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दिल्लीवासियों की आंखों की सेहत पर एम्स की चौंकाने वाली स्टडी.

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ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सांइसेज के आरपी सेंटर की एक पायलट स्टडी ने दिल्लीवासियों की चिंता बढ़ा दी है. राजधानी में रहने वाले करीब 30 फीसदी लोगों की आंखों पर मुसीबत मंडरा रही है और सबसे खास बात है कि बच्चे भी इससे अछूते नहीं हैं. स्कूल जाने वाले बच्चों की आंखों में नजर का स्तर लगातार गिर रहा है और इन सभी लोगों को चश्मे की बेहद जल्दी जरूरत है.

डॉ. राजेंद्र प्रसाद सेंटर फॉर ऑप्थेल्मिक साइंसेज की रिपोर्ट कहती है कि दिल्ली में लगभग 30 फीसदी लोगों को रिफ्रैक्टिव एरर (दृष्टि दोष) के कारण चश्मे की जरूरत है. यह ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति को साफ दिखाई देने में कठिनाई होती है.

अध्ययन के आंकड़े साझा करते हुए कम्यूनिटी ऑप्थेल्मोलॉजी विभाग के प्रोफेसर और प्रमुख डॉ. प्रवीण वशिष्ठ ने बताया कि ये आंकड़े दिखाते हैं कि दिल्ली में नजर से जुड़ी समस्याएं कितनी आम हो चुकी हैं.स्टडी के अनुसार 50 साल से अधिक उम्र के लोगों में समस्या सबसे ज्यादा है, जिनमें लगभग 70% लोगों को साफ देखने के लिए चश्मे की जरूरत होती है.

वे आगे कहते हैं कि यह समस्या सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं है. करीब 20 फीसदी स्कूली बच्चों को भी चश्मे की जरूरत पड़ती है, जो कम उम्र में आंखों की सेहत को लेकर चिंता बढ़ा रहा है. हालांकि एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी है जो समय से न तो चश्मे की जांच करा रहे हैं और न ही पर्याप्त रूप से पहन रहे हैं.

डॉक्टर पर्याप्त लेकिन जांचने वाले कम 
प्रोफेसर वशिष्ठ ने बताया कि दिल्ली में नेत्र रोग विशेषज्ञ (Ophthalmologists) की संख्या अच्छी है लेकिन एक बड़ी कमी यह है कि नजर की जांच करने वाले ऑप्टोमेट्रिस्ट (Optometrists) की संख्या जरूरत से काफी कम है. ऑफ्थेल्मोलॉजिस्ट के पास व्यक्ति तभी जाता है जब उसे आंखों में कोई परेशानी होती है क्योंकि ये आंखों की बीमारियों का इलाज करते हैं. जबकि ऑप्टोमेट्रिस्ट आंखों की जांच करते हैं और चश्मे का नंबर लिखते हैं.इसलिए रिफ्रैक्टिव एरर जैसी समस्याओं के समाधान के लिए ऑप्टोमेट्रिस्ट बहुत महत्वपूर्ण होते हैं.

डॉ. वशिष्ठ बताते हैं कि दिल्ली में लगभग 249 संस्थान आंखों की देखभाल की सेवाएं देते हैं, जिनमें से अधिकतर प्राइवेट सेक्टर में हैं. शहर में करीब 1,085 नेत्र रोग विशेषज्ञ और लगभग 489 ऑप्टोमेट्रिस्ट मौजूद हैं.

डब्ल्यूएचओ के मानकों से कम हैं विशेषज्ञ

उन्होंने बताया कि डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइंस के अनुसार प्रति 50,000 लोगों पर कम से कम एक ऑप्टोमेट्रिस्ट होना चाहिए, लेकिन दिल्ली अभी इस लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाई है.

यहां प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं में भी आंखों की सेवाएं सीमित हैं. दिल्ली में लगभग 270 आयुष्मान आरोग्य मंदिर केंद्र हैं, लेकिन इनमें से केवल लगभग 50 केंद्रों पर ही आंखों की देखभाल की सेवाएं उपलब्ध हैं.

ऐसे में जरूरी है कि आंखों की नियमित जांच की सुविधा बढ़ाई जाए और प्रशिक्षित ऑप्टोमेट्रिस्ट की संख्या बढ़ाई जाए. ताकि बच्चों और बुजुर्गों में दृष्टि समस्याओं का जल्दी पता लगाया जा सके और अधिक लोगों को समय पर चश्मा मिल सके.

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डॉ. राजेंद्र प्रसाद सेंटर फॉर ऑप्थेल्मिक साइंसेज की रिपोर्ट कहती है कि दिल्ली में लगभग 30 फीसदी लोगों को रिफ्रैक्टिव एरर (दृष्टि दोष) के कारण चश्मे की जरूरत है. यह ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति को साफ दिखाई देने में कठिनाई होती है.

अध्ययन के आंकड़े साझा करते हुए कम्यूनिटी ऑप्थेल्मोलॉजी विभाग के प्रोफेसर और प्रमुख डॉ. प्रवीण वशिष्ठ ने बताया कि ये आंकड़े दिखाते हैं कि दिल्ली में नजर से जुड़ी समस्याएं कितनी आम हो चुकी हैं.स्टडी के अनुसार 50 साल से अधिक उम्र के लोगों में समस्या सबसे ज्यादा है, जिनमें लगभग 70% लोगों को साफ देखने के लिए चश्मे की जरूरत होती है.

वे आगे कहते हैं कि यह समस्या सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं है. करीब 20 फीसदी स्कूली बच्चों को भी चश्मे की जरूरत पड़ती है, जो कम उम्र में आंखों की सेहत को लेकर चिंता बढ़ा रहा है. हालांकि एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी है जो समय से न तो चश्मे की जांच करा रहे हैं और न ही पर्याप्त रूप से पहन रहे हैं.

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डॉ. वशिष्ठ बताते हैं कि दिल्ली में लगभग 249 संस्थान आंखों की देखभाल की सेवाएं देते हैं, जिनमें से अधिकतर प्राइवेट सेक्टर में हैं. शहर में करीब 1,085 नेत्र रोग विशेषज्ञ और लगभग 489 ऑप्टोमेट्रिस्ट मौजूद हैं.

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ऐसे में जरूरी है कि आंखों की नियमित जांच की सुविधा बढ़ाई जाए और प्रशिक्षित ऑप्टोमेट्रिस्ट की संख्या बढ़ाई जाए. ताकि बच्चों और बुजुर्गों में दृष्टि समस्याओं का जल्दी पता लगाया जा सके और अधिक लोगों को समय पर चश्मा मिल सके.

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