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Nepal Flood Warning Vs China; Tibet Border Disaster Alert System Explained

Nepal Flood Warning Vs China; Tibet Border Disaster Alert System Explained

26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर आई बाढ़ में 200 से ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो गई है। करीब 1,500 लोग अब भी लापता हैं। दावा किया जा रहा कि काफी जानें बचाई जा सकती थीं, अगर चीन ने समय पर चेता दिया होता।

.

तो क्या वाकई नेपाल में हुई भीषण तबाही के पीछे चीन जिम्मेदार है; दोनों देशों के बीच आपदाओं की वार्निंग देने का क्या सिस्टम है, इसी पर आज का एक्सप्लेनर…

सवाल-1: नेपाल में आई बाढ़ के पीछे चीन पर क्या आरोप लग रहे?

जवाब: नेपाली पत्रकार परशुराम काफ्ले ने X पर लिखा, ‘चीन ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। अगर बीजिंग के डिजास्टर डिटेक्शन सिस्टम से अर्ली वार्निंग मिल जाती, तो नेपाल में ज्यादा जानें बचाई जा सकती थीं। नेपाल हमेशा चीन की चिंताओं का ध्यान रखता है। इस एकतरफा प्यार की कीमत चुकानी पड़ रही है।’

नेपाल के मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक, नेपाल और चीन के बीच मौसम से जुड़ी जानकारियां शेयर करने की व्यवस्था है, लेकिन इस घटना के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं दी गई।

नेपाल के मौसम विभाग की सीनियर साइंटिस्ट विभूति पोखरेल कहती हैं, ‘हम चीनी अधिकारियों के संपर्क में हैं, लेकिन अभी तक वे नहीं बता पाए हैं कि बाढ़ की वजह क्या है।’

2016 में भी नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर रसुवागढ़ी इलाके में भीषण बाढ़ आई थी। तब भी एक्सपर्ट्स ने कहा था कि दोनों देशों के बीच समय रहते इन्फॉर्मेशन शेयर की गई होती, तो नुकसान कम किया जा सकता था।

बाढ़ की वजह से नेपाल-चीन को जोड़ने वाला रसुवागढ़ी-ग्यिरोंग क्रॉस-बॉर्डर लैंड पोर्ट डैमेज हो गया। तिब्बत के इमिग्रेशन कॉम्पलेक्स के ऊपर से सैलाब आता हुआ दिख रहा है।

सवाल-2: दोनों देशों के बीच ऐसे हादसों की जानकारी देने का नियम है या नहीं?

जवाब: नेपाल और चीन के बीच मौसम और आपदा से जुड़ी जानकारियां साझा करने की बात तय हुई थी, लेकिन इस पर कोई औपचारिक समझौता नहीं हो पाया है।

दरअसल, 8 जुलाई 2025 को रसुवागढ़ी बॉर्डर पॉइंट से 35 किलोमीटर ऊपर चीन के इलाके में तिब्बत के पहाड़ों पर ‘पुरेपु’ नाम की ग्लेशियर झील फटी। इससे भोटेकोशी नदी के आसपास करीब 100 किमी तक के इलाके में बाढ़ का मलबा पहुंचा। एक दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी।

पिछले साल भोटेकोशी नदी पर आई बाढ़ में 9 लोगों की मौत हुई थी। कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट डैमेज हुए थे।

पिछले साल भोटेकोशी नदी पर आई बाढ़ में 9 लोगों की मौत हुई थी। कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट डैमेज हुए थे।

इसके बाद नेपाल और चीन ने तीन बातें तय की थीं…

  • दोनों देश आपस में बाढ़ वगैरह से जुड़ी रियल-टाइम जानकारी साझा करेंगे।
  • इसके लिए एक अर्ली वार्निंग सिस्टम बनाया जाएगा।
  • अगर पहाड़ों पर ग्लेशियर की झील फटने, यानी ‘ग्लेशियल आउटबर्स्ट फ्लड, GLOF का खतरा होगा, तो उसे भी फ्लैग करेंगे।

नेपाल की त्रिभुवन यूनिवर्सिटी में एनवायरनमेंट स्टडीज के प्रोफेसर सुदीप ठाकुर बताते हैं, ‘तिब्बत में मौसम से जुड़ी इन्फॉर्मेशन इकठ्ठा करने की व्यवस्था है, लेकिन उसे नेपाल के साथ साझा नहीं किया जाता है। चीन को वैज्ञानिक जानकारी देने में कोई परेशानी नहीं है, लेकिन शायद नेपाल सरकार ही मजबूती से अपनी मांग उनके सामने रख ही नहीं पाई है।’

नेपाल की डिजास्टर स्टडी सेंटर के डायरेक्टर वसंत अधिकारी भी कहते हैं कि अब तक जानकारी शेयर करने की कोई व्यवस्था नहीं है।

सवाल-3: जानकारी शेयर न करने के आरोप पर चीन ने क्या कहा है?

जवाब: चीन ने सीधे तौर पर इसका कोई जवाब नहीं दिया है, हालांकि चीनी दूतावास ने अपने बयान में कहा है कि भूकंप के चलते बाढ़ आई है और ये भूकंप नेपाल की तरफ आया था।

बयान में कहा गया, ‘रसुवा-ग्यिरोंग बॉर्डर इलाके में आई बाढ़ से चीन बेहद दुखी है। नेपाल की तरफ आए भूकंप के चलते हिमस्खलन हुआ और फिर मलबा बहा। इससे सीमा के दोनों तरफ लोगों की मौत हुई।’

दरअसल, पहले कहा गया था कि रिक्टर स्केल पर करीब 5 की तीव्रता के भूकंप के चलते बर्फ का ग्लेशियर टूटा, हालांकि बाद में अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे ने साफ किया कि भूकंप जैसा झटका बर्फ और चट्टान के टूटने से पैदा हुआ था।

हालांकि चीनी दूतावास ने ये जरूर कहा है, ‘भविष्य में सीमा पार मौसम और आपदाओं से जुड़ी जानकारियां साझा करने के लिए बेहतर तरीके से काम करेंगे।’

सवाल-4: बर्फ का पहाड़ चीन में गिरा या नेपाल में?

जवाब: नेपाल की डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी, NDRRMA के मुताबिक, ग्लेशियर टूटने की जगह नेपाल-चीन सीमा चौकी से लगभग 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। अथॉरिटी के वैज्ञानिक प्रकाश पोखरेल के मुताबिक, ‘ये इलाका नेपाली हिस्से में आता है, न कि चीन की तरफ।’

हालांकि, नेपाली मौसम वैज्ञानिक विभूति पोखरेल कहती हैं, ‘हम चीनी अधिकारियों के संपर्क में हैं, लेकिन अब तक ये पता नहीं है कि घटना नेपाल में हुई या चीन की तरफ हुई है।’

दरअसल, मानसून सीजन के चलते उस इलाके में काफी बादल हैं। इसलिए सेटेलाइट तस्वीरों से ये साफ नहीं हो पा रहा है कि ग्लेशियर टूटने की सटीक लोकेशन क्या है।

मोटे तौर पर जहां ग्लेशियर टूटा, वो इलाका सेंट्रल हिमालयन रेंज की क्रेस्टलाइन पर है। यानी अगर पहाड़ की एक तरफ की ढलान नेपाल में है, तो उसी पहाड़ की दूसरी तरफ की ढलान तिब्बत में है, जिस पर चीन का कंट्रोल है। करीब 8000 मीटर की ऊंचाई पर बर्फ और ग्लेशियर जमा रहते हैं, जो पिघलकर दोनों तरफ की नदियों के लिए पानी का सोर्स बनते हैं।

तकनीकी तौर पर अगर ऊंचाई पर कोई ग्लेशियर टूटे, तो उसका असर नीचे दोनों देशों के तरफ की नदियों पर पड़ सकता है।

पोइकू नदी तिब्बत के ग्लेशियर से निकलती है। फिर सीमा पार करके नेपाल में दाखिल होती है और वहां भोटेकोशी कही जाती है, इसी की सहायक नदी ल्हेंदे में बाढ़ आई।

एक बात और है- चीन के मुताबिक, पहले भूकंप आया और फिर ग्लेशियर टूटा। जबकि नेपाल सहित दुनियाभर के मौसम वैज्ञानिक मानते हैं कि पहले ग्लेशियर टूटा, जिससे भूकंप जैसा झटका महसूस हुआ।

सवाल-5: ग्लेशियर टूटने से नेपाल में इतनी भीषण तबाही कैसे आई? जवाबः पूरी घटना 3 स्टेप में समझिए….

1. ग्लेशियर टूटा: 26 अगस्त की सुबह करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर करीब 2000 फीट का ग्लेशियर टूटा और 4 हजार फीट नीचे गिर गया।

2: नदी में पानी जमा हुआ: सुबह करीब 8:37 बजे पिघला ग्लेशियर अपने साथ चट्टानों और मलबे को लेकर ल्हेंदे नदी से टकराया। इससे ल्हेंदे नदी पर एक अस्थायी बांध बन गया और पीछे पानी जमा होने लगा।

3. नदी का बांध टूटने से सैलाब बह चला: सुबह करीब 9 बजे बढ़ते पानी के दबाव से नदी का बांध टूटा, तो एक विशाल सैलाब बनकर निचले इलाकों की तरफ बह चला। आगे भोटे कोशी और त्रिशुली नदी में मलबे वाली बाढ़ आ गई।

फ्लैश फ्लड की वजह से 30 फीट ऊपर तक पानी की लहरी उड़ रही थी। 175 लोगों की मौत हो गई है और1500 से ज्यादा लापता हैं।

फ्लैश फ्लड की वजह से 30 फीट ऊपर तक पानी की लहरी उड़ रही थी। 175 लोगों की मौत हो गई है और1500 से ज्यादा लापता हैं।

नेपाल के रसुवा से नुवाकोट, धादिंग होते हुए चितवन तक भयावह बाढ़ का असर हुआ। रसुवा में करीब एक दर्जन बस्तियां प्रभावित हुईं। बाढ़ धादिंग जिले के गल्छी तक पहुंची और आगे मुग्लिन की ओर बढ़ने की चेतावनी दी गई।

खतरा अभी टला नहीं है। वैज्ञानिकों का कहना है कि नेपाल-चीन बॉर्डर के पास नदी में अब भी एक मलबे का अवरोध जमा है, जो किसी भी वक्त टूटकर सैलाब की एक दूसरी लहर छोड़ सकता है।

जिस त्रिशुली नदी में यह बाढ़ आई है वह आगे नारायणी नदी से मिलती है। यह भारत के बिहार तक आती है, जहां इसे गंडक नदी कहते हैं। इसे बिहार और यूपी के इलाके भी हाई अलर्ट पर रखे गए हैं।

———

ये वीडियो भी देखिए…

2000 फीट चौड़ा ग्लेशियर टूटा, बिना भूकंप कांपने लगी धरती:देखिए नेपाल की तबाही का शुरू से आखिर तक एक-एक सीन

26 अगस्त, सुबह 8:30 बजे। नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर मौसम साफ था। किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले 30 मिनट में क्या होने वाला है। शुरुआत से आखिर तक नेपाल की तबाही का एक-एक सीन, वीडियो देखिए…

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26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर आई बाढ़ में 200 से ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो गई है। करीब 1,500 लोग अब भी लापता हैं। दावा किया जा रहा कि काफी जानें बचाई जा सकती थीं, अगर चीन ने समय पर चेता दिया होता।

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तो क्या वाकई नेपाल में हुई भीषण तबाही के पीछे चीन जिम्मेदार है; दोनों देशों के बीच आपदाओं की वार्निंग देने का क्या सिस्टम है, इसी पर आज का एक्सप्लेनर…

सवाल-1: नेपाल में आई बाढ़ के पीछे चीन पर क्या आरोप लग रहे?

जवाब: नेपाली पत्रकार परशुराम काफ्ले ने X पर लिखा, ‘चीन ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। अगर बीजिंग के डिजास्टर डिटेक्शन सिस्टम से अर्ली वार्निंग मिल जाती, तो नेपाल में ज्यादा जानें बचाई जा सकती थीं। नेपाल हमेशा चीन की चिंताओं का ध्यान रखता है। इस एकतरफा प्यार की कीमत चुकानी पड़ रही है।’

नेपाल के मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक, नेपाल और चीन के बीच मौसम से जुड़ी जानकारियां शेयर करने की व्यवस्था है, लेकिन इस घटना के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं दी गई।

नेपाल के मौसम विभाग की सीनियर साइंटिस्ट विभूति पोखरेल कहती हैं, ‘हम चीनी अधिकारियों के संपर्क में हैं, लेकिन अभी तक वे नहीं बता पाए हैं कि बाढ़ की वजह क्या है।’

2016 में भी नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर रसुवागढ़ी इलाके में भीषण बाढ़ आई थी। तब भी एक्सपर्ट्स ने कहा था कि दोनों देशों के बीच समय रहते इन्फॉर्मेशन शेयर की गई होती, तो नुकसान कम किया जा सकता था।

बाढ़ की वजह से नेपाल-चीन को जोड़ने वाला रसुवागढ़ी-ग्यिरोंग क्रॉस-बॉर्डर लैंड पोर्ट डैमेज हो गया। तिब्बत के इमिग्रेशन कॉम्पलेक्स के ऊपर से सैलाब आता हुआ दिख रहा है।

सवाल-2: दोनों देशों के बीच ऐसे हादसों की जानकारी देने का नियम है या नहीं?

जवाब: नेपाल और चीन के बीच मौसम और आपदा से जुड़ी जानकारियां साझा करने की बात तय हुई थी, लेकिन इस पर कोई औपचारिक समझौता नहीं हो पाया है।

दरअसल, 8 जुलाई 2025 को रसुवागढ़ी बॉर्डर पॉइंट से 35 किलोमीटर ऊपर चीन के इलाके में तिब्बत के पहाड़ों पर ‘पुरेपु’ नाम की ग्लेशियर झील फटी। इससे भोटेकोशी नदी के आसपास करीब 100 किमी तक के इलाके में बाढ़ का मलबा पहुंचा। एक दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी।

पिछले साल भोटेकोशी नदी पर आई बाढ़ में 9 लोगों की मौत हुई थी। कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट डैमेज हुए थे।

पिछले साल भोटेकोशी नदी पर आई बाढ़ में 9 लोगों की मौत हुई थी। कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट डैमेज हुए थे।

इसके बाद नेपाल और चीन ने तीन बातें तय की थीं…

  • दोनों देश आपस में बाढ़ वगैरह से जुड़ी रियल-टाइम जानकारी साझा करेंगे।
  • इसके लिए एक अर्ली वार्निंग सिस्टम बनाया जाएगा।
  • अगर पहाड़ों पर ग्लेशियर की झील फटने, यानी ‘ग्लेशियल आउटबर्स्ट फ्लड, GLOF का खतरा होगा, तो उसे भी फ्लैग करेंगे।

नेपाल की त्रिभुवन यूनिवर्सिटी में एनवायरनमेंट स्टडीज के प्रोफेसर सुदीप ठाकुर बताते हैं, ‘तिब्बत में मौसम से जुड़ी इन्फॉर्मेशन इकठ्ठा करने की व्यवस्था है, लेकिन उसे नेपाल के साथ साझा नहीं किया जाता है। चीन को वैज्ञानिक जानकारी देने में कोई परेशानी नहीं है, लेकिन शायद नेपाल सरकार ही मजबूती से अपनी मांग उनके सामने रख ही नहीं पाई है।’

नेपाल की डिजास्टर स्टडी सेंटर के डायरेक्टर वसंत अधिकारी भी कहते हैं कि अब तक जानकारी शेयर करने की कोई व्यवस्था नहीं है।

सवाल-3: जानकारी शेयर न करने के आरोप पर चीन ने क्या कहा है?

जवाब: चीन ने सीधे तौर पर इसका कोई जवाब नहीं दिया है, हालांकि चीनी दूतावास ने अपने बयान में कहा है कि भूकंप के चलते बाढ़ आई है और ये भूकंप नेपाल की तरफ आया था।

बयान में कहा गया, ‘रसुवा-ग्यिरोंग बॉर्डर इलाके में आई बाढ़ से चीन बेहद दुखी है। नेपाल की तरफ आए भूकंप के चलते हिमस्खलन हुआ और फिर मलबा बहा। इससे सीमा के दोनों तरफ लोगों की मौत हुई।’

दरअसल, पहले कहा गया था कि रिक्टर स्केल पर करीब 5 की तीव्रता के भूकंप के चलते बर्फ का ग्लेशियर टूटा, हालांकि बाद में अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे ने साफ किया कि भूकंप जैसा झटका बर्फ और चट्टान के टूटने से पैदा हुआ था।

हालांकि चीनी दूतावास ने ये जरूर कहा है, ‘भविष्य में सीमा पार मौसम और आपदाओं से जुड़ी जानकारियां साझा करने के लिए बेहतर तरीके से काम करेंगे।’

सवाल-4: बर्फ का पहाड़ चीन में गिरा या नेपाल में?

जवाब: नेपाल की डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी, NDRRMA के मुताबिक, ग्लेशियर टूटने की जगह नेपाल-चीन सीमा चौकी से लगभग 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। अथॉरिटी के वैज्ञानिक प्रकाश पोखरेल के मुताबिक, ‘ये इलाका नेपाली हिस्से में आता है, न कि चीन की तरफ।’

हालांकि, नेपाली मौसम वैज्ञानिक विभूति पोखरेल कहती हैं, ‘हम चीनी अधिकारियों के संपर्क में हैं, लेकिन अब तक ये पता नहीं है कि घटना नेपाल में हुई या चीन की तरफ हुई है।’

दरअसल, मानसून सीजन के चलते उस इलाके में काफी बादल हैं। इसलिए सेटेलाइट तस्वीरों से ये साफ नहीं हो पा रहा है कि ग्लेशियर टूटने की सटीक लोकेशन क्या है।

मोटे तौर पर जहां ग्लेशियर टूटा, वो इलाका सेंट्रल हिमालयन रेंज की क्रेस्टलाइन पर है। यानी अगर पहाड़ की एक तरफ की ढलान नेपाल में है, तो उसी पहाड़ की दूसरी तरफ की ढलान तिब्बत में है, जिस पर चीन का कंट्रोल है। करीब 8000 मीटर की ऊंचाई पर बर्फ और ग्लेशियर जमा रहते हैं, जो पिघलकर दोनों तरफ की नदियों के लिए पानी का सोर्स बनते हैं।

तकनीकी तौर पर अगर ऊंचाई पर कोई ग्लेशियर टूटे, तो उसका असर नीचे दोनों देशों के तरफ की नदियों पर पड़ सकता है।

पोइकू नदी तिब्बत के ग्लेशियर से निकलती है। फिर सीमा पार करके नेपाल में दाखिल होती है और वहां भोटेकोशी कही जाती है, इसी की सहायक नदी ल्हेंदे में बाढ़ आई।

एक बात और है- चीन के मुताबिक, पहले भूकंप आया और फिर ग्लेशियर टूटा। जबकि नेपाल सहित दुनियाभर के मौसम वैज्ञानिक मानते हैं कि पहले ग्लेशियर टूटा, जिससे भूकंप जैसा झटका महसूस हुआ।

सवाल-5: ग्लेशियर टूटने से नेपाल में इतनी भीषण तबाही कैसे आई? जवाबः पूरी घटना 3 स्टेप में समझिए….

1. ग्लेशियर टूटा: 26 अगस्त की सुबह करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर करीब 2000 फीट का ग्लेशियर टूटा और 4 हजार फीट नीचे गिर गया।

2: नदी में पानी जमा हुआ: सुबह करीब 8:37 बजे पिघला ग्लेशियर अपने साथ चट्टानों और मलबे को लेकर ल्हेंदे नदी से टकराया। इससे ल्हेंदे नदी पर एक अस्थायी बांध बन गया और पीछे पानी जमा होने लगा।

3. नदी का बांध टूटने से सैलाब बह चला: सुबह करीब 9 बजे बढ़ते पानी के दबाव से नदी का बांध टूटा, तो एक विशाल सैलाब बनकर निचले इलाकों की तरफ बह चला। आगे भोटे कोशी और त्रिशुली नदी में मलबे वाली बाढ़ आ गई।

फ्लैश फ्लड की वजह से 30 फीट ऊपर तक पानी की लहरी उड़ रही थी। 175 लोगों की मौत हो गई है और1500 से ज्यादा लापता हैं।

फ्लैश फ्लड की वजह से 30 फीट ऊपर तक पानी की लहरी उड़ रही थी। 175 लोगों की मौत हो गई है और1500 से ज्यादा लापता हैं।

नेपाल के रसुवा से नुवाकोट, धादिंग होते हुए चितवन तक भयावह बाढ़ का असर हुआ। रसुवा में करीब एक दर्जन बस्तियां प्रभावित हुईं। बाढ़ धादिंग जिले के गल्छी तक पहुंची और आगे मुग्लिन की ओर बढ़ने की चेतावनी दी गई।

खतरा अभी टला नहीं है। वैज्ञानिकों का कहना है कि नेपाल-चीन बॉर्डर के पास नदी में अब भी एक मलबे का अवरोध जमा है, जो किसी भी वक्त टूटकर सैलाब की एक दूसरी लहर छोड़ सकता है।

जिस त्रिशुली नदी में यह बाढ़ आई है वह आगे नारायणी नदी से मिलती है। यह भारत के बिहार तक आती है, जहां इसे गंडक नदी कहते हैं। इसे बिहार और यूपी के इलाके भी हाई अलर्ट पर रखे गए हैं।

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ये वीडियो भी देखिए…

2000 फीट चौड़ा ग्लेशियर टूटा, बिना भूकंप कांपने लगी धरती:देखिए नेपाल की तबाही का शुरू से आखिर तक एक-एक सीन

26 अगस्त, सुबह 8:30 बजे। नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर मौसम साफ था। किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले 30 मिनट में क्या होने वाला है। शुरुआत से आखिर तक नेपाल की तबाही का एक-एक सीन, वीडियो देखिए…

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