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सरकार बोली- जनहित याचिका का कॉन्सेप्ट खत्म करना चाहिए:पुराना दौर गया, अब कोर्ट तक पहुंच आसान; SC बोला- हम PIL मामलों पर खुद सतर्क

सरकार बोली- जनहित याचिका का कॉन्सेप्ट खत्म करना चाहिए:पुराना दौर गया, अब कोर्ट तक पहुंच आसान; SC बोला- हम PIL मामलों पर खुद सतर्क

केरल के सबरीमाला मामले पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने जनहित याचिकाओं (PIL) की उपयोगिता पर सवाल उठाया। कोर्ट में दायर लिखित दलीलों में सरकार ने कहा- जनहित याचिका को न सिर्फ परिभाषित, बल्कि पूरी तरह से खत्म करने का समय आ गया है। सरकार ने कहा- PIL कॉन्सेप्ट एक ऐसे दौर में बना था, जिसमें एक बड़ी आबादी गरीबी, निरक्षरता, कानूनी मदद जैसे अन्य अभाव में अदालतों तक नहीं पहुंच पाते थे। आज के दौर में टेक्नोलॉजी और ई-फाइलिंग जैसी सुविधाएं हैं जिससे कोर्ट तक पहुंच आसान हुई है। अब तो एक लेटर भी कोर्ट तक सीधे पहुंच जाता है। इस पर भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा- अदालतें खुद PIL पर सुनवाई करने में सतर्क रहती हैं। 2006 से लेकर 2026 तक, दो दशकों में स्थिति बदल गई है। नोटिस तभी जारी किए जाते हैं जब उनमें कोई ठोस आधार हो। कोर्ट ने कहा- हमारे पास अंधविश्वास तय करने का अधिकार सबरीमाला सहित अन्य धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ भेदभाद मामले में आज लगातार तीसरे दिन सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बेंच सुनवाई करेगी। बुधवार को करीब 5 घंटे चली सुनवाई में कोर्ट ने कहा कि किसी धर्म में कौन सी प्रथा अंधविश्वास है, यह तय करने का अधिकार उसके पास है। दरअसल, केंद्र ने दलील दी थी कि धर्मनिरपेक्ष अदालत इस मुद्दे का फैसला नहीं कर सकती, क्योंकि जज कानून के विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के नहीं। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, यह काम विधायिका का है कि वह कानून बनाए। काला जादू और ऐसी प्रथाओं को रोकने के लिए कानून ऐसे ही बनाए गए हैं।’ जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने पूछा, कोई प्रथा जादू टोना से जुड़ी हो, तो क्या उसे अंधविश्वास नहीं माना जाएगा? विधायिका चुप है तो क्या अदालत सार्वजनिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए रोक के निर्देश नहीं दे सकती? केंद्र बोला- व्यभिचार-समलैंगिक संबंधों पर SC के फैसले ठीक नहीं सुनवाई के दौरान मेहता ने कहा है कि व्यभिचार और सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाले फैसले सही कानून नहीं हैं। ये फैसले ‘संवैधानिक नैतिकता’ की व्यक्तिगत व्याख्या पर आधारित थे, इसलिए इन्हें अच्छा कानून नहीं माना जाना चाहिए। मेहता ने कहा- लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर चलने वाले देश में बहुसंख्यक वर्ग का दृष्टिकोण ही प्रभावी होता है। मेहता ने हार्वर्ड लॉ रिव्यू में छपे कैथरीन टी. बार्टलेट के लेख ‘सम फेमिनिस्ट लीगल मेथड्स’ का जिक्र कर कहा, अनुच्छेद 141 के तहत यह एक कानून बन जाता है, जो 140 करोड़ भारतीयों पर लागू होता है।’ कोर्ट ने पूछा- याचिका किसकी, कोई भक्त इसे चुनौती नहीं दे सकता? दिनभर सुनवाई के बाद बेंच उठने वाली थी तो जस्टिस नागरत्ना ने मेहता से जानना चाहा कि सबरीमाला मामले में याचिकाकर्ता कौन हैं। दलीलों से लगता है कि मूल याचिकाकर्ता भक्त नहीं हैं। मेहता ने कहा कि वकीलों के संगठन ‘इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन’ की याचिका है। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा, ‘वे भक्त नहीं हैं। जो भक्त नहीं है और जिसका उस मंदिर से कोई लेना-देना नहीं है, इसे चुनौती देता है, तो क्या अदालत ऐसी रिट याचिका पर सुनवाई कर सकती है?’ सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा रिव्यू पिटीशन धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला बीते 26 सालों से देश की अदालतों में हैं। 2018 में, 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान बेंच 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। कोर्ट में रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, जबकि विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे। सबरीमाला सहित 5 मामले, जिनपर SC फैसला करेगा सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में जाने का अधिकार दिया था। अब बड़ी पीठ तय करेगी कि यह फैसला सही था या नहीं। दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: एडवोकेट सुनीता तिवारी ने 2017 में इसके खिलाफ याचिका दायर की और कहा कि यह प्रथा महिलाओं के साथ भेदभाव करती है और यह नाबालिग बच्चियों के अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है? मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने 2016 में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट तय करेगा कि क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है। पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: 2012 में पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने हिंदू व्यक्ति से शादी के बाद अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोके जाने के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या गैर-पारसी से शादी करने पर पारसी महिला को मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के प्रश्न: सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या धार्मिक गतिविधियों में जेंडर के आधार पर भेदभाव को क्या मौलिक अधिकार का हनन माना जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने 7 संवैधानिक सवाल तय किए, जिन पर बहस होगी- सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं को एंट्री नहीं, पूरा मामला 5 पॉइंट्स में सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री पहले बैन थी। वजह पीरियड्स और भगवान अयप्पा के ब्रह्मचर्य व्रत को माना गया। इसी नियम को लेकर विवाद शुरू हुआ। 1990 में मामला उठा, बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 2006 में कोर्ट ने नोटिस जारी किया। 2008 में केस 3 जजों की बेंच को गया। 2016 में सुनवाई शुरू हुई। 2017 में मामला 5 जजों की संविधान पीठ को भेजा गया। 2018 में 4-1 बहुमत से सभी उम्र की महिलाओं को एंट्री की अनुमति मिली। कोर्ट ने प्रतिबंध को असंवैधानिक बताया। विरोध के बीच बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी ने मंदिर में प्रवेश किया। 2019 में मामला 9 जजों की बड़ी बेंच को भेज दिया गया। बाद में दूसरे धर्मों से जुड़े महिला प्रवेश मामलों को भी इसमें जोड़ा गया। अदालतों में 26 साल में क्या हुआ, पूरी टाइमलाइन… सबरीमाला में 2 महिलाओं की एंट्री पर प्रदर्शन हुए…फोटोज जानिए सबरीमाला मंदिर के बारे में…

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विधायिका चुप है तो क्या अदालत सार्वजनिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए रोक के निर्देश नहीं दे सकती? केंद्र बोला- व्यभिचार-समलैंगिक संबंधों पर SC के फैसले ठीक नहीं सुनवाई के दौरान मेहता ने कहा है कि व्यभिचार और सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाले फैसले सही कानून नहीं हैं। ये फैसले ‘संवैधानिक नैतिकता’ की व्यक्तिगत व्याख्या पर आधारित थे, इसलिए इन्हें अच्छा कानून नहीं माना जाना चाहिए। मेहता ने कहा- लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर चलने वाले देश में बहुसंख्यक वर्ग का दृष्टिकोण ही प्रभावी होता है। मेहता ने हार्वर्ड लॉ रिव्यू में छपे कैथरीन टी. बार्टलेट के लेख ‘सम फेमिनिस्ट लीगल मेथड्स’ का जिक्र कर कहा, अनुच्छेद 141 के तहत यह एक कानून बन जाता है, जो 140 करोड़ भारतीयों पर लागू होता है।’ कोर्ट ने पूछा- याचिका किसकी, कोई भक्त इसे चुनौती नहीं दे सकता? दिनभर सुनवाई के बाद बेंच उठने वाली थी तो जस्टिस नागरत्ना ने मेहता से जानना चाहा कि सबरीमाला मामले में याचिकाकर्ता कौन हैं। दलीलों से लगता है कि मूल याचिकाकर्ता भक्त नहीं हैं। मेहता ने कहा कि वकीलों के संगठन ‘इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन’ की याचिका है। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा, ‘वे भक्त नहीं हैं। जो भक्त नहीं है और जिसका उस मंदिर से कोई लेना-देना नहीं है, इसे चुनौती देता है, तो क्या अदालत ऐसी रिट याचिका पर सुनवाई कर सकती है?’ सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा रिव्यू पिटीशन धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला बीते 26 सालों से देश की अदालतों में हैं। 2018 में, 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान बेंच 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। कोर्ट में रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, जबकि विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे। सबरीमाला सहित 5 मामले, जिनपर SC फैसला करेगा सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में जाने का अधिकार दिया था। अब बड़ी पीठ तय करेगी कि यह फैसला सही था या नहीं। दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: एडवोकेट सुनीता तिवारी ने 2017 में इसके खिलाफ याचिका दायर की और कहा कि यह प्रथा महिलाओं के साथ भेदभाव करती है और यह नाबालिग बच्चियों के अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है? 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