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Netanyahu Trump Secret Meeting: Iran Attack Decision

Netanyahu Trump Secret Meeting: Iran Attack Decision

वॉशिंगटन डीसी14 मिनट पहले

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तारीख: 11 फरवरी जगह: व्हाइट हाउस, वॉशिंगटन डीसी

इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सुबह ही व्हाइट हाउस पहुंच चुके थे। वह कई महीनों से अमेरिका पर दबाव डाल रहे थे कि ईरान पर बड़ा हमला किया जाए। हालांकि इस बार की मुलाकात बेहद सीक्रेट थी। उन्हें बिना किसी औपचारिक स्वागत के सीधे अंदर ले जाया गया ताकि मीडिया को कुछ पता न चले।

पहले कैबिनेट रूम में बातचीत हुई और फिर उन्हें व्हाइट हाउस के सिचुएशन रूम में ले जाया गया, जहां असली बैठक हुई। यह वही जगह है जहां अमेरिका युद्ध और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े बड़े फैसले करता है, लेकिन आमतौर पर यहां विदेशी नेताओं को नहीं लाया जाता।

आमतौर पर जब कोई बड़ी मीटिंग होती है, तो ट्रम्प वह टेबल के सबसे आगे यानी ‘हेड’ वाली कुर्सी पर बैठते हैं। वहां से वह सबको देखते हैं और बैठक को लीड करते हैं। लेकिन इस मीटिंग में ट्रम्प टेबल के किनारे (साइड) पर जाकर बैठे, और उनका चेहरा दीवार पर लगी बड़ी स्क्रीन की तरफ था।

ट्रम्प-नेतन्याहू आमने-सामने थे। स्क्रीन पर इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद के प्रमुख डेविड बार्निया और इजराइली सैन्य अधिकारी जुड़े हुए थे। इससे ऐसा माहौल बनाया गया जैसे नेतन्याहू युद्ध के समय अपने पूरे कमांड के साथ खड़े हैं।

इस बैठक में बहुत कम लोग शामिल थे ताकि कोई जानकारी बाहर न जाए। विदेश मंत्री मार्को रूबियो, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ, सीआईए प्रमुख जॉन रैटक्लिफ, जॉइंट चीफ्स के चेयरमैन जनरल डैन केन, ट्रम्प के दामाद जैरेड कुशनर और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ मौजूद थे। व्हाइट हाउस की चीफ ऑफ स्टाफ सूजी वाइल्स भी वहां थीं। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस बैठक में नहीं थे क्योंकि वे अजरबैजान में थे और बैठक अचानक तय हुई थी।

ईरान पर हमले से पहले सिचुएशनल रूम में राष्ट्रपति ट्रम्प और बाकी अधिकारी। तस्वीर जून 2025 की है।

ईरान पर हमले से पहले सिचुएशनल रूम में राष्ट्रपति ट्रम्प और बाकी अधिकारी। तस्वीर जून 2025 की है।

नेतन्याहू बोले- ईरान पर हमला करने का यह सही वक्त

नेतन्याहू ने एक घंटे का प्रेजेंटेशन दिया और ट्रम्प को समझाने की कोशिश की कि यह ईरान पर हमला करने का सबसे सही समय है। उन्होंने कहा कि ईरान की सरकार कमजोर हो चुकी है और अगर अमेरिका और इजराइल मिलकर हमला करें तो ईरान की सैन्य ताकत जल्दी खत्म की जा सकती है।

नेतन्याहू ने दावा किया कि ईरान का मिसाइल सिस्टम कुछ ही हफ्तों में तबाह किया जा सकता है और सरकार इतनी कमजोर हो जाएगी कि वह होर्मुज स्ट्रेट को बंद नहीं कर पाएगी।

नेतन्याहू ने यह भी कहा कि ईरान के अंदर फिर से विरोध प्रदर्शन शुरू हो सकते हैं और अगर इजराइल सीक्रेट तरीके से मदद करे तो ये प्रदर्शन सरकार गिराने तक पहुंच सकते हैं। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि इराक से कुर्द लड़ाके ईरान में घुसकर एक और मोर्चा खोल सकते हैं जिससे सरकार जल्दी गिर जाएगी।

इस दौरान एक वीडियो भी दिखाया गया जिसमें उन संभावित नेताओं को दिखाया गया जो सरकार गिरने के बाद सत्ता संभाल सकते हैं। इसमें रजा पहलवी का नाम भी था, जो ईरान के आखिरी शाह के बेटे हैं और फिलहाल अमेरिका में रहते हैं।

नेतन्याहू ने बार-बार कहा कि अभी हमला जरूरी है, क्योंकि देर हुई तो ईरान मजबूत हो जाएगा। उनका कहना था कि कुछ न करने का खतरा, हमला करने से ज्यादा है।

ट्रम्प 29 दिसंबर 2025 को फ्लोरिडा में अपने मार-ए-लागो क्लब में इजराइली PM नेतन्याहू से मुलाकात के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उनसे हाथ मिलाते हुए।

ट्रम्प 29 दिसंबर 2025 को फ्लोरिडा में अपने मार-ए-लागो क्लब में इजराइली PM नेतन्याहू से मुलाकात के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उनसे हाथ मिलाते हुए।

नेतन्याहू की बातों में आ गए ट्रम्प

ट्रम्प इस पेशकश से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने कहा कि यह प्लानिंग उन्हें सही लगती है। इससे नेतन्याहू को पता चल गया कि अमेरिका साथ आ सकता है। इसके बाद अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का काम इस प्लानिंग को समझना था। अगले दिन सिचुएशन रूम में सिर्फ अमेरिकी अधिकारियों की बैठक हुई। इसमें योजना को 4 हिस्सों में बांटा गया।

1. खामेनेई और टॉप लीडरशिप को खत्म करना 2. ईरान की सैन्य ताकत खत्म करना 3. देश में विद्रोह करवाना 4. सरकार बदलकर नई व्यवस्था लाना

खुफिया एजेंसियों ने कहा कि पहले दो मकसद हासिल किए जा सकते हैं, लेकिन बाकी दो असलियत से दूर हैं। CIA चीफ जॉन रैटक्लिफ ने इसे मजाक जैसा बताया और मार्को रूबियो ने इसे बेकार कहा।

जब ट्रम्प बैठक में आए तो उन्हें यही रिपोर्ट दी गई। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी वापस आ चुके थे और उन्होंने इस योजना पर गहरी चिंता जताई। जनरल डैन केन ने भी कहा कि इजराइल अक्सर योजनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है क्योंकि उसे अमेरिका की मदद चाहिए होती है।

इसके बाद ट्रम्प ने साफ कहा कि अगर सरकार बदलना संभव नहीं भी है तो भी इससे फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने कहा कि यह इजराइल या ईरान का मामला होगा, लेकिन उनका फैसला इस पर निर्भर नहीं करेगा। उनका ध्यान मुख्य रूप से ईरान के शीर्ष नेताओं को खत्म करने और उसकी सैन्य ताकत को तोड़ने पर था।

नेतन्याहू 7 अप्रैल 2025 को व्हाइट हाउस में हुई बैठक के दौरान बोलते हुए। उनके साथ राष्ट्रपति ट्रम्प, उपराष्ट्रपति वेंस, विदेश मंत्री रूबियो और NSA माइकल वॉल्ट्ज भी मौजूद थे।

नेतन्याहू 7 अप्रैल 2025 को व्हाइट हाउस में हुई बैठक के दौरान बोलते हुए। उनके साथ राष्ट्रपति ट्रम्प, उपराष्ट्रपति वेंस, विदेश मंत्री रूबियो और NSA माइकल वॉल्ट्ज भी मौजूद थे।

ईरान को कमजोर समझने की भूल कर बैठे ट्रम्प

आने वाले दिनों में कई बैठकें हुईं। इन बैठकों में जनरल केन ने चेतावनी दी कि अगर ईरान के खिलाफ बड़ा युद्ध शुरू होता है तो अमेरिका के हथियार तेजी से खत्म हो सकते हैं। खास तौर पर मिसाइल इंटरसेप्टर पहले से ही कम हैं क्योंकि अमेरिका यूक्रेन और इजराइल की मदद करता रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि होर्मुज को सुरक्षित रखना बहुत मुश्किल होगा और अगर ईरान इसे बंद कर देता है तो वैश्विक तेल सप्लाई पर बड़ा असर पड़ेगा।

लेकिन ट्रम्प को भरोसा था कि युद्ध बहुत जल्दी खत्म हो जाएगा। उन्हें लगा कि ईरान ज्यादा जवाब नहीं दे पाएगा, जैसा कि पहले जून में हुए हमलों के बाद देखा गया था।

जंग शुरू करने का वेंस ने सबसे ज्यादा विरोध किया

जनरल केन ने यह कभी नहीं कहा कि जंग गलत है लेकिन वे बार-बार इसके खतरे से आगाह कराते रहे। वह हर प्लानिंग पर पूछते थे कि उसके बाद क्या होगा, लेकिन ट्रम्प अक्सर वही बातों पर ध्यान देते थे जो उनके विचारों से मेल खाती थीं।

कैबिनेट के अंदर भी मतभेद थे। रक्षा मंत्री हेगसेथ युद्ध के सबसे बड़े समर्थक थे। मार्को रूबियो थोड़ा सावधान थे और पहले दबाव की नीति जारी रखना चाहते थे, लेकिन उन्होंने ट्रम्प को रोकने की कोशिश नहीं की। सूजी वाइल्स को भी चिंता थी कि नया युद्ध शुरू होने से राजनीतिक और आर्थिक असर पड़ेगा, खासकर तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, लेकिन उन्होंने भी खुलकर विरोध नहीं किया।

सबसे ज्यादा विरोध उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने किया। उन्होंने कहा कि यह युद्ध बहुत महंगा होगा, अमेरिका की ताकत को कमजोर कर सकता है और ट्रम्प के समर्थकों को नाराज कर सकता है। उनका मानना था कि अगर कोई कार्रवाई करनी भी है तो सीमित होनी चाहिए, पूरे युद्ध में नहीं बदलनी चाहिए।

वेंस को यह भी डर था कि ईरान बदले में क्या करेगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। अगर होर्मुज बंद हुआ तो अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें तेजी से बढ़ेंगी और इसका बड़ा राजनीतिक असर होगा।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ उपराष्ट्रपति जेडी वेंस।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ उपराष्ट्रपति जेडी वेंस।

ईरान पर हमले का मन बना चुके थे ट्रम्प

इसी दौरान एक और अहम खुफिया जानकारी सामने आई कि ईरान के सुप्रीम लीडर और अन्य बड़े अधिकारी एक साथ खुली जगह पर मिलने वाले हैं, जहां उन पर हमला किया जा सकता है। इसे एक रेयर (दुर्लभ) मौका माना गया।

ट्रम्प ने एक बार फिर ईरान को समझौते का मौका दिया। इस बीच कुशनर और विटकॉफ ने ईरान के साथ ओमान और स्विट्जरलैंड में बातचीत की। उन्होंने यहां तक प्रस्ताव दिया कि ईरान को उसके पूरे परमाणु कार्यक्रम के लिए मुफ्त ईंधन दिया जाएगा, लेकिन ईरान ने इसे ठुकरा दिया और इसे अपनी गरिमा के खिलाफ बताया।

कुशनर और विटकॉफ ने ट्रम्प से कहा कि समझौता संभव है लेकिन इसमें कई महीने लगेंगे और ईरान समय निकाल रहा है।

फरवरी के आखिरी दिनों में अंतिम बैठक हुई। इस समय तक सभी की राय साफ हो चुकी थी। कोई नया तर्क नहीं था, सिर्फ फैसला लेना बाकी था। बैठक करीब डेढ़ घंटे चली।

इस पूरी प्रक्रिया के दौरान साफ दिखा कि ट्रम्प पहले ही मन बना चुके थे। वह सिर्फ सही समय का इंतजार कर रहे थे। यहीं से अमेरिका के ईरान के खिलाफ युद्ध में शामिल होने का अंतिम फैसला लगभग तय हो गया।

उस आखिरी बैठक में रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और जनरल डैन केन ने हमले की पूरी योजना समझाई। उन्होंने बताया कि हमला किस तरह से होगा। इसे कैसे शुरू किया जाएगा और कैसे आगे बढ़ेगा।

इसके बाद राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा कि वह टेबल पर बैठे हर व्यक्ति की राय सुनना चाहते हैं।

उपराष्ट्रपति जेडी वेंस- विरोध

वेंस ने साफ कहा कि उन्हें यह पूरा प्लान गलत लगता है। लेकिन साथ ही यह भी कहा कि अगर राष्ट्रपति यह फैसला लेते हैं, तो वह उनका साथ देंगे। यानी वह निजी तौर पर विरोध में थे, लेकिन अंत में राष्ट्रपति के फैसले के साथ खड़े रहने को तैयार थे।

चीफ ऑफ स्टाफ सूजी वाइल्स- समर्थन

सूजी वाइल्स ने कहा कि अगर ट्रम्प को लगता है कि यह अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है, तो उन्हें आगे बढ़ना चाहिए।

CIA चीफ रैटक्लिफ- राय नहीं दी

रैटक्लिफ ने यह नहीं कहा कि हमला करना चाहिए या नहीं, लेकिन उन्होंने नई खुफिया जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ईरान की टॉप लीडरशिप तेहरान में अयातुल्ला के परिसर में इकट्ठा होने वाला है, जो हमला करने के लिए एक बड़ा मौका हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर रेजीम चेंज का मतलब सिर्फ सर्वोच्च नेता को खत्म करना है, तो यह संभव हो सकता है।

कानूनी सलाहकार डेविड वारिंगटन- समर्थन

इसके बाद व्हाइट हाउस के कानूनी सलाहकार डेविड वारिंगटन से राय ली गई। उन्होंने कहा कि जो योजना बनाई गई है, वह कानूनी रूप से सही है और अमेरिका इसे कर सकता है। उन्होंने ट्रम्प से कहा कि अगर इजराइल यह हमला करने जा रहा है, तो अमेरिका को भी साथ देना चाहिए।

कम्युनिकेशन डायरेक्टर स्टीवन चेउंग- विरोध

व्हाइट हाउस के कम्युनिकेशन डायरेक्टर स्टीवन चेउंग ने इस फैसले के राजनीतिक और सार्वजनिक असर की बात रखी। उन्होंने कहा कि ट्रम्प चुनाव में यह कहकर आए थे कि वह नए युद्ध नहीं करेंगे। लोगों ने विदेश में जंग के लिए वोट नहीं दिया था।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अगर अब हमला किया गया तो पिछले आठ महीनों में जो कहा गया कि ईरान के परमाणु ठिकाने पूरी तरह खत्म हो चुके हैं, उसका क्या जवाब दिया जाएगा। हालांकि उन्होंने सीधे हां या ना नहीं कहा, लेकिन यह जरूर कहा कि ट्रम्प जो भी फैसला करेंगे, वही सही माना जाएगा।

प्रेस सेक्रेटरी कैरोलाइन लेविट- समर्थन

प्रेस सेक्रेटरी कैरोलाइन लेविट ने कहा कि यह पूरी तरह राष्ट्रपति का फैसला है और मीडिया टीम इसे संभाल लेगी।

रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ- समर्थन

रक्षा मंत्री हेगसेथ ने साफ तौर पर युद्ध के पक्ष में बात रखी। उन्होंने कहा कि ईरान से कभी न कभी निपटना ही है, तो अभी कर लेना बेहतर है। उन्होंने यह भी बताया कि कितने समय में और कितनी ताकत के साथ यह अभियान चलाया जा सकता है।

जॉइंट चीफ्स के चेयरमैन जनरल डैन केन- राय नहीं दी

जनरल डैन केन ने खतरों के बारे में बताया और कहा कि इस युद्ध से अमेरिका के हथियारों का भंडार तेजी से कम होगा। उन्होंने अपनी कोई व्यक्तिगत राय नहीं दी। उनका कहना था कि अगर राष्ट्रपति आदेश देंगे, तो सेना इसे पूरा करेगी। उन्होंने यह भी समझाया कि हमला कैसे आगे बढ़ेगा और अमेरिका ईरान की सैन्य ताकत को कितना कमजोर कर सकता है।

विदेश मंत्री मार्को रूबियो- मिली जुली प्रतिक्रिया

विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने सबसे साफ और संतुलित राय दी। उन्होंने कहा कि अगर लक्ष्य सरकार बदलना या अंदर से विद्रोह कराना है, तो यह नहीं करना चाहिए। लेकिन अगर लक्ष्य ईरान के मिसाइल प्रोग्राम को खत्म करना है, तो यह संभव है और इसे किया जा सकता है।

सभी ने ट्रम्प को उनके फैसले पर छोड़ा

बैठक में मौजूद लगभग सभी लोग आखिर में ट्रम्प को उनके फैसले पर छोड़ चुके थे। सभी जानते थे कि ट्रम्प पहले भी बड़े जोखिम उठाकर फैसले लेते रहे हैं और अक्सर सफल भी हुए हैं। इसलिए इस बार भी कोई उनके रास्ते में नहीं आया।

अंत में ट्रम्प ने कहा, “मुझे लगता है हमें यह करना चाहिए। यह जरूरी है कि ईरान के पास परमाणु हथियार न हों और वह इजराइल या क्षेत्र के अन्य देशों पर मिसाइल से हमला न कर सके।”

अगले दिन ट्रम्प एयरफोर्स वन में थे। तय समय से सिर्फ 22 मिनट पहले उन्होंने अंतिम आदेश दे दिया। उनका संदेश था, “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी मंजूर है। इसे रोका नहीं जाएगा। शुभकामनाएं।”

यहीं से ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू करने का औपचारिक फैसला हो गया।

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वॉशिंगटन डीसी14 मिनट पहले

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तारीख: 11 फरवरी जगह: व्हाइट हाउस, वॉशिंगटन डीसी

इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सुबह ही व्हाइट हाउस पहुंच चुके थे। वह कई महीनों से अमेरिका पर दबाव डाल रहे थे कि ईरान पर बड़ा हमला किया जाए। हालांकि इस बार की मुलाकात बेहद सीक्रेट थी। उन्हें बिना किसी औपचारिक स्वागत के सीधे अंदर ले जाया गया ताकि मीडिया को कुछ पता न चले।

पहले कैबिनेट रूम में बातचीत हुई और फिर उन्हें व्हाइट हाउस के सिचुएशन रूम में ले जाया गया, जहां असली बैठक हुई। यह वही जगह है जहां अमेरिका युद्ध और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े बड़े फैसले करता है, लेकिन आमतौर पर यहां विदेशी नेताओं को नहीं लाया जाता।

आमतौर पर जब कोई बड़ी मीटिंग होती है, तो ट्रम्प वह टेबल के सबसे आगे यानी ‘हेड’ वाली कुर्सी पर बैठते हैं। वहां से वह सबको देखते हैं और बैठक को लीड करते हैं। लेकिन इस मीटिंग में ट्रम्प टेबल के किनारे (साइड) पर जाकर बैठे, और उनका चेहरा दीवार पर लगी बड़ी स्क्रीन की तरफ था।

ट्रम्प-नेतन्याहू आमने-सामने थे। स्क्रीन पर इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद के प्रमुख डेविड बार्निया और इजराइली सैन्य अधिकारी जुड़े हुए थे। इससे ऐसा माहौल बनाया गया जैसे नेतन्याहू युद्ध के समय अपने पूरे कमांड के साथ खड़े हैं।

इस बैठक में बहुत कम लोग शामिल थे ताकि कोई जानकारी बाहर न जाए। विदेश मंत्री मार्को रूबियो, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ, सीआईए प्रमुख जॉन रैटक्लिफ, जॉइंट चीफ्स के चेयरमैन जनरल डैन केन, ट्रम्प के दामाद जैरेड कुशनर और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ मौजूद थे। व्हाइट हाउस की चीफ ऑफ स्टाफ सूजी वाइल्स भी वहां थीं। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस बैठक में नहीं थे क्योंकि वे अजरबैजान में थे और बैठक अचानक तय हुई थी।

ईरान पर हमले से पहले सिचुएशनल रूम में राष्ट्रपति ट्रम्प और बाकी अधिकारी। तस्वीर जून 2025 की है।

ईरान पर हमले से पहले सिचुएशनल रूम में राष्ट्रपति ट्रम्प और बाकी अधिकारी। तस्वीर जून 2025 की है।

नेतन्याहू बोले- ईरान पर हमला करने का यह सही वक्त

नेतन्याहू ने एक घंटे का प्रेजेंटेशन दिया और ट्रम्प को समझाने की कोशिश की कि यह ईरान पर हमला करने का सबसे सही समय है। उन्होंने कहा कि ईरान की सरकार कमजोर हो चुकी है और अगर अमेरिका और इजराइल मिलकर हमला करें तो ईरान की सैन्य ताकत जल्दी खत्म की जा सकती है।

नेतन्याहू ने दावा किया कि ईरान का मिसाइल सिस्टम कुछ ही हफ्तों में तबाह किया जा सकता है और सरकार इतनी कमजोर हो जाएगी कि वह होर्मुज स्ट्रेट को बंद नहीं कर पाएगी।

नेतन्याहू ने यह भी कहा कि ईरान के अंदर फिर से विरोध प्रदर्शन शुरू हो सकते हैं और अगर इजराइल सीक्रेट तरीके से मदद करे तो ये प्रदर्शन सरकार गिराने तक पहुंच सकते हैं। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि इराक से कुर्द लड़ाके ईरान में घुसकर एक और मोर्चा खोल सकते हैं जिससे सरकार जल्दी गिर जाएगी।

इस दौरान एक वीडियो भी दिखाया गया जिसमें उन संभावित नेताओं को दिखाया गया जो सरकार गिरने के बाद सत्ता संभाल सकते हैं। इसमें रजा पहलवी का नाम भी था, जो ईरान के आखिरी शाह के बेटे हैं और फिलहाल अमेरिका में रहते हैं।

नेतन्याहू ने बार-बार कहा कि अभी हमला जरूरी है, क्योंकि देर हुई तो ईरान मजबूत हो जाएगा। उनका कहना था कि कुछ न करने का खतरा, हमला करने से ज्यादा है।

ट्रम्प 29 दिसंबर 2025 को फ्लोरिडा में अपने मार-ए-लागो क्लब में इजराइली PM नेतन्याहू से मुलाकात के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उनसे हाथ मिलाते हुए।

ट्रम्प 29 दिसंबर 2025 को फ्लोरिडा में अपने मार-ए-लागो क्लब में इजराइली PM नेतन्याहू से मुलाकात के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उनसे हाथ मिलाते हुए।

नेतन्याहू की बातों में आ गए ट्रम्प

ट्रम्प इस पेशकश से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने कहा कि यह प्लानिंग उन्हें सही लगती है। इससे नेतन्याहू को पता चल गया कि अमेरिका साथ आ सकता है। इसके बाद अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का काम इस प्लानिंग को समझना था। अगले दिन सिचुएशन रूम में सिर्फ अमेरिकी अधिकारियों की बैठक हुई। इसमें योजना को 4 हिस्सों में बांटा गया।

1. खामेनेई और टॉप लीडरशिप को खत्म करना 2. ईरान की सैन्य ताकत खत्म करना 3. देश में विद्रोह करवाना 4. सरकार बदलकर नई व्यवस्था लाना

खुफिया एजेंसियों ने कहा कि पहले दो मकसद हासिल किए जा सकते हैं, लेकिन बाकी दो असलियत से दूर हैं। CIA चीफ जॉन रैटक्लिफ ने इसे मजाक जैसा बताया और मार्को रूबियो ने इसे बेकार कहा।

जब ट्रम्प बैठक में आए तो उन्हें यही रिपोर्ट दी गई। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी वापस आ चुके थे और उन्होंने इस योजना पर गहरी चिंता जताई। जनरल डैन केन ने भी कहा कि इजराइल अक्सर योजनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है क्योंकि उसे अमेरिका की मदद चाहिए होती है।

इसके बाद ट्रम्प ने साफ कहा कि अगर सरकार बदलना संभव नहीं भी है तो भी इससे फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने कहा कि यह इजराइल या ईरान का मामला होगा, लेकिन उनका फैसला इस पर निर्भर नहीं करेगा। उनका ध्यान मुख्य रूप से ईरान के शीर्ष नेताओं को खत्म करने और उसकी सैन्य ताकत को तोड़ने पर था।

नेतन्याहू 7 अप्रैल 2025 को व्हाइट हाउस में हुई बैठक के दौरान बोलते हुए। उनके साथ राष्ट्रपति ट्रम्प, उपराष्ट्रपति वेंस, विदेश मंत्री रूबियो और NSA माइकल वॉल्ट्ज भी मौजूद थे।

नेतन्याहू 7 अप्रैल 2025 को व्हाइट हाउस में हुई बैठक के दौरान बोलते हुए। उनके साथ राष्ट्रपति ट्रम्प, उपराष्ट्रपति वेंस, विदेश मंत्री रूबियो और NSA माइकल वॉल्ट्ज भी मौजूद थे।

ईरान को कमजोर समझने की भूल कर बैठे ट्रम्प

आने वाले दिनों में कई बैठकें हुईं। इन बैठकों में जनरल केन ने चेतावनी दी कि अगर ईरान के खिलाफ बड़ा युद्ध शुरू होता है तो अमेरिका के हथियार तेजी से खत्म हो सकते हैं। खास तौर पर मिसाइल इंटरसेप्टर पहले से ही कम हैं क्योंकि अमेरिका यूक्रेन और इजराइल की मदद करता रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि होर्मुज को सुरक्षित रखना बहुत मुश्किल होगा और अगर ईरान इसे बंद कर देता है तो वैश्विक तेल सप्लाई पर बड़ा असर पड़ेगा।

लेकिन ट्रम्प को भरोसा था कि युद्ध बहुत जल्दी खत्म हो जाएगा। उन्हें लगा कि ईरान ज्यादा जवाब नहीं दे पाएगा, जैसा कि पहले जून में हुए हमलों के बाद देखा गया था।

जंग शुरू करने का वेंस ने सबसे ज्यादा विरोध किया

जनरल केन ने यह कभी नहीं कहा कि जंग गलत है लेकिन वे बार-बार इसके खतरे से आगाह कराते रहे। वह हर प्लानिंग पर पूछते थे कि उसके बाद क्या होगा, लेकिन ट्रम्प अक्सर वही बातों पर ध्यान देते थे जो उनके विचारों से मेल खाती थीं।

कैबिनेट के अंदर भी मतभेद थे। रक्षा मंत्री हेगसेथ युद्ध के सबसे बड़े समर्थक थे। मार्को रूबियो थोड़ा सावधान थे और पहले दबाव की नीति जारी रखना चाहते थे, लेकिन उन्होंने ट्रम्प को रोकने की कोशिश नहीं की। सूजी वाइल्स को भी चिंता थी कि नया युद्ध शुरू होने से राजनीतिक और आर्थिक असर पड़ेगा, खासकर तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, लेकिन उन्होंने भी खुलकर विरोध नहीं किया।

सबसे ज्यादा विरोध उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने किया। उन्होंने कहा कि यह युद्ध बहुत महंगा होगा, अमेरिका की ताकत को कमजोर कर सकता है और ट्रम्प के समर्थकों को नाराज कर सकता है। उनका मानना था कि अगर कोई कार्रवाई करनी भी है तो सीमित होनी चाहिए, पूरे युद्ध में नहीं बदलनी चाहिए।

वेंस को यह भी डर था कि ईरान बदले में क्या करेगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। अगर होर्मुज बंद हुआ तो अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें तेजी से बढ़ेंगी और इसका बड़ा राजनीतिक असर होगा।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ उपराष्ट्रपति जेडी वेंस।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ उपराष्ट्रपति जेडी वेंस।

ईरान पर हमले का मन बना चुके थे ट्रम्प

इसी दौरान एक और अहम खुफिया जानकारी सामने आई कि ईरान के सुप्रीम लीडर और अन्य बड़े अधिकारी एक साथ खुली जगह पर मिलने वाले हैं, जहां उन पर हमला किया जा सकता है। इसे एक रेयर (दुर्लभ) मौका माना गया।

ट्रम्प ने एक बार फिर ईरान को समझौते का मौका दिया। इस बीच कुशनर और विटकॉफ ने ईरान के साथ ओमान और स्विट्जरलैंड में बातचीत की। उन्होंने यहां तक प्रस्ताव दिया कि ईरान को उसके पूरे परमाणु कार्यक्रम के लिए मुफ्त ईंधन दिया जाएगा, लेकिन ईरान ने इसे ठुकरा दिया और इसे अपनी गरिमा के खिलाफ बताया।

कुशनर और विटकॉफ ने ट्रम्प से कहा कि समझौता संभव है लेकिन इसमें कई महीने लगेंगे और ईरान समय निकाल रहा है।

फरवरी के आखिरी दिनों में अंतिम बैठक हुई। इस समय तक सभी की राय साफ हो चुकी थी। कोई नया तर्क नहीं था, सिर्फ फैसला लेना बाकी था। बैठक करीब डेढ़ घंटे चली।

इस पूरी प्रक्रिया के दौरान साफ दिखा कि ट्रम्प पहले ही मन बना चुके थे। वह सिर्फ सही समय का इंतजार कर रहे थे। यहीं से अमेरिका के ईरान के खिलाफ युद्ध में शामिल होने का अंतिम फैसला लगभग तय हो गया।

उस आखिरी बैठक में रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और जनरल डैन केन ने हमले की पूरी योजना समझाई। उन्होंने बताया कि हमला किस तरह से होगा। इसे कैसे शुरू किया जाएगा और कैसे आगे बढ़ेगा।

इसके बाद राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा कि वह टेबल पर बैठे हर व्यक्ति की राय सुनना चाहते हैं।

उपराष्ट्रपति जेडी वेंस- विरोध

वेंस ने साफ कहा कि उन्हें यह पूरा प्लान गलत लगता है। लेकिन साथ ही यह भी कहा कि अगर राष्ट्रपति यह फैसला लेते हैं, तो वह उनका साथ देंगे। यानी वह निजी तौर पर विरोध में थे, लेकिन अंत में राष्ट्रपति के फैसले के साथ खड़े रहने को तैयार थे।

चीफ ऑफ स्टाफ सूजी वाइल्स- समर्थन

सूजी वाइल्स ने कहा कि अगर ट्रम्प को लगता है कि यह अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है, तो उन्हें आगे बढ़ना चाहिए।

CIA चीफ रैटक्लिफ- राय नहीं दी

रैटक्लिफ ने यह नहीं कहा कि हमला करना चाहिए या नहीं, लेकिन उन्होंने नई खुफिया जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ईरान की टॉप लीडरशिप तेहरान में अयातुल्ला के परिसर में इकट्ठा होने वाला है, जो हमला करने के लिए एक बड़ा मौका हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर रेजीम चेंज का मतलब सिर्फ सर्वोच्च नेता को खत्म करना है, तो यह संभव हो सकता है।

कानूनी सलाहकार डेविड वारिंगटन- समर्थन

इसके बाद व्हाइट हाउस के कानूनी सलाहकार डेविड वारिंगटन से राय ली गई। उन्होंने कहा कि जो योजना बनाई गई है, वह कानूनी रूप से सही है और अमेरिका इसे कर सकता है। उन्होंने ट्रम्प से कहा कि अगर इजराइल यह हमला करने जा रहा है, तो अमेरिका को भी साथ देना चाहिए।

कम्युनिकेशन डायरेक्टर स्टीवन चेउंग- विरोध

व्हाइट हाउस के कम्युनिकेशन डायरेक्टर स्टीवन चेउंग ने इस फैसले के राजनीतिक और सार्वजनिक असर की बात रखी। उन्होंने कहा कि ट्रम्प चुनाव में यह कहकर आए थे कि वह नए युद्ध नहीं करेंगे। लोगों ने विदेश में जंग के लिए वोट नहीं दिया था।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अगर अब हमला किया गया तो पिछले आठ महीनों में जो कहा गया कि ईरान के परमाणु ठिकाने पूरी तरह खत्म हो चुके हैं, उसका क्या जवाब दिया जाएगा। हालांकि उन्होंने सीधे हां या ना नहीं कहा, लेकिन यह जरूर कहा कि ट्रम्प जो भी फैसला करेंगे, वही सही माना जाएगा।

प्रेस सेक्रेटरी कैरोलाइन लेविट- समर्थन

प्रेस सेक्रेटरी कैरोलाइन लेविट ने कहा कि यह पूरी तरह राष्ट्रपति का फैसला है और मीडिया टीम इसे संभाल लेगी।

रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ- समर्थन

रक्षा मंत्री हेगसेथ ने साफ तौर पर युद्ध के पक्ष में बात रखी। उन्होंने कहा कि ईरान से कभी न कभी निपटना ही है, तो अभी कर लेना बेहतर है। उन्होंने यह भी बताया कि कितने समय में और कितनी ताकत के साथ यह अभियान चलाया जा सकता है।

जॉइंट चीफ्स के चेयरमैन जनरल डैन केन- राय नहीं दी

जनरल डैन केन ने खतरों के बारे में बताया और कहा कि इस युद्ध से अमेरिका के हथियारों का भंडार तेजी से कम होगा। उन्होंने अपनी कोई व्यक्तिगत राय नहीं दी। उनका कहना था कि अगर राष्ट्रपति आदेश देंगे, तो सेना इसे पूरा करेगी। उन्होंने यह भी समझाया कि हमला कैसे आगे बढ़ेगा और अमेरिका ईरान की सैन्य ताकत को कितना कमजोर कर सकता है।

विदेश मंत्री मार्को रूबियो- मिली जुली प्रतिक्रिया

विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने सबसे साफ और संतुलित राय दी। उन्होंने कहा कि अगर लक्ष्य सरकार बदलना या अंदर से विद्रोह कराना है, तो यह नहीं करना चाहिए। लेकिन अगर लक्ष्य ईरान के मिसाइल प्रोग्राम को खत्म करना है, तो यह संभव है और इसे किया जा सकता है।

सभी ने ट्रम्प को उनके फैसले पर छोड़ा

बैठक में मौजूद लगभग सभी लोग आखिर में ट्रम्प को उनके फैसले पर छोड़ चुके थे। सभी जानते थे कि ट्रम्प पहले भी बड़े जोखिम उठाकर फैसले लेते रहे हैं और अक्सर सफल भी हुए हैं। इसलिए इस बार भी कोई उनके रास्ते में नहीं आया।

अंत में ट्रम्प ने कहा, “मुझे लगता है हमें यह करना चाहिए। यह जरूरी है कि ईरान के पास परमाणु हथियार न हों और वह इजराइल या क्षेत्र के अन्य देशों पर मिसाइल से हमला न कर सके।”

अगले दिन ट्रम्प एयरफोर्स वन में थे। तय समय से सिर्फ 22 मिनट पहले उन्होंने अंतिम आदेश दे दिया। उनका संदेश था, “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी मंजूर है। इसे रोका नहीं जाएगा। शुभकामनाएं।”

यहीं से ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू करने का औपचारिक फैसला हो गया।

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