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लीजिए, आज से मोटापे की दवा का पेटेंट खत्म, अब 500 रुपए तक भी मिल जाएगी, इस गेम चेंजिंग के क्या मायने

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Weight Loss Drug under 500 : वजन कम करने वाली दवा के नाम से मशहूर ओजेंपिक और वीगोवी का पेटेंट आज खत्म हो गया. इसका सीधा सा मतलब है कि महीने के 10 हजार रुपये वाली दवा अब 500 से हजार रुपये में मिलेगी. भारत में हर 4 वयस्क में से एक मोटापे का शिकार है.मोटापा कई बीमारियों की जड़ है. इसलिए यह कदम भारत के लिए गेम चेंजिंग साबित हो सकता है और इसके दूरगामी असर होने की संभावना है.

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वेट लॉस दवा का पेंटेट खत्म होने से कीमत में भारी गिरावट.

वर्तमान में वेट लॉस यानी मोटापे को खत्म करने वाली दवा ओजेंपिक और वीगोभी की कीमत महीने का 10 हजार के करीब है. इस इंजेक्शन को सप्ताह में एक दिन लगाना होता है. इस दवा के कारण शरीर के अंदर संतुष्टि वाला हार्मोन जागृत हो जाता है और लोगों को भूख कम लगती है. इस कारण वजन कम होना शुरू हो जाता है. वर्तमान में भारत में 10 हजार रुपये की दवा अधिकांश लोगों की क्षमता से बाहर है. लेकिन जिस विदेशी कंपनी नोवो नॉर्डिस्क ने यह दवा बनाई थी, उसका पेटेंट भारत, चीन, कनाडा, ब्राजील सहित कई देशों में खत्म हो गया है. इसलिए अब यह दवा 500 रुपये के आसपास मिलने लगेगी. मोटापे की दवा की कीमत कम होने के दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे क्योंकि भारत में डायबिटीज और मोटापे से पीड़ित लोगों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है.

आम लोगों को बड़ी राहत
मारेन्गो एशिया अस्पताल गुरुग्राम में डायबिटीज, ओबेसिटी एंड मेटोबोलिज्म डिसॉर्डर के क्लिनिकल डायरेक्टर डॉ. पारस अग्रवाल कहते हैं कि वेट लॉस की दवा का सस्ता होना भारत जैसे देशों के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है. भारत में मोटापा तेजी से बढ़ता जा रहा है और मोटापा कई बीमारियों का गेटवे है. इतना ही नहीं हम डायबिटीज कैपिटल ऑफ वर्ल्ड कहलाते हैं. करीब 10 करोड़ लोगों को डायबिटीज है. अच्छी बात यह है कि यह दवा दोनों बीमारियों के लिए जादुई असर वाली है. इसलिए मैं सरकार को तहे दिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूं कि उसने इस दवा के पेटेंट अधिकार को इतनी जल्दी खत्म करा दिया. इससे बहुत बड़ी राहत मिली है. अब आम लोगों के लिए मोटापे को कंट्रोल करना बहुत आसान हो जाएगा.

कैसे गेमचेंजर होगा
डॉ. पारस अग्रवाल ने कहा कि भारत में महीने का 10 हजार रुपये दवा पर खर्च करना बहुत बड़ी बात है. उसमें भी लोग अब तक यह नहीं समझते हैं कि मोटापा एक बीमारी है. ऐसे में अधिकांश लोग मोटापा घटाने के लिए दवा नहीं कराते हैं. अब जब इस दवा की कीमत घट जाएगी तो आम लोगों में जागरुकता आएगी. वे लोग भी इस दवा को लेने के लिए डॉक्टर के पास आएंगे. अभी हमारे पास जो मोटापे का इलाज कराने आते हैं, उनमें से कुछ के मन में तो दवा की कीमत को लेकर सवाल रहता ही है. कुछ लोग एक-दो महीना तो इलाज करा लेते हैं लेकिन उसके बाद छोड़ देते हैं. ऐसे में सस्ती दवा हमारे लिए गेमचेंजर साबित होगा. भारत में करीब 40 प्रतिशत वयस्क मोटापे से ग्रस्त हैं. इसलिए यह समझा जा सकता है कि दवा की कीमत कम होने से इसका क्या प्रभाव पड़ेगा.

अब कितनी होगी कीमत
वर्तमान में ओजेंपिक या वीगोभी का इंजेक्शन लगाने का खर्च एक महीने में 5 से 20 हजार रुपये तक है. महीने का खर्च दवा की डोज पर निर्भर है. अगर किसी व्यक्ति को हाई डोज वाला इंजेक्शन लग रहा है तो उसके लिए ज्यादा पैसा खर्च करना होता है. कुछ लोगों को लो डोज की जरूरत होती है. इसलिए 2 से 5 हजार महीने में भी काम चल जाता है. इस इंजेक्शन को सप्ताह में एक दिन लगाना होता है. लेकिन यह डॉक्टर तय करते हैं कि कितने दिनों तक इलाज चलेगा. यह कम से कम 6 महीने तक चलता है. इस तरह देखें तो पेटेंट हटने के बाद मार्केट में दवा कंपनियों में कंपटीशन बढेगा और सब सस्ती दवा बनाने में आगे निकलने की कोशिश करेंगे. अब तक 40 कंपनियां इस दवा को बनाने में आगे आ चुकी है. पेटेंट हटने के लिए 80 से 90 प्रतिशत तक दवा के दाम कम हो जाएंगे. ऐसी स्थिति में एक महीना का खर्च 500 रुपये भी हो सकता है.

जेनरिक दवा बनाने में भारत को महारथ
भारत को जेनरिक दवा बनाने में महारथ हासिल है. भारत पहले से ही 60 हजार ब्रांड के नाम से जेनरिक दवाइयां बनाता है. जेनरिक दवा बनाने में दुनिया के बाजारों में भारत की धाक है. हम 200 से अधिक देशों में जेनरिक दवाइयों की सप्लाई करते हैं. भारत विश्व का 20 प्रतिशत जेनरिक दवा बनाता है. इसलिए भारत को फार्मेसी ऑफ वर्ल्ड भी कहा जाता है. दो दशक पहले भारत की दवा कंपनियों ने एचआईवी एड्स के लिए जेनरिक दवा बनाई थी. इस दवा ने पूरे अफ्रीका में एड्स को मिटाने में क्रांति लाई थी. भारत 30.46 अरब डॉलर का जेनरिक दवा निर्यात करता है. भारत में बनी वेट लॉस की जेनरिक दवा भी दुनिया के बाजारों में जाएगी. इसलिए दवा का पेटेंट हटने का फायदा सिर्फ भारत के लोगों को ही नहीं मिलेगा बल्कि पूरी दुनिया को इसका पायदा होगा.

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Lakshmi Narayan

18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, समाज, …और पढ़ें

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वेट लॉस दवा का पेंटेट खत्म होने से कीमत में भारी गिरावट.

वर्तमान में वेट लॉस यानी मोटापे को खत्म करने वाली दवा ओजेंपिक और वीगोभी की कीमत महीने का 10 हजार के करीब है. इस इंजेक्शन को सप्ताह में एक दिन लगाना होता है. इस दवा के कारण शरीर के अंदर संतुष्टि वाला हार्मोन जागृत हो जाता है और लोगों को भूख कम लगती है. इस कारण वजन कम होना शुरू हो जाता है. वर्तमान में भारत में 10 हजार रुपये की दवा अधिकांश लोगों की क्षमता से बाहर है. लेकिन जिस विदेशी कंपनी नोवो नॉर्डिस्क ने यह दवा बनाई थी, उसका पेटेंट भारत, चीन, कनाडा, ब्राजील सहित कई देशों में खत्म हो गया है. इसलिए अब यह दवा 500 रुपये के आसपास मिलने लगेगी. मोटापे की दवा की कीमत कम होने के दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे क्योंकि भारत में डायबिटीज और मोटापे से पीड़ित लोगों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है.

आम लोगों को बड़ी राहत
मारेन्गो एशिया अस्पताल गुरुग्राम में डायबिटीज, ओबेसिटी एंड मेटोबोलिज्म डिसॉर्डर के क्लिनिकल डायरेक्टर डॉ. पारस अग्रवाल कहते हैं कि वेट लॉस की दवा का सस्ता होना भारत जैसे देशों के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है. भारत में मोटापा तेजी से बढ़ता जा रहा है और मोटापा कई बीमारियों का गेटवे है. इतना ही नहीं हम डायबिटीज कैपिटल ऑफ वर्ल्ड कहलाते हैं. करीब 10 करोड़ लोगों को डायबिटीज है. अच्छी बात यह है कि यह दवा दोनों बीमारियों के लिए जादुई असर वाली है. इसलिए मैं सरकार को तहे दिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूं कि उसने इस दवा के पेटेंट अधिकार को इतनी जल्दी खत्म करा दिया. इससे बहुत बड़ी राहत मिली है. अब आम लोगों के लिए मोटापे को कंट्रोल करना बहुत आसान हो जाएगा.

कैसे गेमचेंजर होगा
डॉ. पारस अग्रवाल ने कहा कि भारत में महीने का 10 हजार रुपये दवा पर खर्च करना बहुत बड़ी बात है. उसमें भी लोग अब तक यह नहीं समझते हैं कि मोटापा एक बीमारी है. ऐसे में अधिकांश लोग मोटापा घटाने के लिए दवा नहीं कराते हैं. अब जब इस दवा की कीमत घट जाएगी तो आम लोगों में जागरुकता आएगी. वे लोग भी इस दवा को लेने के लिए डॉक्टर के पास आएंगे. अभी हमारे पास जो मोटापे का इलाज कराने आते हैं, उनमें से कुछ के मन में तो दवा की कीमत को लेकर सवाल रहता ही है. कुछ लोग एक-दो महीना तो इलाज करा लेते हैं लेकिन उसके बाद छोड़ देते हैं. ऐसे में सस्ती दवा हमारे लिए गेमचेंजर साबित होगा. भारत में करीब 40 प्रतिशत वयस्क मोटापे से ग्रस्त हैं. इसलिए यह समझा जा सकता है कि दवा की कीमत कम होने से इसका क्या प्रभाव पड़ेगा.

अब कितनी होगी कीमत
वर्तमान में ओजेंपिक या वीगोभी का इंजेक्शन लगाने का खर्च एक महीने में 5 से 20 हजार रुपये तक है. महीने का खर्च दवा की डोज पर निर्भर है. अगर किसी व्यक्ति को हाई डोज वाला इंजेक्शन लग रहा है तो उसके लिए ज्यादा पैसा खर्च करना होता है. कुछ लोगों को लो डोज की जरूरत होती है. इसलिए 2 से 5 हजार महीने में भी काम चल जाता है. इस इंजेक्शन को सप्ताह में एक दिन लगाना होता है. लेकिन यह डॉक्टर तय करते हैं कि कितने दिनों तक इलाज चलेगा. यह कम से कम 6 महीने तक चलता है. इस तरह देखें तो पेटेंट हटने के बाद मार्केट में दवा कंपनियों में कंपटीशन बढेगा और सब सस्ती दवा बनाने में आगे निकलने की कोशिश करेंगे. अब तक 40 कंपनियां इस दवा को बनाने में आगे आ चुकी है. पेटेंट हटने के लिए 80 से 90 प्रतिशत तक दवा के दाम कम हो जाएंगे. ऐसी स्थिति में एक महीना का खर्च 500 रुपये भी हो सकता है.

जेनरिक दवा बनाने में भारत को महारथ
भारत को जेनरिक दवा बनाने में महारथ हासिल है. भारत पहले से ही 60 हजार ब्रांड के नाम से जेनरिक दवाइयां बनाता है. जेनरिक दवा बनाने में दुनिया के बाजारों में भारत की धाक है. हम 200 से अधिक देशों में जेनरिक दवाइयों की सप्लाई करते हैं. भारत विश्व का 20 प्रतिशत जेनरिक दवा बनाता है. इसलिए भारत को फार्मेसी ऑफ वर्ल्ड भी कहा जाता है. दो दशक पहले भारत की दवा कंपनियों ने एचआईवी एड्स के लिए जेनरिक दवा बनाई थी. इस दवा ने पूरे अफ्रीका में एड्स को मिटाने में क्रांति लाई थी. भारत 30.46 अरब डॉलर का जेनरिक दवा निर्यात करता है. भारत में बनी वेट लॉस की जेनरिक दवा भी दुनिया के बाजारों में जाएगी. इसलिए दवा का पेटेंट हटने का फायदा सिर्फ भारत के लोगों को ही नहीं मिलेगा बल्कि पूरी दुनिया को इसका पायदा होगा.

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18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, समाज, …और पढ़ें

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