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What is difference between Avimukteshwaranand and Asaram Bapu Case: avimukteshwaranand pocso case | up police | क्या अविमुक्तेश्वरानंद जाएंगे जेल, यौन शोषण के आरोप कितने गंभीर, आसाराम बापू से कितना अलग है मामला?

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नई दिल्ली. क्या ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती यौन शोषण के आरोप में बहुत जल्द गिरफ्तार होने वाले हैं? पॉक्सो एक्ट में एफआईआर दर्ज होने के बाद अविमुक्तेश्वरानंद के सामने अब क्या-क्या कानूनी विकल्प बच गए हैं? अविमुक्तेश्वरानंद का मामला आसाराम बापू वाले मामले से कितना अलग है? क्या पॉक्सो एक्ट 2012 और भारतीय न्याय संहिता 2023 अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य मुकुंदानंद गिरि को जेल की सलाखों तक पहुंचा देगा? अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ यौन शोषण के आरोपों में दर्ज एफआईआर को लेकर अब धार्मिक और कानूनी गलियारों में हलचल मच गई है. प्रयागराज में माघ मेला 2025-26 के दौरान दो नाबालिग बच्चों द्वारा लगाए गए आरोपों के आधार पर अविमुक्तेश्वरानंद एक बार फिर से चर्चा में आ गए हैं.

21 फरवरी 2026 को प्रयागराज की स्पेशल पॉक्सो कोर्ट ने झूंसी पुलिस स्टेशन को एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया. आरोपों में भारतीय न्याय संहिता की धारा 69, 74, 75, 76, 79 और 109 साथ ही POCSO एक्ट की धारा 3, 5, 9 और 17 शामिल हैं, जो यौन हमला, गैंग असॉल्ट और नाबालिगों के शोषण से संबंधित हैं.

क्या अविमुक्तेश्वरानंद की गिरफ्तारी होगी?

कानूनी रूप से देखा जाए तो पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज होने वाले मामले बेहद गंभीर और गैर-जमानती होते हैं. एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस को जांच के दौरान आरोपी को गिरफ्तार करने का अधिकार होता है. खासकर जब मामला नाबालिगों से जुड़ा हो. हालांकि, गिरफ्तारी केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि पुलिस द्वारा जुटाए गए शुरुआती साक्ष्यों और पीड़ितों के बयानों जो धारा 164 के तहत की गंभीरता पर निर्भर करेगी. यदि जांच एजेंसी को लगता है कि आरोपी साक्ष्यों को प्रभावित कर सकता है, तो गिरफ्तारी की संभावना प्रबल हो जाती है.

अविमुक्तेश्वरानंद के पास अब क्या विकल्प बचे हैं?

एफआईआर दर्ज होने के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पास मुख्य रूप से तीन कानूनी विकल्प मौजूद हैं:

1. अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail): स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद गिरफ्तारी से बचने के लिए सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत की याचिका दायर कर सकते हैं.
2. 2. FIR को चुनौती (Quashing of FIR): वे इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर को रद्द करने की मांग कर सकते हैं, यदि वे यह साबित कर सकें कि यह मामला पूरी तरह फर्जी या दुर्भावनापूर्ण है.
3. जांच में सहयोग: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अब खुद पुलिस के सामने पेश होकर अपना पक्ष रख सकते हैं और अपनी बेगुनाही के सबूत पेश कर सकते हैं.

आशाराम बापू और अविमुक्तेश्वरानंद: क्या मामला एक जैसा है?

अक्सर लोग इसकी तुलना आशाराम बापू मामले से कर रहे हैं, लेकिन दोनों में कुछ बुनियादी समानताएं और अंतर हैं. दोनों ही मामलों में पीड़ितों ने ‘गुरु-शिष्य’ परंपरा की आड़ में यौन शोषण का आरोप लगाया है. दोनों पर पॉक्सो एक्ट की धाराएं लगी हैं. लेकिन आशाराम के खिलाफ पुलिस ने सीधे एफआईआर दर्ज की थी, जबकि अविमुक्तेश्वरानंद के मामले में शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा, क्योंकि पुलिस ने शुरुआत में केस दर्ज नहीं किया था. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इसे एक साजिश करार दिया है और शिकायतकर्ता के हिस्ट्रीशीटर होने का दावा किया है.

पॉक्सो एक्ट में सजा के क्या प्रावधान हैं?

अविमुक्तेश्वरानंद पर अब पॉक्सो एक्ट और भारतीय न्याय संहिता 2023 के मामला चलेगा. पॉक्सो एक्ट की धारा 6 में गंभीर मर्मभेदी यौन हमला के लिए न्यूनतम 20 साल की कैद, जिसे आजीवन कारावास या मृत्युदंड तक बढ़ाया जा सकता है. बीएनएस 2023 की धारा 64/65 में नाबालिग के साथ दुष्कर्म के मामले में सख्त सजा का प्रावधान है. यदि पीड़िता 12 साल से कम है तो मौत की सजा तक का प्रावधान है.

कानून के जानकारों का मानना है कि अदालत ने केवल एफआईआर का आदेश दिया है. इसका मतलब यह नहीं कि दोष सिद्ध हो गया है. चूंकि शिकायतकर्ता का पिछला रिकॉर्ड विवादित बताया जा रहा है, इसलिए पुलिस को साक्ष्यों विशेषकर शिकायतकर्ता द्वारा सौंपी गई सीडी की फॉरेंसिक जांच बहुत बारीकी से करनी होगी. पॉक्सो के मामलों में अदालतें अक्सर बहुत सख्त रुख अपनाती हैं, इसलिए आरोपी के लिए कानूनी लड़ाई चुनौतीपूर्ण हो सकती है.

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नई दिल्ली. क्या ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती यौन शोषण के आरोप में बहुत जल्द गिरफ्तार होने वाले हैं? पॉक्सो एक्ट में एफआईआर दर्ज होने के बाद अविमुक्तेश्वरानंद के सामने अब क्या-क्या कानूनी विकल्प बच गए हैं? अविमुक्तेश्वरानंद का मामला आसाराम बापू वाले मामले से कितना अलग है? क्या पॉक्सो एक्ट 2012 और भारतीय न्याय संहिता 2023 अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य मुकुंदानंद गिरि को जेल की सलाखों तक पहुंचा देगा? अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ यौन शोषण के आरोपों में दर्ज एफआईआर को लेकर अब धार्मिक और कानूनी गलियारों में हलचल मच गई है. प्रयागराज में माघ मेला 2025-26 के दौरान दो नाबालिग बच्चों द्वारा लगाए गए आरोपों के आधार पर अविमुक्तेश्वरानंद एक बार फिर से चर्चा में आ गए हैं.

21 फरवरी 2026 को प्रयागराज की स्पेशल पॉक्सो कोर्ट ने झूंसी पुलिस स्टेशन को एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया. आरोपों में भारतीय न्याय संहिता की धारा 69, 74, 75, 76, 79 और 109 साथ ही POCSO एक्ट की धारा 3, 5, 9 और 17 शामिल हैं, जो यौन हमला, गैंग असॉल्ट और नाबालिगों के शोषण से संबंधित हैं.

क्या अविमुक्तेश्वरानंद की गिरफ्तारी होगी?

कानूनी रूप से देखा जाए तो पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज होने वाले मामले बेहद गंभीर और गैर-जमानती होते हैं. एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस को जांच के दौरान आरोपी को गिरफ्तार करने का अधिकार होता है. खासकर जब मामला नाबालिगों से जुड़ा हो. हालांकि, गिरफ्तारी केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि पुलिस द्वारा जुटाए गए शुरुआती साक्ष्यों और पीड़ितों के बयानों जो धारा 164 के तहत की गंभीरता पर निर्भर करेगी. यदि जांच एजेंसी को लगता है कि आरोपी साक्ष्यों को प्रभावित कर सकता है, तो गिरफ्तारी की संभावना प्रबल हो जाती है.

अविमुक्तेश्वरानंद के पास अब क्या विकल्प बचे हैं?

एफआईआर दर्ज होने के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पास मुख्य रूप से तीन कानूनी विकल्प मौजूद हैं:

1. अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail): स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद गिरफ्तारी से बचने के लिए सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत की याचिका दायर कर सकते हैं.
2. 2. FIR को चुनौती (Quashing of FIR): वे इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर को रद्द करने की मांग कर सकते हैं, यदि वे यह साबित कर सकें कि यह मामला पूरी तरह फर्जी या दुर्भावनापूर्ण है.
3. जांच में सहयोग: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अब खुद पुलिस के सामने पेश होकर अपना पक्ष रख सकते हैं और अपनी बेगुनाही के सबूत पेश कर सकते हैं.

आशाराम बापू और अविमुक्तेश्वरानंद: क्या मामला एक जैसा है?

अक्सर लोग इसकी तुलना आशाराम बापू मामले से कर रहे हैं, लेकिन दोनों में कुछ बुनियादी समानताएं और अंतर हैं. दोनों ही मामलों में पीड़ितों ने ‘गुरु-शिष्य’ परंपरा की आड़ में यौन शोषण का आरोप लगाया है. दोनों पर पॉक्सो एक्ट की धाराएं लगी हैं. लेकिन आशाराम के खिलाफ पुलिस ने सीधे एफआईआर दर्ज की थी, जबकि अविमुक्तेश्वरानंद के मामले में शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा, क्योंकि पुलिस ने शुरुआत में केस दर्ज नहीं किया था. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इसे एक साजिश करार दिया है और शिकायतकर्ता के हिस्ट्रीशीटर होने का दावा किया है.

पॉक्सो एक्ट में सजा के क्या प्रावधान हैं?

अविमुक्तेश्वरानंद पर अब पॉक्सो एक्ट और भारतीय न्याय संहिता 2023 के मामला चलेगा. पॉक्सो एक्ट की धारा 6 में गंभीर मर्मभेदी यौन हमला के लिए न्यूनतम 20 साल की कैद, जिसे आजीवन कारावास या मृत्युदंड तक बढ़ाया जा सकता है. बीएनएस 2023 की धारा 64/65 में नाबालिग के साथ दुष्कर्म के मामले में सख्त सजा का प्रावधान है. यदि पीड़िता 12 साल से कम है तो मौत की सजा तक का प्रावधान है.

कानून के जानकारों का मानना है कि अदालत ने केवल एफआईआर का आदेश दिया है. इसका मतलब यह नहीं कि दोष सिद्ध हो गया है. चूंकि शिकायतकर्ता का पिछला रिकॉर्ड विवादित बताया जा रहा है, इसलिए पुलिस को साक्ष्यों विशेषकर शिकायतकर्ता द्वारा सौंपी गई सीडी की फॉरेंसिक जांच बहुत बारीकी से करनी होगी. पॉक्सो के मामलों में अदालतें अक्सर बहुत सख्त रुख अपनाती हैं, इसलिए आरोपी के लिए कानूनी लड़ाई चुनौतीपूर्ण हो सकती है.

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