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टीचर ने घर को बना दिया साइंस म्यूजियम:35-40 लाख खर्च कर 22 देशों से मंगवाए उपकरण, खेल-खेल में सिखाते हैं फिजिक्स

टीचर ने घर को बना दिया साइंस म्यूजियम:35-40 लाख खर्च कर 22 देशों से मंगवाए उपकरण, खेल-खेल में सिखाते हैं फिजिक्स

स्कूली स्टूडेंट्स में फिजिक्स सब्जेक्ट और साइंस के प्रति उत्सुकता जगाने के लिए जयपुर के जीएस मेनारिया ने अपने तीन मंजिला घर को ही साइंस का म्यूजियम बना दिया। यहां बच्चे खेल-खेल में साइंस सीखते हैं। 20 साल में 22 देशों से जुटाए गए भौतिकी से जुड़े दुर्लभ मॉडल और उपकरण इस घर को खास बनाते हैं। मेनारिया का दावा है कि उनके पास मौजूद 150 से ज्यादा ऐसे इंटरएक्टिव ‘खिलौने’ हैं, जो देश के किसी भी शैक्षणिक संस्थान में मौजूद नहीं। मेनारिया ने इस आइडिया पर लाखों रुपए खर्च किए, ताकि स्कूली बच्चे जटिल सिद्धांतों को प्रयोग के जरिए समझ सकें, बिना किसी डर के, बिना रट्टा मारे। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… चितौड़गढ़ के बड़ीसादड़ी के रहने वाले जीएस मेनारिया के पिता भगवान लाल गांव के स्कूल में फिजिक्स लैब सहायक थे। 40 साल पिता ने वहां नौकरी की। मेनारिया कहते हैं, जिस विषय से हमारा घर चला, हमने उसी को पूजा। वही सम्मान आगे चलकर जुनून बना। 1996 में पिता के रिटायरमेंट पर मेनारिया ने उनके नाम से 10 हजार रुपए का ड्राफ्ट स्कूल को दिया ताकि ब्याज से फिजिक्स टॉपर को स्कॉलरशिप मिले। आज वही रकम 5 लाख रुपए तक पहुंच चुकी है। उसी लैब से जुड़े तीन होनहार छात्रों को हर साल छात्रवृत्ति मिलती है। पहला रिसर्च पेपर छपा, वहीं से बदली दिशा
मेनारिया ने सुखाड़िया यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन किया। इसके बाद जयपुर में रहकर बच्चों को फिजिक्स पढ़ाने लगे। यहीं से पढ़ाने का तरीका बदलने की बेचैनी शुरू हुई। 1988 में ऑल इंडिया फिजिक्स टीचर्स एसोसिएशन की राष्ट्रीय परीक्षा में ‘फिजिक्स को लोकप्रिय कैसे बनाएं’ विषय पर उनका पेपर पूरे राजस्थान में प्रथम रहा। आज मेनारिया इस परीक्षा के स्टेट को-ऑर्डिनेटर हैं। यहां से मिला आइडिया
2005 में आइंस्टीन के E=mc² को 100 साल पूरे होने पर मनाए गए इंटरनेशनल ईयर ऑफ फिजिक्स के तहत मैसूर में हुए सम्मेलन में उन्होंने अपना रिसर्च पेपर प्रस्तुत किया। यह आयोजन भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और नेशनल टीचर साइंस कांग्रेस की ओर से हुआ था। पैनल के सामने उन्होंने ‘कोऑपरेटिव लर्निंग के जरिए फिजिक्स पढ़ाने की डायनामिक्स’ पर पेपर प्रस्तुत किया, जो न सिर्फ सराहा गया, बल्कि दुनिया भर से आए चुनिंदा रिसर्च पेपर्स में शामिल भी हुआ। यहीं मेनारिया ने पहली बार देखा कि कैसे खिलौनों, मॉडल्स और खुद के डिजाइन किए उपकरणों से फिजिक्स को आम भाषा में समझाया जा सकता है। यही वह पल था, जब उन्हें फिजिक्स को पढ़ाने नहीं, दिखाकर समझाने का विचार आया। 500 से ज्यादा उपकरण, 150 ऐसे जो देश में कहीं नहीं
फिजिक्स को खेल-खेल में समझाने के लिए जीएस मेनारिया के पास 500 से ज्यादा फिजिक्स खिलौने और उपकरण हैं, जिनमें से 300 से अधिक जयपुर के प्रतापनगर स्थित उनके तीन मंजिला घर में प्रदर्शित हैं। मेनारिया का दावा है कि इनमें 150 से ज्यादा ऐसे इंटरएक्टिव मॉडल हैं, जो पूरे देश के किसी भी शैक्षणिक संस्थान में मौजूद नहीं। इन उपकरणों को उन्होंने 22 देशों से मंगवाया है। कुछ सीधे विदेशों से तो कुछ अपने उन छात्रों के जरिए जो अलग-अलग देशों में काम कर रहे हैं। इन सब पर अब तक 35-40 लाख रुपए खर्च हो चुके हैं। इस तरह सिखाते हैं फिजिक्स उपकरणों के लिए घर छोटा पड़ा तो नया बनवाया
जयपुर के दुर्गापुरा की शांतिनगर कॉलोनी वाला घर इन उपकरणों से भर गया तो प्रतापनगर में नया मकान बनवाया। आधा बनते-बनते फैसला हो गया कि यह घर नहीं, फिजिक्स का संग्रहालय होगा। आज नए घर के ग्राउंड और फर्स्ट फ्लोर पर उनकी 20 साल की मेहनत सजी है। थर्ड फ्लोर वर्कशॉप के लिए है, जिसे जल्द बाकी बचे उपकरणों से सजाने की तैयारी है। अब तक 100 से ज्यादा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड जीत चुके मेनारिया की किताब ‘डांसिंग फिजिक्स’ भी जल्द प्रकाशित होने वाली है।

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टीचर ने घर को बना दिया साइंस म्यूजियम:35-40 लाख खर्च कर 22 देशों से मंगवाए उपकरण, खेल-खेल में सिखाते हैं फिजिक्स

टीचर ने घर को बना दिया साइंस म्यूजियम:35-40 लाख खर्च कर 22 देशों से मंगवाए उपकरण, खेल-खेल में सिखाते हैं फिजिक्स

स्कूली स्टूडेंट्स में फिजिक्स सब्जेक्ट और साइंस के प्रति उत्सुकता जगाने के लिए जयपुर के जीएस मेनारिया ने अपने तीन मंजिला घर को ही साइंस का म्यूजियम बना दिया। यहां बच्चे खेल-खेल में साइंस सीखते हैं। 20 साल में 22 देशों से जुटाए गए भौतिकी से जुड़े दुर्लभ मॉडल और उपकरण इस घर को खास बनाते हैं। मेनारिया का दावा है कि उनके पास मौजूद 150 से ज्यादा ऐसे इंटरएक्टिव ‘खिलौने’ हैं, जो देश के किसी भी शैक्षणिक संस्थान में मौजूद नहीं। मेनारिया ने इस आइडिया पर लाखों रुपए खर्च किए, ताकि स्कूली बच्चे जटिल सिद्धांतों को प्रयोग के जरिए समझ सकें, बिना किसी डर के, बिना रट्टा मारे। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… चितौड़गढ़ के बड़ीसादड़ी के रहने वाले जीएस मेनारिया के पिता भगवान लाल गांव के स्कूल में फिजिक्स लैब सहायक थे। 40 साल पिता ने वहां नौकरी की। मेनारिया कहते हैं, जिस विषय से हमारा घर चला, हमने उसी को पूजा। वही सम्मान आगे चलकर जुनून बना। 1996 में पिता के रिटायरमेंट पर मेनारिया ने उनके नाम से 10 हजार रुपए का ड्राफ्ट स्कूल को दिया ताकि ब्याज से फिजिक्स टॉपर को स्कॉलरशिप मिले। आज वही रकम 5 लाख रुपए तक पहुंच चुकी है। उसी लैब से जुड़े तीन होनहार छात्रों को हर साल छात्रवृत्ति मिलती है। पहला रिसर्च पेपर छपा, वहीं से बदली दिशा
मेनारिया ने सुखाड़िया यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन किया। इसके बाद जयपुर में रहकर बच्चों को फिजिक्स पढ़ाने लगे। यहीं से पढ़ाने का तरीका बदलने की बेचैनी शुरू हुई। 1988 में ऑल इंडिया फिजिक्स टीचर्स एसोसिएशन की राष्ट्रीय परीक्षा में ‘फिजिक्स को लोकप्रिय कैसे बनाएं’ विषय पर उनका पेपर पूरे राजस्थान में प्रथम रहा। आज मेनारिया इस परीक्षा के स्टेट को-ऑर्डिनेटर हैं। यहां से मिला आइडिया
2005 में आइंस्टीन के E=mc² को 100 साल पूरे होने पर मनाए गए इंटरनेशनल ईयर ऑफ फिजिक्स के तहत मैसूर में हुए सम्मेलन में उन्होंने अपना रिसर्च पेपर प्रस्तुत किया। यह आयोजन भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और नेशनल टीचर साइंस कांग्रेस की ओर से हुआ था। पैनल के सामने उन्होंने ‘कोऑपरेटिव लर्निंग के जरिए फिजिक्स पढ़ाने की डायनामिक्स’ पर पेपर प्रस्तुत किया, जो न सिर्फ सराहा गया, बल्कि दुनिया भर से आए चुनिंदा रिसर्च पेपर्स में शामिल भी हुआ। यहीं मेनारिया ने पहली बार देखा कि कैसे खिलौनों, मॉडल्स और खुद के डिजाइन किए उपकरणों से फिजिक्स को आम भाषा में समझाया जा सकता है। यही वह पल था, जब उन्हें फिजिक्स को पढ़ाने नहीं, दिखाकर समझाने का विचार आया। 500 से ज्यादा उपकरण, 150 ऐसे जो देश में कहीं नहीं
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