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अंजुम शर्मा ने रणवीर सिंह की तारीफ:कहा- वो बहुत कमाल और सिक्योर एक्टर हैं; ‘धुरंधर’ में रहमान के रोल को भी सराहा

अंजुम शर्मा ने रणवीर सिंह की तारीफ:कहा- वो बहुत कमाल और सिक्योर एक्टर हैं; ‘धुरंधर’ में रहमान के रोल को भी सराहा

एक्टर अंजुम शर्मा इन दिनों वेब सीरीज ‘कप्तान’ में अपने किरदार ‘मुन्ना’ को लेकर चर्चा में हैं। ‘मिर्जापुर’ के शरद शुक्ला के बाद अंजुम ने इस बार एक बिल्कुल अलग और मस्तमौला किरदार निभाया है। दैनिक भास्कर से बातचीत में अंजुम शर्मा ने इंडस्ट्री में आउटसाइडर होने के संघर्ष, स्टार्स की इनसिक्योरिटी, ओटीटी के बदलते दौर पर बात की। सवाल: क्या ओटीटी ने बॉलीवुड और मेनस्ट्रीम सिनेमा की कहानी कहने का तरीका बदल दिया है? जवाब: बिल्कुल। ओटीटी मेनस्ट्रीम सिनेमा का ही एक्सटेंशन है। वही फिल्ममेकर आए, जिन्होंने फिल्मों का अनुभव लेकर ‘मिर्जापुर’, ‘सेक्रेड गेम्स’ जैसी सीरीज बनाई। फर्क सिर्फ इतना था कि यहां लॉन्ग फॉर्मेट मिला, इसलिए कहानियों को ज्यादा गहराई और खुलकर दिखाया जा सका। सवाल: इंडस्ट्री में आउटसाइडर होने की वजह से कभी इनसिक्योरिटी या पॉलिटिक्स फेस करनी पड़ी? जवाब:कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी फिल्म या किरदार में कास्टिंग का पूरा मामला कॉम्बिनेशन पर निर्भर करता है। मैं इसमें किसी को दोष नहीं देता। कई बार मेकर्स ये देखते हैं कि दो कलाकार स्क्रीन पर साथ कैसे दिखेंगे, चाहे सामने बड़ा स्टार हो या कोई और एक्टर। ऐसे में अगर किसी एक कलाकार की प्रेजेंस या परफॉर्मेंस ज्यादा डोमिनेटिंग लगती है, तो हो सकता है कि वो उस किरदार या कहानी के लिए सही फिट न हो। कई बार कहानी को ऐसे एक्टर की जरूरत होती है, जो दूसरे किरदार पर हावी न पड़े और स्क्रीन पर बैलेंस बना रहे। मेरे साथ भी शुरुआत में एक-दो बार ऐसा हुआ, लेकिन मैं खुद को खुशकिस्मत मानता हूं कि जिन लोगों के साथ काम किया, उन्होंने हमेशा बहुत सुरक्षित और सहयोग वाला माहौल दिया। चाहे ‘मिर्जापुर’ में अली फजल हों, पंकज त्रिपाठी जी हों या विजय वर्मा। मैं उस वक्त काफी नया था, जबकि वो लोग काफी अनुभवी थे, लेकिन उन्हें देखकर मुझे लगा कि जितना सहज हो सकते हो, उतना सहज हो जाओ। क्योंकि सामने वाला कलाकार पूरी तरह सिक्योर होकर काम कर रहा है, आपको सपोर्ट कर रहा है और एप्रिशिएट भी कर रहा है। मुझे हमेशा ऐसा महसूस हुआ कि वो लोग आपको नीचे नहीं दिखाना चाहते, बल्कि अपने साथ लेकर आगे बढ़ाना चाहते हैं। सवाल: लेकिन इंडस्ट्री में ऐसा भी सुनने को मिलता है कि अच्छे सीन्स काट दिए जाते हैं या अच्छे एक्टर्स को रिप्लेस कर दिया जाता है? जवाब: बहुत पहले की बात है। एक फिल्म में एक ऐसे एक्टर को कास्ट किया गया था, जो पहले से फिल्मों में काम कर रहे थे और इंडस्ट्री से जुड़े हुए थे, लेकिन जिस लहजे और जिस जोन के किरदार के लिए उन्हें चुना गया था, उससे वो पूरी तरह वाकिफ नहीं थे। मुझे बिना ज्यादा कुछ बताए बुलाया गया और कहा गया कि उनकी आवाज डब करनी है। मैंने बिना यह पूछे कि क्यों, कैसे या कितने पैसे मिलेंगे, तुरंत हां कर दी। मैंने सोचा कि बुलाया है, तो जरूर कोई वजह होगी। मैंने डबिंग की और बाद में जब फिल्म रिलीज हुई, तो मैंने देखा कि फाइनल डबिंग काफी हद तक वैसी ही थी जैसी मैंने की थी। तब लगा कि शायद मेरी डबिंग को रेफरेंस की तरह इस्तेमाल किया गया होगा। ऐसे अनुभव बहुत कुछ सिखाते हैं। खासकर अगर आप इंडस्ट्री में बाहर से आए हैं, तो आपको समझ आ जाता है कि यहां मौके खुद आपके पास नहीं आते, आपको खुद उन्हें बनाना पड़ता है। सवाल: धुरंधर 2 में ऐसी कौन-सी चीज थी, जिसने आपको सबसे ज्यादा प्रभावित किया? जवाब: धुरंधर 2 देखकर मुझे बहुत समय बाद ऐसा लगा कि इतनी लंबी, करीब साढ़े तीन घंटे की फिल्म को मैं दोबारा देखना चाहूंगा। खासकर रणवीर सिंह का गांव वाला शुरुआती सीक्वेंस आपको पूरी तरह बांध लेता है। फिल्म में वो सारी चीजें हैं, जो अच्छे सिनेमा को यादगार बनाती हैं। सवाल: ‘एनिमल’ और ‘धुरंधर’ जैसे मेकर्स के साथ काम करने की इच्छा है? जवाब: बिल्कुल। संदीप रेड्डी वांगा, विशाल भारद्वाज, आदित्य धर जैसे मेकर्स के साथ काम करने का बहुत मन है। मुझे लगता है कि मेरे अंदर अभी बहुत कुछ एक्सप्लोर होना बाकी है। सही डायरेक्टर और सही कहानी आपकी एनर्जी को सही दिशा देते हैं। सवाल: ‘धुरंधर’ में कोई ऐसा किरदार लगा, जिसे आप करना चाहते? जवाब: नहीं, मतलब यह तो मैं नहीं कह सकता कि मैं अलग फ्लेवर डाल सकता था। मुझे धुरंधर के पार्ट वन में रहमान डकैत एक ऐसा कैरेक्टर था, जिसको देख कर लगा कि मतलब बखूबी उन्होंने निभाया है। अक्षय खन्ना ने बहुत अच्छे से किया है। उनको देख कर आपको लगता है कि अरे, यह आप करते तो इसमें दो-चार चीजें आप और एड कर सकते थे। रणवीर सिंह ने तो कमाल किया है। सबसे बड़ी बात ये है कि वो बहुत सिक्योर एक्टर हैं। वो कहानी और बाकी किरदारों के साथ पूरी तरह घुल-मिल जाते हैं। सवाल: क्या आज इंडस्ट्री में टैलेंट से ज्यादा पीआर और सोशल मीडिया को अहमियत मिलती है? जवाब: देखिए, मैं ये नहीं कहूंगा कि इंडस्ट्री पूरी तरह ऐसी है, लेकिन हां, आज एक गैप जरूर आ गया है। एक तरफ आपका टैलेंट, क्राफ्ट और काम है और दूसरी तरफ ये बात कही जाती है कि आपकी पीआर बहुत स्ट्रॉन्ग होनी चाहिए, आपको खुद को मार्केट करना आना चाहिए। मेरा मानना है कि एक्टर या किसी भी क्रिएटिव इंसान का असली काम अपना काम ईमानदारी और मेहनत से करना है। अगर आपने तमाम मुश्किलों के बावजूद अच्छा काम किया है, तो वही सिलसिला आगे बढ़ना चाहिए। आपकी पहचान आपके टैलेंट, क्रेडिबिलिटी और क्राफ्ट के आधार पर बननी चाहिए।

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अंजुम शर्मा ने रणवीर सिंह की तारीफ:कहा- वो बहुत कमाल और सिक्योर एक्टर हैं; ‘धुरंधर’ में रहमान के रोल को भी सराहा

अंजुम शर्मा ने रणवीर सिंह की तारीफ:कहा- वो बहुत कमाल और सिक्योर एक्टर हैं; ‘धुरंधर’ में रहमान के रोल को भी सराहा

एक्टर अंजुम शर्मा इन दिनों वेब सीरीज ‘कप्तान’ में अपने किरदार ‘मुन्ना’ को लेकर चर्चा में हैं। ‘मिर्जापुर’ के शरद शुक्ला के बाद अंजुम ने इस बार एक बिल्कुल अलग और मस्तमौला किरदार निभाया है। दैनिक भास्कर से बातचीत में अंजुम शर्मा ने इंडस्ट्री में आउटसाइडर होने के संघर्ष, स्टार्स की इनसिक्योरिटी, ओटीटी के बदलते दौर पर बात की। सवाल: क्या ओटीटी ने बॉलीवुड और मेनस्ट्रीम सिनेमा की कहानी कहने का तरीका बदल दिया है? जवाब: बिल्कुल। ओटीटी मेनस्ट्रीम सिनेमा का ही एक्सटेंशन है। वही फिल्ममेकर आए, जिन्होंने फिल्मों का अनुभव लेकर ‘मिर्जापुर’, ‘सेक्रेड गेम्स’ जैसी सीरीज बनाई। फर्क सिर्फ इतना था कि यहां लॉन्ग फॉर्मेट मिला, इसलिए कहानियों को ज्यादा गहराई और खुलकर दिखाया जा सका। सवाल: इंडस्ट्री में आउटसाइडर होने की वजह से कभी इनसिक्योरिटी या पॉलिटिक्स फेस करनी पड़ी? जवाब:कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी फिल्म या किरदार में कास्टिंग का पूरा मामला कॉम्बिनेशन पर निर्भर करता है। मैं इसमें किसी को दोष नहीं देता। कई बार मेकर्स ये देखते हैं कि दो कलाकार स्क्रीन पर साथ कैसे दिखेंगे, चाहे सामने बड़ा स्टार हो या कोई और एक्टर। ऐसे में अगर किसी एक कलाकार की प्रेजेंस या परफॉर्मेंस ज्यादा डोमिनेटिंग लगती है, तो हो सकता है कि वो उस किरदार या कहानी के लिए सही फिट न हो। कई बार कहानी को ऐसे एक्टर की जरूरत होती है, जो दूसरे किरदार पर हावी न पड़े और स्क्रीन पर बैलेंस बना रहे। मेरे साथ भी शुरुआत में एक-दो बार ऐसा हुआ, लेकिन मैं खुद को खुशकिस्मत मानता हूं कि जिन लोगों के साथ काम किया, उन्होंने हमेशा बहुत सुरक्षित और सहयोग वाला माहौल दिया। चाहे ‘मिर्जापुर’ में अली फजल हों, पंकज त्रिपाठी जी हों या विजय वर्मा। मैं उस वक्त काफी नया था, जबकि वो लोग काफी अनुभवी थे, लेकिन उन्हें देखकर मुझे लगा कि जितना सहज हो सकते हो, उतना सहज हो जाओ। क्योंकि सामने वाला कलाकार पूरी तरह सिक्योर होकर काम कर रहा है, आपको सपोर्ट कर रहा है और एप्रिशिएट भी कर रहा है। मुझे हमेशा ऐसा महसूस हुआ कि वो लोग आपको नीचे नहीं दिखाना चाहते, बल्कि अपने साथ लेकर आगे बढ़ाना चाहते हैं। सवाल: लेकिन इंडस्ट्री में ऐसा भी सुनने को मिलता है कि अच्छे सीन्स काट दिए जाते हैं या अच्छे एक्टर्स को रिप्लेस कर दिया जाता है? जवाब: बहुत पहले की बात है। एक फिल्म में एक ऐसे एक्टर को कास्ट किया गया था, जो पहले से फिल्मों में काम कर रहे थे और इंडस्ट्री से जुड़े हुए थे, लेकिन जिस लहजे और जिस जोन के किरदार के लिए उन्हें चुना गया था, उससे वो पूरी तरह वाकिफ नहीं थे। मुझे बिना ज्यादा कुछ बताए बुलाया गया और कहा गया कि उनकी आवाज डब करनी है। मैंने बिना यह पूछे कि क्यों, कैसे या कितने पैसे मिलेंगे, तुरंत हां कर दी। मैंने सोचा कि बुलाया है, तो जरूर कोई वजह होगी। मैंने डबिंग की और बाद में जब फिल्म रिलीज हुई, तो मैंने देखा कि फाइनल डबिंग काफी हद तक वैसी ही थी जैसी मैंने की थी। तब लगा कि शायद मेरी डबिंग को रेफरेंस की तरह इस्तेमाल किया गया होगा। ऐसे अनुभव बहुत कुछ सिखाते हैं। खासकर अगर आप इंडस्ट्री में बाहर से आए हैं, तो आपको समझ आ जाता है कि यहां मौके खुद आपके पास नहीं आते, आपको खुद उन्हें बनाना पड़ता है। सवाल: धुरंधर 2 में ऐसी कौन-सी चीज थी, जिसने आपको सबसे ज्यादा प्रभावित किया? जवाब: धुरंधर 2 देखकर मुझे बहुत समय बाद ऐसा लगा कि इतनी लंबी, करीब साढ़े तीन घंटे की फिल्म को मैं दोबारा देखना चाहूंगा। खासकर रणवीर सिंह का गांव वाला शुरुआती सीक्वेंस आपको पूरी तरह बांध लेता है। फिल्म में वो सारी चीजें हैं, जो अच्छे सिनेमा को यादगार बनाती हैं। सवाल: ‘एनिमल’ और ‘धुरंधर’ जैसे मेकर्स के साथ काम करने की इच्छा है? जवाब: बिल्कुल। संदीप रेड्डी वांगा, विशाल भारद्वाज, आदित्य धर जैसे मेकर्स के साथ काम करने का बहुत मन है। मुझे लगता है कि मेरे अंदर अभी बहुत कुछ एक्सप्लोर होना बाकी है। सही डायरेक्टर और सही कहानी आपकी एनर्जी को सही दिशा देते हैं। सवाल: ‘धुरंधर’ में कोई ऐसा किरदार लगा, जिसे आप करना चाहते? जवाब: नहीं, मतलब यह तो मैं नहीं कह सकता कि मैं अलग फ्लेवर डाल सकता था। मुझे धुरंधर के पार्ट वन में रहमान डकैत एक ऐसा कैरेक्टर था, जिसको देख कर लगा कि मतलब बखूबी उन्होंने निभाया है। अक्षय खन्ना ने बहुत अच्छे से किया है। उनको देख कर आपको लगता है कि अरे, यह आप करते तो इसमें दो-चार चीजें आप और एड कर सकते थे। रणवीर सिंह ने तो कमाल किया है। सबसे बड़ी बात ये है कि वो बहुत सिक्योर एक्टर हैं। वो कहानी और बाकी किरदारों के साथ पूरी तरह घुल-मिल जाते हैं। सवाल: क्या आज इंडस्ट्री में टैलेंट से ज्यादा पीआर और सोशल मीडिया को अहमियत मिलती है? जवाब: देखिए, मैं ये नहीं कहूंगा कि इंडस्ट्री पूरी तरह ऐसी है, लेकिन हां, आज एक गैप जरूर आ गया है। एक तरफ आपका टैलेंट, क्राफ्ट और काम है और दूसरी तरफ ये बात कही जाती है कि आपकी पीआर बहुत स्ट्रॉन्ग होनी चाहिए, आपको खुद को मार्केट करना आना चाहिए। मेरा मानना है कि एक्टर या किसी भी क्रिएटिव इंसान का असली काम अपना काम ईमानदारी और मेहनत से करना है। अगर आपने तमाम मुश्किलों के बावजूद अच्छा काम किया है, तो वही सिलसिला आगे बढ़ना चाहिए। आपकी पहचान आपके टैलेंट, क्रेडिबिलिटी और क्राफ्ट के आधार पर बननी चाहिए।

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