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गांव का देसी खाना या शहर का फास्ट फूड? जानें किससे बढ़ रही हैं बीमारियां

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फरीदाबाद: फरीदाबाद की चमचमाती सड़कों, ऊंची इमारतों और फूड ऐप्स की दुनिया के बीच एक ऐसी खामोश लड़ाई चल रही है जो सीधे लोगों की सेहत पर असर डाल रही है. एक तरफ गांवों की थाली है जिसमें आज भी बाजरे की रोटी, ताजा सब्जियां, घर का घी और मिट्टी की खुशबू वाली छाछ शामिल है. दूसरी तरफ शहरों की भागदौड़ भरी जिंदगी है जहां पैकेज्ड फूड, बर्गर, पिज्जा और बाहर का खाना रोजमर्रा की आदत बन चुका है. यही वजह है कि अब कम उम्र में ही मोटापा, डायबिटीज और हाई बीपी जैसी बीमारियां तेजी से लोगों को अपनी चपेट में ले रही हैं.

गांव का खाना अभी भी काफी हद तक बैलेंस और क्लीन

लोकल 18 से बातचीत में सर्वोदय हॉस्पिटल की सीनियर डाइटिशियन और न्यूट्रिशन कंसल्टेंट डॉक्टर रितिका शर्मा बताती है फरीदाबाद जैसे इलाकों में गांव का खाना अभी भी काफी हद तक बैलेंस और क्लीन फूड माना जाता है. गांवों में आज भी लोग ताजा और घर का बना खाना खाते हैं जिसमें पैकेज्ड फूड की मात्रा बहुत कम होती है. वहीं शहरों में बिजी लाइफस्टाइल के कारण लोग जल्दी बनने वाले या बाहर से मंगाए गए खाने पर ज्यादा निर्भर हो चुके हैं. बच्चे स्कूल जाते हैं माता-पिता नौकरी करते हैं और ऐसे में पैकेज्ड फूड धीरे-धीरे पूरी लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुका है.

देसी और ताजा खाना शरीर को ज्यादा पोषण देता है

डॉ. रितिका बताती है बाजरा, रागी, ज्वार और बेसन जैसी पारंपरिक चीजें आज भी पैकेज्ड फूड से कहीं ज्यादा फायदेमंद हैं. गांव में जो खाना तैयार होता है वही आसपास उगाया भी जाता है इसलिए उसकी फ्रेशनेस बनी रहती है. जबकि पैकेज्ड फूड कब तैयार हुआ कितने समय तक रखा गया और उसमें कितने प्रिजर्वेटिव्स हैं इसकी कोई गारंटी नहीं होती. यही वजह है कि देसी और ताजा खाना शरीर को ज्यादा पोषण देता है.

फास्ट फूड और बाहर के खाने से हेल्थ इश्यूज

डॉक्टर रितिका बताती है शहरों में बढ़ते फास्ट फूड और बाहर के खाने का सीधा असर लोगों की सेहत पर दिखाई दे रहा है. डायबिटीज, हाई बीपी और मोटापा अब लाइफस्टाइल डिसऑर्डर बन चुके हैं. लोग काम में इतने व्यस्त हो चुके हैं कि खाना बनाने के बजाय बाहर से ऑर्डर करना ज्यादा आसान समझते हैं. हर चीज तुरंत उपलब्ध होने लगी है और इसी सुविधा ने लोगों को धीरे-धीरे अनहेल्दी खान-पान की ओर धकेल दिया है.

गांव और शहर की लाइफस्टाइल में भी फर्क

डॉ. रितिका बताती हैं गांव और शहर की लाइफस्टाइल में भी बड़ा फर्क है. गांवों में लोग खेतों में मेहनत करते हैं ज्यादा फिजिकल एक्टिव रहते हैं और उनका शरीर लगातार काम करता रहता है. इससे शरीर का मेटाबॉलिज्म बेहतर रहता है और बीमारियां कम होती हैं. वहीं शहरों में लंबे समय तक बैठकर काम करने वाली जिंदगी ने लोगों की इम्यूनिटी कमजोर कर दी है. आज हालत यह हो चुकी है कि लोग थोड़ा सा बाहर निकलते हैं तो खांसी-जुकाम जैसी समस्याएं जल्दी हो जाती हैं.

बच्चे भी वही सीखेंगे जो माता-पिता करेंगे

डॉक्टर रितिका बताती हैं बच्चे वही सीखते हैं जो अपने माता-पिता को करते हुए देखते हैं. अगर घर में रोज बाहर का खाना मंगाया जाएगा, तो बच्चे भी उसी आदत को आसान मानने लगेंगे. माता-पिता अगर खुद हेल्दी डाइट अपनाएंगे घर का खाना खाएंगे और बच्चों को भी वही आदत सिखाएंगे तभी आने वाली पीढ़ी को बीमारियों से बचाया जा सकता है.

प्रोटीन डाइट है फायदेमंद

फरीदाबाद के लोगों के लिए सलाह देते हुए डॉ. रितिका शर्मा बताती हैं सिर्फ फरीदाबाद ही नहीं बल्कि हर व्यक्ति को अपनी डाइट में प्रोटीन की मात्रा बढ़ानी चाहिए, क्योंकि भारतीय खान-पान में अक्सर इसकी कमी देखी जाती है. इसके अलावा ताजे फल और सब्जियां अच्छी तरह धोकर खानी चाहिए और गर्मियों में 3 से 4 लीटर पानी जरूर पीना चाहिए. लोग पानी में फल या थोड़ा नमक मिलाकर भी पी सकते हैं, ताकि शरीर में डिहाइड्रेशन की समस्या न हो और शरीर संतुलित बना रहे.

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गांव का खाना अभी भी काफी हद तक बैलेंस और क्लीन

लोकल 18 से बातचीत में सर्वोदय हॉस्पिटल की सीनियर डाइटिशियन और न्यूट्रिशन कंसल्टेंट डॉक्टर रितिका शर्मा बताती है फरीदाबाद जैसे इलाकों में गांव का खाना अभी भी काफी हद तक बैलेंस और क्लीन फूड माना जाता है. गांवों में आज भी लोग ताजा और घर का बना खाना खाते हैं जिसमें पैकेज्ड फूड की मात्रा बहुत कम होती है. वहीं शहरों में बिजी लाइफस्टाइल के कारण लोग जल्दी बनने वाले या बाहर से मंगाए गए खाने पर ज्यादा निर्भर हो चुके हैं. बच्चे स्कूल जाते हैं माता-पिता नौकरी करते हैं और ऐसे में पैकेज्ड फूड धीरे-धीरे पूरी लाइफस्टाइल का हिस्सा बन चुका है.

देसी और ताजा खाना शरीर को ज्यादा पोषण देता है

डॉ. रितिका बताती है बाजरा, रागी, ज्वार और बेसन जैसी पारंपरिक चीजें आज भी पैकेज्ड फूड से कहीं ज्यादा फायदेमंद हैं. गांव में जो खाना तैयार होता है वही आसपास उगाया भी जाता है इसलिए उसकी फ्रेशनेस बनी रहती है. जबकि पैकेज्ड फूड कब तैयार हुआ कितने समय तक रखा गया और उसमें कितने प्रिजर्वेटिव्स हैं इसकी कोई गारंटी नहीं होती. यही वजह है कि देसी और ताजा खाना शरीर को ज्यादा पोषण देता है.

फास्ट फूड और बाहर के खाने से हेल्थ इश्यूज

डॉक्टर रितिका बताती है शहरों में बढ़ते फास्ट फूड और बाहर के खाने का सीधा असर लोगों की सेहत पर दिखाई दे रहा है. डायबिटीज, हाई बीपी और मोटापा अब लाइफस्टाइल डिसऑर्डर बन चुके हैं. लोग काम में इतने व्यस्त हो चुके हैं कि खाना बनाने के बजाय बाहर से ऑर्डर करना ज्यादा आसान समझते हैं. हर चीज तुरंत उपलब्ध होने लगी है और इसी सुविधा ने लोगों को धीरे-धीरे अनहेल्दी खान-पान की ओर धकेल दिया है.

गांव और शहर की लाइफस्टाइल में भी फर्क

डॉ. रितिका बताती हैं गांव और शहर की लाइफस्टाइल में भी बड़ा फर्क है. गांवों में लोग खेतों में मेहनत करते हैं ज्यादा फिजिकल एक्टिव रहते हैं और उनका शरीर लगातार काम करता रहता है. इससे शरीर का मेटाबॉलिज्म बेहतर रहता है और बीमारियां कम होती हैं. वहीं शहरों में लंबे समय तक बैठकर काम करने वाली जिंदगी ने लोगों की इम्यूनिटी कमजोर कर दी है. आज हालत यह हो चुकी है कि लोग थोड़ा सा बाहर निकलते हैं तो खांसी-जुकाम जैसी समस्याएं जल्दी हो जाती हैं.

बच्चे भी वही सीखेंगे जो माता-पिता करेंगे

डॉक्टर रितिका बताती हैं बच्चे वही सीखते हैं जो अपने माता-पिता को करते हुए देखते हैं. अगर घर में रोज बाहर का खाना मंगाया जाएगा, तो बच्चे भी उसी आदत को आसान मानने लगेंगे. माता-पिता अगर खुद हेल्दी डाइट अपनाएंगे घर का खाना खाएंगे और बच्चों को भी वही आदत सिखाएंगे तभी आने वाली पीढ़ी को बीमारियों से बचाया जा सकता है.

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