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कच्चा तेल 15% सस्ता होकर 94.27 डॉलर पर आया:वजह- अमेरिका और ईरान के बीच 2 हफ्ते का सीजफायर; पेट्रोल-डीजल सस्ते होने की उम्मीद

कच्चा तेल 15% सस्ता होकर 94.27 डॉलर पर आया:वजह- अमेरिका और ईरान के बीच 2 हफ्ते का सीजफायर; पेट्रोल-डीजल सस्ते होने की उम्मीद

अमेरिका और ईरान के बीच 2 हफ्ते के सीजफायर के ऐलान के बाद ब्रेंट क्रूड ऑयल 15% सस्ता हो गया है। ब्रेंट क्रूड ऑयल के दाम आज (8 अप्रैल) करीब 15% यानी 15 डॉलर गिरकर 94.27 डॉलर प्रति बैरल पर आ गए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 6 साल में तेल की कीमतों में यह एक दिन की सबसे बड़ी गिरावट है। एक दिन पहले ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 109.27 डॉलर प्रति बैरल पर थी। 28 फरवरी को अमेरिका और ईरान के बीच जंग शुरू होने से पहले कच्चा तेल 70 डॉलर प्रति बैरल के आस-पास था। फिर जंग के बीच कच्चे तेल के दाम बढ़कर 120 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गए थे। क्रूड ऑयल में तेजी की वजह सीजफायर सीजफायर से ग्लोबल मार्केट उछले, डॉलर गिरा युद्ध थमने की खबरों से ग्लोबल शेयर बाजारों में तेजी आई है। अमेरिका का SP 500 फ्यूचर्स 2% और यूरोपीय बाजार 5% तक चढ़ गए। भारत के सेंसेक्स और निफ्टी में भी करीब 4% की तेजी देखने को मिल रही है। निवेशकों का भरोसा बढ़ने से डॉलर की वैल्यू में गिरावट आई है, क्योंकि अब सुरक्षित निवेश के तौर पर लोग डॉलर के बजाय शेयरों की तरफ बढ़ रहे हैं। हालांकि, सोने की कीमतों में सीजफायर की उम्मीद से हल्की बढ़त देखी गई है। क्या कच्चे तेल की कीमतें और गिरेंगी? एनालिस्ट्स का कहना है कि यह राहत अस्थायी हो सकती है। आईजी के एनालिस्ट टोनी सिकामोर के मुताबिक, यह एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन अभी कई अगर-मगर बाकी हैं। एक्सपर्ट्स को डर है कि अगर दो हफ्ते बाद स्थायी समझौता नहीं हुआ, तो तेल की कीमतें फिर से 100 डॉलर के पार जा सकती हैं। कच्चा तेल सस्ता होने से भारत को क्या-क्या फायदे होंगे? कच्चा तेल भारत के लिए सबसे जरूरी है, क्योंकि हम अपनी जरूरत का करीब 85% तेल दूसरे देशों से खरीदते हैं। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमतें गिरती हैं, तो भारतीय अर्थव्यवस्था को कई मोर्चों पर राहत मिलती है। 1. पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी: कच्चा तेल सस्ता होने से ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (जैसे IOC, BPCL, HPCL) पेट्रोल और डीजल के दाम कम कर सकती हैं। इससे ट्रांसपोर्टेशन लागत घटती है, जिसका सीधा असर आपके महीने के बजट पर पड़ता है। 2. महंगाई दर पर लगाम: भारत में महंगाई का सीधा कनेक्शन डीजल की कीमतों से है। जब डीजल सस्ता होता है, तो ट्रकों का भाड़ा कम हो जाता है। इससे फल, सब्जियां, अनाज और अन्य रोजमर्रा के सामानों की ढुलाई सस्ती पड़ती है।इससे बाजार में खाने-पीने की चीजों के दाम कम होने लगते हैं। 3. करंट अकाउंट डेफिसिट में सुधार: भारत तेल खरीदने के लिए भारी मात्रा में डॉलर का भुगतान करता है। अगर तेल सस्ता होता है, तो भारत का इंपोर्ट बिल कम हो जाता है। इससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार की बचत होती है और करेंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) कम होता है, जो अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए बहुत जरूरी है। 4. भारतीय रुपये को मजबूती: जब तेल का बिल कम होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की मांग कम हो जाती है। इससे डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये को मजबूती मिलती है। मजबूत रुपया आयात की जाने वाली अन्य चीजों (जैसे इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनरी) को भी सस्ता बनाने में मदद करता है। 5. सरकारी सब्सिडी का बोझ कम होना: सरकार एलपीजी (LPG) और केरोसिन जैसी चीजों पर सब्सिडी देती है। कच्चा तेल सस्ता होने से सरकार पर सब्सिडी का वित्तीय बोझ कम हो जाता है। इस बचे हुए पैसे को सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सेक्टर में निवेश कर सकती है। 6. कॉर्पोरेट प्रॉफिट में बढ़ोतरी: पेंट, टायर, लुब्रिकेंट, फर्टिलाइजर और लॉजिस्टिक सेक्टर की कंपनियों के लिए कच्चा तेल एक मुख्य कच्चा माल है। तेल सस्ता होने से इन कंपनियों की लागत घटती है और मुनाफा बढ़ता है, जिससे शेयर बाजार में भी पॉजिटिव असर देखने को मिलता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर कच्चे तेल की कीमतों में 10 डॉलर प्रति बैरल की कमी आती है, तो भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट यानी चालू खाता घाटे (CAD) में करीब 9-10 बिलियन डॉलर की कमी आ सकती है और महंगाई दर में भी लगभग 0.5% तक की राहत मिल सकती है। होर्मुज प्रभावित होने से तेल की कीमतें बढ़ी थीं जंग शुरू होने के बाद ईरान ने होर्मुज रूट को लगभग बंद कर दिया था। दुनिया का करीब 20% तेल और गैस इसी रास्ते से गुजरता है। इसके बंद होने से न केवल तेल, बल्कि एल्युमीनियम, फर्टिलाइजर और प्लास्टिक की कीमतों में भी भारी तेजी आने लगी थी। ब्रिटेन और यूरोप में भी दवाओं और जरूरी चीजों की कमी होने का खतरा बढ़ गया था, क्योंकि शिपिंग का खर्च कई गुना बढ़ गया है। मार्च में 60% महंगा हुआ था क्रूड ऑयल मार्च में कच्चे तेल की कीमतों में करीब 60% का उछाल आया था, जो 1990 के खाड़ी युद्ध के बाद एक महीने में सबसे बड़ी बढ़ोतरी थी। फरवरी के आखिरी में ब्रेंट क्रूड 72.48 डॉलर पर था, जो मार्च में 120 डॉलर के पार पहुंच गया था। इससे पहले सितंबर 1990 में सद्दाम हुसैन के कुवैत पर हमले के समय तेल की कीमतें एक महीने में 46% बढ़ी थीं। भारत के कुल तेल आयात का 51% खाड़ी देशों से आता है भारत कच्चे तेल की जरूरतों के लिए सबसे ज्यादा पश्चिम एशिया पर निर्भर है। FY2025-26 के पहले 10 महीनों में भारत के कुल कच्चे तेल और पेट्रोलियम आयात में 51% हिस्सा इसी क्षेत्र का था। कच्चे तेल का भाव बढ़ने से भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ रहा था। तेल की कीमतें 10 डॉलर बढ़ने से 0.60% बढ़ेगी महंगाई इससे पहले रेटिंग एजेंसी केयरएज ग्लोबल ने कहा था कि कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ोतरी से भारत में रिटेल महंगाई 60 बेसिस पॉइंट्स (0.60%) तक बढ़ सकती है। भारत अपनी तेल जरूरतों के लिए काफी हद तक पश्चिम एशिया पर निर्भर है, ऐसे में वहां के हालात बिगड़ने से भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट, GDP ग्रोथ और रुपए की वैल्यू पर भी दबाव बढ़ेगा। ये खबर भी पढ़ें… सेंसेक्स 3000 अंक चढ़कर 77,600 पर कारोबार कर रहा: निफ्टी भी 900 अंक ऊपर; ऑटो, रियल्टी और बैंकिंग शेयरों में सबसे ज्यादा खरीदारी अमेरिका और ईरान के बीच 2 हफ्ते के सीजफायर के ऐलान के बाद आज यानी बुधवार 8 अप्रैल को शेयर बाजार में तेजी है। सेंसेक्स 3000 अंक (3.95%) चढ़कर 77,600 पर कारोबार कर रहा है। निफ्टी भी 900 अंक (3.80%) ऊपर है, ये 24,000 पर पहुंच गया है। आज ऑटो, रियल्टी और बैंकिंग शेयरों में ज्यादा खरीदारी है। निफ्टी का ऑटो और रियल्टी इंडेक्स करीब 5% ऊपर है। सरकारी बैंकों के इंडेक्स और मेटल इंडेक्स में भी 3% से ज्यादा तेजी है। FMCG और ऑयल एंड गैस इंडेक्स 2% से ज्यादा ऊपर कारोबार कर रहे हैं। पूरी खबर पढ़ें…

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अमेरिका और ईरान के बीच 2 हफ्ते के सीजफायर के ऐलान के बाद ब्रेंट क्रूड ऑयल 15% सस्ता हो गया है। ब्रेंट क्रूड ऑयल के दाम आज (8 अप्रैल) करीब 15% यानी 15 डॉलर गिरकर 94.27 डॉलर प्रति बैरल पर आ गए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 6 साल में तेल की कीमतों में यह एक दिन की सबसे बड़ी गिरावट है। एक दिन पहले ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 109.27 डॉलर प्रति बैरल पर थी। 28 फरवरी को अमेरिका और ईरान के बीच जंग शुरू होने से पहले कच्चा तेल 70 डॉलर प्रति बैरल के आस-पास था। फिर जंग के बीच कच्चे तेल के दाम बढ़कर 120 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गए थे। क्रूड ऑयल में तेजी की वजह सीजफायर सीजफायर से ग्लोबल मार्केट उछले, डॉलर गिरा युद्ध थमने की खबरों से ग्लोबल शेयर बाजारों में तेजी आई है। अमेरिका का SP 500 फ्यूचर्स 2% और यूरोपीय बाजार 5% तक चढ़ गए। भारत के सेंसेक्स और निफ्टी में भी करीब 4% की तेजी देखने को मिल रही है। निवेशकों का भरोसा बढ़ने से डॉलर की वैल्यू में गिरावट आई है, क्योंकि अब सुरक्षित निवेश के तौर पर लोग डॉलर के बजाय शेयरों की तरफ बढ़ रहे हैं। हालांकि, सोने की कीमतों में सीजफायर की उम्मीद से हल्की बढ़त देखी गई है। क्या कच्चे तेल की कीमतें और गिरेंगी? एनालिस्ट्स का कहना है कि यह राहत अस्थायी हो सकती है। आईजी के एनालिस्ट टोनी सिकामोर के मुताबिक, यह एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन अभी कई अगर-मगर बाकी हैं। एक्सपर्ट्स को डर है कि अगर दो हफ्ते बाद स्थायी समझौता नहीं हुआ, तो तेल की कीमतें फिर से 100 डॉलर के पार जा सकती हैं। कच्चा तेल सस्ता होने से भारत को क्या-क्या फायदे होंगे? कच्चा तेल भारत के लिए सबसे जरूरी है, क्योंकि हम अपनी जरूरत का करीब 85% तेल दूसरे देशों से खरीदते हैं। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमतें गिरती हैं, तो भारतीय अर्थव्यवस्था को कई मोर्चों पर राहत मिलती है। 1. पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी: कच्चा तेल सस्ता होने से ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (जैसे IOC, BPCL, HPCL) पेट्रोल और डीजल के दाम कम कर सकती हैं। इससे ट्रांसपोर्टेशन लागत घटती है, जिसका सीधा असर आपके महीने के बजट पर पड़ता है। 2. महंगाई दर पर लगाम: भारत में महंगाई का सीधा कनेक्शन डीजल की कीमतों से है। जब डीजल सस्ता होता है, तो ट्रकों का भाड़ा कम हो जाता है। इससे फल, सब्जियां, अनाज और अन्य रोजमर्रा के सामानों की ढुलाई सस्ती पड़ती है।इससे बाजार में खाने-पीने की चीजों के दाम कम होने लगते हैं। 3. करंट अकाउंट डेफिसिट में सुधार: भारत तेल खरीदने के लिए भारी मात्रा में डॉलर का भुगतान करता है। अगर तेल सस्ता होता है, तो भारत का इंपोर्ट बिल कम हो जाता है। इससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार की बचत होती है और करेंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) कम होता है, जो अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए बहुत जरूरी है। 4. भारतीय रुपये को मजबूती: जब तेल का बिल कम होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की मांग कम हो जाती है। इससे डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये को मजबूती मिलती है। मजबूत रुपया आयात की जाने वाली अन्य चीजों (जैसे इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनरी) को भी सस्ता बनाने में मदद करता है। 5. सरकारी सब्सिडी का बोझ कम होना: सरकार एलपीजी (LPG) और केरोसिन जैसी चीजों पर सब्सिडी देती है। कच्चा तेल सस्ता होने से सरकार पर सब्सिडी का वित्तीय बोझ कम हो जाता है। इस बचे हुए पैसे को सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सेक्टर में निवेश कर सकती है। 6. कॉर्पोरेट प्रॉफिट में बढ़ोतरी: पेंट, टायर, लुब्रिकेंट, फर्टिलाइजर और लॉजिस्टिक सेक्टर की कंपनियों के लिए कच्चा तेल एक मुख्य कच्चा माल है। तेल सस्ता होने से इन कंपनियों की लागत घटती है और मुनाफा बढ़ता है, जिससे शेयर बाजार में भी पॉजिटिव असर देखने को मिलता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर कच्चे तेल की कीमतों में 10 डॉलर प्रति बैरल की कमी आती है, तो भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट यानी चालू खाता घाटे (CAD) में करीब 9-10 बिलियन डॉलर की कमी आ सकती है और महंगाई दर में भी लगभग 0.5% तक की राहत मिल सकती है। होर्मुज प्रभावित होने से तेल की कीमतें बढ़ी थीं जंग शुरू होने के बाद ईरान ने होर्मुज रूट को लगभग बंद कर दिया था। दुनिया का करीब 20% तेल और गैस इसी रास्ते से गुजरता है। इसके बंद होने से न केवल तेल, बल्कि एल्युमीनियम, फर्टिलाइजर और प्लास्टिक की कीमतों में भी भारी तेजी आने लगी थी। ब्रिटेन और यूरोप में भी दवाओं और जरूरी चीजों की कमी होने का खतरा बढ़ गया था, क्योंकि शिपिंग का खर्च कई गुना बढ़ गया है। मार्च में 60% महंगा हुआ था क्रूड ऑयल मार्च में कच्चे तेल की कीमतों में करीब 60% का उछाल आया था, जो 1990 के खाड़ी युद्ध के बाद एक महीने में सबसे बड़ी बढ़ोतरी थी। फरवरी के आखिरी में ब्रेंट क्रूड 72.48 डॉलर पर था, जो मार्च में 120 डॉलर के पार पहुंच गया था। इससे पहले सितंबर 1990 में सद्दाम हुसैन के कुवैत पर हमले के समय तेल की कीमतें एक महीने में 46% बढ़ी थीं। भारत के कुल तेल आयात का 51% खाड़ी देशों से आता है भारत कच्चे तेल की जरूरतों के लिए सबसे ज्यादा पश्चिम एशिया पर निर्भर है। FY2025-26 के पहले 10 महीनों में भारत के कुल कच्चे तेल और पेट्रोलियम आयात में 51% हिस्सा इसी क्षेत्र का था। कच्चे तेल का भाव बढ़ने से भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ रहा था। तेल की कीमतें 10 डॉलर बढ़ने से 0.60% बढ़ेगी महंगाई इससे पहले रेटिंग एजेंसी केयरएज ग्लोबल ने कहा था कि कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ोतरी से भारत में रिटेल महंगाई 60 बेसिस पॉइंट्स (0.60%) तक बढ़ सकती है। भारत अपनी तेल जरूरतों के लिए काफी हद तक पश्चिम एशिया पर निर्भर है, ऐसे में वहां के हालात बिगड़ने से भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट, GDP ग्रोथ और रुपए की वैल्यू पर भी दबाव बढ़ेगा। ये खबर भी पढ़ें… सेंसेक्स 3000 अंक चढ़कर 77,600 पर कारोबार कर रहा: निफ्टी भी 900 अंक ऊपर; ऑटो, रियल्टी और बैंकिंग शेयरों में सबसे ज्यादा खरीदारी अमेरिका और ईरान के बीच 2 हफ्ते के सीजफायर के ऐलान के बाद आज यानी बुधवार 8 अप्रैल को शेयर बाजार में तेजी है। सेंसेक्स 3000 अंक (3.95%) चढ़कर 77,600 पर कारोबार कर रहा है। निफ्टी भी 900 अंक (3.80%) ऊपर है, ये 24,000 पर पहुंच गया है। आज ऑटो, रियल्टी और बैंकिंग शेयरों में ज्यादा खरीदारी है। निफ्टी का ऑटो और रियल्टी इंडेक्स करीब 5% ऊपर है। सरकारी बैंकों के इंडेक्स और मेटल इंडेक्स में भी 3% से ज्यादा तेजी है। FMCG और ऑयल एंड गैस इंडेक्स 2% से ज्यादा ऊपर कारोबार कर रहे हैं। पूरी खबर पढ़ें…

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