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SEAL Team 6 Rescue US Airman in Iran

SEAL Team 6 Rescue US Airman in Iran

वॉशिंगटन डीसी/तेहरान11 मिनट पहले

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सील टीम-6 पर बनी एक फिक्शनल फिल्म का दृश्य

अमेरिका ने ईरान में लापता दोनों पायलट्स को 36 घंटे के भीतर रेस्क्यू कर लिया। ईरान में 3 अप्रैल को एक ऑपरेशन पर गए F-15E फाइटर जेट्स पर हमला हुआ था। विमान के क्रैश होने से पहले दोनों पायलट्स पैराशूट की मदद से इजेक्ट हो गए थे।

इसमें से एक पायलट को अमेरिकी सेना ने कुछ ही घंटे बाद ढूंढ़ लिया जबकि दूसरे के लिए एक बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया। इसकी सफलता की तारीफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी की। उन्होंने इसे देश के इतिहास का सबसे खतरनाक रेस्क्यू मिशन बताया।

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि अमेरिकी नेवी की स्पेशल यूनिट ‘सील टीम-6’ ने इसे अंजाम दिया। यह वही स्पेशल फोर्स है जिसने 15 साल साल पहले 2011 में आतंकी ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान के एबटाबाद में घुसकर मारा था।

इजराइल के साथ से संभव हुआ मिशन

ईरान के साथ जारी संघर्ष के बीच यह 2026 का पहला कन्फर्म्ड अमेरिकी ग्राउंड ऑपरेशन माना जा रहा है। एक सैनिक को बचाने के लिए बड़े स्तर पर सैन्य ताकत का इस्तेमाल किया गया, जो इस मिशन की अहमियत दिखाता है।

मिशन को सफल बनाने के लिए अमेरिका ने कई लेयर में रणनीति बनाई। पहले, इजराइली खुफिया एजेंसी ने ईरानी सेना की मूवमेंट ट्रैक की। फिर हवाई हमले 36 घंटे के लिए रोके गए ताकि रेस्क्यू टीम आगे बढ़ सके।

जिसके बाद अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने फर्जी जानकारी फैलाई कि ऑफिसर सड़क के रास्ते से भाग निकला है। ऊपर अमेरिकी फाइटर जेट्स निगरानी कर रहे थे, जबकि जमीन पर कमांडो धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे।

अमेरिकी नेवी की स्पेशल यूनिट SEAL टीम-6 ने ऑपरेशन शुरू किया। जब कमांडो अफसर तक पहुंचे, तब ईरानी सेना बेहद करीब थी। ऐसे में भारी गोलीबारी कर दुश्मन को पीछे धकेला गया। इसके बाद ट्रांसपोर्ट विमान फायरिंग के बीच उतरे और घायल अफसर को बाहर निकाला गया।

अमेरिकी सेना ने अपने ही दो विमान नष्ट किए

ऑपरेशन के बीच इस्फाहन के पास तकनीकी खराबी के कारण दो अमेरिकी ट्रांसपोर्ट विमान काम नहीं कर पाए। इन विमानों को मौके पर ही विस्फोट से नष्ट कर दिया गया, ताकि कोई संवेदनशील तकनीक दुश्मन के हाथ न लगे।

इस मिशन की तुलना 2011 में पाकिस्तान के एबटाबाद में हुए ऑपरेशन से की जा रही है, जब ओसामा बिन लादेन को मार गिराया गया था। तब भी अमेरिकी कमांडो ने खराब हेलीकॉप्टर को नष्ट कर दिया था।

तस्वीर में अमेरिकी ट्रांसपोर्ट विमान जलते हुए नजर आ रहे हैं, जिन्हें ईरान से निकलने से पहले आग लगा दी गई। (सोर्स- Osinttechnical)

तस्वीर में अमेरिकी ट्रांसपोर्ट विमान जलते हुए नजर आ रहे हैं, जिन्हें ईरान से निकलने से पहले आग लगा दी गई। (सोर्स- Osinttechnical)

एबटाबाद से ज्यादा बड़ा था ईरान का रेस्क्यू मिशन

ईरान में रेस्क्यू का यह मिशन एबटाबाद ऑपरेशन से ज्यादा बड़ा था। उसमें 24 सील कमांडो दो स्टेल्थ ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टरों में पाकिस्तान के अंदर घुसे थे। लेकिन इसमें सैकड़ों स्पेशल फोर्स सैनिक, दर्जनों लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टर, साइबर और स्पेस टेक्नोलॉजी। सब एक ही मिशन के लिए जुटे थे।

ईरान के अंदर, इस्फहान के पास एक छोड़े गए एयरस्ट्रिप पर फॉरवर्ड रिफ्यूलिंग पॉइंट बनाया गया। दो MC-130J कमांडो विमान और MH-6 हेलिकॉप्टर वहां उतरे। लेकिन दोनों ट्रांसपोर्ट विमान वहीं फंस गए और उड़ नहीं पाए। नए विमान बुलाए गए। वे गोलाबारी के बीच पहुंचे। आखिरकार, सील टीम 6 ने एयरमैन को ढूंढ लिया।

मिशन कामयाब- एक भी अमेरिकी सैनिक नहीं मरा अब जरा सी भी गलती की गुंजाइश नहीं थी। ईरानी फोर्स पास पहुंच रही थी। कमांडो ने फायरिंग कर उन्हें रोका। ऊपर से हवाई हमले कर दुश्मन के काफिलों को निशाना बनाया गया। घायल एयरमैन को पहाड़ों से निकालकर विमान में बैठाया गया, साथ ही फंसी हुई रेस्क्यू टीम को भी। तीन नए ट्रांसपोर्ट विमान उन्हें लेकर ईरान से बाहर निकले। इस मिशन में अमेरिका का कोई सैनिक नहीं मरा।

ईरान में ऑपरेशन नाकाम, फिर बनी सीगल टीम-6

1979 में ईरान की इस्लामिक क्रांति के बाद तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा हो गया। इस दौरान 52 अमेरिकी बंधक बना लिए गए। इन्हें छुड़ाने के लिए अमेरिका ने अप्रैल 1980 में एक मिशन ऑपरेशन ईगल क्लॉ लॉन्च किया।

ईरान के रेगिस्तान में तकनीकी खराबी, मौसम और कोऑर्डिनेशन फेल होने से यह मिशन असफल हो गया। इसमें 8 अमेरिकी सैनिक मारे गए थे। तब अमेरिका को एहसास हुआ कि उसके पास ऐसा यूनिट नहीं है जो हाई-रिस्क काउंटर-टेरर ऑपरेशन में हॉस्टेज रेस्क्यू और दुश्मन के इलाके में सीक्रेट मिशन को पूरी क्षमता से कर सके।

इस नाकामी के तुरंत बाद अमेरिकी नेवी ने सील टीम-6 बनाया। इसका असली नाम नेवेल स्पेशल वारफेयर डेवलपमेंट ग्रुप है। इसका कोड नेम DEVGRU है। यह डेवलेपमेंट और ग्रुप से मिलकर बनाया गया है।

सील टीम 6 को अफगानिस्तान के नेता हामिद करजई की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी। साल 2002 में कंधार में उन पर एक जानलेवा हमला हुआ। इस दौरान एक कमांडो घायल हो गया था।उसने अपने शर्ट से सिर से निकल रहा खून रोककर स्थिति संभाली और ड्यूटी को अंजाम दिया।

सील टीम 6 को अफगानिस्तान के नेता हामिद करजई की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी। साल 2002 में कंधार में उन पर एक जानलेवा हमला हुआ। इस दौरान एक कमांडो घायल हो गया था।उसने अपने शर्ट से सिर से निकल रहा खून रोककर स्थिति संभाली और ड्यूटी को अंजाम दिया।

टीम-6 नाम सोवियत यूनियन को धोखा देने के लिए रखा

इससे पहले रेगुलर स्पेशल ऑपरेशन के लिए सील टीम-1 और सील टीम- 2 थी। लेकिन सबसे सीक्रेट मिशन को पूरा करने के लिए सील टीम-6 बनाई गई। तब टीम-6 नाम जानबूझकर रखा गया था ताकि सोवियत यूनियन को लगे कि अमेरिका के पास कई सील टीमें हैं।

सील टीम 6 को इस तरह तैयार किया जाता है कि वे जमीन, समुद्र और हवा तीनों जगह ऑपरेशन कर सकें। रात, खराब मौसम, दुश्मन के इलाके हर हालत में काम करें और बिना पहचान के सीक्रेट मिशन पूरा करें।

जैसे अमेरिका सेना के पास डेल्टा फोर्स है वैसे ही नेवी की सील टीम-6 है। दोनों ही टायर-1 (सबसे ऊंचा स्तर) यूनिट हैं। फर्क सिर्फ ऑपरेटिंग डोमेन का है। जैसे डेल्टा फोर्स जमीन आधारित ऑपरेशन के लिए है। वहीं सील टीम-6 समुद्र और मल्टी डोमेन ऑपरेशन के लिए।

दुनिया में सबसे कठिन एंट्री टेस्ट

सील टीम 6 में शामिल होना दुनिया की सबसे कठिन स्पेशल फोर्स चयन प्रक्रियाओं में से एक माना जाता है। इसमें सीधे भर्ती नहीं होती। सबसे पहले अमेरिकी नेवी की स्पेशल यूनिट Navy SEAL बनना पड़ता है। इसके बाद कई साल तक ऑपरेशन का अनुभव हासिल करने वाले चुनिंदा कमांडोज को ही आगे के लिए बुलाया जाता है।

इसके बाद ग्रीन टीम नाम की एक कड़ी चयन और ट्रेनिंग प्रक्रिया होती है। यही वह आखिरी चरण होता है, जहां से फाइनल चयन किया जाता है।

इस दौरान सैनिकों को बेहद कठिन शारीरिक और मानसिक परीक्षणों से गुजरना पड़ता है। इसमें लंबी दूरी की दौड़, भारी वजन के साथ मार्च, खुले पानी में तैराकी और नींद की कमी के बीच लगातार काम करना शामिल होता है। अकेले मैप और कंपास के सहारे कठिन इलाकों में रास्ता खोजने जैसे टास्क भी दिए जाते हैं।

साल 2007 में एक ट्रेनिंग एक्सरसाइज के दौरान नेवी टीम का एक कमांडो।

साल 2007 में एक ट्रेनिंग एक्सरसाइज के दौरान नेवी टीम का एक कमांडो।

सबसे अहम हिस्सा मानसिक परीक्षण होता है, जिसमें दबाव में सही फैसला लेना, टीम के साथ तालमेल बैठाना और लंबे समय तक तनाव में काम करने की क्षमता को परखा जाता है। इस चरण में बड़ी संख्या में उम्मीदवार बाहर हो जाते हैं।

जो चयन पार कर लेते हैं, उनके लिए असली ट्रेनिंग शुरू होती है। यह पूरी तरह हाई-रिस्क मिशन पर केंद्रित होती है। उन्हें सिखाया जाता है कि किसी बिल्डिंग में घुसकर सेकंडों में दुश्मन और बंधक में फर्क कैसे करना है।

शूटिंग इतनी सटीक होती है कि गलती की गुंजाइश नहीं रहती। बंधक छुड़ाने के सीनारियो बार-बार अभ्यास कराए जाते हैं, ताकि असली ऑपरेशन में कोई हिचकिचाहट न हो।

इसके अलावा, चुपचाप घुसपैठ, रात में ऑपरेशन, हवा से पैराशूट जंप और पानी के रास्ते एंट्री जैसी तकनीकों पर भी महारत दी जाती है। सब कुछ असली मिशन जैसा बनाकर बार-बार कराया जाता है।

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सील टीम-6 पर बनी एक फिक्शनल फिल्म का दृश्य

अमेरिका ने ईरान में लापता दोनों पायलट्स को 36 घंटे के भीतर रेस्क्यू कर लिया। ईरान में 3 अप्रैल को एक ऑपरेशन पर गए F-15E फाइटर जेट्स पर हमला हुआ था। विमान के क्रैश होने से पहले दोनों पायलट्स पैराशूट की मदद से इजेक्ट हो गए थे।

इसमें से एक पायलट को अमेरिकी सेना ने कुछ ही घंटे बाद ढूंढ़ लिया जबकि दूसरे के लिए एक बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया। इसकी सफलता की तारीफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी की। उन्होंने इसे देश के इतिहास का सबसे खतरनाक रेस्क्यू मिशन बताया।

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि अमेरिकी नेवी की स्पेशल यूनिट ‘सील टीम-6’ ने इसे अंजाम दिया। यह वही स्पेशल फोर्स है जिसने 15 साल साल पहले 2011 में आतंकी ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान के एबटाबाद में घुसकर मारा था।

इजराइल के साथ से संभव हुआ मिशन

ईरान के साथ जारी संघर्ष के बीच यह 2026 का पहला कन्फर्म्ड अमेरिकी ग्राउंड ऑपरेशन माना जा रहा है। एक सैनिक को बचाने के लिए बड़े स्तर पर सैन्य ताकत का इस्तेमाल किया गया, जो इस मिशन की अहमियत दिखाता है।

मिशन को सफल बनाने के लिए अमेरिका ने कई लेयर में रणनीति बनाई। पहले, इजराइली खुफिया एजेंसी ने ईरानी सेना की मूवमेंट ट्रैक की। फिर हवाई हमले 36 घंटे के लिए रोके गए ताकि रेस्क्यू टीम आगे बढ़ सके।

जिसके बाद अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने फर्जी जानकारी फैलाई कि ऑफिसर सड़क के रास्ते से भाग निकला है। ऊपर अमेरिकी फाइटर जेट्स निगरानी कर रहे थे, जबकि जमीन पर कमांडो धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे।

अमेरिकी नेवी की स्पेशल यूनिट SEAL टीम-6 ने ऑपरेशन शुरू किया। जब कमांडो अफसर तक पहुंचे, तब ईरानी सेना बेहद करीब थी। ऐसे में भारी गोलीबारी कर दुश्मन को पीछे धकेला गया। इसके बाद ट्रांसपोर्ट विमान फायरिंग के बीच उतरे और घायल अफसर को बाहर निकाला गया।

अमेरिकी सेना ने अपने ही दो विमान नष्ट किए

ऑपरेशन के बीच इस्फाहन के पास तकनीकी खराबी के कारण दो अमेरिकी ट्रांसपोर्ट विमान काम नहीं कर पाए। इन विमानों को मौके पर ही विस्फोट से नष्ट कर दिया गया, ताकि कोई संवेदनशील तकनीक दुश्मन के हाथ न लगे।

इस मिशन की तुलना 2011 में पाकिस्तान के एबटाबाद में हुए ऑपरेशन से की जा रही है, जब ओसामा बिन लादेन को मार गिराया गया था। तब भी अमेरिकी कमांडो ने खराब हेलीकॉप्टर को नष्ट कर दिया था।

तस्वीर में अमेरिकी ट्रांसपोर्ट विमान जलते हुए नजर आ रहे हैं, जिन्हें ईरान से निकलने से पहले आग लगा दी गई। (सोर्स- Osinttechnical)

तस्वीर में अमेरिकी ट्रांसपोर्ट विमान जलते हुए नजर आ रहे हैं, जिन्हें ईरान से निकलने से पहले आग लगा दी गई। (सोर्स- Osinttechnical)

एबटाबाद से ज्यादा बड़ा था ईरान का रेस्क्यू मिशन

ईरान में रेस्क्यू का यह मिशन एबटाबाद ऑपरेशन से ज्यादा बड़ा था। उसमें 24 सील कमांडो दो स्टेल्थ ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टरों में पाकिस्तान के अंदर घुसे थे। लेकिन इसमें सैकड़ों स्पेशल फोर्स सैनिक, दर्जनों लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टर, साइबर और स्पेस टेक्नोलॉजी। सब एक ही मिशन के लिए जुटे थे।

ईरान के अंदर, इस्फहान के पास एक छोड़े गए एयरस्ट्रिप पर फॉरवर्ड रिफ्यूलिंग पॉइंट बनाया गया। दो MC-130J कमांडो विमान और MH-6 हेलिकॉप्टर वहां उतरे। लेकिन दोनों ट्रांसपोर्ट विमान वहीं फंस गए और उड़ नहीं पाए। नए विमान बुलाए गए। वे गोलाबारी के बीच पहुंचे। आखिरकार, सील टीम 6 ने एयरमैन को ढूंढ लिया।

मिशन कामयाब- एक भी अमेरिकी सैनिक नहीं मरा अब जरा सी भी गलती की गुंजाइश नहीं थी। ईरानी फोर्स पास पहुंच रही थी। कमांडो ने फायरिंग कर उन्हें रोका। ऊपर से हवाई हमले कर दुश्मन के काफिलों को निशाना बनाया गया। घायल एयरमैन को पहाड़ों से निकालकर विमान में बैठाया गया, साथ ही फंसी हुई रेस्क्यू टीम को भी। तीन नए ट्रांसपोर्ट विमान उन्हें लेकर ईरान से बाहर निकले। इस मिशन में अमेरिका का कोई सैनिक नहीं मरा।

ईरान में ऑपरेशन नाकाम, फिर बनी सीगल टीम-6

1979 में ईरान की इस्लामिक क्रांति के बाद तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा हो गया। इस दौरान 52 अमेरिकी बंधक बना लिए गए। इन्हें छुड़ाने के लिए अमेरिका ने अप्रैल 1980 में एक मिशन ऑपरेशन ईगल क्लॉ लॉन्च किया।

ईरान के रेगिस्तान में तकनीकी खराबी, मौसम और कोऑर्डिनेशन फेल होने से यह मिशन असफल हो गया। इसमें 8 अमेरिकी सैनिक मारे गए थे। तब अमेरिका को एहसास हुआ कि उसके पास ऐसा यूनिट नहीं है जो हाई-रिस्क काउंटर-टेरर ऑपरेशन में हॉस्टेज रेस्क्यू और दुश्मन के इलाके में सीक्रेट मिशन को पूरी क्षमता से कर सके।

इस नाकामी के तुरंत बाद अमेरिकी नेवी ने सील टीम-6 बनाया। इसका असली नाम नेवेल स्पेशल वारफेयर डेवलपमेंट ग्रुप है। इसका कोड नेम DEVGRU है। यह डेवलेपमेंट और ग्रुप से मिलकर बनाया गया है।

सील टीम 6 को अफगानिस्तान के नेता हामिद करजई की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी। साल 2002 में कंधार में उन पर एक जानलेवा हमला हुआ। इस दौरान एक कमांडो घायल हो गया था।उसने अपने शर्ट से सिर से निकल रहा खून रोककर स्थिति संभाली और ड्यूटी को अंजाम दिया।

सील टीम 6 को अफगानिस्तान के नेता हामिद करजई की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी। साल 2002 में कंधार में उन पर एक जानलेवा हमला हुआ। इस दौरान एक कमांडो घायल हो गया था।उसने अपने शर्ट से सिर से निकल रहा खून रोककर स्थिति संभाली और ड्यूटी को अंजाम दिया।

टीम-6 नाम सोवियत यूनियन को धोखा देने के लिए रखा

इससे पहले रेगुलर स्पेशल ऑपरेशन के लिए सील टीम-1 और सील टीम- 2 थी। लेकिन सबसे सीक्रेट मिशन को पूरा करने के लिए सील टीम-6 बनाई गई। तब टीम-6 नाम जानबूझकर रखा गया था ताकि सोवियत यूनियन को लगे कि अमेरिका के पास कई सील टीमें हैं।

सील टीम 6 को इस तरह तैयार किया जाता है कि वे जमीन, समुद्र और हवा तीनों जगह ऑपरेशन कर सकें। रात, खराब मौसम, दुश्मन के इलाके हर हालत में काम करें और बिना पहचान के सीक्रेट मिशन पूरा करें।

जैसे अमेरिका सेना के पास डेल्टा फोर्स है वैसे ही नेवी की सील टीम-6 है। दोनों ही टायर-1 (सबसे ऊंचा स्तर) यूनिट हैं। फर्क सिर्फ ऑपरेटिंग डोमेन का है। जैसे डेल्टा फोर्स जमीन आधारित ऑपरेशन के लिए है। वहीं सील टीम-6 समुद्र और मल्टी डोमेन ऑपरेशन के लिए।

दुनिया में सबसे कठिन एंट्री टेस्ट

सील टीम 6 में शामिल होना दुनिया की सबसे कठिन स्पेशल फोर्स चयन प्रक्रियाओं में से एक माना जाता है। इसमें सीधे भर्ती नहीं होती। सबसे पहले अमेरिकी नेवी की स्पेशल यूनिट Navy SEAL बनना पड़ता है। इसके बाद कई साल तक ऑपरेशन का अनुभव हासिल करने वाले चुनिंदा कमांडोज को ही आगे के लिए बुलाया जाता है।

इसके बाद ग्रीन टीम नाम की एक कड़ी चयन और ट्रेनिंग प्रक्रिया होती है। यही वह आखिरी चरण होता है, जहां से फाइनल चयन किया जाता है।

इस दौरान सैनिकों को बेहद कठिन शारीरिक और मानसिक परीक्षणों से गुजरना पड़ता है। इसमें लंबी दूरी की दौड़, भारी वजन के साथ मार्च, खुले पानी में तैराकी और नींद की कमी के बीच लगातार काम करना शामिल होता है। अकेले मैप और कंपास के सहारे कठिन इलाकों में रास्ता खोजने जैसे टास्क भी दिए जाते हैं।

साल 2007 में एक ट्रेनिंग एक्सरसाइज के दौरान नेवी टीम का एक कमांडो।

साल 2007 में एक ट्रेनिंग एक्सरसाइज के दौरान नेवी टीम का एक कमांडो।

सबसे अहम हिस्सा मानसिक परीक्षण होता है, जिसमें दबाव में सही फैसला लेना, टीम के साथ तालमेल बैठाना और लंबे समय तक तनाव में काम करने की क्षमता को परखा जाता है। इस चरण में बड़ी संख्या में उम्मीदवार बाहर हो जाते हैं।

जो चयन पार कर लेते हैं, उनके लिए असली ट्रेनिंग शुरू होती है। यह पूरी तरह हाई-रिस्क मिशन पर केंद्रित होती है। उन्हें सिखाया जाता है कि किसी बिल्डिंग में घुसकर सेकंडों में दुश्मन और बंधक में फर्क कैसे करना है।

शूटिंग इतनी सटीक होती है कि गलती की गुंजाइश नहीं रहती। बंधक छुड़ाने के सीनारियो बार-बार अभ्यास कराए जाते हैं, ताकि असली ऑपरेशन में कोई हिचकिचाहट न हो।

इसके अलावा, चुपचाप घुसपैठ, रात में ऑपरेशन, हवा से पैराशूट जंप और पानी के रास्ते एंट्री जैसी तकनीकों पर भी महारत दी जाती है। सब कुछ असली मिशन जैसा बनाकर बार-बार कराया जाता है।

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