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सतर्क रहें, नमी वाली गर्मी नया खतरा:मध्यम तापमान में लू भी संभव, 80 साल से ज्यादा के डेटा का विश्लेषण

सतर्क रहें, नमी वाली गर्मी नया खतरा:मध्यम तापमान में लू भी संभव, 80 साल से ज्यादा के डेटा का विश्लेषण

भारत में ‘नमी वाली गर्मी’ जलवायु परिवर्तन का सबसे खतरनाक रूप बनती जा रही है। यह तेज तापमान और ज्यादा नमी का ऐसा गठजोड़ है, जिसमें शरीर पसीने के जरिए खुद को ठंडा नहीं कर पाता। जर्नल क्लाइमेट डायनैमिक्स में छपी नई स्टडी के मुताबिक केरल में इसका सबसे ज्यादा खतरा है। भारत में अब तक हीटवेव की पहचान ज्यादातर तापमान की सीमा से होती रही है, लेकिन स्टडी कहती है कि सिर्फ तापमान से असली खतरा नहीं समझ आता। ज्यादा नमी में पसीना जल्दी नहीं सूखता, शरीर का कूलिंग सिस्टम फेल होने लगता है, कोर बॉडी टेम्परेचर बढ़ता है और कुछ मामलों में कुछ देर में हीटस्ट्रोक तक हो सकता है। ऐसे में ज्यादा नमी में मध्यम तापमान भी जानलेवा बन सकता है। यूके की यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के अक्षय देओरस के नेतृत्व में हुई रिसर्च में 80 साल से ज्यादा के मौसम डेटा का विश्लेषण किया गया। खतरे की टाइमिंग और जगह तय करने में दक्षिण-पश्चिम मानसून की बड़ी भूमिका है। देओरस के मुताबिक मानसून के पैटर्न को 4 हफ्ते पहले तक अनुमान लगाया जा जा सकता है, इसलिए लोगों को पहले से चेतावनी देकर तैयारी का मौका मिल सकता है। केरल में अब दिन के साथ रातें भी गर्म हो रही हैं केरल में अब दिन गर्म होने के साथ रातें भी गर्म हो रही हैं। इससे शरीर को रिकवरी का समय कम मिलता है। शहरों में गर्मी ज्यादा देर तक फंस रही है और समुद्री हवाएं भी पहले जैसी नहीं रहीं। इससे हीट स्ट्रेस बढ़ रहा है। ऐसे में अगर तापमान हीटवेव की मान्य सीमा से नीचे है, फिर भी लोगों को गंभीर परेशानी हो रही है। तापमान नहीं, ‘वेट-बल्ब’ ज्यादा सही पैमाना कई वैज्ञानिक वेट-बल्ब तापमान को भरोसेमंद मानते हैं। यह गर्मी और नमी दोनों को जोड़कर खतरा बताता है। वेट-बल्ब तापमान 35° सेल्सियस हो जाए, तो छाया में बैठा स्वस्थ इंसान भी 6 घंटे में खतरे में आ सकता है। क्योंकि ऐसे में शरीर खुद को ठंडा करने में पूरी तरह असमर्थ हो जाता है। बारिश में उत्तर भारत में रहता है ज्यादा जोखिम जब मानसून अपने ‘सक्रिय चरण’ में होता है, तो मध्य और उत्तरी भारत में भारी बारिश होती है। इस दौरान हवा में नमी (उमस) बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। अध्ययन कहता है कि इस स्थिति में उत्तरी भारत में नमी वाले लू चलने की आशंका सामान्य से 125% तक बढ़ जाती है।
अध्ययन के अनुसार, घातक नमी वाली गर्मी के लिए मानसून की आंतरिक हलचल जिम्मेदार है। इससे बारिश रुकने पर भी खतरा बना रहता है। ‘ब्रेक’ मानसून में प्रायद्वीपीय भारत में बढ़ जाता है खतरा जब मानसून ‘ब्रेक फेज’ में जाता है, तो बारिश रुक जाती है और बादल छंट जाते हैं, जिससे सूरज की सीधी गर्मी बढ़ती है। बारिश तो रुक जाती है, लेकिन हवा में मौजूद नमी गायब नहीं होती, वह वहीं टिकी रहती है। यह वह समय होता है जब केरल और दक्षिण भारत के अन्य राज्य सबसे अधिक असुरक्षित हो जाते हैं। इन्हें ज्यादा खतरा – बिना कूलिंग सुविधा वाले परिवार।
– बुजुर्ग, जिनके घरों में वेंटिलेशन कम है।
– बाहर काम करने वाले मजदूर।

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भारत में ‘नमी वाली गर्मी’ जलवायु परिवर्तन का सबसे खतरनाक रूप बनती जा रही है। यह तेज तापमान और ज्यादा नमी का ऐसा गठजोड़ है, जिसमें शरीर पसीने के जरिए खुद को ठंडा नहीं कर पाता। जर्नल क्लाइमेट डायनैमिक्स में छपी नई स्टडी के मुताबिक केरल में इसका सबसे ज्यादा खतरा है। भारत में अब तक हीटवेव की पहचान ज्यादातर तापमान की सीमा से होती रही है, लेकिन स्टडी कहती है कि सिर्फ तापमान से असली खतरा नहीं समझ आता। ज्यादा नमी में पसीना जल्दी नहीं सूखता, शरीर का कूलिंग सिस्टम फेल होने लगता है, कोर बॉडी टेम्परेचर बढ़ता है और कुछ मामलों में कुछ देर में हीटस्ट्रोक तक हो सकता है। ऐसे में ज्यादा नमी में मध्यम तापमान भी जानलेवा बन सकता है। यूके की यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के अक्षय देओरस के नेतृत्व में हुई रिसर्च में 80 साल से ज्यादा के मौसम डेटा का विश्लेषण किया गया। खतरे की टाइमिंग और जगह तय करने में दक्षिण-पश्चिम मानसून की बड़ी भूमिका है। देओरस के मुताबिक मानसून के पैटर्न को 4 हफ्ते पहले तक अनुमान लगाया जा जा सकता है, इसलिए लोगों को पहले से चेतावनी देकर तैयारी का मौका मिल सकता है। केरल में अब दिन के साथ रातें भी गर्म हो रही हैं केरल में अब दिन गर्म होने के साथ रातें भी गर्म हो रही हैं। इससे शरीर को रिकवरी का समय कम मिलता है। शहरों में गर्मी ज्यादा देर तक फंस रही है और समुद्री हवाएं भी पहले जैसी नहीं रहीं। इससे हीट स्ट्रेस बढ़ रहा है। ऐसे में अगर तापमान हीटवेव की मान्य सीमा से नीचे है, फिर भी लोगों को गंभीर परेशानी हो रही है। तापमान नहीं, ‘वेट-बल्ब’ ज्यादा सही पैमाना कई वैज्ञानिक वेट-बल्ब तापमान को भरोसेमंद मानते हैं। यह गर्मी और नमी दोनों को जोड़कर खतरा बताता है। वेट-बल्ब तापमान 35° सेल्सियस हो जाए, तो छाया में बैठा स्वस्थ इंसान भी 6 घंटे में खतरे में आ सकता है। क्योंकि ऐसे में शरीर खुद को ठंडा करने में पूरी तरह असमर्थ हो जाता है। बारिश में उत्तर भारत में रहता है ज्यादा जोखिम जब मानसून अपने ‘सक्रिय चरण’ में होता है, तो मध्य और उत्तरी भारत में भारी बारिश होती है। इस दौरान हवा में नमी (उमस) बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। अध्ययन कहता है कि इस स्थिति में उत्तरी भारत में नमी वाले लू चलने की आशंका सामान्य से 125% तक बढ़ जाती है।
अध्ययन के अनुसार, घातक नमी वाली गर्मी के लिए मानसून की आंतरिक हलचल जिम्मेदार है। इससे बारिश रुकने पर भी खतरा बना रहता है। ‘ब्रेक’ मानसून में प्रायद्वीपीय भारत में बढ़ जाता है खतरा जब मानसून ‘ब्रेक फेज’ में जाता है, तो बारिश रुक जाती है और बादल छंट जाते हैं, जिससे सूरज की सीधी गर्मी बढ़ती है। बारिश तो रुक जाती है, लेकिन हवा में मौजूद नमी गायब नहीं होती, वह वहीं टिकी रहती है। यह वह समय होता है जब केरल और दक्षिण भारत के अन्य राज्य सबसे अधिक असुरक्षित हो जाते हैं। इन्हें ज्यादा खतरा – बिना कूलिंग सुविधा वाले परिवार।
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