादी अधिग्रहण’ कर सकती हैं।
  • इसी को रोकने के लिए नियम बनाया गया था कि पड़ोसी देशों से आने वाले हर छोटे-बड़े निवेश के लिए सरकार की मंजूरी अनिवार्य होगी।

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रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ती जंग और होर्मुज रूट प्रभावित होने के कारण कच्चे तेल की कीमतों और जेट फ्यूल के दाम में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। जिसका असर ग्लोबल एविएशन इंडस्ट्री पर भी दिखने लगा है। पूरी खबर पढ़ें…

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केंद्र सरकार ने चीन सहित भारत के साथ जमीनी सीमा यानी बॉर्डर शेयर करने वाले देशों से आने वाले फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) के नियमों में ढील दी है। PM मोदी की अध्यक्षता में मंगलवार (10 मार्च) को हुई कैबिनेट मीटिंग में प्रेस नोट 3 यानी FDI पॉलिसी के प्रावधानों में संशोधन यानी बदलाव को मंजूरी दी गई।

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अब तक प्रेस नोट 3 की वजह से कई ग्लोबल प्राइवेट इक्विटी (PE) और वेंचर कैपिटल (VC) फंड्स को निवेश करने में परेशानी हो रही थी, क्योंकि उनमें पड़ोसी देशों के निवेशकों का छोटा हिस्सा भी शामिल होता था। अब 10% की सीमा तय होने से फंड का फ्लो आसान हो जाएगा।

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अप्रूवल मिलने में महीनों का समय लगता था, कोई डेडलाइन नहीं थी। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए 60 दिन की समय सीमा तय की गई है।
‘बेनिफिशियल ओनर’ की परिभाषा को लेकर अस्पष्टता थी। PMLA एक्ट के तहत 10% की लिमिट और स्पष्ट परिभाषा लागू की।

‘बेनिफिशियल ओनर’ की परिभाषा साफ हुई

  • सरकार ने निवेश के नियमों में पारदर्शिता लाने के लिए ‘बेनिफिशियल ओनर’ की परिभाषा को अब प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) रूल्स, 2005 के समान कर दिया है।
  • अगर किसी निवेश में लैंड बॉर्डर वाले देश के निवेशक की हिस्सेदारी 10% से कम है और वह कंपनी के फैसलों को प्रभावित नहीं करता है, तो उसे सरकारी मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होगी।
  • ऐसी स्थिति में भारतीय कंपनी को सिर्फ डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (DPIIT) यानी उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग को इसकी जानकारी देनी होगी।

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  • सोलर सेल्स: रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।

सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं, भारतीय कंट्रोल जरूरी

नियमों में ढील के बावजूद सरकार ने सुरक्षा को बरकरार रखा है। संवेदनशील सेक्टर में फास्ट-ट्रैक अप्रूवल तभी मिलेगा, जब उस कंपनी की मेजोरिटी शेयरहोल्डिंग और कंट्रोल भारतीय नागरिकों या भारतीय कंपनियों के पास ही रहे।

यह सुनिश्चित किया गया है कि किसी भी निवेश से देश की सुरक्षा को खतरा न हो और कंपनी का कमांड भारतीय हाथों में ही रहे।

FDI पॉलिसी को 2020 में लागू किया गया था

  • अप्रैल 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान केंद्र सरकार ने प्रेस नोट 3 यानी FDI पॉलिसी को लागू किया था। उस समय भारतीय कंपनियों की वैल्यूएशन काफी गिर गई थी।
  • सरकार को डर था कि चीन जैसे पड़ोसी देश की कंपनियां इस मौके का फायदा उठाकर भारतीय कंपनियों का ‘अवसरवादी अधिग्रहण’ कर सकती हैं।
  • इसी को रोकने के लिए नियम बनाया गया था कि पड़ोसी देशों से आने वाले हर छोटे-बड़े निवेश के लिए सरकार की मंजूरी अनिवार्य होगी।

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रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ती जंग और होर्मुज रूट प्रभावित होने के कारण कच्चे तेल की कीमतों और जेट फ्यूल के दाम में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। जिसका असर ग्लोबल एविएशन इंडस्ट्री पर भी दिखने लगा है। पूरी खबर पढ़ें…

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