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लॉकअप तक क्यों पहुंचा नेटफ्लिक्स?:भारत के सबसे बड़े OTT की सबसे बड़ी बेचैनी, दबाव और बदलते बाजार की कहानी

लॉकअप तक क्यों पहुंचा नेटफ्लिक्स?:भारत के सबसे बड़े OTT की सबसे बड़ी बेचैनी, दबाव और बदलते बाजार की कहानी

भारत में नेटफ्लिक्स के पास बड़े सितारे, बड़े बजट और वैश्विक पहचान है। फिर भी वह अमेजन प्राइम, जियोहॉटस्टार और दूसरे ओटीटी प्लेटफॉर्म जैसा सांस्कृतिक प्रभाव नहीं बना पाया। सवाल सिर्फ फ्लॉप शो का नहीं, दर्शकों से जुड़ाव का भी है। जहां दूसरे प्लेटफॉर्म ऐसे किरदार और कहानियां बनाने में सफल रहे जो लोगों की बातचीत का हिस्सा बन गए, वहीं नेटफ्लिक्स के कई चर्चित प्रोजेक्ट रिलीज के कुछ समय बाद भुला दिए गए। अब सवाल यह है कि भारतीय बाजार में नेटफ्लिक्स कहां चूक गया और ‘लॉकअप’ उसके लिए कितना बड़ा इम्तिहान साबित होगा। इसे समझने के लिए हमने डायरेक्टर विवेक शर्मा, लेखक धीरज मिश्रा और ट्रेड एनालिस्ट अतुल मोहन से बातचीत की । नेटफ्लिक्स की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ फ्लॉप शो नहीं, भारतीय दर्शकों से दूरी भी है भारत में नेटफ्लिक्स की आलोचना अक्सर इस बात पर होती है कि उसके कई बड़े प्रोजेक्ट उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाए। लेकिन समस्या सिर्फ फ्लॉप शो या कमजोर व्यूअरशिप की नहीं है। सवाल यह है कि क्या नेटफ्लिक्स भारतीय दर्शकों के साथ वैसा भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव बना पाया है, जैसा उसके प्रतिस्पर्धी प्लेटफॉर्म बना चुके हैं। आज भारतीय मनोरंजन बाजार में सफलता सिर्फ व्यूअरशिप से तय नहीं होती। सफलता तब मानी जाती है जब किरदार लोगों की बातचीत का हिस्सा बन जाएं, संवाद सोशल मीडिया से निकलकर आम बोलचाल तक पहुंच जाएं और दर्शक अगले सीजन का इंतजार करें। यहीं नेटफ्लिक्स संघर्ष करता दिखाई देता है। फिल्म निर्देशक विवेक शर्मा का कहना है कि शुरुआत में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स से उम्मीद थी कि वे नए फिल्ममेकरों, नई कहानियों और अलग कंटेंट के लिए मंच बनेंगे। लेकिन समय के साथ कई प्लेटफॉर्म उसी व्यवस्था का हिस्सा बन गए, जिससे बदलाव की उम्मीद थी। उनके मुताबिक नेटफ्लिक्स ने बड़े सितारों और बड़े बैनरों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया, जबकि नए विचारों और प्रतिभाओं को अपेक्षित जगह नहीं मिली। अमेजन ने किरदार बनाए, नेटफ्लिक्स ने प्रोजेक्ट अगर भारतीय ओटीटी बाजार का सबसे बड़ा विजेता चुना जाए तो अमेजन प्राइम वीडियो आगे दिखाई देता है। वजह सिर्फ अच्छी सीरीज नहीं, बल्कि मजबूत फ्रेंचाइजी का निर्माण है। कालीन भैया, गुड्डू पंडित, श्रीकांत तिवारी, हाथीराम चौधरी और सचिव जी अब सिर्फ किरदार नहीं रहे, बल्कि भारतीय पॉप कल्चर का हिस्सा बन चुके हैं। ऑरमैक्स मीडिया के अनुसार शाहिद कपूर और विजय सेतुपति की ‘फर्जी’ 3.71 करोड़ दर्शकों के साथ भारत की सबसे ज्यादा देखी जाने वाली एसवीओडी सीरीज बनी थी। वहीं ‘मिर्जापुर’ और ‘पंचायत’ आज भी दर्शकों की बातचीत का हिस्सा हैं। ‘मिर्जापुर’ सिर्फ एक सीरीज नहीं है। उस पर फिल्म भी बन रही है। उसके किरदारों की अलग पहचान है और उसकी दुनिया दर्शकों के दिमाग में आज भी जीवित है। विवेक शर्मा कहते हैं कि बड़े कलाकार किसी भी प्रोजेक्ट को शुरुआती चर्चा दिला सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक वही कंटेंट टिकता है जिसमें नई सोच, मजबूत कहानी और याद रह जाने वाले किरदार हों। उनके मुताबिक दर्शक अब सिर्फ स्टार्स नहीं, बल्कि ऐसा कंटेंट चाहते हैं जो उन्हें नया अनुभव दे सके। यही वह क्षेत्र है जहां अमेजन प्राइम और दूसरे प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स से आगे दिखाई देते हैं। बड़े सितारों पर दांव, लेकिन याद क्या रह गया? नेटफ्लिक्स ने पिछले कुछ वर्षों में लगभग हर बड़े कलाकार के साथ काम किया। सैफ अली खान, जयदीप अहलावत, माधुरी दीक्षित, तृप्ति डिमरी, करीना कपूर खान, राजकुमार राव, विजय वर्मा और बॉबी देओल जैसे नाम उसकी रणनीति का हिस्सा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि इन बड़े नामों के बावजूद कितने प्रोजेक्ट लंबे समय तक दर्शकों के बीच टिक पाए। सैफ अली खान के हालिया प्रोजेक्ट ‘कर्तव्य’ और ‘ज्वेल थीफ’ को रिलीज से पहले काफी चर्चा मिली। ट्रेलर लॉन्च हुए, इंटरव्यू हुए और सोशल मीडिया अभियान भी चले। लेकिन रिलीज के बाद वे वैसा सांस्कृतिक प्रभाव नहीं बना सके, जैसी उनके स्तर के प्रोजेक्ट से उम्मीद थी। इसी तरह माधुरी दीक्षित और तृप्ति डिमरी की ‘मां-बहन’ को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा हुई, लेकिन वह कुछ हफ्तों में ठंडी पड़ गई। विवेक शर्मा का कहना है कि समस्या कलाकारों में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो बार-बार सुरक्षित विकल्प चुनती है। उनके मुताबिक हाल के वर्षों में बड़े प्रोजेक्ट्स में बड़े कलाकारों का इस्तेमाल हुआ, लेकिन उन्हें जिस तरह प्रस्तुत किया गया उसमें नवीनता और रचनात्मक गहराई की कमी दिखी। कंटेंट का संकट या विजन का संकट? नेटफ्लिक्स की चुनौतियों को सिर्फ कमजोर प्रोजेक्ट्स तक सीमित नहीं देखा जा सकता। सवाल यह भी है कि क्या प्लेटफॉर्म के पास भारतीय बाजार के लिए स्पष्ट कंटेंट विजन है। विवेक शर्मा का मानना है कि सबसे बड़ी समस्या यही है। उनके मुताबिक कई बार फैसले रचनात्मकता के बजाय रिश्तों, लॉबी और स्थापित समूहों के प्रभाव में लिए जाते हैं। एक ही बैनर या प्रोडक्शन हाउस को बार-बार बड़े प्रोजेक्ट मिलते हैं, जबकि नए लोगों और नए विचारों को पर्याप्त अवसर नहीं मिलते। विवेक शर्मा कहते हैं कि कई ऐसे लोग कंटेंट से जुड़े फैसले ले रहे हैं जिन्होंने खुद रचनात्मक स्तर पर बड़ी सफलता हासिल नहीं की। ऐसे माहौल में नए विचारों और ताजा कंटेंट का आना मुश्किल हो जाता है। उनके मुताबिक नेटफ्लिक्स को गंभीर आत्ममंथन की जरूरत है। उसे तय करना होगा कि वह सिर्फ बड़े नामों का प्लेटफॉर्म बनना चाहता है या नई प्रतिभाओं और नई कहानियों का मंच भी। भारत बदल गया, क्या नेटफ्लिक्स भी बदला? ऑरमैक्स की 2025 रिपोर्ट के अनुसार भारत में ओटीटी दर्शकों की संख्या 60 करोड़ से ज्यादा पहुंच चुकी है। अब यह बाजार सिर्फ महानगरों और अंग्रेजी भाषी दर्शकों तक सीमित नहीं रहा। छोटे शहर, कस्बे, परिवार और क्षेत्रीय दर्शक इसकी सबसे बड़ी ताकत बन चुके हैं। लेखक धीरज मिश्रा का मानना है कि नेटफ्लिक्स आम भारतीय दर्शकों की नब्ज पकड़ने में देर कर गया। उनके मुताबिक शुरुआती दौर में प्लेटफॉर्म के शो तकनीकी रूप से मजबूत थे और महानगरों के दर्शकों को पसंद आए, लेकिन बड़े दर्शक वर्ग से उनका जुड़ाव सीमित रहा। धीरज मिश्रा कहते हैं कि इसी दौरान दूसरे ओटीटी प्लेटफॉर्म ऐसे शो और फिल्में लेकर आए जिनकी कहानियां और किरदार आम भारतीय दर्शकों के ज्यादा करीब थे। इसी वजह से उन्होंने तेजी से अपनी पकड़ मजबूत कर ली। ट्रेड एनालिस्ट अतुल मोहन मानते हैं कि नेटफ्लिक्स की शुरुआती पोजिशनिंग भी उसकी सीमाओं का कारण बनी। शुरुआत से उसने खुद को प्रीमियम प्लेटफॉर्म के रूप में पेश किया। उसकी कीमत दूसरे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स से ज्यादा रही, जबकि भारत प्राइस-सेंसिटिव मार्केट है। अतुल मोहन के मुताबिक अमेजन प्राइम, जियोहॉटस्टार और दूसरे प्लेटफॉर्म कम कीमत में ज्यादा वैल्यू देने में सफल रहे। खासकर ‘पंचायत’ जैसे शो उन दर्शकों तक पहुंचे जिन्होंने खुद को उन कहानियों में देखा। लॉकअप नेटफ्लिक्स को बचाएगा या बेनकाब करेगा? ऐसे समय में नेटफ्लिक्स का ‘लॉकअप’ जैसे रियलिटी फॉर्मेट की ओर बढ़ना दिलचस्प माना जा रहा है। धीरज मिश्रा कहते हैं कि जब एकता कपूर का ‘लॉक अप’ एमएक्स प्लेयर पर आया था, तब उसे अच्छा रिस्पॉन्स मिला था। इसकी बड़ी वजह यह थी कि एमएक्स प्लेयर को आम भारतीय दर्शकों का प्लेटफॉर्म माना जाता था। उनके मुताबिक अगर नेटफ्लिक्स अब इसी दिशा में बढ़ रहा है, तो इसका मतलब है कि वह भारतीय बाजार और बड़े दर्शक वर्ग को बेहतर समझने की कोशिश कर रहा है। साथ ही उसे एकता कपूर जैसे निर्माता का साथ मिल रहा है, जिन्हें दर्शकों की पसंद और सफल कंटेंट की अच्छी समझ रखने वाला प्रोड्यूसर माना जाता है। अगर ‘लॉकअप’ सफल होता है तो यह साबित कर सकता है कि नेटफ्लिक्स अब व्यापक भारतीय दर्शक वर्ग की ओर बढ़ रहा है। लेकिन अगर यह प्रयोग भी उम्मीद के मुताबिक सफल नहीं होता, तो सवाल और गंभीर हो जाएगा कि भारत में ऐसा कौन-सा फॉर्मेट है जिसमें नेटफ्लिक्स वास्तव में दर्शकों की नब्ज पकड़ सकता है। निष्कर्ष भारत में नेटफ्लिक्स की सबसे बड़ी समस्या सिर्फ कंटेंट नहीं, कनेक्शन और कंटेंट विजन की भी है। विवेक शर्मा के मुताबिक प्लेटफॉर्म को नए फिल्ममेकरों, नई प्रतिभाओं और नए विचारों के लिए ज्यादा जगह बनानी होगी। धीरज मिश्रा मानते हैं कि उसे आम भारतीय दर्शकों की पसंद और भावनाओं को बेहतर समझना होगा। वहीं अतुल मोहन के अनुसार उसकी प्रीमियम पोजिशनिंग और महंगी सदस्यता भी उसकी पहुंच सीमित करती रही है। नेटफ्लिक्स के पास पैसा, तकनीक, वैश्विक पहचान और बड़े सितारे हैं। लेकिन भारतीय बाजार में सफलता सिर्फ बड़े नामों से नहीं मिलती। यहां दर्शक ऐसे किरदार और कहानियां चाहता है जिनसे वह जुड़ सके और जो उसकी अपनी दुनिया के करीब महसूस हों। शायद इसी वजह से नेटफ्लिक्स आज ऐसे मोड़ पर है जहां उसे सिर्फ नए शो नहीं, नए नजरिए की भी जरूरत है। सवाल यह नहीं कि नेटफ्लिक्स कंटेंट बना सकता है या नहीं। सवाल यह है कि क्या वह ऐसा कंटेंट बना सकता है जो भारतीय दर्शकों के दिल और यादों में जगह बना सके।

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भारत में नेटफ्लिक्स के पास बड़े सितारे, बड़े बजट और वैश्विक पहचान है। फिर भी वह अमेजन प्राइम, जियोहॉटस्टार और दूसरे ओटीटी प्लेटफॉर्म जैसा सांस्कृतिक प्रभाव नहीं बना पाया। सवाल सिर्फ फ्लॉप शो का नहीं, दर्शकों से जुड़ाव का भी है। जहां दूसरे प्लेटफॉर्म ऐसे किरदार और कहानियां बनाने में सफल रहे जो लोगों की बातचीत का हिस्सा बन गए, वहीं नेटफ्लिक्स के कई चर्चित प्रोजेक्ट रिलीज के कुछ समय बाद भुला दिए गए। अब सवाल यह है कि भारतीय बाजार में नेटफ्लिक्स कहां चूक गया और ‘लॉकअप’ उसके लिए कितना बड़ा इम्तिहान साबित होगा। इसे समझने के लिए हमने डायरेक्टर विवेक शर्मा, लेखक धीरज मिश्रा और ट्रेड एनालिस्ट अतुल मोहन से बातचीत की । नेटफ्लिक्स की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ फ्लॉप शो नहीं, भारतीय दर्शकों से दूरी भी है भारत में नेटफ्लिक्स की आलोचना अक्सर इस बात पर होती है कि उसके कई बड़े प्रोजेक्ट उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाए। लेकिन समस्या सिर्फ फ्लॉप शो या कमजोर व्यूअरशिप की नहीं है। सवाल यह है कि क्या नेटफ्लिक्स भारतीय दर्शकों के साथ वैसा भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव बना पाया है, जैसा उसके प्रतिस्पर्धी प्लेटफॉर्म बना चुके हैं। आज भारतीय मनोरंजन बाजार में सफलता सिर्फ व्यूअरशिप से तय नहीं होती। सफलता तब मानी जाती है जब किरदार लोगों की बातचीत का हिस्सा बन जाएं, संवाद सोशल मीडिया से निकलकर आम बोलचाल तक पहुंच जाएं और दर्शक अगले सीजन का इंतजार करें। यहीं नेटफ्लिक्स संघर्ष करता दिखाई देता है। फिल्म निर्देशक विवेक शर्मा का कहना है कि शुरुआत में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स से उम्मीद थी कि वे नए फिल्ममेकरों, नई कहानियों और अलग कंटेंट के लिए मंच बनेंगे। लेकिन समय के साथ कई प्लेटफॉर्म उसी व्यवस्था का हिस्सा बन गए, जिससे बदलाव की उम्मीद थी। उनके मुताबिक नेटफ्लिक्स ने बड़े सितारों और बड़े बैनरों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया, जबकि नए विचारों और प्रतिभाओं को अपेक्षित जगह नहीं मिली। अमेजन ने किरदार बनाए, नेटफ्लिक्स ने प्रोजेक्ट अगर भारतीय ओटीटी बाजार का सबसे बड़ा विजेता चुना जाए तो अमेजन प्राइम वीडियो आगे दिखाई देता है। वजह सिर्फ अच्छी सीरीज नहीं, बल्कि मजबूत फ्रेंचाइजी का निर्माण है। कालीन भैया, गुड्डू पंडित, श्रीकांत तिवारी, हाथीराम चौधरी और सचिव जी अब सिर्फ किरदार नहीं रहे, बल्कि भारतीय पॉप कल्चर का हिस्सा बन चुके हैं। ऑरमैक्स मीडिया के अनुसार शाहिद कपूर और विजय सेतुपति की ‘फर्जी’ 3.71 करोड़ दर्शकों के साथ भारत की सबसे ज्यादा देखी जाने वाली एसवीओडी सीरीज बनी थी। वहीं ‘मिर्जापुर’ और ‘पंचायत’ आज भी दर्शकों की बातचीत का हिस्सा हैं। ‘मिर्जापुर’ सिर्फ एक सीरीज नहीं है। उस पर फिल्म भी बन रही है। उसके किरदारों की अलग पहचान है और उसकी दुनिया दर्शकों के दिमाग में आज भी जीवित है। विवेक शर्मा कहते हैं कि बड़े कलाकार किसी भी प्रोजेक्ट को शुरुआती चर्चा दिला सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक वही कंटेंट टिकता है जिसमें नई सोच, मजबूत कहानी और याद रह जाने वाले किरदार हों। उनके मुताबिक दर्शक अब सिर्फ स्टार्स नहीं, बल्कि ऐसा कंटेंट चाहते हैं जो उन्हें नया अनुभव दे सके। यही वह क्षेत्र है जहां अमेजन प्राइम और दूसरे प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स से आगे दिखाई देते हैं। बड़े सितारों पर दांव, लेकिन याद क्या रह गया? नेटफ्लिक्स ने पिछले कुछ वर्षों में लगभग हर बड़े कलाकार के साथ काम किया। सैफ अली खान, जयदीप अहलावत, माधुरी दीक्षित, तृप्ति डिमरी, करीना कपूर खान, राजकुमार राव, विजय वर्मा और बॉबी देओल जैसे नाम उसकी रणनीति का हिस्सा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि इन बड़े नामों के बावजूद कितने प्रोजेक्ट लंबे समय तक दर्शकों के बीच टिक पाए। सैफ अली खान के हालिया प्रोजेक्ट ‘कर्तव्य’ और ‘ज्वेल थीफ’ को रिलीज से पहले काफी चर्चा मिली। ट्रेलर लॉन्च हुए, इंटरव्यू हुए और सोशल मीडिया अभियान भी चले। लेकिन रिलीज के बाद वे वैसा सांस्कृतिक प्रभाव नहीं बना सके, जैसी उनके स्तर के प्रोजेक्ट से उम्मीद थी। इसी तरह माधुरी दीक्षित और तृप्ति डिमरी की ‘मां-बहन’ को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा हुई, लेकिन वह कुछ हफ्तों में ठंडी पड़ गई। विवेक शर्मा का कहना है कि समस्या कलाकारों में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो बार-बार सुरक्षित विकल्प चुनती है। उनके मुताबिक हाल के वर्षों में बड़े प्रोजेक्ट्स में बड़े कलाकारों का इस्तेमाल हुआ, लेकिन उन्हें जिस तरह प्रस्तुत किया गया उसमें नवीनता और रचनात्मक गहराई की कमी दिखी। कंटेंट का संकट या विजन का संकट? नेटफ्लिक्स की चुनौतियों को सिर्फ कमजोर प्रोजेक्ट्स तक सीमित नहीं देखा जा सकता। सवाल यह भी है कि क्या प्लेटफॉर्म के पास भारतीय बाजार के लिए स्पष्ट कंटेंट विजन है। विवेक शर्मा का मानना है कि सबसे बड़ी समस्या यही है। उनके मुताबिक कई बार फैसले रचनात्मकता के बजाय रिश्तों, लॉबी और स्थापित समूहों के प्रभाव में लिए जाते हैं। एक ही बैनर या प्रोडक्शन हाउस को बार-बार बड़े प्रोजेक्ट मिलते हैं, जबकि नए लोगों और नए विचारों को पर्याप्त अवसर नहीं मिलते। विवेक शर्मा कहते हैं कि कई ऐसे लोग कंटेंट से जुड़े फैसले ले रहे हैं जिन्होंने खुद रचनात्मक स्तर पर बड़ी सफलता हासिल नहीं की। ऐसे माहौल में नए विचारों और ताजा कंटेंट का आना मुश्किल हो जाता है। उनके मुताबिक नेटफ्लिक्स को गंभीर आत्ममंथन की जरूरत है। उसे तय करना होगा कि वह सिर्फ बड़े नामों का प्लेटफॉर्म बनना चाहता है या नई प्रतिभाओं और नई कहानियों का मंच भी। भारत बदल गया, क्या नेटफ्लिक्स भी बदला? ऑरमैक्स की 2025 रिपोर्ट के अनुसार भारत में ओटीटी दर्शकों की संख्या 60 करोड़ से ज्यादा पहुंच चुकी है। अब यह बाजार सिर्फ महानगरों और अंग्रेजी भाषी दर्शकों तक सीमित नहीं रहा। छोटे शहर, कस्बे, परिवार और क्षेत्रीय दर्शक इसकी सबसे बड़ी ताकत बन चुके हैं। लेखक धीरज मिश्रा का मानना है कि नेटफ्लिक्स आम भारतीय दर्शकों की नब्ज पकड़ने में देर कर गया। उनके मुताबिक शुरुआती दौर में प्लेटफॉर्म के शो तकनीकी रूप से मजबूत थे और महानगरों के दर्शकों को पसंद आए, लेकिन बड़े दर्शक वर्ग से उनका जुड़ाव सीमित रहा। धीरज मिश्रा कहते हैं कि इसी दौरान दूसरे ओटीटी प्लेटफॉर्म ऐसे शो और फिल्में लेकर आए जिनकी कहानियां और किरदार आम भारतीय दर्शकों के ज्यादा करीब थे। इसी वजह से उन्होंने तेजी से अपनी पकड़ मजबूत कर ली। ट्रेड एनालिस्ट अतुल मोहन मानते हैं कि नेटफ्लिक्स की शुरुआती पोजिशनिंग भी उसकी सीमाओं का कारण बनी। शुरुआत से उसने खुद को प्रीमियम प्लेटफॉर्म के रूप में पेश किया। उसकी कीमत दूसरे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स से ज्यादा रही, जबकि भारत प्राइस-सेंसिटिव मार्केट है। अतुल मोहन के मुताबिक अमेजन प्राइम, जियोहॉटस्टार और दूसरे प्लेटफॉर्म कम कीमत में ज्यादा वैल्यू देने में सफल रहे। खासकर ‘पंचायत’ जैसे शो उन दर्शकों तक पहुंचे जिन्होंने खुद को उन कहानियों में देखा। लॉकअप नेटफ्लिक्स को बचाएगा या बेनकाब करेगा? ऐसे समय में नेटफ्लिक्स का ‘लॉकअप’ जैसे रियलिटी फॉर्मेट की ओर बढ़ना दिलचस्प माना जा रहा है। धीरज मिश्रा कहते हैं कि जब एकता कपूर का ‘लॉक अप’ एमएक्स प्लेयर पर आया था, तब उसे अच्छा रिस्पॉन्स मिला था। इसकी बड़ी वजह यह थी कि एमएक्स प्लेयर को आम भारतीय दर्शकों का प्लेटफॉर्म माना जाता था। उनके मुताबिक अगर नेटफ्लिक्स अब इसी दिशा में बढ़ रहा है, तो इसका मतलब है कि वह भारतीय बाजार और बड़े दर्शक वर्ग को बेहतर समझने की कोशिश कर रहा है। साथ ही उसे एकता कपूर जैसे निर्माता का साथ मिल रहा है, जिन्हें दर्शकों की पसंद और सफल कंटेंट की अच्छी समझ रखने वाला प्रोड्यूसर माना जाता है। अगर ‘लॉकअप’ सफल होता है तो यह साबित कर सकता है कि नेटफ्लिक्स अब व्यापक भारतीय दर्शक वर्ग की ओर बढ़ रहा है। लेकिन अगर यह प्रयोग भी उम्मीद के मुताबिक सफल नहीं होता, तो सवाल और गंभीर हो जाएगा कि भारत में ऐसा कौन-सा फॉर्मेट है जिसमें नेटफ्लिक्स वास्तव में दर्शकों की नब्ज पकड़ सकता है। निष्कर्ष भारत में नेटफ्लिक्स की सबसे बड़ी समस्या सिर्फ कंटेंट नहीं, कनेक्शन और कंटेंट विजन की भी है। विवेक शर्मा के मुताबिक प्लेटफॉर्म को नए फिल्ममेकरों, नई प्रतिभाओं और नए विचारों के लिए ज्यादा जगह बनानी होगी। धीरज मिश्रा मानते हैं कि उसे आम भारतीय दर्शकों की पसंद और भावनाओं को बेहतर समझना होगा। वहीं अतुल मोहन के अनुसार उसकी प्रीमियम पोजिशनिंग और महंगी सदस्यता भी उसकी पहुंच सीमित करती रही है। नेटफ्लिक्स के पास पैसा, तकनीक, वैश्विक पहचान और बड़े सितारे हैं। लेकिन भारतीय बाजार में सफलता सिर्फ बड़े नामों से नहीं मिलती। यहां दर्शक ऐसे किरदार और कहानियां चाहता है जिनसे वह जुड़ सके और जो उसकी अपनी दुनिया के करीब महसूस हों। शायद इसी वजह से नेटफ्लिक्स आज ऐसे मोड़ पर है जहां उसे सिर्फ नए शो नहीं, नए नजरिए की भी जरूरत है। सवाल यह नहीं कि नेटफ्लिक्स कंटेंट बना सकता है या नहीं। सवाल यह है कि क्या वह ऐसा कंटेंट बना सकता है जो भारतीय दर्शकों के दिल और यादों में जगह बना सके।

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