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प्रदूषण से डायबीटीज की चपेट में आ रहे लोग? नोएडा से कानपुर तक नई आफत, पता भी नहीं चलेगा हो जाओगे रोगी

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Diabetes Causes : डायबिटीज (शुगर) को अब तक गलत खानपान या खराब लाइफस्टाइल से हुई बीमारी माना जाता रहा है, लेकिन अब तेजी से बढ़ते वायु प्रदूषण ने इसे और खतरनाक बना दिया है. हवा में मौजूद धूल और प्रदूषक कण सीधे शरीर के अंदर जाकर ऐसी प्रक्रियाएं शुरू कर देते हैं, जो धीरे-धीरे इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ाती हैं और व्यक्ति को डायबिटीज की ओर धकेल देती हैं. लोकल 18 ने इस बारे में कानपुर के चिकित्सक डॉ. एसके गौतम से बात की. वे बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में डायबिटीज के मामलों में जो तेजी आई है, उसमें प्रदूषण की भूमिका अब साफ दिखने लगी है.

कानपुर. अब डायबिटीज सिर्फ गलत खानपान या खराब लाइफस्टाइल की बीमारी नहीं रह गई है. तेजी से बढ़ते वायु प्रदूषण ने इस बीमारी को और खतरनाक बना दिया है. डॉक्टरों के अनुसार, हवा में मौजूद धूल और प्रदूषक कण सीधे शरीर के अंदर जाकर ऐसी प्रक्रियाएं शुरू कर देते हैं, जो धीरे-धीरे इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ाती हैं और व्यक्ति को डायबिटीज की ओर धकेल देती हैं. कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. एसके गौतम बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में डायबिटीज के मामलों में जो तेजी आई है, उसमें प्रदूषण की भूमिका अब साफ दिखाई देने लगी है. पहले जहां इसे सिर्फ खानपान और लाइफस्टाइल से जोड़कर देखा जाता था, अब हवा की गुणवत्ता भी एक बड़ा कारण बन चुकी है.

कैसे करते हैं काम

डॉ. एसके गौतम के मुताबिक, हवा में मौजूद पीएम 2.5 जैसे बेहद महीन कण सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर जाते हैं. ये कण इतने छोटे होते हैं कि सीधे फेफड़ों से होते हुए ब्लडस्ट्रीम तक पहुंच जाते हैं. इसके बाद ये शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं और उनसे हानिकारक केमिकल रिलीज कराते हैं. यही केमिकल इंसुलिन के काम करने की क्षमता को कमजोर कर देते हैं. नतीजा यह होता है कि शरीर में शुगर का स्तर धीरे-धीरे बढ़ने लगता है और व्यक्ति डायबिटीज की चपेट में आ जाता है.

इन शहरों को खतरा ज्यादा

जिन शहरों में प्रदूषण का स्तर ज्यादा है, वहां डायबिटीज के मरीजों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है. दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद जैसे शहर इसका बड़ा उदाहरण हैं. यहां की खराब हवा लोगों के शरीर पर लगातार असर डाल रही है. कानपुर जैसे शहरों में भी सर्दियों और गर्मियों में धूल और प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है, जिससे खतरा और बढ़ जाता है. लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने वाले लोग धीरे-धीरे इस बीमारी की ओर बढ़ते जाते हैं, उन्हें इसका पता भी नहीं चलता.

फिर करें क्या
डॉ. गौतम का कहना है कि इस खतरे से पूरी तरह बच पाना मुश्किल जरूर है, लेकिन सावधानी से जोखिम कम किया जा सकता है. जहां प्रदूषण अधिक हो, वहां मास्क का उपयोग जरूर करना चाहिए. सुबह-शाम जब हवा में धूल ज्यादा हो, उस समय बाहर निकलने से बचना चाहिए. शरीर को मजबूत रखना भी जरूरी है, ताकि प्रदूषण का असर कम हो सके. समय-समय पर जांच कराना और शुगर लेवल पर नजर रखना भी बेहद जरूरी है.

About the Author

Priyanshu Gupta

Priyanshu has more than 10 years of experience in journalism. Before News 18 (Network 18 Group), he had worked with Rajsthan Patrika and Amar Ujala. He has Studied Journalism from Indian Institute of Mass Commu…और पढ़ें

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कानपुर. अब डायबिटीज सिर्फ गलत खानपान या खराब लाइफस्टाइल की बीमारी नहीं रह गई है. तेजी से बढ़ते वायु प्रदूषण ने इस बीमारी को और खतरनाक बना दिया है. डॉक्टरों के अनुसार, हवा में मौजूद धूल और प्रदूषक कण सीधे शरीर के अंदर जाकर ऐसी प्रक्रियाएं शुरू कर देते हैं, जो धीरे-धीरे इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ाती हैं और व्यक्ति को डायबिटीज की ओर धकेल देती हैं. कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. एसके गौतम बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में डायबिटीज के मामलों में जो तेजी आई है, उसमें प्रदूषण की भूमिका अब साफ दिखाई देने लगी है. पहले जहां इसे सिर्फ खानपान और लाइफस्टाइल से जोड़कर देखा जाता था, अब हवा की गुणवत्ता भी एक बड़ा कारण बन चुकी है.

कैसे करते हैं काम

डॉ. एसके गौतम के मुताबिक, हवा में मौजूद पीएम 2.5 जैसे बेहद महीन कण सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर जाते हैं. ये कण इतने छोटे होते हैं कि सीधे फेफड़ों से होते हुए ब्लडस्ट्रीम तक पहुंच जाते हैं. इसके बाद ये शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं और उनसे हानिकारक केमिकल रिलीज कराते हैं. यही केमिकल इंसुलिन के काम करने की क्षमता को कमजोर कर देते हैं. नतीजा यह होता है कि शरीर में शुगर का स्तर धीरे-धीरे बढ़ने लगता है और व्यक्ति डायबिटीज की चपेट में आ जाता है.

इन शहरों को खतरा ज्यादा

जिन शहरों में प्रदूषण का स्तर ज्यादा है, वहां डायबिटीज के मरीजों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है. दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद जैसे शहर इसका बड़ा उदाहरण हैं. यहां की खराब हवा लोगों के शरीर पर लगातार असर डाल रही है. कानपुर जैसे शहरों में भी सर्दियों और गर्मियों में धूल और प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है, जिससे खतरा और बढ़ जाता है. लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने वाले लोग धीरे-धीरे इस बीमारी की ओर बढ़ते जाते हैं, उन्हें इसका पता भी नहीं चलता.

फिर करें क्या
डॉ. गौतम का कहना है कि इस खतरे से पूरी तरह बच पाना मुश्किल जरूर है, लेकिन सावधानी से जोखिम कम किया जा सकता है. जहां प्रदूषण अधिक हो, वहां मास्क का उपयोग जरूर करना चाहिए. सुबह-शाम जब हवा में धूल ज्यादा हो, उस समय बाहर निकलने से बचना चाहिए. शरीर को मजबूत रखना भी जरूरी है, ताकि प्रदूषण का असर कम हो सके. समय-समय पर जांच कराना और शुगर लेवल पर नजर रखना भी बेहद जरूरी है.

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