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आयरलैंड में फोन-फ्री बचपन:‘ग्रेस्टोन्स’ कस्बे में पेरेंट्स और शिक्षकों ने लागू किया ‘नो फोन कोड’, 12 साल से पहले बच्चों को मोबाइल नहीं

आयरलैंड में फोन-फ्री बचपन:‘ग्रेस्टोन्स’ कस्बे में पेरेंट्स और शिक्षकों ने लागू किया ‘नो फोन कोड’, 12 साल से पहले बच्चों को मोबाइल नहीं
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द न्यू यॉर्क टाइम्स. न्यूयॉर्क3 घंटे पहले

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स्मार्टफोन के ‘डिजिटल चक्रव्यूह’ से बचपन को बचाने के लिए पूरा कस्बा ढाल बन गया है।

यूरोपीय देश आयरलैंड के ‘ग्रेस्टोन्स’ कस्बे ने दुनिया को वह रास्ता दिखाया है, जिसकी तलाश आज हर परेशान माता-पिता को है। इस कस्बे के 22 हजार लोगों ने मिलकर तय किया है कि वे अपने बच्चों का बचपन ‘स्मार्टफोन’ की भेंट नहीं चढ़ने देंगे। ‘इट टेक्स ए विलेज’ नाम के इस आंदोलन ने तकनीक के खिलाफ एक सामूहिक दीवार खड़ी कर दी है। फोन की जगह बच्चों के लिए ‘यूथ कैफे’ और खेल गतिविधियां बढ़ाई गई हैं।

‘फोन-फ्री बीच पार्टी’ जैसे आयोजन शुरू हुए हैं। ग्रेस्टोन्स की इस पहल से प्रेरित होकर अब आयरलैंड के अन्य शहरों कॉर्क और डबलिन ने भी ‘नो स्मार्टफोन कोड’ को अपनाया है। देश की सीमा के बाहर ब्रिटेन और स्पेन के बार्सिलोना में भी पेरेंट्स के समूहों ने ऐसी ही पहल शुरू की है। कोविड लॉकडाउन के बाद जब ग्रेस्टोन्स में स्कूल खुले, तो मंजर बदल चुका था।

सेंट पैट्रिक स्कूल की प्रिंसिपल रैचल हार्पर ने देखा कि बच्चे क्लास में ध्यान नहीं लगा पा रहे थे। वे रातभर आने वाले मैसेज से परेशान थे। उनकी नींद अधूरी थी और कुछ बच्चे तो ‘कैलोरी काउंटिंग एप्स’ के कारण ‘ईटिंग डिसऑर्डर’ का शिकार हो रहे थे। 12 साल के बॉडी मैंगन गिसलर इस बदलाव के पोस्टर बॉय हैं। वे कहते हैं, ‘मुझे डर है कि अगर फोन की लत लग गई, तो मैं खेल नहीं पाऊंगा। मैं स्वस्थ रहना चाहता हूं।’

ऐसे कई बच्चों में अब एक नई ‘अलर्टनेस’ दिख रही है। वे सुबह स्कूल में ज्यादा सक्रिय रहते हैं और अब वर्चुअल चैट के बजाय आमने-सामने बैठकर खेलने के प्लान बनाते हैं।

प्रिंसिपल रैचल हार्पर के मुताबिक, 8 प्राइमरी स्कूलों के 70% माता-पिता ने स्वैच्छिक रूप से ‘नो स्मार्टफोन’ कोड पर साइन किए हैं। उन्होंने कहा कि ‘हम बच्चों को मिडिल स्कूल से पहले मोबाइल फोन नहीं देंगे। क्योंकि हम बच्चों को डिजिटल भविष्य के लिए तैयार करना चाहते हैं, उसमें डुबाना नहीं।’

जहां टेक कंपनियों के हेडक्वार्टर, वहीं ‘नो स्मार्टफोन’ की मुहिम

आयरलैंड में गूगल, मेटा और एप्पल जैसी दिग्गज कंपनियों के यूरोपीय मुख्यालय हैं, जहां औसतन 9 साल की उम्र में ही बच्चों को फोन मिल जाता है। ऐसे में ग्रेस्टोन्स की यह पहल ‘चिराग तले अंधेरे’ को दूर करने जैसी है। देश के डिप्टी पीएम साइमन हैरिस, जो खुद इस कस्बे के निवासी हैं, इस मुहिम के सबसे बड़े समर्थक बनकर उभरे हैं। ग्रेस्टोन्स के लोगों को खुशी है कि अब यहां के बच्चे मैदानों में दुनिया ढूंढ रहे हैं।

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‘फोन-फ्री बीच पार्टी’ जैसे आयोजन शुरू हुए हैं। ग्रेस्टोन्स की इस पहल से प्रेरित होकर अब आयरलैंड के अन्य शहरों कॉर्क और डबलिन ने भी ‘नो स्मार्टफोन कोड’ को अपनाया है। देश की सीमा के बाहर ब्रिटेन और स्पेन के बार्सिलोना में भी पेरेंट्स के समूहों ने ऐसी ही पहल शुरू की है। कोविड लॉकडाउन के बाद जब ग्रेस्टोन्स में स्कूल खुले, तो मंजर बदल चुका था।

सेंट पैट्रिक स्कूल की प्रिंसिपल रैचल हार्पर ने देखा कि बच्चे क्लास में ध्यान नहीं लगा पा रहे थे। वे रातभर आने वाले मैसेज से परेशान थे। उनकी नींद अधूरी थी और कुछ बच्चे तो ‘कैलोरी काउंटिंग एप्स’ के कारण ‘ईटिंग डिसऑर्डर’ का शिकार हो रहे थे। 12 साल के बॉडी मैंगन गिसलर इस बदलाव के पोस्टर बॉय हैं। वे कहते हैं, ‘मुझे डर है कि अगर फोन की लत लग गई, तो मैं खेल नहीं पाऊंगा। मैं स्वस्थ रहना चाहता हूं।’

ऐसे कई बच्चों में अब एक नई ‘अलर्टनेस’ दिख रही है। वे सुबह स्कूल में ज्यादा सक्रिय रहते हैं और अब वर्चुअल चैट के बजाय आमने-सामने बैठकर खेलने के प्लान बनाते हैं।

प्रिंसिपल रैचल हार्पर के मुताबिक, 8 प्राइमरी स्कूलों के 70% माता-पिता ने स्वैच्छिक रूप से ‘नो स्मार्टफोन’ कोड पर साइन किए हैं। उन्होंने कहा कि ‘हम बच्चों को मिडिल स्कूल से पहले मोबाइल फोन नहीं देंगे। क्योंकि हम बच्चों को डिजिटल भविष्य के लिए तैयार करना चाहते हैं, उसमें डुबाना नहीं।’

जहां टेक कंपनियों के हेडक्वार्टर, वहीं ‘नो स्मार्टफोन’ की मुहिम

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