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US-Iran Tension | Why Trump Avoided Military Attack Strategy Explained

US-Iran Tension | Why Trump Avoided Military Attack Strategy Explained

वॉशिंगटन डीसी6 मिनट पहले

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प 14 अगस्त को न्यूयॉर्क के गार्डन सिटी में भाषण देते हुए।

अमेरिका और ईरान के बीच जून में हुआ 60 दिन का समझौता सोमवार को खत्म हो गया। इसका मकसद दोनों देशों के बीच चल रहे युद्ध को रोकना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर विवाद का समाधान निकालना था। समयसीमा खत्म होने के बाद भी न तो कोई अंतिम समझौता हुआ और न ही अमेरिका ने ईरान पर नया बड़ा हमला शुरू किया।

60 दिनों के दौरान ट्रम्प ने कई बार कहा कि अगर बातचीत नाकाम रही तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। इसलिए माना जा रहा था कि डेडलाइन खत्म होते ही अमेरिका ईरान पर फिर बड़ा हमला कर सकता है।

समयसीमा खत्म होने से ठीक पहले ट्रम्प का रुख बदलता दिख रहा है। एक्सियोस को दिए इंटरव्यू में ट्रम्प ने कहा, “हम इसे लो-की कर रहे हैं।”

वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक अमेरिका, ईरान को तीन तरीके से घेर रहा है।

1. आर्थिक दबाव- ईरान की कमाई और अर्थव्यवस्था को कमजोर करना।

2. नौसैनिक नाकाबंदी- ईरान के लिए समुद्र के रास्ते व्यापार मुश्किल करना।

3. बातचीत- सीधे या दूसरे देशों के जरिए ईरान से समझौते की कोशिश करना।

यानी अभी अमेरिका सीधे बड़ा हमला करने की बजाय ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रहा है, समुद्र के रास्ते उसका व्यापार रोक रहा है और बातचीत के जरिए समझौते की कोशिश भी कर रहा है। बजाय इसके कि अमेरिका तुरंत फिर से बड़े युद्ध में उतर जाए।

ट्रम्प हमला रोककर क्या हासिल करना चाहते हैं?

ट्रम्प की मौजूदा रणनीति को समझने के लिए सबसे अहम बात यह है कि अमेरिका युद्ध को खत्म नहीं मान रहा है।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने शनिवार को कहा कि संघर्ष खत्म नहीं हुआ है और अमेरिका कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य तीनों तरीकों का इस्तेमाल कर रहा है।

हालांकि ट्रम्प को लगता है कि फिलहाल ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना सैन्य हमले से ज्यादा असरदार हो सकता है।

अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी ने ईरान की आर्थिक मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। ट्रम्प का मानना है कि अगर ईरान युद्ध में नहीं उलझा रहेगा तो उसे अपनी असली आर्थिक स्थिति का सामना करना पड़ेगा। जैसे कि बर्बाद बुनियादी ढांचा, कमजोर अर्थव्यवस्था, महंगाई और पैसों की कमी।

यानी अमेरिका का दांव यह है कि युद्ध रोककर ईरान को कमजोर होने दिया जाए।

अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि युद्ध जारी रहने पर ईरानी सरकार संघर्ष को अपनी आर्थिक परेशानियों के लिए जिम्मेदार ठहरा सकती है। लेकिन जब युद्ध नहीं होगा, तब जनता और सरकार को आर्थिक संकट का सामना सीधे करना पड़ेगा।

इसीलिए ट्रम्प फिलहाल सैन्य हमले की जगह आर्थिक दबाव को समय देना चाहते हैं।

ईरान में गरीबी दर इस साल 40% से ज्यादा होने का अनुमान है।

ईरान में गरीबी दर इस साल 40% से ज्यादा होने का अनुमान है।

ट्रम्प को ईरान के खिलाफ रणनीति क्यों बदलनी पड़ी?

ट्रम्प ने फरवरी में इजराइल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया था। शुरुआत में उम्मीद थी कि संघर्ष ज्यादा लंबा नहीं चलेगा, लेकिन यह कई महीनों तक खिंच गया।

अब अमेरिका के सामने दो तरह का दबाव है। एक तरफ वह ईरान के खिलाफ अपने सैन्य लक्ष्य हासिल करना चाहता है, दूसरी तरफ लंबे युद्ध की बढ़ती लागत भी उसके लिए चिंता बन रही है।

ट्रम्प लगातार कहते रहे हैं कि ईरान की कमजोर अर्थव्यवस्था अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत है। एक इंटरव्यू में ट्रम्प ने कहा था कि अमेरिका के सामने दो रास्ते हैं- या तो ईरान को आर्थिक रूप से टूटने दिया जाए या फिर उस पर बहुत बड़ा सैन्य हमला किया जाए। फिलहाल ट्रम्प पहला रास्ता आजमाते दिख रहे हैं।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि अमेरिका ने टकराव खत्म कर दिया है। रॉयटर्स के मुताबिक, ट्रम्प सरकार चीन की उन रिफाइनरियों पर नए प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है जो ईरानी तेल खरीदती हैं।

इसके अलावा ईरान के साथ लेन-देन करने वाले चीनी बैंकों और उन संस्थाओं पर भी कार्रवाई की तैयारी है, जिन पर प्रतिबंधों से बचने में ईरान की मदद करने का आरोप है। यानी हमला भले ही रुका हुआ है, लेकिन दबाव कम नहीं हुआ है।

होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा सौदेबाजी का मुद्दा

अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा टकराव में होर्मुज स्ट्रेट सबसे बड़ा दांव बन गया है।

दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है। इसलिए होर्मुज स्ट्रेट को लेकर किसी भी तरह की रुकावट का असर सिर्फ अमेरिका और ईरान पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के तेल बाजार और समुद्री व्यापार पर पड़ सकता है।

ईरान इस मुद्दे पर ओमान के साथ बातचीत कर रहा है। 9 अगस्त को ईरानी अधिकारियों ने कहा था कि ओमान के साथ समझौता अंतिम चरण में पहुंच गया है।

लेकिन तेहरान ने यह भी साफ कर दिया कि ओमान के साथ समझौता होने का मतलब यह नहीं है कि होर्मुज स्ट्रेट तुरंत अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खोल दिया जाएगा।

ईरान चाहता है कि अमेरिका पहले नौसैनिक नाकाबंदी खत्म करे, प्रतिबंध हटाए और युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा दे।

यानी अमेरिका चाहता है कि समुद्री रास्ते और जहाजों की आवाजाही सामान्य हो, जबकि ईरान इसे अमेरिकी रियायतों से जोड़कर देख रहा है।

इसी वजह से होर्मुज स्ट्रेट अब सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं रह गया है। यह दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा सौदेबाजी का हथियार बन चुका है।

युद्ध की बड़ी कीमत चुका रहा अमेरिका

सूत्रों के मुताबिक, ईरान के साथ पांच महीने चले युद्ध में अमेरिका ने लंबी दूरी तक मार करने वाली बड़ी संख्या में मिसाइलें इस्तेमाल की हैं। इनमें ATACMS और प्रिसीजन स्ट्राइक मिसाइल शामिल हैं।

दो सूत्रों ने दावा किया कि अमेरिका ने इन हथियारों का लगभग पूरा भंडार इस्तेमाल कर लिया है, हालांकि उन्होंने सटीक संख्या नहीं बताई।

अमेरिका युद्ध के दौरान कम से कम 45 एमक्यू-9 रीपर ड्रोन भी गंवा चुका है। यह उसके कुल बेड़े का करीब 25% है।

अमेरिकी वायुसेना के मुताबिक, एक रीपर ड्रोन की कीमत उसके उपकरणों के आधार पर 3 से 5 करोड़ डॉलर तक हो सकती है। वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, इन नुकसानों की कुल कीमत 1.3 अरब डॉलर से ज्यादा हो सकती है।

इन ड्रोन का इस्तेमाल खास तौर पर होर्मुज स्ट्रेट के आसपास निगरानी और हमलों के लिए किया गया था। कम ऊंचाई और धीमी गति के कारण ये ईरानी बलों और ईरान समर्थित समूहों के निशाने पर रहे।

युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिका के पास करीब 185 रीपर ड्रोन थे। इनमें 165 वायुसेना और 20 मरीन कॉर्प्स के पास थे। मई में अमेरिकी वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल डेविड टैबर ने सीनेट को बताया था कि वायुसेना के पास करीब 135 रीपर ड्रोन बचे हैं।

पेंटागन पहले से ही रीपर ड्रोन को धीरे-धीरे हटाकर उनकी जगह कम कीमत वाले नए हथियारबंद ड्रोन लाने की योजना पर काम कर रहा है।

लंबी दूरी की मिसाइलों की कीमत भी 10 लाख डॉलर से ज्यादा होती है। इनका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में भी किया गया है।

अगर अमेरिका के पास इन हथियारों का भंडार कम होता है तो भविष्य में ईरान पर बड़े हमले या रूस और चीन जैसे दूसरे प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ उसकी सैन्य क्षमता प्रभावित हो सकती है।

हालांकि एक अन्य अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि अमेरिका दुनिया भर में मौजूद अपने सैन्य भंडार से इन हथियारों की फिर से आपूर्ति कर सकता है।

ईरान की मांगें क्या हैं?

अमेरिका आर्थिक दबाव बढ़ाकर ईरान को समझौते के लिए तैयार करना चाहता है। लेकिन ईरान भी अपने पास मौजूद विकल्पों का इस्तेमाल कर रहा है। होर्मुज स्ट्रेट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ईरान ने अमेरिका के सामने होर्मुज खोलने के लिए 6 मांगें रखी हैं।

यानी अमेरिका आर्थिक प्रतिबंधों को दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है, जबकि ईरान दुनिया के सबसे अहम समुद्री तेल मार्ग पर अपनी पकड़ को दबाव के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है।

यही वजह है कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत की गुंजाइश होते हुए भी समझौते की राह आसान नहीं है। ——————————– ईरान से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें…

ट्रम्प ने ओमान पर बमबारी की धमकी दी:कहा- ईरान मुद्दे पर बीच में न आए; IRGC का अमेरिका से बातचीत का दावा खारिज

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को लेकर ओमान को बमबारी की धमकी दी है। फॉक्स न्यूज के मुताबिक, ट्रम्प ने कहा कि अगर ओमान अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में बाधा बना, तो अमेरिका उस पर ‘बमबारी करेगा’। पूरी खबर यहां पढ़ें…

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प 14 अगस्त को न्यूयॉर्क के गार्डन सिटी में भाषण देते हुए।

अमेरिका और ईरान के बीच जून में हुआ 60 दिन का समझौता सोमवार को खत्म हो गया। इसका मकसद दोनों देशों के बीच चल रहे युद्ध को रोकना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर विवाद का समाधान निकालना था। समयसीमा खत्म होने के बाद भी न तो कोई अंतिम समझौता हुआ और न ही अमेरिका ने ईरान पर नया बड़ा हमला शुरू किया।

60 दिनों के दौरान ट्रम्प ने कई बार कहा कि अगर बातचीत नाकाम रही तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। इसलिए माना जा रहा था कि डेडलाइन खत्म होते ही अमेरिका ईरान पर फिर बड़ा हमला कर सकता है।

समयसीमा खत्म होने से ठीक पहले ट्रम्प का रुख बदलता दिख रहा है। एक्सियोस को दिए इंटरव्यू में ट्रम्प ने कहा, “हम इसे लो-की कर रहे हैं।”

वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक अमेरिका, ईरान को तीन तरीके से घेर रहा है।

1. आर्थिक दबाव- ईरान की कमाई और अर्थव्यवस्था को कमजोर करना।

2. नौसैनिक नाकाबंदी- ईरान के लिए समुद्र के रास्ते व्यापार मुश्किल करना।

3. बातचीत- सीधे या दूसरे देशों के जरिए ईरान से समझौते की कोशिश करना।

यानी अभी अमेरिका सीधे बड़ा हमला करने की बजाय ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रहा है, समुद्र के रास्ते उसका व्यापार रोक रहा है और बातचीत के जरिए समझौते की कोशिश भी कर रहा है। बजाय इसके कि अमेरिका तुरंत फिर से बड़े युद्ध में उतर जाए।

ट्रम्प हमला रोककर क्या हासिल करना चाहते हैं?

ट्रम्प की मौजूदा रणनीति को समझने के लिए सबसे अहम बात यह है कि अमेरिका युद्ध को खत्म नहीं मान रहा है।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने शनिवार को कहा कि संघर्ष खत्म नहीं हुआ है और अमेरिका कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य तीनों तरीकों का इस्तेमाल कर रहा है।

हालांकि ट्रम्प को लगता है कि फिलहाल ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना सैन्य हमले से ज्यादा असरदार हो सकता है।

अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी ने ईरान की आर्थिक मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। ट्रम्प का मानना है कि अगर ईरान युद्ध में नहीं उलझा रहेगा तो उसे अपनी असली आर्थिक स्थिति का सामना करना पड़ेगा। जैसे कि बर्बाद बुनियादी ढांचा, कमजोर अर्थव्यवस्था, महंगाई और पैसों की कमी।

यानी अमेरिका का दांव यह है कि युद्ध रोककर ईरान को कमजोर होने दिया जाए।

अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि युद्ध जारी रहने पर ईरानी सरकार संघर्ष को अपनी आर्थिक परेशानियों के लिए जिम्मेदार ठहरा सकती है। लेकिन जब युद्ध नहीं होगा, तब जनता और सरकार को आर्थिक संकट का सामना सीधे करना पड़ेगा।

इसीलिए ट्रम्प फिलहाल सैन्य हमले की जगह आर्थिक दबाव को समय देना चाहते हैं।

ईरान में गरीबी दर इस साल 40% से ज्यादा होने का अनुमान है।

ईरान में गरीबी दर इस साल 40% से ज्यादा होने का अनुमान है।

ट्रम्प को ईरान के खिलाफ रणनीति क्यों बदलनी पड़ी?

ट्रम्प ने फरवरी में इजराइल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया था। शुरुआत में उम्मीद थी कि संघर्ष ज्यादा लंबा नहीं चलेगा, लेकिन यह कई महीनों तक खिंच गया।

अब अमेरिका के सामने दो तरह का दबाव है। एक तरफ वह ईरान के खिलाफ अपने सैन्य लक्ष्य हासिल करना चाहता है, दूसरी तरफ लंबे युद्ध की बढ़ती लागत भी उसके लिए चिंता बन रही है।

ट्रम्प लगातार कहते रहे हैं कि ईरान की कमजोर अर्थव्यवस्था अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत है। एक इंटरव्यू में ट्रम्प ने कहा था कि अमेरिका के सामने दो रास्ते हैं- या तो ईरान को आर्थिक रूप से टूटने दिया जाए या फिर उस पर बहुत बड़ा सैन्य हमला किया जाए। फिलहाल ट्रम्प पहला रास्ता आजमाते दिख रहे हैं।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि अमेरिका ने टकराव खत्म कर दिया है। रॉयटर्स के मुताबिक, ट्रम्प सरकार चीन की उन रिफाइनरियों पर नए प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है जो ईरानी तेल खरीदती हैं।

इसके अलावा ईरान के साथ लेन-देन करने वाले चीनी बैंकों और उन संस्थाओं पर भी कार्रवाई की तैयारी है, जिन पर प्रतिबंधों से बचने में ईरान की मदद करने का आरोप है। यानी हमला भले ही रुका हुआ है, लेकिन दबाव कम नहीं हुआ है।

होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा सौदेबाजी का मुद्दा

अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा टकराव में होर्मुज स्ट्रेट सबसे बड़ा दांव बन गया है।

दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है। इसलिए होर्मुज स्ट्रेट को लेकर किसी भी तरह की रुकावट का असर सिर्फ अमेरिका और ईरान पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के तेल बाजार और समुद्री व्यापार पर पड़ सकता है।

ईरान इस मुद्दे पर ओमान के साथ बातचीत कर रहा है। 9 अगस्त को ईरानी अधिकारियों ने कहा था कि ओमान के साथ समझौता अंतिम चरण में पहुंच गया है।

लेकिन तेहरान ने यह भी साफ कर दिया कि ओमान के साथ समझौता होने का मतलब यह नहीं है कि होर्मुज स्ट्रेट तुरंत अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खोल दिया जाएगा।

ईरान चाहता है कि अमेरिका पहले नौसैनिक नाकाबंदी खत्म करे, प्रतिबंध हटाए और युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा दे।

यानी अमेरिका चाहता है कि समुद्री रास्ते और जहाजों की आवाजाही सामान्य हो, जबकि ईरान इसे अमेरिकी रियायतों से जोड़कर देख रहा है।

इसी वजह से होर्मुज स्ट्रेट अब सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं रह गया है। यह दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा सौदेबाजी का हथियार बन चुका है।

युद्ध की बड़ी कीमत चुका रहा अमेरिका

सूत्रों के मुताबिक, ईरान के साथ पांच महीने चले युद्ध में अमेरिका ने लंबी दूरी तक मार करने वाली बड़ी संख्या में मिसाइलें इस्तेमाल की हैं। इनमें ATACMS और प्रिसीजन स्ट्राइक मिसाइल शामिल हैं।

दो सूत्रों ने दावा किया कि अमेरिका ने इन हथियारों का लगभग पूरा भंडार इस्तेमाल कर लिया है, हालांकि उन्होंने सटीक संख्या नहीं बताई।

अमेरिका युद्ध के दौरान कम से कम 45 एमक्यू-9 रीपर ड्रोन भी गंवा चुका है। यह उसके कुल बेड़े का करीब 25% है।

अमेरिकी वायुसेना के मुताबिक, एक रीपर ड्रोन की कीमत उसके उपकरणों के आधार पर 3 से 5 करोड़ डॉलर तक हो सकती है। वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, इन नुकसानों की कुल कीमत 1.3 अरब डॉलर से ज्यादा हो सकती है।

इन ड्रोन का इस्तेमाल खास तौर पर होर्मुज स्ट्रेट के आसपास निगरानी और हमलों के लिए किया गया था। कम ऊंचाई और धीमी गति के कारण ये ईरानी बलों और ईरान समर्थित समूहों के निशाने पर रहे।

युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिका के पास करीब 185 रीपर ड्रोन थे। इनमें 165 वायुसेना और 20 मरीन कॉर्प्स के पास थे। मई में अमेरिकी वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल डेविड टैबर ने सीनेट को बताया था कि वायुसेना के पास करीब 135 रीपर ड्रोन बचे हैं।

पेंटागन पहले से ही रीपर ड्रोन को धीरे-धीरे हटाकर उनकी जगह कम कीमत वाले नए हथियारबंद ड्रोन लाने की योजना पर काम कर रहा है।

लंबी दूरी की मिसाइलों की कीमत भी 10 लाख डॉलर से ज्यादा होती है। इनका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में भी किया गया है।

अगर अमेरिका के पास इन हथियारों का भंडार कम होता है तो भविष्य में ईरान पर बड़े हमले या रूस और चीन जैसे दूसरे प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ उसकी सैन्य क्षमता प्रभावित हो सकती है।

हालांकि एक अन्य अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि अमेरिका दुनिया भर में मौजूद अपने सैन्य भंडार से इन हथियारों की फिर से आपूर्ति कर सकता है।

ईरान की मांगें क्या हैं?

अमेरिका आर्थिक दबाव बढ़ाकर ईरान को समझौते के लिए तैयार करना चाहता है। लेकिन ईरान भी अपने पास मौजूद विकल्पों का इस्तेमाल कर रहा है। होर्मुज स्ट्रेट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ईरान ने अमेरिका के सामने होर्मुज खोलने के लिए 6 मांगें रखी हैं।

यानी अमेरिका आर्थिक प्रतिबंधों को दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है, जबकि ईरान दुनिया के सबसे अहम समुद्री तेल मार्ग पर अपनी पकड़ को दबाव के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है।

यही वजह है कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत की गुंजाइश होते हुए भी समझौते की राह आसान नहीं है। ——————————– ईरान से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें…

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को लेकर ओमान को बमबारी की धमकी दी है। फॉक्स न्यूज के मुताबिक, ट्रम्प ने कहा कि अगर ओमान अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में बाधा बना, तो अमेरिका उस पर ‘बमबारी करेगा’। पूरी खबर यहां पढ़ें…

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