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अगर घर में है ये 5 पत्तों वाला पौधा तो बार-बार डॉक्टर के पास नहीं जाना होगा! इससे कई बीमारियों का इलाज

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Nirgundi Benefits: रीवा आयुर्वेद हॉस्पिटल के डीन ने बताया, चरक और सुश्रुत संहिता में निर्गुंडी को विषनाशक और कृमिनाशक गुणों के लिए जाना जाता है. यह वात और कफ दोष को संतुलित करती है, दर्द कम करती है और सूजन, घाव, तथा बैक्टीरिया को नष्ट करती है. जानें और फायदे…

Ayurvedic Health Tips: आयुर्वेद में निर्गुंडी को एक चमत्कारी औषधि माना जाता है. संस्कृत में इसका अर्थ “शरीर को रोगों से बचाने वाली” होता है. यह पौधा पूरे भारत में कई जगह पाया जाता है. विंध्य क्षेत्र के जंगलों और पहाड़ में आमतौर पर पाया जाता है. निर्गुंडी के पत्तों से विशिष्ट दुर्गंध आती है और इसके नीले तथा सफेद फूलों वाली प्रजातियां प्रमुख हैं. निर्गुंडी के दो प्रकार हैं,  पांच या तीन पत्तों वाला और केवल तीन पत्तों वाला. आयुर्वेदाचार्य से जानें इसका प्रभाव.

रीवा आयुर्वेद हॉस्पिटल के डीन (MD) डाॅ. दीपक कुलश्रेष्ठ ने बताया, आयुर्वेदिक ग्रंथों जैसे चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में निर्गुंडी को विषनाशक और कृमिनाशक गुणों के लिए जाना जाता है. यह वात और कफ दोष को संतुलित करती है, दर्द कम करती है और सूजन, घाव, तथा बैक्टीरिया को नष्ट करती है. यह भूख बढ़ाने, पाचन सुधारने, लीवर को स्वस्थ रखने और मासिक धर्म संबंधी समस्याओं में भी लाभकारी है. इसके अतिरिक्त, यह टायफाइड, बुखार, खुजली, सूखी खांसी और कान बहने जैसे रोगों में भी प्रभावी माना जाता है.

सिर से लेकर पेट दर्द में कारगर
निर्गुंडी के औषधीय उपयोग अनेक हैं. सिरदर्द के लिए दो से चार ग्राम फल चूर्ण शहद के साथ लेने या पत्तों का लेप लगाने से राहत मिलती है. नाक बहने की समस्या में इसके पत्तों के रस से बना तेल एक-दो बूंद डालने से लाभ होता है. गले के दर्द और मुंह के छालों के लिए इसके पत्तों के उबले पानी से कुल्ला करना फायदेमंद है. पेट की समस्याओं के लिए 10 मिली पत्तों का रस, काली मिर्च और अजवायन मिलाकर लेने से पाचन शक्ति बढ़ती है. टायफाइड में बढ़े हुए लीवर और तिल्ली के लिए इसके चूर्ण को हरड़ और गोमूत्र के साथ लेने की सलाह दी जाती है.

महिलाओं के लिए भी लाभकारी
वहीं, महिलाओं में मासिक धर्म की अनियमितता के लिए निर्गुंडी बीज का चूर्ण सुबह-शाम लेना लाभकारी है. साइटिका और गठिया में इसके पत्तों का काढ़ा या जड़ का चूर्ण तिल के तेल के साथ लेने से दर्द में आराम मिलता है. मोच, सूजन और चर्म रोगों जैसे एक्जिमा और दाद में इसके पत्तों का लेप या तेल लगाना प्रभावी है. मलेरिया और निमोनिया जैसे बुखार में इसके काढ़े का सेवन लाभकारी होता है.

बच्चों के भी आए काम
निर्गुंडी का उपयोग बच्चों के दांत निकलने, शारीरिक कमजोरी दूर करने, और त्वचा की समस्याओं में भी किया जाता है. इसके रस की मात्रा 10-20 मिली और चूर्ण की तीन से छह ग्राम प्रतिदिन लेने की सलाह दी जाती है. यह पौधा आयुर्वेद में स्वास्थ्य और उपचार का प्रतीक है, जो प्राकृतिक रूप से रोगों से लड़ने की शक्ति देता है.

(नोट: किसी भी औषधीय को लेने से पहले अपने चिकित्सक की सलाह जरूर लेनी चाहिए. किसी भी औषधीय से होने वाले नुकसान की सही सलाह केवल आपका औषधीय चिकित्साक ही दे सकता है.)

About the Author

Rishi mishra

एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय. प्रिंट मीडिया से शुरुआत. साल 2023 से न्यूज 18 हिंदी के साथ डिजिटल सफर की शुरुआत. न्यूज 18 के पहले दैनिक जागरण, अमर उजाला में रिपोर्टिंग और डेस्क पर कार्य का अनुभव. म…और पढ़ें

Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.

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Ayurvedic Health Tips: आयुर्वेद में निर्गुंडी को एक चमत्कारी औषधि माना जाता है. संस्कृत में इसका अर्थ “शरीर को रोगों से बचाने वाली” होता है. यह पौधा पूरे भारत में कई जगह पाया जाता है. विंध्य क्षेत्र के जंगलों और पहाड़ में आमतौर पर पाया जाता है. निर्गुंडी के पत्तों से विशिष्ट दुर्गंध आती है और इसके नीले तथा सफेद फूलों वाली प्रजातियां प्रमुख हैं. निर्गुंडी के दो प्रकार हैं,  पांच या तीन पत्तों वाला और केवल तीन पत्तों वाला. आयुर्वेदाचार्य से जानें इसका प्रभाव.

रीवा आयुर्वेद हॉस्पिटल के डीन (MD) डाॅ. दीपक कुलश्रेष्ठ ने बताया, आयुर्वेदिक ग्रंथों जैसे चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में निर्गुंडी को विषनाशक और कृमिनाशक गुणों के लिए जाना जाता है. यह वात और कफ दोष को संतुलित करती है, दर्द कम करती है और सूजन, घाव, तथा बैक्टीरिया को नष्ट करती है. यह भूख बढ़ाने, पाचन सुधारने, लीवर को स्वस्थ रखने और मासिक धर्म संबंधी समस्याओं में भी लाभकारी है. इसके अतिरिक्त, यह टायफाइड, बुखार, खुजली, सूखी खांसी और कान बहने जैसे रोगों में भी प्रभावी माना जाता है.

सिर से लेकर पेट दर्द में कारगर
निर्गुंडी के औषधीय उपयोग अनेक हैं. सिरदर्द के लिए दो से चार ग्राम फल चूर्ण शहद के साथ लेने या पत्तों का लेप लगाने से राहत मिलती है. नाक बहने की समस्या में इसके पत्तों के रस से बना तेल एक-दो बूंद डालने से लाभ होता है. गले के दर्द और मुंह के छालों के लिए इसके पत्तों के उबले पानी से कुल्ला करना फायदेमंद है. पेट की समस्याओं के लिए 10 मिली पत्तों का रस, काली मिर्च और अजवायन मिलाकर लेने से पाचन शक्ति बढ़ती है. टायफाइड में बढ़े हुए लीवर और तिल्ली के लिए इसके चूर्ण को हरड़ और गोमूत्र के साथ लेने की सलाह दी जाती है.

महिलाओं के लिए भी लाभकारी
वहीं, महिलाओं में मासिक धर्म की अनियमितता के लिए निर्गुंडी बीज का चूर्ण सुबह-शाम लेना लाभकारी है. साइटिका और गठिया में इसके पत्तों का काढ़ा या जड़ का चूर्ण तिल के तेल के साथ लेने से दर्द में आराम मिलता है. मोच, सूजन और चर्म रोगों जैसे एक्जिमा और दाद में इसके पत्तों का लेप या तेल लगाना प्रभावी है. मलेरिया और निमोनिया जैसे बुखार में इसके काढ़े का सेवन लाभकारी होता है.

बच्चों के भी आए काम
निर्गुंडी का उपयोग बच्चों के दांत निकलने, शारीरिक कमजोरी दूर करने, और त्वचा की समस्याओं में भी किया जाता है. इसके रस की मात्रा 10-20 मिली और चूर्ण की तीन से छह ग्राम प्रतिदिन लेने की सलाह दी जाती है. यह पौधा आयुर्वेद में स्वास्थ्य और उपचार का प्रतीक है, जो प्राकृतिक रूप से रोगों से लड़ने की शक्ति देता है.

(नोट: किसी भी औषधीय को लेने से पहले अपने चिकित्सक की सलाह जरूर लेनी चाहिए. किसी भी औषधीय से होने वाले नुकसान की सही सलाह केवल आपका औषधीय चिकित्साक ही दे सकता है.)

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