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इस पौधे की चाय का कमाल! नसों में जमा गंदा कोलेस्ट्रॉल करेगी साफ, किडनी को भी रखेगी हेल्दी

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Sidhi News: डॉ नरेंद्र पटेल ने लोकल 18 को बताया कि आयुर्वेद में पुनर्नवा का इस्तेमाल कई बीमारियों के इलाज में किया जाता है. यह खासतौर पर किडनी से जुड़ी समस्याओं में फायदेमंद मानी जाती है. इसके अलावा पीलिया, शरीर में सूजन और इंफ्लेमेटरी बीमारियों में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है.

सीधी. मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में कई ऐसे औषधीय पौधे पाए जाते हैं, जिनका उपयोग सदियों से आयुर्वेद में किया जाता रहा है. इनमें से एक खास पौधा है पुनर्नवा, जिसे आयुर्वेद में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. प्राकृतिक रूप से उगने वाला यह पौधा किडनी से जुड़ी समस्याओं में खासतौर पर लाभकारी माना जाता है. सीधी के आयुष अधिकारी डॉ नरेंद्र पटेल ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि पुनर्नवा एक फैलने वाली औषधीय घास है, जो मुख्य रूप से नमी वाली जगहों पर पाई जाती है. गर्मियों में यह सूख जाती है लेकिन बारिश शुरू होते ही दोबारा हरी-भरी हो जाती है. इसी वजह से इसका नाम पुनर्नवा पड़ा, जिसका अर्थ होता है फिर से नया हो जाना.

डॉ पटेल ने बताया कि आयुर्वेद में पुनर्नवा का उपयोग कई बीमारियों के उपचार में किया जाता है. यह खासतौर पर किडनी से जुड़ी समस्याओं में लाभकारी मानी जाती है. इसके अलावा जॉन्डिस, शरीर में सूजन और इंफ्लेमेटरी बीमारियों में भी इसका उपयोग किया जाता है. पुनर्नवा शरीर से अतिरिक्त पानी बाहर निकालने में मदद करती है. इसी कारण किडनी मरीजों में यह डायरेटिक की तरह काम करती है और सूजन कम करने में सहायक मानी जाती है. यह नसों में जमा गंदा कोलेस्ट्रॉल बाहर करने में मददगार है.

चाय या काढ़े के रूप में सेवन
पुनर्नवा का सेवन चाय या काढ़े के रूप में किया जा सकता है. इसके जड़, पत्तियों और तने को पानी में उबालकर छानने के बाद सेवन किया जाता है. नियमित और संतुलित मात्रा में इसका सेवन शरीर को कई तरह के लाभ पहुंचा सकता है. हालांकि बच्चों में इसके उपयोग को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है.

एनीमिया और सूजन की समस्या में उपयोगी
डॉ नरेंद्र पटेल के अनुसार, पुनर्नवा को लौह भस्म यानी आयरन के साथ मिलाकर पुनर्नवा मंडूर तैयार किया जाता है. यह आयुर्वेदिक औषधि एनीमिया और सूजन की समस्या में काफी उपयोगी मानी जाती है. यदि इसे आंवला जैसे विटामिन सी युक्त पदार्थों के साथ लिया जाए, तो शरीर में आयरन का अवशोषण बेहतर होता है. खास बात यह है कि एलोपैथिक आयरन दवाओं की तुलना में इससे पेट संबंधी समस्याएं कम होती हैं. आयुर्वेद विशेषज्ञ इसे गर्भावस्था में भी सुरक्षित मानते हैं.

About the Author

Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.

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सीधी. मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में कई ऐसे औषधीय पौधे पाए जाते हैं, जिनका उपयोग सदियों से आयुर्वेद में किया जाता रहा है. इनमें से एक खास पौधा है पुनर्नवा, जिसे आयुर्वेद में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. प्राकृतिक रूप से उगने वाला यह पौधा किडनी से जुड़ी समस्याओं में खासतौर पर लाभकारी माना जाता है. सीधी के आयुष अधिकारी डॉ नरेंद्र पटेल ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि पुनर्नवा एक फैलने वाली औषधीय घास है, जो मुख्य रूप से नमी वाली जगहों पर पाई जाती है. गर्मियों में यह सूख जाती है लेकिन बारिश शुरू होते ही दोबारा हरी-भरी हो जाती है. इसी वजह से इसका नाम पुनर्नवा पड़ा, जिसका अर्थ होता है फिर से नया हो जाना.

डॉ पटेल ने बताया कि आयुर्वेद में पुनर्नवा का उपयोग कई बीमारियों के उपचार में किया जाता है. यह खासतौर पर किडनी से जुड़ी समस्याओं में लाभकारी मानी जाती है. इसके अलावा जॉन्डिस, शरीर में सूजन और इंफ्लेमेटरी बीमारियों में भी इसका उपयोग किया जाता है. पुनर्नवा शरीर से अतिरिक्त पानी बाहर निकालने में मदद करती है. इसी कारण किडनी मरीजों में यह डायरेटिक की तरह काम करती है और सूजन कम करने में सहायक मानी जाती है. यह नसों में जमा गंदा कोलेस्ट्रॉल बाहर करने में मददगार है.

चाय या काढ़े के रूप में सेवन
पुनर्नवा का सेवन चाय या काढ़े के रूप में किया जा सकता है. इसके जड़, पत्तियों और तने को पानी में उबालकर छानने के बाद सेवन किया जाता है. नियमित और संतुलित मात्रा में इसका सेवन शरीर को कई तरह के लाभ पहुंचा सकता है. हालांकि बच्चों में इसके उपयोग को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है.

एनीमिया और सूजन की समस्या में उपयोगी
डॉ नरेंद्र पटेल के अनुसार, पुनर्नवा को लौह भस्म यानी आयरन के साथ मिलाकर पुनर्नवा मंडूर तैयार किया जाता है. यह आयुर्वेदिक औषधि एनीमिया और सूजन की समस्या में काफी उपयोगी मानी जाती है. यदि इसे आंवला जैसे विटामिन सी युक्त पदार्थों के साथ लिया जाए, तो शरीर में आयरन का अवशोषण बेहतर होता है. खास बात यह है कि एलोपैथिक आयरन दवाओं की तुलना में इससे पेट संबंधी समस्याएं कम होती हैं. आयुर्वेद विशेषज्ञ इसे गर्भावस्था में भी सुरक्षित मानते हैं.

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