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भारत की लोक परंपराओं से सीखें खुश रहने के सूत्र:हैप्पीनेस का फॉर्मूला हमारी संस्कृति में; उत्तराखंड के फूलदेई त्योहार से केरल की नौका दौड़ तक, ये परंपराएं सिखाती हैं जीना

भारत की लोक परंपराओं से सीखें खुश रहने के सूत्र:हैप्पीनेस का फॉर्मूला हमारी संस्कृति में; उत्तराखंड के फूलदेई त्योहार से केरल की नौका दौड़ तक, ये परंपराएं सिखाती हैं जीना

हर साल वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट में नॉर्वे-स्वीडन जैसे देश शीर्ष पर रहते हैं, लेकिन खुशी के जो सिद्धांत वहां मापे जाते हैं, जैसे- सामाजिक भरोसा, सामूहिक जीवन, प्रकृति से जुड़ाव, रिश्तों की मजबूती। वे भारत की लोक परंपराओं में सदियों से मौजूद हैं। देश की ये अलग-अलग परंपराएं बताती हैं कि खुशी कोई भावना नहीं, बल्कि जीने का तरीका है। सामूहिकता साथ हो तो मुश्किल भी आसान लगती है – भारत की कई परंपराएं ‘मैं’ नहीं, ‘हम’ पर आधारित हैं। – उत्तराखंड में फूलदेई का त्योहार हर साल चैत्र माह की शुरुआत में मनाया जाता है। सर्दियों के बाद जब पहाड़ों में नए-नए फूल खिलते हैं, तब बच्चे घर-घर जाकर दहलीज पर फूल सजाते हैं और सबके सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। पूरा गांव एक-दूसरे के दरवाजे से जुड़ता है और बसंत का स्वागत अकेले नहीं, बल्कि सामूहिक खुशी के साथ करता है। – केरल की वल्लम कली (नौका दौड़) में 100 से भी ज्यादा लोग एक लंबी नाव में सवार होकर एक ही ताल और लय में चप्पू चलाते हैं। यह इस बात को दर्शाता है कि इतने लोग एक लक्ष्य के लिए पूरी एकता के साथ साथ चल रहे हैं। कृतज्ञता शुक्रिया कहना सिखाता है; जो है, वही काफी है – ओडिशा की नुआखाई में नई फसल पहले धरती और देवी को अर्पित की जाती है, फिर गांव साथ खाना खाता है। कृतज्ञता हमें सिखाती है कि जो है, वही काफी है। – तमिलनाडु का कोलम सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि छोटे जीवों के लिए भोजन है। यानी दिन की शुरुआत ही दान से होती है। रिश्ते और संवाद, अकेलेपन का सबसे बड़ा इलाज – असम में ‘भेलघर’ नाम का अस्थायी घर बनाकर लोग रात भर साथ जश्न मनाते हैं और अगली सुबह उसे जला देते हैं। यह सिखाती है कि खुशी लोगों के बीच होती है। – नागालैंड का मोरुंग सामुदायिक केंद्र है। बुजुर्ग युवाओं को जीवन कौशल सिखाते हैं, इससे पीढ़ियों के बीच जुड़ाव बना रहता है। प्रकृति और धैर्य, स्थायी खुशियों का सूत्र – मेघालय में खासी और जयंतिया जनजाति के लोग पेड़ों की जीवित जड़ों को मोड़-तोड़कर पुल बनाते हैं। ये पुल प्रकृति के साथ मिलकर तैयार होते हैं और पूरी तरह बनने में 15 से 30 साल लग जाते हैं। यह परंपरा हमें धैर्य और दूरदृष्टि सिखाती है। आज मेहनत करके आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ टिकाऊ बनाना ही संतोष है। भरोसा, जिंदगी में कोई भी डर मायने नहीं रखता – गुजरात के डांग क्षेत्र के आदिवासी इलाकों में होली के दौरान एक साहसिक परंपरा निभाई जाती है। लोग एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर मानव मीनार बनाते हैं और उस पर नाचते हैं। – सीख: यह परंपरा आपसी भरोसा सिखाती है… ऊपर खड़ा व्यक्ति जानता है कि नीचे खड़े लोग उसे गिरने नहीं देंगे।

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