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खबर मत करो, ये बताओ करना क्या है?:बीज निगम के अफसर का रिपोर्टर को ऑफर, फर्जी दस्तावेजों से नौकरी, अबतक ली 1.55 करोड़ सैलरी

खबर मत करो, ये बताओ करना क्या है?:बीज निगम के अफसर का रिपोर्टर को ऑफर, फर्जी दस्तावेजों से नौकरी, अबतक ली 1.55 करोड़ सैलरी

मध्य प्रदेश राज्य बीज एवं फार्म विकास निगम में 23 साल से एक ऐसा अधिकारी प्रोडक्शन मैनेजर के पद पर बैठा है, जिसकी नींव ही धोखाधड़ी और कूटरचित दस्तावेजों पर रखी गई है। उत्तर प्रदेश के झांसी निवासी लाल सिंह, मध्य प्रदेश का फर्जी जाति प्रमाण पत्र और निवास प्रमाण पत्र बनाकर न केवल नौकरी हासिल करने में कामयाब रहा, बल्कि पिछले 23 सालों में 1.55 करोड़ रुपए से अधिक का वेतन ले चुका है। इस पूरे फर्जीवाड़े का खुलासा होने और कृषि विभाग के सचिव द्वारा सेवा समाप्ति और FIR के स्पष्ट आदेश के बावजूद, बीज निगम के आला अधिकारी उसे बचाने में लगे हैं। भास्कर ने इस पूरे मामले की गहन पड़ताल की, जिसमें सामने आया कि कैसे एक व्यक्ति सिस्टम की खामियों का फायदा उठाकर सालों तक सरकार को धोखा देता रहा और मध्य प्रदेश के एक अनुसूचित जाति के हकदार का अधिकार मारता रहा। पढ़िए रिपोर्ट… दो बिंदुओं में समझें नियुक्ति का पूरा खेल
जैसा कि दस्तावेजों से साफ है, लाल सिंह की पूरी शिक्षा उत्तर प्रदेश में हुई। फिर वह मध्य प्रदेश के कोटे के तहत आरक्षित पद पर नियुक्त कैसे हो गया? 1. विज्ञापन और फर्जी आवेदन: वर्ष 2002 में मध्य प्रदेश राज्य बीज एवं फार्म विकास निगम ने विशेष भर्ती अभियान के तहत सहायक प्रबंधक (उत्पादन) के पदों के लिए विज्ञापन निकाला। शर्त थी कि आवेदक मध्य प्रदेश का मूल निवासी और अनुसूचित जाति वर्ग का हो। लाल सिंह ने 10 दिसंबर 2002 को इसी आरक्षित वर्ग में आवेदन किया। साक्षात्कार के बाद, 7 जनवरी 2003 को उसे नियुक्ति पत्र (आदेश क्रमांक एचओ/प्रशा/वि.भ.अ./2002/3893) जारी कर दिया गया। 2. फर्जी दस्तावेजों का जाल: नियुक्ति के बाद जब दस्तावेज सत्यापन की बारी आई, तो लाल सिंह ने खेल शुरू किया। उसने नायब तहसीलदार, ग्वालियर के कार्यालय से जारी एक अस्थायी जाति प्रमाण पत्र (क्रमांक 65-स. क्र. 6455, प्रकरण क्रमांक 2296/ 2002-2003, 19 अगस्त 2003) प्रस्तुत किया। यह प्रमाण पत्र न केवल अस्थायी था, बल्कि संदेहास्पद था। निवास प्रमाण पत्र में काट-छांट कर चौथी कक्षा की जगह पांचवीं कक्षा का जिक्र किया गया, जबकि लाल सिंह की पूरी शिक्षा झांसी से हुई थी। भास्कर की पड़ताल में हुआ धोखाधड़ी का खुलासा
शिकायतकर्ता कर्मवीर चौहान द्वारा सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त जानकारी से इस फर्जीवाड़े की परतें उधड़ गईं। RTI से पता चला कि जिस प्रकरण क्रमांक 2296 (दिनांक 19 अगस्त 2003) का जाति प्रमाण पत्र लाल सिंह ने जमा किया था, उस क्रमांक पर ग्वालियर के गोपालपुरा निवासी चंद्र किशोर यादव पिता चतुर्भुज सिंह के नाम से प्रमाण पत्र जारी हुआ था। यानी लाल सिंह ने एक ऐसे नंबर का इस्तेमाल किया, जो किसी और को आवंटित था। यह सीधा-सीधा धोखाधड़ी और जालसाजी का मामला है। लाल सिंह बोला- खबर न करें, मामला वायरल होगा
जब भास्कर रिपोर्टर ने सबूतों के साथ लाल सिंह से बात की, तो वह पहले तो मामले को टालता रहा, लेकिन बाद में खबर न छापने की मिन्नतें करने लगा। रिपोर्टर: आपके फर्जी जाति प्रमाण पत्र को लेकर कृषि सचिव ने एक्शन लेने के लिए नोटशीट जारी की है, सारे डॉक्यूमेंट मेरे पास हैं। क्या कहेंगे? लाल सिंह: हां, होंगे आपके पास। वह मामला अभी पेंडिंग है। हाईकोर्ट में भी गया है। छानबीन समिति में भी है। रिपोर्टर: आपकी स्कूलिंग कहां से हुई? लाल सिंह: मेरी स्कूलिंग एमपी और यूपी, दोनों जगह से हुई थी। (यह उनके दस्तावेजों के विपरीत है) रिपोर्टर: इतने साल तक नौकरी कैसे करते रहे? अधिकारियों को कैसे मैनेज किया? लाल सिंह: अधिकारियों ने सत्यापन करवाया है। कलेक्टर से कॉपी आई है। विभाग से कॉपी ग्वालियर कलेक्टर को गई और वहां से सत्यापन आया। (यह दावा झूठा है, क्योंकि RTI से पता चला है कि सत्यापन कभी हुआ ही नहीं) रिपोर्टर: हमारे पास सारे दस्तावेज हैं, बताइए क्या करना है? लाल सिंह: मुझे तो पूरी उम्मीद है कि आपकी भी सरकार सुनती है और आप भी इस मामले में मेरा सपोर्ट करोगे। रिपोर्टर: अब बताइए क्या करना चाहिए ? लाल सिंह: देखिए, आपका बड़ा प्लेटफार्म है, आपकी खबर का इंपैक्ट भी होगा। मेरी तो आपसे रिक्वेस्ट है कि आप खबर ना करें, क्योंकि यह मामला और वायरल होगा। बाकी ठीक है, यह इन्वेस्टिगेशन चलता रहेगा। आप मुझे बता दीजिए क्या करना है, मैं वो कर लूंगा। सचिव ने लिखा- सेवा समाप्त करें, आपराधिक केस दर्ज करें
इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि धोखाधड़ी साबित होने के बाद भी कार्रवाई नहीं हो रही है। किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग के सचिव निशांत वरवड़े ने 2 जनवरी 2026 को एक विस्तृत नोटशीट जारी की। यह आदेश सीधे प्रबंध संचालक, बीज निगम को भेजा गया था, लेकिन एक महीने से ज्यादा बीत जाने के बाद भी यह फाइल धूल फांक रही है। एमडी का गोलमोल जवाब, मामला बोर्ड में रखेंगे
जब भास्कर ने बीज निगम के एमडी संदीप केरकेट्टा से पूछा कि सचिव के स्पष्ट आदेश के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हो रही, तो उन्होंने टालमटोल वाला जवाब दिया। उन्होंने कहा कि लाल सिंह के मामले का प्रपोजल हमने राज्य बीज एवं फार्म विकास निगम बोर्ड में रख दिया है। अब बोर्ड के सदस्य इस पर विचार करेंगे। यह जवाब अपने आप में एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। जब विभाग के प्रशासनिक प्रमुख ने जांच के बाद नियुक्ति को अवैध मानकर सेवा समाप्ति का आदेश दे दिया है, तो उसे बोर्ड के सामने रखने का क्या औचित्य है? क्या यह आरोपी को बचाने और मामले को लंबा खींचने की कोशिश नहीं है? पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार के भी गंभीर आरोप
लाल सिंह का करियर सिर्फ फर्जी नियुक्ति तक सीमित नहीं है। सतना में क्षेत्रीय प्रबंधक रहते हुए उस पर बीजों की हेराफेरी कर 60 से 80 लाख रुपये के भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे, जिसके बाद उसे सस्पेंड भी किया गया था। आरोप है कि 2014-15 से 2022 तक उसने पौंडी, सिंदुर्खार और रेवरा फॉर्म पर लगभग 7,577 क्विंटल आधार बीजों की हेराफेरी की। अगर यह बीज किसानों को मिलता, तो इससे लगभग 25,000 क्विंटल प्रमाणित बीज तैयार होता, जिससे निगम और किसान दोनों को फायदा होता। इस मामले की जांच भी कछुआ चाल से चल रही है। शिकायतकर्ता की मांग: पैसे की वसूली हो, बचाने वाले अफसरों पर भी हो केस
एक व्यक्ति जो नौकरी का हकदार ही नहीं था, उसने जनता के टैक्स के पैसों से 1.36 करोड़ रुपए से ज्यादा अपनी जेब में रखे। इस मामले को उजागर करने वाले कर्मवीर चौहान का कहना है कि लाल सिंह ने मध्य प्रदेश के अनुसूचित जाति वर्ग के एक अभ्यर्थी का हक मारा है। उसकी नियुक्ति पूरी तरह से अवैध है। उसे तत्काल बर्खास्त कर अब तक दिए गए पूरे वेतन की वसूली होनी चाहिए। इतने सालों तक उसे संरक्षण देने वाले और बीज निगम सचिव के आदेश पर कार्रवाई न करने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी आपराधिक प्रकरण दर्ज होना चाहिए। 5 पॉइंटस जो अफसरों की मंशा पर सवाल खड़े करते हैं

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जैसा कि दस्तावेजों से साफ है, लाल सिंह की पूरी शिक्षा उत्तर प्रदेश में हुई। फिर वह मध्य प्रदेश के कोटे के तहत आरक्षित पद पर नियुक्त कैसे हो गया? 1. विज्ञापन और फर्जी आवेदन: वर्ष 2002 में मध्य प्रदेश राज्य बीज एवं फार्म विकास निगम ने विशेष भर्ती अभियान के तहत सहायक प्रबंधक (उत्पादन) के पदों के लिए विज्ञापन निकाला। शर्त थी कि आवेदक मध्य प्रदेश का मूल निवासी और अनुसूचित जाति वर्ग का हो। लाल सिंह ने 10 दिसंबर 2002 को इसी आरक्षित वर्ग में आवेदन किया। साक्षात्कार के बाद, 7 जनवरी 2003 को उसे नियुक्ति पत्र (आदेश क्रमांक एचओ/प्रशा/वि.भ.अ./2002/3893) जारी कर दिया गया। 2. फर्जी दस्तावेजों का जाल: नियुक्ति के बाद जब दस्तावेज सत्यापन की बारी आई, तो लाल सिंह ने खेल शुरू किया। उसने नायब तहसीलदार, ग्वालियर के कार्यालय से जारी एक अस्थायी जाति प्रमाण पत्र (क्रमांक 65-स. क्र. 6455, प्रकरण क्रमांक 2296/ 2002-2003, 19 अगस्त 2003) प्रस्तुत किया। यह प्रमाण पत्र न केवल अस्थायी था, बल्कि संदेहास्पद था। निवास प्रमाण पत्र में काट-छांट कर चौथी कक्षा की जगह पांचवीं कक्षा का जिक्र किया गया, जबकि लाल सिंह की पूरी शिक्षा झांसी से हुई थी। भास्कर की पड़ताल में हुआ धोखाधड़ी का खुलासा
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जब भास्कर रिपोर्टर ने सबूतों के साथ लाल सिंह से बात की, तो वह पहले तो मामले को टालता रहा, लेकिन बाद में खबर न छापने की मिन्नतें करने लगा। रिपोर्टर: आपके फर्जी जाति प्रमाण पत्र को लेकर कृषि सचिव ने एक्शन लेने के लिए नोटशीट जारी की है, सारे डॉक्यूमेंट मेरे पास हैं। क्या कहेंगे? लाल सिंह: हां, होंगे आपके पास। वह मामला अभी पेंडिंग है। हाईकोर्ट में भी गया है। छानबीन समिति में भी है। रिपोर्टर: आपकी स्कूलिंग कहां से हुई? लाल सिंह: मेरी स्कूलिंग एमपी और यूपी, दोनों जगह से हुई थी। (यह उनके दस्तावेजों के विपरीत है) रिपोर्टर: इतने साल तक नौकरी कैसे करते रहे? अधिकारियों को कैसे मैनेज किया? लाल सिंह: अधिकारियों ने सत्यापन करवाया है। कलेक्टर से कॉपी आई है। विभाग से कॉपी ग्वालियर कलेक्टर को गई और वहां से सत्यापन आया। (यह दावा झूठा है, क्योंकि RTI से पता चला है कि सत्यापन कभी हुआ ही नहीं) रिपोर्टर: हमारे पास सारे दस्तावेज हैं, बताइए क्या करना है? लाल सिंह: मुझे तो पूरी उम्मीद है कि आपकी भी सरकार सुनती है और आप भी इस मामले में मेरा सपोर्ट करोगे। रिपोर्टर: अब बताइए क्या करना चाहिए ? लाल सिंह: देखिए, आपका बड़ा प्लेटफार्म है, आपकी खबर का इंपैक्ट भी होगा। मेरी तो आपसे रिक्वेस्ट है कि आप खबर ना करें, क्योंकि यह मामला और वायरल होगा। बाकी ठीक है, यह इन्वेस्टिगेशन चलता रहेगा। आप मुझे बता दीजिए क्या करना है, मैं वो कर लूंगा। सचिव ने लिखा- सेवा समाप्त करें, आपराधिक केस दर्ज करें
इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि धोखाधड़ी साबित होने के बाद भी कार्रवाई नहीं हो रही है। किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग के सचिव निशांत वरवड़े ने 2 जनवरी 2026 को एक विस्तृत नोटशीट जारी की। यह आदेश सीधे प्रबंध संचालक, बीज निगम को भेजा गया था, लेकिन एक महीने से ज्यादा बीत जाने के बाद भी यह फाइल धूल फांक रही है। एमडी का गोलमोल जवाब, मामला बोर्ड में रखेंगे
जब भास्कर ने बीज निगम के एमडी संदीप केरकेट्टा से पूछा कि सचिव के स्पष्ट आदेश के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हो रही, तो उन्होंने टालमटोल वाला जवाब दिया। उन्होंने कहा कि लाल सिंह के मामले का प्रपोजल हमने राज्य बीज एवं फार्म विकास निगम बोर्ड में रख दिया है। अब बोर्ड के सदस्य इस पर विचार करेंगे। यह जवाब अपने आप में एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। जब विभाग के प्रशासनिक प्रमुख ने जांच के बाद नियुक्ति को अवैध मानकर सेवा समाप्ति का आदेश दे दिया है, तो उसे बोर्ड के सामने रखने का क्या औचित्य है? क्या यह आरोपी को बचाने और मामले को लंबा खींचने की कोशिश नहीं है? पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार के भी गंभीर आरोप
लाल सिंह का करियर सिर्फ फर्जी नियुक्ति तक सीमित नहीं है। सतना में क्षेत्रीय प्रबंधक रहते हुए उस पर बीजों की हेराफेरी कर 60 से 80 लाख रुपये के भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे, जिसके बाद उसे सस्पेंड भी किया गया था। आरोप है कि 2014-15 से 2022 तक उसने पौंडी, सिंदुर्खार और रेवरा फॉर्म पर लगभग 7,577 क्विंटल आधार बीजों की हेराफेरी की। अगर यह बीज किसानों को मिलता, तो इससे लगभग 25,000 क्विंटल प्रमाणित बीज तैयार होता, जिससे निगम और किसान दोनों को फायदा होता। इस मामले की जांच भी कछुआ चाल से चल रही है। शिकायतकर्ता की मांग: पैसे की वसूली हो, बचाने वाले अफसरों पर भी हो केस
एक व्यक्ति जो नौकरी का हकदार ही नहीं था, उसने जनता के टैक्स के पैसों से 1.36 करोड़ रुपए से ज्यादा अपनी जेब में रखे। इस मामले को उजागर करने वाले कर्मवीर चौहान का कहना है कि लाल सिंह ने मध्य प्रदेश के अनुसूचित जाति वर्ग के एक अभ्यर्थी का हक मारा है। उसकी नियुक्ति पूरी तरह से अवैध है। उसे तत्काल बर्खास्त कर अब तक दिए गए पूरे वेतन की वसूली होनी चाहिए। इतने सालों तक उसे संरक्षण देने वाले और बीज निगम सचिव के आदेश पर कार्रवाई न करने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी आपराधिक प्रकरण दर्ज होना चाहिए। 5 पॉइंटस जो अफसरों की मंशा पर सवाल खड़े करते हैं

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