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परीक्षा परिणाम का तनाव और बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य | Child Depression Symptoms & Expert Advice

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Child Depression Symptoms & Expert Advice: राजस्थान में बोर्ड परीक्षा परिणामों के बाद बच्चों में बढ़ते आत्महत्या के मामलों ने समाज को झकझोर दिया है. पाली की हालिया घटना के संदर्भ में मनोचिकित्सक डॉ. संजय गहलोत ने माता-पिता को विशेष सलाह दी है. उनका कहना है कि बच्चों के साथ दोस्त जैसा व्यवहार करना और उनके साथ समय बिताना बहुत जरूरी है. आज के दौर में माता-पिता की व्यस्तता और बच्चों से संवाद की कमी उन्हें डिप्रेशन की ओर धकेल रही है. बच्चों की तुलना दूसरों से करना और उन पर ऊंचे अंकों का दबाव बनाना उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक है. डॉ. गहलोत के अनुसार, माता-पिता को बच्चों को यह विश्वास दिलाना चाहिए कि कोई भी परीक्षा जीवन से बड़ी नहीं है.

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Child Depression Symptoms & Expert Advice: एक माता-पिता के लिए दुनिया का सबसे खौफनाक मंजर क्या हो सकता है? शायद वह, जब उन्हें अपने जिगर के टुकड़े की ‘खून से सनी देह’ देखनी पड़े या मासूम को ‘फंदे’ से झूलता देखना पड़े. यह सोचने मात्र से दिल दहल जाता है, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि ‘परीक्षा का परिणाम’ अब बच्चों की जिंदगी पर भारी पड़ने लगा है. हाल ही में पाली में 10वीं के रिजल्ट के बाद एक छात्र द्वारा डिप्रेशन में आकर उठाया गया खौफनाक कदम इसी ओर इशारा करता है. सवाल यह है कि क्या इस मासूम को बचाया जा सकता था? जवाब है-हाँ. अगर माता-पिता समय रहते अपने बच्चे के बदलते हाव-भाव और उसकी ‘खामोश चीख’ को सुन लेते, तो शायद आज वह हमारे बीच होता.

लोकल-18 से खास बातचीत में राजस्थान के जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ. संजय गहलोत ने कहा कि यह ऐसी स्थितियां हैं जिन्हें समय रहते भांप लिया जाए तो अनहोनी को रोका जा सकता है. अक्सर माता-पिता चाहते हैं कि जो वे स्वयं जीवन में नहीं कर पाए, वह उनका बच्चा करे. इसके कारण बच्चे भारी दबाव महसूस करते हैं. डॉ. गहलोत के अनुसार, बच्चों के व्यवहार में बदलाव अचानक नहीं होता. इसके पीछे कई कारण होते हैं. यदि माता-पिता जागरूक हैं और बच्चों के साथ पर्याप्त समय व्यतीत करते हैं, तो बच्चा अपनी हर छोटी-बड़ी परेशानी पहले अपने परिवार को बताता है. आज के व्यस्त दौर में माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद कम हो गया है, जिससे बच्चे घर में खुद को अकेला महसूस करने लगते हैं.

इम्तिहान जिंदगी का आखिरी मकसद नहीं
डॉ. संजय गहलोत सलाह देते हैं कि बच्चों को यह समझाना बेहद जरूरी है कि इम्तिहान जिंदगी का आखिरी मकसद नहीं है. परीक्षाएं और पढ़ाई जीवन का एक हिस्सा मात्र हैं. केवल 10वीं और 12वीं की परीक्षा ही भविष्य तय नहीं करती, यह तो बस शुरुआत है. कई बार परिवार का आपसी कलह और माता-पिता के बीच अनबन भी बच्चे को मानसिक रूप से तोड़ देती है. ऐसी स्थिति में बच्चा अपनी बात कहने से डरता है. उसे लगता है कि यदि नंबर अच्छे नहीं आए या वह फेल हो गया, तो वह माता-पिता को क्या मुंह दिखाएगा. माता-पिता द्वारा बच्चों के सामने बहुत ऊंचे आदर्श रख देना और दूसरे बच्चों से उनकी निरंतर तुलना करना डिप्रेशन का सबसे बड़ा कारण बनता है.

स्कूल और शिक्षकों की भी अहम जिम्मेदारी
सिर्फ घर ही नहीं, स्कूल का वातावरण भी बच्चों पर गहरा प्रभाव डालता है. अच्छे रिजल्ट और स्कूल की रैंकिंग के लिए बच्चों पर अतिरिक्त दबाव डाला जाता है. डॉ. गहलोत का मानना है कि स्कूलों को भी बच्चों की मनोस्थिति समझते हुए काम करना चाहिए. शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों के व्यवहार में आने वाले बदलावों को नोटिस करें. यदि कोई बच्चा अचानक शांत रहने लगे, अकेला महसूस करे या पढ़ाई से कतराने लगे, तो उसे तुरंत सहायता और परामर्श दिया जाना चाहिए. समय रहते पहचान और सहयोग ही बच्चों को मौत के मुंह से बाहर निकाल सकता है.

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Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a seasoned multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience across digital media, social media management, video production, editing, content…और पढ़ें

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लोकल-18 से खास बातचीत में राजस्थान के जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ. संजय गहलोत ने कहा कि यह ऐसी स्थितियां हैं जिन्हें समय रहते भांप लिया जाए तो अनहोनी को रोका जा सकता है. अक्सर माता-पिता चाहते हैं कि जो वे स्वयं जीवन में नहीं कर पाए, वह उनका बच्चा करे. इसके कारण बच्चे भारी दबाव महसूस करते हैं. डॉ. गहलोत के अनुसार, बच्चों के व्यवहार में बदलाव अचानक नहीं होता. इसके पीछे कई कारण होते हैं. यदि माता-पिता जागरूक हैं और बच्चों के साथ पर्याप्त समय व्यतीत करते हैं, तो बच्चा अपनी हर छोटी-बड़ी परेशानी पहले अपने परिवार को बताता है. आज के व्यस्त दौर में माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद कम हो गया है, जिससे बच्चे घर में खुद को अकेला महसूस करने लगते हैं.

इम्तिहान जिंदगी का आखिरी मकसद नहीं
डॉ. संजय गहलोत सलाह देते हैं कि बच्चों को यह समझाना बेहद जरूरी है कि इम्तिहान जिंदगी का आखिरी मकसद नहीं है. परीक्षाएं और पढ़ाई जीवन का एक हिस्सा मात्र हैं. केवल 10वीं और 12वीं की परीक्षा ही भविष्य तय नहीं करती, यह तो बस शुरुआत है. कई बार परिवार का आपसी कलह और माता-पिता के बीच अनबन भी बच्चे को मानसिक रूप से तोड़ देती है. ऐसी स्थिति में बच्चा अपनी बात कहने से डरता है. उसे लगता है कि यदि नंबर अच्छे नहीं आए या वह फेल हो गया, तो वह माता-पिता को क्या मुंह दिखाएगा. माता-पिता द्वारा बच्चों के सामने बहुत ऊंचे आदर्श रख देना और दूसरे बच्चों से उनकी निरंतर तुलना करना डिप्रेशन का सबसे बड़ा कारण बनता है.

स्कूल और शिक्षकों की भी अहम जिम्मेदारी
सिर्फ घर ही नहीं, स्कूल का वातावरण भी बच्चों पर गहरा प्रभाव डालता है. अच्छे रिजल्ट और स्कूल की रैंकिंग के लिए बच्चों पर अतिरिक्त दबाव डाला जाता है. डॉ. गहलोत का मानना है कि स्कूलों को भी बच्चों की मनोस्थिति समझते हुए काम करना चाहिए. शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों के व्यवहार में आने वाले बदलावों को नोटिस करें. यदि कोई बच्चा अचानक शांत रहने लगे, अकेला महसूस करे या पढ़ाई से कतराने लगे, तो उसे तुरंत सहायता और परामर्श दिया जाना चाहिए. समय रहते पहचान और सहयोग ही बच्चों को मौत के मुंह से बाहर निकाल सकता है.

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