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मूवी रिव्यू- मिर्जापुरः द फिल्म:मुन्ना का पागलपन, कालीन भैया का ठहराव और गुड्डू का गुस्सा, ‘मिर्जापुर’ में फिर गरजी बंदूकें, लेकिन कहानी हुई लंबी

मूवी रिव्यू- मिर्जापुरः द फिल्म:मुन्ना का पागलपन, कालीन भैया का ठहराव और गुड्डू का गुस्सा, ‘मिर्जापुर’ में फिर गरजी बंदूकें, लेकिन कहानी हुई लंबी

स्टारकास्ट- अली फजल, पंकज त्रिपाठी, दिव्येंदु शर्मा, रवि किशन, जीतेंद्र कुमार, रसिका दुग्गल, श्वेता त्रिपाठी, अभिषेक बनर्जी, श्रेया पिलगांवकर डायरेक्टर- गुरमीत सिंह ड्यूरेशन- 3 घंटे 17 मिनट रेटिंग- 3.5/ 5 मिर्जापुर की दुनिया में कानून से ज्यादा ताकतवर है बंदूक और बंदूक से ज्यादा ताकतवर है सही वक्त पर चली गई चाल। तीन सीजन तक ओटीटी पर इस दुनिया का भौकाल देखने के बाद अब गुरमीत सिंह इसे बड़े पर्दे पर लेकर आए हैं। अच्छी बात यह है कि फिल्म को सिर्फ सीरीज का लंबा एपिसोड बनाने की कोशिश नहीं की गई है। इसे सिनेमाई विस्तार दिया गया है। लेकिन 3 घंटे 17 मिनट की इस फिल्म में जहां कई सीक्वेंस बड़े पर्दे पर खूब असर करते हैं, वहीं कुछ जगह कहानी को अपनी मंजिल तक पहुंचने में जरूरत से ज्यादा वक्त लगता है। कैसी है फिल्म की कहानी? ‘मिर्जापुर: द मूवी’ की कहानी फ्रेंचाइजी की उसी दुनिया में लौटती है, जहां सत्ता की कुर्सी खाली होते ही बंदूकें खुद अपनी भाषा बोलने लगती हैं। फिल्म दरअसल मिर्जापुर की कहानी में एक ऐसा अध्याय खोलती है, जो सीरीज की टाइमलाइन के बीच का हिस्सा है। यानी यह कहानी अचानक किसी दूसरी दुनिया में नहीं चली जाती, बल्कि पुराने किरदारों और उनके रिश्तों के बीच एक नया खेल जोड़ती है। कालीन भैया यानी पंकज त्रिपाठी के लिए सत्ता सिर्फ गद्दी नहीं, विरासत और दबदबे का सवाल है। दूसरी तरफ गुड्डू पंडित यानी अली फजल की दुनिया बदले और ताकत के इर्द-गिर्द घूमती है। और फिर मुन्ना त्रिपाठी यानी दिव्येंदु की मौजूदगी इस पूरे समीकरण को फिर से खतरनाक बना देती है। मुन्ना की वापसी फिल्म का सबसे बड़ा तुरुप का पत्ता है, लेकिन कहानी सिर्फ पुराने चेहरों की वापसी पर निर्भर नहीं रहती। रवि किशन का बब्बुआ यादव इस सत्ता के खेल में नया रंग भरता है। उसके आते ही कहानी में एक अलग किस्म की आक्रामकता दिखाई देती है। बीना त्रिपाठी यानी रसिका दुग्गल भी अपनी चालें चलती हैं और यही मिर्जापुर की खासियत है। यहां कोई किरदार सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं होता, हर कोई किसी न किसी खेल का खिलाड़ी है। कहानी आगे बढ़ती है तो मिर्जापुर की गलियों से निकलकर राजस्थान के रेगिस्तान तक पहुंचती है। बदला, सत्ता, धोखा और वर्चस्व की यह लड़ाई धीरे-धीरे ऐसे मुकाम पर जाती है, जहां पुरानी दुश्मनी और नए समीकरण आमने-सामने खड़े हो जाते हैं। कैसी है कहानी और स्क्रीनप्ले में क्या खास है? पुनीत कृष्णा की लिखाई अब भी इस फ्रेंचाइजी की रीढ़ है। मिर्जापुर का संवाद सिर्फ संवाद नहीं होता, वह किरदार की पहचान बन जाता है। फिल्म में भी कई जगह बातचीत इतनी धारदार है कि गोली चलने से पहले ही सीन में तनाव पैदा हो जाता है। खास बात यह है कि यहां हास्य भी उसी अंधेरी दुनिया से निकलता है। हिंसा के बीच अचानक आने वाला देसी हास्य फिल्म को लगातार गंभीर बने रहने से बचाता है। लेकिन यहीं स्क्रीनप्ले थोड़ी परेशानी पैदा करता है। फिल्म के पास किरदार बहुत हैं, पुराने रिश्ते बहुत हैं और नए समीकरण भी बहुत हैं। इन्हें संभालने की कोशिश में दूसरे हिस्से में कहानी कई जगह आगे बढ़ने के बजाय अपने ही बनाए चक्कर में घूमती हुई लगती है। कुछ हिस्सों को छोटा किया जाता तो फिल्म का असर और तेज हो सकता था। कैसी है स्टारकास्ट कि एक्टिंग? दिव्येंदु शर्मा- दिव्येंदु को मुन्ना के रूप में दोबारा देखना सिर्फ प्रशंसकों के लिए पुरानी याद नहीं है, अभिनय के स्तर पर भी यह फिल्म का बड़ा आकर्षण है। मुन्ना की बेपरवाही, सनक और खतरनाक मासूमियत का जो मिश्रण दिव्येंदु ने बनाया है, वह अब भी काम करता है। पंकज त्रिपाठी- कालीन भैया, दिव्येंदु के किरदार मुन्ना से ठीक उलट है। वह कम बोलते हैं और ज्यादा महसूस कराते हैं। उनका अभिनय शोर नहीं करता, लेकिन सीन पर कब्जा कर लेता है। अली फजल- अली का गुड्डू अब पहले से ज्यादा कठोर और सत्ता के खेल को समझने वाला किरदार है। उनके गुस्से में अब सिर्फ बदला नहीं, सत्ता की भूख भी दिखाई देती है। रवि किशन- इनकी एंट्री फिल्म को जरूरी ऊर्जा देती है। बब्बुआ यादव के किरदार में उनका देसी अंदाज और आक्रामकता मिर्जापुर की दुनिया में नया तड़का लगाती है। रसिका दुग्गल, जितेंद्र कुमार, अभिषेक बनर्जी, राजेश तैलंग और बाकी कलाकार भी अपने किरदारों को उसी दुनिया का हिस्सा बनाए रखते हैं। बड़े पर्दे पर मिर्जापुर का असली फायदा मिर्जापुर की बंदूकें ओटीटी पर भी चलती थीं, लेकिन सिनेमाघर में उनका असर अलग है। गोलियों की आवाज, हाथापाई, खून-खराबा और बड़े एक्शन सीक्वेंस फिल्म को थिएटर वाला स्केल देते हैं। खासकर राजस्थान के रेगिस्तान में फिल्म का प्री-क्लाइमैक्स और क्लाइमैक्स हिस्सा शानदार तरीके से फिल्माया गया है। यहां निर्देशक गुरमीत सिंह को अपनी सबसे ज्यादा आजादी मिलती है और कैमरा लोकेशन को सिर्फ पृष्ठभूमि नहीं रहने देता, बल्कि उसे एक्शन का हिस्सा बना देता है। सिनेमैटोग्राफी भी फिल्म के स्केल को बढ़ाती है। 3 घंटे 17 मिनट भारी पड़ती है
फिल्म की सबसे बड़ी कमी उसकी लंबाई है। पहला हिस्सा कहानी, किरदार और टकराव को तेजी से स्थापित करता है। इंटरवल तक कई जगह फिल्म काफी मनोरंजक रहती है। लेकिन इंटरवल के बाद कुछ हिस्सों में स्क्रीनप्ले जरूरत से ज्यादा समझाता है और रफ्तार गिरती है। यह वही जगह है जहां फिल्म को थोड़ा कसने की जरूरत थी। ताजा प्रतिक्रियाओं में भी ओवर-एक्सप्लेनिंग और पेसिंग को लेकर यही बात सामने आई है। कुछ दृश्य ऐसे लगते हैं जिन्हें कहानी के लिए जरूरी समझा गया है, लेकिन वे फिल्म की गति को उतना आगे नहीं बढ़ाते। यही वजह है कि करीब 15-20 मिनट की कटौती फिल्म को और प्रभावी बना सकती थी। फिर आखिरी हिस्से में फिल्म दोबारा रफ्तार पकड़ती है और एक्शन के साथ कहानी अपना वजन वापस हासिल करती है। कैसा है डायरेक्शन, टेक्निकली कैसी बनी फिल्म? गुरमीत सिंह ने सबसे मुश्किल काम यह किया है कि मिर्जापुर की ओटीटी वाली पहचान को बड़े पर्दे की भाषा में बदला जाए। इस मामले में वह काफी हद तक सफल रहते हैं। फिल्म में मास एलिवेशन है, लेकिन वह पूरी तरह अपनी मूल दुनिया से बाहर नहीं जाती। बैकग्राउंड स्कोर कई एक्शन और एंट्री सीक्वेंस को जरूरी ताकत देता है। गाने फिल्म का प्रमुख आकर्षण नहीं हैं और उन्हें कहानी पर हावी भी नहीं होने दिया गया है। निर्माण कला और लोकेशन फिल्म की दुनिया को विश्वसनीय बनाए रखते हैं। कैमरा खास तौर पर एक्शन वाले हिस्सों में अच्छा काम करता है। फाइनल वर्डिक्टः फिल्म देखें या नहीं? ‘मिर्जापुर: द मूवी’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह अपने मूल भौकाल को बड़े पर्दे पर ले जाने में कामयाब रहती है। कालीन भैया का ठहराव, गुड्डू का गुस्सा, मुन्ना का पागलपन और बब्बुआ यादव की नई आक्रामकतास इन सबको मिलाकर फिल्म में कई ऐसे पल बनते हैं जो याद रह जाते हैं। लेकिन अच्छी फिल्म और बेहतरीन फिल्म के बीच का फर्क यहां स्क्रीनप्ले की कसावट पैदा करती है। कहानी में दम है, कलाकारों में दम है, संवादों में दम है और क्लाइमैक्स में भी दम है, मगर बीच का हिस्सा उतना धारदार नहीं रह पाता। कुल मिलाकर, ‘मिर्जापुर: द मूवी’ भौकाल की वही पुरानी बोली बोलती है, बस इस बार आवाज बड़े पर्दे की है। फिल्म में बारूद खूब है, किरदार भी अपने रंग में हैं, लेकिन अगर कहानी की रफ्तार पर थोड़ी और कैंची चलती तो यह भौकाल और ज्यादा दमदार हो सकता था।

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फिल्म की सबसे बड़ी कमी उसकी लंबाई है। पहला हिस्सा कहानी, किरदार और टकराव को तेजी से स्थापित करता है। इंटरवल तक कई जगह फिल्म काफी मनोरंजक रहती है। लेकिन इंटरवल के बाद कुछ हिस्सों में स्क्रीनप्ले जरूरत से ज्यादा समझाता है और रफ्तार गिरती है। यह वही जगह है जहां फिल्म को थोड़ा कसने की जरूरत थी। ताजा प्रतिक्रियाओं में भी ओवर-एक्सप्लेनिंग और पेसिंग को लेकर यही बात सामने आई है। कुछ दृश्य ऐसे लगते हैं जिन्हें कहानी के लिए जरूरी समझा गया है, लेकिन वे फिल्म की गति को उतना आगे नहीं बढ़ाते। यही वजह है कि करीब 15-20 मिनट की कटौती फिल्म को और प्रभावी बना सकती थी। फिर आखिरी हिस्से में फिल्म दोबारा रफ्तार पकड़ती है और एक्शन के साथ कहानी अपना वजन वापस हासिल करती है। कैसा है डायरेक्शन, टेक्निकली कैसी बनी फिल्म? गुरमीत सिंह ने सबसे मुश्किल काम यह किया है कि मिर्जापुर की ओटीटी वाली पहचान को बड़े पर्दे की भाषा में बदला जाए। इस मामले में वह काफी हद तक सफल रहते हैं। फिल्म में मास एलिवेशन है, लेकिन वह पूरी तरह अपनी मूल दुनिया से बाहर नहीं जाती। बैकग्राउंड स्कोर कई एक्शन और एंट्री सीक्वेंस को जरूरी ताकत देता है। गाने फिल्म का प्रमुख आकर्षण नहीं हैं और उन्हें कहानी पर हावी भी नहीं होने दिया गया है। निर्माण कला और लोकेशन फिल्म की दुनिया को विश्वसनीय बनाए रखते हैं। कैमरा खास तौर पर एक्शन वाले हिस्सों में अच्छा काम करता है। फाइनल वर्डिक्टः फिल्म देखें या नहीं? ‘मिर्जापुर: द मूवी’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह अपने मूल भौकाल को बड़े पर्दे पर ले जाने में कामयाब रहती है। कालीन भैया का ठहराव, गुड्डू का गुस्सा, मुन्ना का पागलपन और बब्बुआ यादव की नई आक्रामकतास इन सबको मिलाकर फिल्म में कई ऐसे पल बनते हैं जो याद रह जाते हैं। लेकिन अच्छी फिल्म और बेहतरीन फिल्म के बीच का फर्क यहां स्क्रीनप्ले की कसावट पैदा करती है। कहानी में दम है, कलाकारों में दम है, संवादों में दम है और क्लाइमैक्स में भी दम है, मगर बीच का हिस्सा उतना धारदार नहीं रह पाता। कुल मिलाकर, ‘मिर्जापुर: द मूवी’ भौकाल की वही पुरानी बोली बोलती है, बस इस बार आवाज बड़े पर्दे की है। फिल्म में बारूद खूब है, किरदार भी अपने रंग में हैं, लेकिन अगर कहानी की रफ्तार पर थोड़ी और कैंची चलती तो यह भौकाल और ज्यादा दमदार हो सकता था।

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