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भूत बंगला में कॉमेडी-हॉरर का नया अनुभव देंगे अक्षय:प्रियदर्शन बोले- कहानी कई बार लिखी गई; वामिका ने कहा- फिल्म ने शांत रहना और काम एंजॉय करना सिखाया

भूत बंगला में कॉमेडी-हॉरर का नया अनुभव देंगे अक्षय:प्रियदर्शन बोले- कहानी कई बार लिखी गई; वामिका ने कहा- फिल्म ने शांत रहना और काम एंजॉय करना सिखाया

फिल्म ‘भूत बंगला’ को लेकर स्टारकास्ट और डायरेक्टर ने खुलकर बातचीत की, जिसमें इसके आइडिया, शूटिंग अनुभव और कॉमेडी-हॉरर के संतुलन पर चर्चा हुई। डायरेक्टर प्रियदर्शन ने बताया कि कहानी को कई बार री-राइट कर इसे एक परफेक्ट एंटरटेनर बनाया गया, जबकि अक्षय कुमार ने फिल्म में लॉजिक और रियल अप्रोच पर जोर दिया। वामिका गब्बी ने कहा कि इस फिल्म ने उन्हें शांत रहकर काम को एंजॉय करना सिखाया। शूटिंग के दौरान के दिलचस्प किस्से और प्रैंक्स भी सामने आए। साथ ही, आज के दौर में कॉमेडी, ओटीटी, जेन जी ऑडियंस और एआई के बढ़ते प्रभाव पर भी अपनी राय रखी। फिल्म को अलग ट्रीटमेंट और फ्रेश एक्सपीरियंस देने का दावा किया गया है। पेश है फिल्म की स्टारकास्ट और डायरेक्टर से हुई बातचीत के कुछ प्रमुख अंश.. ‘भूत बंगला’ का आइडिया कैसे आया और ऐसा क्या है इसमें जो यह दर्शकों को एक नयापन देगी? प्रियदर्शन– भूत बंगला का आइडिया मुझे प्रोड्यूसर की तरफ से मिला था। उन्होंने एक स्टोरीलाइन भेजी थी, जो मुझे काफी दिलचस्प लगी। जब मैंने उसे सुना, तो लगा कि इसमें एक बहुत अच्छा प्लॉट है और इसे आगे डेवलप किया जा सकता है। इसके बाद हमने कहानी पर बार-बार काम किया, उसे री-राइट किया, क्योंकि हमारा मकसद था कि यह फिल्म एक पूरी तरह से एंटरटेनर बने। जिसमें भरपूर कॉमेडी भी हो और हॉरर भी। ये बैलेंस बनाना आसान नहीं होता, लेकिन हमने इसे हासिल करने की कोशिश की। अक्षय–एकता ने यह आइडिया मुझे सुनाया, फिर हमने इसे प्रियंक सर को सुनाया और आगे मिलकर इसे डेवलप किया। इसके बाद कहानी को एक अलग तरीके से ट्रीट किया गया। इसमें कॉमेडी, हॉरर और सबसे जरूरी, लॉजिक जोड़ा गया। हमने खास तौर पर ध्यान रखा कि फिल्म में लॉजिक मजबूत रहे। इसी प्रक्रिया के बाद यह फिल्म तैयार हुई। शूटिंग के दौरान क्या कभी डर लगा, कोई वाकया सेट का? अक्षय–सेट पर हमें कभी डर नहीं लगा, क्योंकि वहां असल में कोई भूत-वूत नहीं था। लेकिन एक दिलचस्प इंसिडेंट जरूर याद आता है, जो मैं आपसे शेयर करना चाहूंगा। मड आइलैंड में एक बहुत बड़ा बंगला है, जहां मैंने कई बार शूटिंग की है। हालांकि, लोग वहां रात में शूटिंग करने से बचते हैं। मैं बंगले का नाम नहीं लेना चाहूंगा, लेकिन उसके बारे में यह मशहूर था कि वहां रात को ‘भूत’ दिखाई देता है। कई लोगों ने उसे देखने का दावा भी किया था—यहां तक कि वहां के केयरटेकर ने भी कहा था कि उसने कई बार उसे देखा है। इसी वजह से वहां शूटिंग जल्दी खत्म कर दी जाती थी। आमतौर पर रात 1 बजे तक पैकअप हो जाता था और उसके बाद कोई भी बाहर नहीं निकलता था। उस बंगले के बारे में इतना डर फैल गया था कि उसका मालिक भी उसे बेच नहीं पा रहा था। सालों तक वह बंगला बिक ही नहीं पाया लेकिन कुछ साल पहले सच्चाई सामने आई, जो काफी हैरान करने वाली थी। दरअसल, वही केयरटेकर खुद ‘भूत’ बनकर लोगों को डराता था। वह नहीं चाहता था कि बंगला बिके, क्योंकि वह खुद वहीं रहना चाहता था। इसलिए वह रात में साड़ी पहनकर इधर-उधर घूमता था और लोगों को डराता था, जिससे इलाके में यह बात फैल गई कि वहां सच में भूत है। इस तरह उसने करीब 26–27 साल तक लोगों को भ्रम में रखा और बंगले को बिकने नहीं दिया। सच में, यह उसकी एक बहुत ही चालाकी भरी योजना थी।” वामिका–मेरे लिए यही हैं (अक्षय) सबसे बड़े प्रैंकस्टर। सेट पर एक दिन मेरे डैड आए थे। मुझे हार्नेस में शॉट देना था और जैसे ही एक्शन हुआ अक्षय ने मुझे अचानक छोड़ दिया। मैं हवा में लटक गई। मुझे नहीं पता था यह होने वाला है तो मैं तो बहुत डर गई थी। बाद में पता चला कि इस प्रैंक में खुद डैड शामिल थे और वीडियो बना रहे थे। ऐसी फिल्मों में हॉरर और कॉमेडी दोनों की टाइमिंग मेंटेन करना बड़ा चैलेंज होता है? प्रियदर्शन– नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है कि हम पहले से तय करते हैं कि फिल्म में कितनी कॉमेडी होगी और कितना हॉरर। अगर आपने भूल-भुलैया देखी है, तो वह भी हॉरर और कॉमेडी का ही एक बेहतरीन कॉम्बिनेशन है। असल में इसमें कोई फिक्स टाइमिंग नहीं होती कि इतने मिनट हॉरर होगा और इतने मिनट कॉमेडी। यह सब कहानी के साथ नैचुरली चलता है। जब आप थिएटर में बैठकर फिल्म देखते हैं, तो कभी आपको हंसी आती है, तो कभी अचानक आप टेंशन या डर महसूस करने लगते हैं। यही इस तरह की फिल्मों की खासियत होती है कि दोनों चीजें साथ-साथ चलती हैं और ऑडियंस को एक अलग ही एक्सपीरियंस देती हैं।’ दो दशक पहले की और अब की कॉमेडी में क्या अंतर आया है? अक्षय–कॉमेडी की बात करें तो यह कई तरह की होती है। जैसे फिजिकल कॉमेडी, सिचुएशनल कॉमेडी और कई बार सिर्फ एक्सप्रेशन्स के जरिए होने वाली फेशियल कॉमेडी–जहां बिना कुछ बोले ही दर्शक हंस पड़ते हैं। यानी कॉमेडी के कई अलग-अलग रूप होते हैं। मुझे नहीं लगता कि कॉमेडी के बेसिक फॉर्म में अब तक कोई बहुत बड़ा बदलाव आया है, लेकिन हां, समय के साथ ह्यूमर का स्टाइल जरूर थोड़ा बदला है। अगर आप हेरा फेरी की बात करें, तो वह एक बहुत खास फिल्म थी। उस समय तक कॉमेडी फिल्में ओवरसीज में ज्यादा नहीं चलती थीं। आमतौर पर वहां सिर्फ रोमांटिक फिल्में ही अच्छा बिजनेस करती थीं। लेकिन हेरा फेरी पहली ऐसी कॉमेडी फिल्म बनी, जिसने ओवरसीज में भी शानदार प्रदर्शन किया और यह साबित किया कि अच्छी कॉमेडी हर जगह दर्शकों को पसंद आ सकती है। प्रियदर्शन की फिल्में सिचुएशनल कॉमेडी होती हैं। प्रियदर्शन–हेराफेरी के बाद हम कॉमेडी फिल्मों में जोक्स नहीं लाते हैं बल्कि हमारी कॉमेडी सिचुएशनल होती है। ‘हेरा फेरी’ के बाद आपके करियर में काम करने के तरीकों में क्या बदलाव आया? अक्षय–जब मैंने पहली बार उनके साथ काम किया, तो मेरे लिए वह एक बहुत सीखने वाला अनुभव था। अपने करियर में मैंने उनसे काफी कुछ सीखा है, खासकर कॉमेडी के अलग-अलग पहलुओं को समझने में। कॉमेडी के भी कई प्रकार होते हैं और उन्हें किस तरह पेश करना है, उसकी बारीकियां मैंने उन्हीं से सीखी हैं। इसके अलावा, फिल्म बनाते समय एक और बहुत महत्वपूर्ण बात मैंने समझी कि एक डायरेक्टर को एडिटिंग की अच्छी समझ होना बेहद जरूरी है। उनके साथ काम करते हुए मुझे कई नई चीजें सीखने का मौका मिला, जो मेरे करियर में काफी काम आई हैं। ‘भूत बंगला’ से रिलेटेड कोई ऐसा किस्सा बताइए जो अलग हो? प्रियदर्शन–असल में फिल्म बनाते वक्त हम उसे कॉमेडी के तौर पर एंजॉय नहीं कर रहे होते, जैसा कि लोग सोचते हैं। क्योंकि हमारे किरदार काफी सीरियस होते हैं, लेकिन परिस्थितियां हास्य पैदा करती हैं। शूटिंग के दौरान हम ज्यादा हंसते नहीं हैं, क्योंकि हम पूरी तरह अपने किरदार और सिचुएशन पर फोकस करते हैं। हमें पहले से पता होता है कि जब यही सीन थिएटर में जाएगा, तो दर्शक उस सिचुएशन की वजह से ज्यादा हंसेंगे। यानी हमारी फिल्म की कॉमेडी सिर्फ परफॉर्मेंस पर नहीं, बल्कि सिचुएशन पर ज्यादा निर्भर करती है और यही उसकी खासियत है। आप लोग शूटिंग के दौरान पूरी तरह स्क्रिप्ट पर ही चलते हैं या इम्प्रोवाइज करते हैं? अक्षय–सेट पर काफी कुछ चेंज होता है। इंप्रोवाइजेशन बहुत होता है। मैं कुछ बोलता हूं, फिर इन्हें प्रियदर्शन को बताता हूं। ऐसा करके देखिए। अगर ठीक लगता है तो हम तुरंत उसे करते हैं। कोई भी सीन जो लिखा गया है, वो बदलता जरूर है। इम्प्रोवाइजेशन सेट के माहौल के हिसाब से होता है। यह राइटर बैठकर नहीं कर सकता है। वो खड़े–खड़े सेट पर ही होगा। आप एक साथ कई फिल्में कर चुके हैं। कभी कोई ऐसा सीन जहां आप एक दूसरे से सहमत ना हों? अक्षय–नहीं ऐसा नहीं है। हमने 8 फिल्में साथ की हैं। लेकिन हम हर शॉट और हर डायलॉग पर एक-दूसरे से सहमत होते हैं। इसीलिए लंबे समय से साथ काम कर रहे हैं। कभी एक-दूसरे को क्वेश्चन नहीं किया। शॉर्ट्स और रील के दौर में आप जेन जी दर्शकों को कैसे ध्यान में रखते हैं? अक्षय– दर्शकों को हर तरह का कंटेंट पसंद होता है। वो शॉर्ट्स भी देखता है और चार घंटे की धुरंधर भी दर्शक पसंद कर रहे हैं। वामिका–मैं खुद भी इंस्टाग्राम पर रील देखती हूं। लेकिन मैं फिल्में भी देखती हूं। लोग फोन देखते हैं लेकिन फिल्में देखने का अनुभव बिल्कुल अलग है। वो रील्स नहीं है। उसमें कैरेक्टर हैं, स्टोरी है। इसलिए यंग लोग भी नेटफ्लिक्स, अमेजन पर और थिएटर पर फिल्में और वेबसीरीज देख रहे हैं। अक्षय– मैं तो जब घर पर ओटीटी पर कॉमेडी फिल्में देख रहा होता हूं तो उतनी हंसी नहीं आती है। क्योंकि आसपास कम लोग होते हैं। लेकिन जब लोग थिएटर में जाते हैं तो 150–200 लोगों के बीच में मजा आता है। थिएटर और घर पर बैठकर फिल्म देखने में बहुत अंतर है। आज एआई एक्टर्स की आवाज कॉपी कर रहा है। सीन रीक्रिएट कर रहा है। इसे आप कैसे देखते हैं? अक्षय– हाल ही में मुझसे किसी ने पूछा कि मैं किस तरह की फिल्म करना चाहता हूं। तो मैंने कहा कि मैं एक ऐसी फिल्म करना चाहता हूं जिसमें जबरदस्त एक्शन हो, और मैं फिर से 80s–90s के दौर में लौटना चाहता हूं। उस समय एक्टर खुद अपने स्टंट करते थे, खुद फाइट सीन करते थे—ना कि वीएफएक्स या एआई के सहारे। आजकल टेक्नोलॉजी बहुत आगे बढ़ गई है, लेकिन मैं एक ऐसी फिल्म बनाना चाहता हूं जिसमें ना एआई का इस्तेमाल हो और ना ही वीएफएक्स का– पूरी तरह रियल और ऑर्गेनिक फिल्म। मैं इसे एक उदाहरण से समझाता हूं–जैसे घर में एक प्रिंटेड पेंटिंग और एक हाथ से बनाई गई पेंटिंग होती है। प्रिंटेड पेंटिंग देखने में बहुत परफेक्ट लगती है, लेकिन जो असली पेंटिंग होती है, जिसे किसी कलाकार ने अपने हाथों से मेहनत करके बनाया होता है, उसमें जो डिटेलिंग, मेहनत और आत्मा होती है, वो अलग ही स्तर की होती है। ठीक उसी तरह, मैं ऐसी फिल्म बनाना चाहता हूं जिसमें वही असलियत और पवित्रता हो, जहां सब कुछ रियल हो। मैं अपनी जिंदगी में कम से कम एक ऐसी फिल्म जरूर बनाने की कोशिश करूंगा, जिसमें एआई और वीएफएक्स का इस्तेमाल बिल्कुल न हो। क्या एडिटिंग और स्क्रिप्टिंग जैसे कामों में भी खूब एआई इस्तेमाल हो रहा है? प्रियदर्शन–देखिए, फिल्म में हम एआई का सीमित इस्तेमाल करते हैं। जैसे कॉन्सेप्ट ड्रॉइंग बनाने के लिए, ताकि हमें यह समझने में मदद मिल सके कि कोई किरदार या सीन कैसा दिख सकता है। एआई के जरिए हम अलग-अलग विकल्प देख लेते हैं। लेकिन एक बात समझना जरूरी है कि आज भी एआई के पास सीमित डेटा है और वह पूरी तरह से क्रिएटर के निर्देशों पर ही काम करता है। वह खुद से कुछ नहीं करता, बल्कि इंसान के दिए गए कमांड के आधार पर ही रिजल्ट देता है। हां, अगर कभी ऐसा समय आता है जब एआई खुद इंसानों की तरह सोचने और फैसले लेने लगे, तो वह एक खतरनाक स्थिति हो सकती है। वामिका आपकी क्या लर्निंग रही इस स्टारकास्ट के साथ? वामिका–मेरी सबसे बड़ी लर्निंग यही रही कि आपको पेशेंस रखना चाहिए, शांत रहना चाहिए और अपने काम को एंजॉय करना चाहिए। शुरुआत में मैं चीजों को बहुत ज्यादा सीरियसली ले रही थी और अपने दिमाग में काफी प्रेशर बना लिया था लेकिन फिर मुझे एहसास हुआ कि आप रिलैक्स रहते हुए भी अच्छा काम कर सकते हैं, और इस पूरे प्रोसेस को एंजॉय करना बहुत जरूरी है। इसमें ‘भूल भुलैया’ से अलग क्या देखने को मिलेगा? प्रियदर्शन–‘भूल-भुलैया’ और इस फिल्म में यही सबसे बड़ा अंतर है। ‘भूल-भुलैया’ एक साइकोलॉजिकल थ्रिलर थी, जहां अंत में पता चलता है कि असल में कोई भूत नहीं है लेकिन यह फिल्म एक फैंटेसी है। यहां कहानी का ट्रीटमेंट अलग है—इसमें शुरुआत में हमारा मुख्य किरदार यही मानता है कि भूत जैसी कोई चीज नहीं होती, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उसे खुद भूत का सामना करना पड़ता है।’ असरानी जी अब नहीं हैं, इस फिल्म से जुड़ी उनकी कोई बात? प्रियदर्शन–मैंने उनके साथ फिल्म का आखिरी शॉट शूट किया था। उस दिन उन्होंने शॉट पूरा किया और फिर कहा कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। उसके दो दिन बाद ही उनका निधन हो गया लेकिन उन्होंने दोनों फिल्मों की शूटिंग पूरी कर ली थी। कोई भी शॉट अधूरा नहीं रहा। दोनों फिल्मों में उनकी ही असली आवाज इस्तेमाल की गई है। सब कुछ बिल्कुल ओरिजिनल है। और सच कहूं तो हम सभी उन्हें दिल से बहुत मिस करते हैं।

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अक्षय–सेट पर हमें कभी डर नहीं लगा, क्योंकि वहां असल में कोई भूत-वूत नहीं था। लेकिन एक दिलचस्प इंसिडेंट जरूर याद आता है, जो मैं आपसे शेयर करना चाहूंगा। मड आइलैंड में एक बहुत बड़ा बंगला है, जहां मैंने कई बार शूटिंग की है। हालांकि, लोग वहां रात में शूटिंग करने से बचते हैं। मैं बंगले का नाम नहीं लेना चाहूंगा, लेकिन उसके बारे में यह मशहूर था कि वहां रात को ‘भूत’ दिखाई देता है। कई लोगों ने उसे देखने का दावा भी किया था—यहां तक कि वहां के केयरटेकर ने भी कहा था कि उसने कई बार उसे देखा है। इसी वजह से वहां शूटिंग जल्दी खत्म कर दी जाती थी। आमतौर पर रात 1 बजे तक पैकअप हो जाता था और उसके बाद कोई भी बाहर नहीं निकलता था। उस बंगले के बारे में इतना डर फैल गया था कि उसका मालिक भी उसे बेच नहीं पा रहा था। सालों तक वह बंगला बिक ही नहीं पाया लेकिन कुछ साल पहले सच्चाई सामने आई, जो काफी हैरान करने वाली थी। दरअसल, वही केयरटेकर खुद ‘भूत’ बनकर लोगों को डराता था। वह नहीं चाहता था कि बंगला बिके, क्योंकि वह खुद वहीं रहना चाहता था। इसलिए वह रात में साड़ी पहनकर इधर-उधर घूमता था और लोगों को डराता था, जिससे इलाके में यह बात फैल गई कि वहां सच में भूत है। इस तरह उसने करीब 26–27 साल तक लोगों को भ्रम में रखा और बंगले को बिकने नहीं दिया। सच में, यह उसकी एक बहुत ही चालाकी भरी योजना थी।” वामिका–मेरे लिए यही हैं (अक्षय) सबसे बड़े प्रैंकस्टर। सेट पर एक दिन मेरे डैड आए थे। मुझे हार्नेस में शॉट देना था और जैसे ही एक्शन हुआ अक्षय ने मुझे अचानक छोड़ दिया। मैं हवा में लटक गई। मुझे नहीं पता था यह होने वाला है तो मैं तो बहुत डर गई थी। बाद में पता चला कि इस प्रैंक में खुद डैड शामिल थे और वीडियो बना रहे थे। ऐसी फिल्मों में हॉरर और कॉमेडी दोनों की टाइमिंग मेंटेन करना बड़ा चैलेंज होता है? प्रियदर्शन– नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है कि हम पहले से तय करते हैं कि फिल्म में कितनी कॉमेडी होगी और कितना हॉरर। अगर आपने भूल-भुलैया देखी है, तो वह भी हॉरर और कॉमेडी का ही एक बेहतरीन कॉम्बिनेशन है। असल में इसमें कोई फिक्स टाइमिंग नहीं होती कि इतने मिनट हॉरर होगा और इतने मिनट कॉमेडी। यह सब कहानी के साथ नैचुरली चलता है। जब आप थिएटर में बैठकर फिल्म देखते हैं, तो कभी आपको हंसी आती है, तो कभी अचानक आप टेंशन या डर महसूस करने लगते हैं। यही इस तरह की फिल्मों की खासियत होती है कि दोनों चीजें साथ-साथ चलती हैं और ऑडियंस को एक अलग ही एक्सपीरियंस देती हैं।’ दो दशक पहले की और अब की कॉमेडी में क्या अंतर आया है? अक्षय–कॉमेडी की बात करें तो यह कई तरह की होती है। जैसे फिजिकल कॉमेडी, सिचुएशनल कॉमेडी और कई बार सिर्फ एक्सप्रेशन्स के जरिए होने वाली फेशियल कॉमेडी–जहां बिना कुछ बोले ही दर्शक हंस पड़ते हैं। यानी कॉमेडी के कई अलग-अलग रूप होते हैं। मुझे नहीं लगता कि कॉमेडी के बेसिक फॉर्म में अब तक कोई बहुत बड़ा बदलाव आया है, लेकिन हां, समय के साथ ह्यूमर का स्टाइल जरूर थोड़ा बदला है। अगर आप हेरा फेरी की बात करें, तो वह एक बहुत खास फिल्म थी। उस समय तक कॉमेडी फिल्में ओवरसीज में ज्यादा नहीं चलती थीं। आमतौर पर वहां सिर्फ रोमांटिक फिल्में ही अच्छा बिजनेस करती थीं। लेकिन हेरा फेरी पहली ऐसी कॉमेडी फिल्म बनी, जिसने ओवरसीज में भी शानदार प्रदर्शन किया और यह साबित किया कि अच्छी कॉमेडी हर जगह दर्शकों को पसंद आ सकती है। प्रियदर्शन की फिल्में सिचुएशनल कॉमेडी होती हैं। प्रियदर्शन–हेराफेरी के बाद हम कॉमेडी फिल्मों में जोक्स नहीं लाते हैं बल्कि हमारी कॉमेडी सिचुएशनल होती है। ‘हेरा फेरी’ के बाद आपके करियर में काम करने के तरीकों में क्या बदलाव आया? अक्षय–जब मैंने पहली बार उनके साथ काम किया, तो मेरे लिए वह एक बहुत सीखने वाला अनुभव था। अपने करियर में मैंने उनसे काफी कुछ सीखा है, खासकर कॉमेडी के अलग-अलग पहलुओं को समझने में। कॉमेडी के भी कई प्रकार होते हैं और उन्हें किस तरह पेश करना है, उसकी बारीकियां मैंने उन्हीं से सीखी हैं। इसके अलावा, फिल्म बनाते समय एक और बहुत महत्वपूर्ण बात मैंने समझी कि एक डायरेक्टर को एडिटिंग की अच्छी समझ होना बेहद जरूरी है। उनके साथ काम करते हुए मुझे कई नई चीजें सीखने का मौका मिला, जो मेरे करियर में काफी काम आई हैं। ‘भूत बंगला’ से रिलेटेड कोई ऐसा किस्सा बताइए जो अलग हो? प्रियदर्शन–असल में फिल्म बनाते वक्त हम उसे कॉमेडी के तौर पर एंजॉय नहीं कर रहे होते, जैसा कि लोग सोचते हैं। क्योंकि हमारे किरदार काफी सीरियस होते हैं, लेकिन परिस्थितियां हास्य पैदा करती हैं। शूटिंग के दौरान हम ज्यादा हंसते नहीं हैं, क्योंकि हम पूरी तरह अपने किरदार और सिचुएशन पर फोकस करते हैं। हमें पहले से पता होता है कि जब यही सीन थिएटर में जाएगा, तो दर्शक उस सिचुएशन की वजह से ज्यादा हंसेंगे। यानी हमारी फिल्म की कॉमेडी सिर्फ परफॉर्मेंस पर नहीं, बल्कि सिचुएशन पर ज्यादा निर्भर करती है और यही उसकी खासियत है। आप लोग शूटिंग के दौरान पूरी तरह स्क्रिप्ट पर ही चलते हैं या इम्प्रोवाइज करते हैं? अक्षय–सेट पर काफी कुछ चेंज होता है। इंप्रोवाइजेशन बहुत होता है। मैं कुछ बोलता हूं, फिर इन्हें प्रियदर्शन को बताता हूं। ऐसा करके देखिए। अगर ठीक लगता है तो हम तुरंत उसे करते हैं। कोई भी सीन जो लिखा गया है, वो बदलता जरूर है। इम्प्रोवाइजेशन सेट के माहौल के हिसाब से होता है। यह राइटर बैठकर नहीं कर सकता है। वो खड़े–खड़े सेट पर ही होगा। आप एक साथ कई फिल्में कर चुके हैं। कभी कोई ऐसा सीन जहां आप एक दूसरे से सहमत ना हों? अक्षय–नहीं ऐसा नहीं है। हमने 8 फिल्में साथ की हैं। लेकिन हम हर शॉट और हर डायलॉग पर एक-दूसरे से सहमत होते हैं। इसीलिए लंबे समय से साथ काम कर रहे हैं। कभी एक-दूसरे को क्वेश्चन नहीं किया। शॉर्ट्स और रील के दौर में आप जेन जी दर्शकों को कैसे ध्यान में रखते हैं? अक्षय– दर्शकों को हर तरह का कंटेंट पसंद होता है। वो शॉर्ट्स भी देखता है और चार घंटे की धुरंधर भी दर्शक पसंद कर रहे हैं। वामिका–मैं खुद भी इंस्टाग्राम पर रील देखती हूं। लेकिन मैं फिल्में भी देखती हूं। लोग फोन देखते हैं लेकिन फिल्में देखने का अनुभव बिल्कुल अलग है। वो रील्स नहीं है। उसमें कैरेक्टर हैं, स्टोरी है। इसलिए यंग लोग भी नेटफ्लिक्स, अमेजन पर और थिएटर पर फिल्में और वेबसीरीज देख रहे हैं। अक्षय– मैं तो जब घर पर ओटीटी पर कॉमेडी फिल्में देख रहा होता हूं तो उतनी हंसी नहीं आती है। क्योंकि आसपास कम लोग होते हैं। लेकिन जब लोग थिएटर में जाते हैं तो 150–200 लोगों के बीच में मजा आता है। थिएटर और घर पर बैठकर फिल्म देखने में बहुत अंतर है। आज एआई एक्टर्स की आवाज कॉपी कर रहा है। सीन रीक्रिएट कर रहा है। इसे आप कैसे देखते हैं? अक्षय– हाल ही में मुझसे किसी ने पूछा कि मैं किस तरह की फिल्म करना चाहता हूं। तो मैंने कहा कि मैं एक ऐसी फिल्म करना चाहता हूं जिसमें जबरदस्त एक्शन हो, और मैं फिर से 80s–90s के दौर में लौटना चाहता हूं। उस समय एक्टर खुद अपने स्टंट करते थे, खुद फाइट सीन करते थे—ना कि वीएफएक्स या एआई के सहारे। आजकल टेक्नोलॉजी बहुत आगे बढ़ गई है, लेकिन मैं एक ऐसी फिल्म बनाना चाहता हूं जिसमें ना एआई का इस्तेमाल हो और ना ही वीएफएक्स का– पूरी तरह रियल और ऑर्गेनिक फिल्म। मैं इसे एक उदाहरण से समझाता हूं–जैसे घर में एक प्रिंटेड पेंटिंग और एक हाथ से बनाई गई पेंटिंग होती है। प्रिंटेड पेंटिंग देखने में बहुत परफेक्ट लगती है, लेकिन जो असली पेंटिंग होती है, जिसे किसी कलाकार ने अपने हाथों से मेहनत करके बनाया होता है, उसमें जो डिटेलिंग, मेहनत और आत्मा होती है, वो अलग ही स्तर की होती है। ठीक उसी तरह, मैं ऐसी फिल्म बनाना चाहता हूं जिसमें वही असलियत और पवित्रता हो, जहां सब कुछ रियल हो। मैं अपनी जिंदगी में कम से कम एक ऐसी फिल्म जरूर बनाने की कोशिश करूंगा, जिसमें एआई और वीएफएक्स का इस्तेमाल बिल्कुल न हो। क्या एडिटिंग और स्क्रिप्टिंग जैसे कामों में भी खूब एआई इस्तेमाल हो रहा है? प्रियदर्शन–देखिए, फिल्म में हम एआई का सीमित इस्तेमाल करते हैं। जैसे कॉन्सेप्ट ड्रॉइंग बनाने के लिए, ताकि हमें यह समझने में मदद मिल सके कि कोई किरदार या सीन कैसा दिख सकता है। एआई के जरिए हम अलग-अलग विकल्प देख लेते हैं। लेकिन एक बात समझना जरूरी है कि आज भी एआई के पास सीमित डेटा है और वह पूरी तरह से क्रिएटर के निर्देशों पर ही काम करता है। वह खुद से कुछ नहीं करता, बल्कि इंसान के दिए गए कमांड के आधार पर ही रिजल्ट देता है। हां, अगर कभी ऐसा समय आता है जब एआई खुद इंसानों की तरह सोचने और फैसले लेने लगे, तो वह एक खतरनाक स्थिति हो सकती है। वामिका आपकी क्या लर्निंग रही इस स्टारकास्ट के साथ? वामिका–मेरी सबसे बड़ी लर्निंग यही रही कि आपको पेशेंस रखना चाहिए, शांत रहना चाहिए और अपने काम को एंजॉय करना चाहिए। शुरुआत में मैं चीजों को बहुत ज्यादा सीरियसली ले रही थी और अपने दिमाग में काफी प्रेशर बना लिया था लेकिन फिर मुझे एहसास हुआ कि आप रिलैक्स रहते हुए भी अच्छा काम कर सकते हैं, और इस पूरे प्रोसेस को एंजॉय करना बहुत जरूरी है। इसमें ‘भूल भुलैया’ से अलग क्या देखने को मिलेगा? प्रियदर्शन–‘भूल-भुलैया’ और इस फिल्म में यही सबसे बड़ा अंतर है। ‘भूल-भुलैया’ एक साइकोलॉजिकल थ्रिलर थी, जहां अंत में पता चलता है कि असल में कोई भूत नहीं है लेकिन यह फिल्म एक फैंटेसी है। यहां कहानी का ट्रीटमेंट अलग है—इसमें शुरुआत में हमारा मुख्य किरदार यही मानता है कि भूत जैसी कोई चीज नहीं होती, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उसे खुद भूत का सामना करना पड़ता है।’ असरानी जी अब नहीं हैं, इस फिल्म से जुड़ी उनकी कोई बात? प्रियदर्शन–मैंने उनके साथ फिल्म का आखिरी शॉट शूट किया था। उस दिन उन्होंने शॉट पूरा किया और फिर कहा कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। उसके दो दिन बाद ही उनका निधन हो गया लेकिन उन्होंने दोनों फिल्मों की शूटिंग पूरी कर ली थी। कोई भी शॉट अधूरा नहीं रहा। दोनों फिल्मों में उनकी ही असली आवाज इस्तेमाल की गई है। सब कुछ बिल्कुल ओरिजिनल है। और सच कहूं तो हम सभी उन्हें दिल से बहुत मिस करते हैं।

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