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लॉस एंजिलिस में मेयर के लिए चुनाव:रेस में केरल में जन्मीं नित्या रमन भी, बोलीं-शहर की पहचान बड़ी इमारतें नहीं, गरीबों से व्यवहार

लॉस एंजिलिस में मेयर के लिए चुनाव:रेस में केरल में जन्मीं नित्या रमन भी, बोलीं-शहर की पहचान बड़ी इमारतें नहीं, गरीबों से व्यवहार

केरल में जन्मीं नित्या रमन (44) लॉस एंजिलिस के मेयर पद के प्राथमिक चुनाव में दूसरे स्थान पर पहुंच गईं। वे अब नवंबर में होने वाले चुनाव में मेयर करेन बैस को चुनौती देती दिख रही हैं। 72 वर्षीय करेन 34.7% वोटों के साथ पहले स्थान पर हैं। नित्या को 27.1% वोट मिले। मेयर पद का उम्मीदवार प्राथमिक चुनाव में 50% से अधिक वोट हासिल कर सीधे जीत सकता है। नहीं तो टॉप-2 उम्मीदवार रनऑफ चुनाव में आमने-सामने होते हैं। लॉस एंजिलिस न्यूयॉर्क के बाद अमेरिका का दूसरा सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर है। हॉलीवुड भी यहीं है। नित्या कहती हैं कि लोगों की मदद के लिए राजनीतिक सोच बनाने में भारत का अहम योगदान है। कैसे, जानिए उन्हीं की जुबानी… मैं 6 साल की उम्र में अमेरिका आ गई थी। स्कूल में प्रवासी और रंग दोनों के आधार पर भेदभाव झेला। इस अनुभव ने सामाजिक न्याय के प्रति मुझमें गहरी संवेदना पैदा की। हार्वर्ड में पॉलिटिकल थ्योरी पढ़ी। एमआईटी से अर्बन प्लानिंग की डिग्री ली। 2020 में पहली बार लॉस एंजिलिस सिटी काउंसिल में जीती तो ये ‘राजनीतिक भूकंप’ कहा गया। लोग मानते हैं कि मेरी राजनीति यहीं से शुरू हुई। पर, इसकी जड़ें दिल्ली और चेन्नई की झुग्गियों में हैं। दिल्ली ने सवाल दिए, चेन्नई ने जवाब पढ़ाई के बाद मैं भारत लौटी। दिल्ली में एक दिन देखा कि एक विशाल झुग्गी बस्ती तोड़ दी गई। एक लाख से ज्यादा लोग बेघर हो गए। इस पर कहीं कोई चर्चा नहीं हुई। समझ आया कि गरीबों की समस्या सिर्फ गरीबी नहीं, बल्कि उन्हें अदृश्य बना दिया जाना है। दिल्ली ने सवाल दिए, तो चेन्नई ने जवाब। वहां ‘ट्रांसपेरेंट चेन्नई’ पहल के तहत झुग्गी बस्तियों का नक्शा बनाया। पानी, शौचालय, ड्रेनेज और बुनियादी सुविधाओं का डेटा जुटाया। बदलाव के लिए संवेदना के साथ आंकड़े भी जरूरी हैं। शहरी समस्याएं व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी होती हैं। भारत में झुग्गी, अमेरिका में फुटपाथ 2013 में लॉस एंजिलिस पहुंची। यहां झुग्गियों की जगह बेघर लोग फुटपाथ पर थे। प्रशासनिक कार्यालय में नौकरी के दौरान बेघरों पर होने वाले खर्च पर शोध की जिम्मेदारी मिली। इन पर हर साल 10 करोड़ डॉलर खर्च हो रहे हैं। लेकिन, 90% खर्च इन्हें जेल भेजने जैसे कामों पर था। आवास, पुनर्वास और स्थायी समाधान पर खर्च बहुत कम था। बदलाव के लिए राजनीति में उतरी। राजनीति करियर नहीं, सिर्फ काम का जरिया जब मैंने मेयर का चुनाव लड़ने की सोची तो लोगों ने कहा कि यह सही समय नहीं है। मैंने कहा कि संकट कभी समय देखकर नहीं आते। मैं यहां करियर बनाने या 20 साल तक कुर्सी पर चिपके रहने के लिए नहीं आई हूं। मैं अर्बन प्लानर हूं। राजनीति मेरा पेशा नहीं, अपना काम पूरा करने का जरिया है। बदलाव का कोई बेहतर तरीका राजनीति के बाहर भी दिखा तो मैं उसे अपनाने में संकोच नहीं करूंगी। किसी शहर की महानता उसकी चमकदार इमारतों से नहीं, बल्कि इससे तय होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। अगर एक शहर हर व्यक्ति को सम्मानजनक आवास, सुरक्षित जीवन और अवसर नहीं दे सकता, तो उसकी समृद्धि अधूरी है।

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लॉस एंजिलिस में मेयर के लिए चुनाव:रेस में केरल में जन्मीं नित्या रमन भी, बोलीं-शहर की पहचान बड़ी इमारतें नहीं, गरीबों से व्यवहार

केरल में जन्मीं नित्या रमन (44) लॉस एंजिलिस के मेयर पद के प्राथमिक चुनाव में दूसरे स्थान पर पहुंच गईं। वे अब नवंबर में होने वाले चुनाव में मेयर करेन बैस को चुनौती देती दिख रही हैं। 72 वर्षीय करेन 34.7% वोटों के साथ पहले स्थान पर हैं। नित्या को 27.1% वोट मिले। मेयर पद का उम्मीदवार प्राथमिक चुनाव में 50% से अधिक वोट हासिल कर सीधे जीत सकता है। नहीं तो टॉप-2 उम्मीदवार रनऑफ चुनाव में आमने-सामने होते हैं। लॉस एंजिलिस न्यूयॉर्क के बाद अमेरिका का दूसरा सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर है। हॉलीवुड भी यहीं है। नित्या कहती हैं कि लोगों की मदद के लिए राजनीतिक सोच बनाने में भारत का अहम योगदान है। कैसे, जानिए उन्हीं की जुबानी… मैं 6 साल की उम्र में अमेरिका आ गई थी। स्कूल में प्रवासी और रंग दोनों के आधार पर भेदभाव झेला। इस अनुभव ने सामाजिक न्याय के प्रति मुझमें गहरी संवेदना पैदा की। हार्वर्ड में पॉलिटिकल थ्योरी पढ़ी। एमआईटी से अर्बन प्लानिंग की डिग्री ली। 2020 में पहली बार लॉस एंजिलिस सिटी काउंसिल में जीती तो ये ‘राजनीतिक भूकंप’ कहा गया। लोग मानते हैं कि मेरी राजनीति यहीं से शुरू हुई। पर, इसकी जड़ें दिल्ली और चेन्नई की झुग्गियों में हैं। दिल्ली ने सवाल दिए, चेन्नई ने जवाब पढ़ाई के बाद मैं भारत लौटी। दिल्ली में एक दिन देखा कि एक विशाल झुग्गी बस्ती तोड़ दी गई। एक लाख से ज्यादा लोग बेघर हो गए। इस पर कहीं कोई चर्चा नहीं हुई। समझ आया कि गरीबों की समस्या सिर्फ गरीबी नहीं, बल्कि उन्हें अदृश्य बना दिया जाना है। दिल्ली ने सवाल दिए, तो चेन्नई ने जवाब। वहां ‘ट्रांसपेरेंट चेन्नई’ पहल के तहत झुग्गी बस्तियों का नक्शा बनाया। पानी, शौचालय, ड्रेनेज और बुनियादी सुविधाओं का डेटा जुटाया। बदलाव के लिए संवेदना के साथ आंकड़े भी जरूरी हैं। शहरी समस्याएं व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी होती हैं। भारत में झुग्गी, अमेरिका में फुटपाथ 2013 में लॉस एंजिलिस पहुंची। यहां झुग्गियों की जगह बेघर लोग फुटपाथ पर थे। प्रशासनिक कार्यालय में नौकरी के दौरान बेघरों पर होने वाले खर्च पर शोध की जिम्मेदारी मिली। इन पर हर साल 10 करोड़ डॉलर खर्च हो रहे हैं। लेकिन, 90% खर्च इन्हें जेल भेजने जैसे कामों पर था। आवास, पुनर्वास और स्थायी समाधान पर खर्च बहुत कम था। बदलाव के लिए राजनीति में उतरी। राजनीति करियर नहीं, सिर्फ काम का जरिया जब मैंने मेयर का चुनाव लड़ने की सोची तो लोगों ने कहा कि यह सही समय नहीं है। मैंने कहा कि संकट कभी समय देखकर नहीं आते। मैं यहां करियर बनाने या 20 साल तक कुर्सी पर चिपके रहने के लिए नहीं आई हूं। मैं अर्बन प्लानर हूं। राजनीति मेरा पेशा नहीं, अपना काम पूरा करने का जरिया है। बदलाव का कोई बेहतर तरीका राजनीति के बाहर भी दिखा तो मैं उसे अपनाने में संकोच नहीं करूंगी। किसी शहर की महानता उसकी चमकदार इमारतों से नहीं, बल्कि इससे तय होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। अगर एक शहर हर व्यक्ति को सम्मानजनक आवास, सुरक्षित जीवन और अवसर नहीं दे सकता, तो उसकी समृद्धि अधूरी है।

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