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सवाल पूछना अधिकार, पर मकसद सच की तलाश होना चाहिए:इंसान की बड़ी क्षमता उसका दिमाग और दिमाग का सबसे असरदार औजार- एक अच्छा सवाल

सवाल पूछना अधिकार, पर मकसद सच की तलाश होना चाहिए:इंसान की बड़ी क्षमता उसका दिमाग और दिमाग का सबसे असरदार औजार- एक अच्छा सवाल

भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी ताकत हमेशा यह रही है कि उसने सवाल पूछने से कभी डरना नहीं सीखा। उपनिषदों में शिष्य गुरु से बेझिझक प्रश्न करता है। बुद्ध सदियों से चली आ रही मान्यताओं को चुनौती देते हैं। चार्वाक ईश्वर और वेदों तक पर सवाल उठाते हैं। कबीर धर्म और समाज में फैले पाखंड पर खुलकर चोट करते हैं। भारतीय दर्शन की लगभग हर परंपरा का आधार संवाद, तर्क और वाद-विवाद की समृद्ध परंपरा रही है। इंसान की सबसे बड़ी कुव्वत उसका दिमाग है और दिमाग का सबसे असरदार औजार है- एक अच्छा सवाल। इंसान और बाकी तमाम जीव-जंतुओं के बीच सबसे बड़ा फर्क सिर्फ यह नहीं है कि इंसान दो पैरों पर चलता है, औजार बनाता है या आसमान छूती इमारतें खड़ी कर लेता है। असली फर्क यह है कि इंसान सवाल पूछता है। वह सिर्फ यह नहीं देखता कि सूरज हर सुबह निकलता है; वह जानना चाहता है कि सूरज उगता हुआ दिखाई क्यों देता है। वह किसी बात को महज इसलिए सच नहीं मान लेता कि सब उसे सच मानते हैं; वह पूछता है आखिर यह सच क्यों है, और यही जिज्ञासा, यही सवाल करने की बेचैनी इंसान को इंसान बनाती है। किसी छोटे बच्चे को देखिए। दुनिया में आने के कुछ ही सालों में वह सवालों की चलती-फिरती मशीन बन जाता है। यह क्या है? वह कौन है? ऐसा क्यों है? वैसा क्यों नहीं है? अगर हम गौर से देखें, तो समझ आएगा कि जिज्ञासा इंसान की सबसे स्वाभाविक फितरत है। इतिहास गवाह है कि जिस समाज ने सवालों को दबाया, वह ठहर गया; और जिसने सवालों का इस्तकबाल किया, वह आगे बढ़ता गया। जरा सोचिए, विज्ञान की पूरी इमारत किस बुनियाद पर खड़ी है? किसी दिन न्यूटन के दिमाग में यह सवाल कौंधा कि पेड़ से गिरता हुआ सेब हमेशा नीचे ही क्यों आता है, ऊपर क्यों नहीं चला जाता। अगर कुछ सवाल कभी न पूछे गए होते तो शायद हम आज भी अंधविश्वासों और गलत धारणाओं के जंगल में भटक रहे होते। विज्ञान जवाबों नहीं, सवालों से जन्म लेता है। सवाल सिर्फ विज्ञान के दायरे तक ही नहीं रहते हैं। अदब, फन और फलसफा भी सवालों की कोख से ही जन्म लेते हैं। एक शायर जब पूछता है कि इंसान दु:खी क्यों है, मोहब्बत क्या है, तन्हाई क्यों है, इंसाफ किसे कहते हैं, तब शायरी पैदा होती है। एक लेखक जब अपने समाज से सवाल करता है, एक फिल्मकार जब अपने दौर की उलझनों, नाइंसाफियों और विसंगतियों पर उंगली रखता है, तब मायने रखने वाला सिनेमा बनता है। कला का काम तैयार जवाब बांटना नहीं, ऐसे सवाल पैदा करना है जो हमें अपने बारे में कुछ नया सोचने पर मजबूर कर दें। मुझे तब फिक्र होती है, जब लोग किसी फिल्म, किताब या खयाल से असहमत होने के बजाय उसे चुप करा देना चाहते हैं। किसी सवाल को सिर्फ इसलिए दबा देना कि वह असुविधाजनक है, किसी आत्मविश्वास से भरे समाज की निशानी नहीं हो सकती। अगर कोई बच्चा पूछ ले कि यह नियम क्यों है, तो उसे चुप करा दिया जाता है। अगर कोई नौजवान जानना चाहे कि यह परंपरा किस बुनियाद पर बनी है, तो उससे कहा जाता है, बहुत सवाल मत करो। अगर कोई नागरिक सरकार से पूछ ले कि यह फैसला क्यों लिया गया, तो उसे विरोधी मान लिया जाता है। जबकि सच यह है कि सवाल पूछना विरोध नहीं, बल्कि समाज में अपनी हिस्सेदारी निभाने का तरीका है। जो शख्स सवाल पूछ रहा है, वह बता रहा है कि उसे समाज की फिक्र है। धर्म और आस्था के मामले में भी यही बात लागू होती है। आस्था का सम्मान करने का यह हरगिज मतलब नहीं कि इंसान अपनी सोचने-समझने की ताकत पर ताला लगा दे। पर सवाल पूछना और हर बात का विरोध करना एक ही चीज नहीं हैं। कुछ लोग समझते हैं हर बात में नुक्स निकालना ही अक्लमंदी की निशानी है। ऐसा नहीं है। सवाल पूछने का मकसद सच तक पहुंचना होना चाहिए। अगर आपका इरादा सामने वाले को नीचा दिखाना भर है, तो वह जिज्ञासा नहीं, अहंकार है, लेकिन अगर आपकी कोशिश समझने की है, सीखने की है, सच के थोड़ा और करीब जाने की है, तो आपका सवाल पूछना एक रचनात्मक सरोकार बन जाता है। बौद्धिक ईमानदारी की पहली शर्त यही है कि इंसान जो सवाल दूसरों से पूछता है, उसे अपने आप से भी पूछे। हम अक्सर दूसरों के खयालों को कसौटी पर कसते हैं, लेकिन अपने यकीनों की जांच नहीं करते। हमें खुद से भी यह पूछने का हौसला होना चाहिए कि मैं जो मानता हूं, उसे मानने की बुनियाद क्या है। कहीं ऐसा तो नहीं कि मैंने कोई राय सिर्फ इसलिए अपना ली क्योंकि मेरे आसपास के ज्यादातर लोग उसे सही मानते हैं? अपने ही विश्वासों से सवाल करना आसान नहीं होता, लेकिन यही मानसिक परिपक्वता की सबसे बड़ी निशानी है। आज के दौर में, जब जानकारी पहले से कहीं ज्यादा और कहीं तेजी से हमारे सामने आती है, तब सवाल पूछने की जरूरत और भी बढ़ जाती है। इंटरनेट पर हर रोज लाखों दावे किए जाते हैं। हर विचार के हक में भी दलीलें मिल जाती हैं और उसके खिलाफ भी। ऐसे में आंख मूंदकर किसी बात को सच मान लेना खतरनाक हो सकता है। हमें पूछना होगा- इसका स्रोत क्या है? इसका सबूत क्या है? इसकी दलील क्या है? यही आलोचनात्मक सोच हमें भ्रम, अफवाह और प्रचार के जाल से बचाती है।सवाल पूछना सिर्फ हमारा अधिकार नहीं, हमारी जिम्मेदारी भी है। जो समाज सवाल पूछना छोड़ देता है, वह धीरे-धीरे सोचने की अपनी ताकत खो देता है, और जो इंसान सवाल पूछना छोड़ देता है, वह सीखना भी छोड़ देता है। (संपादन और समन्वय- अरविंद मण्डलोई)

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सवाल पूछना अधिकार, पर मकसद सच की तलाश होना चाहिए:इंसान की बड़ी क्षमता उसका दिमाग और दिमाग का सबसे असरदार औजार- एक अच्छा सवाल

भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी ताकत हमेशा यह रही है कि उसने सवाल पूछने से कभी डरना नहीं सीखा। उपनिषदों में शिष्य गुरु से बेझिझक प्रश्न करता है। बुद्ध सदियों से चली आ रही मान्यताओं को चुनौती देते हैं। चार्वाक ईश्वर और वेदों तक पर सवाल उठाते हैं। कबीर धर्म और समाज में फैले पाखंड पर खुलकर चोट करते हैं। भारतीय दर्शन की लगभग हर परंपरा का आधार संवाद, तर्क और वाद-विवाद की समृद्ध परंपरा रही है। इंसान की सबसे बड़ी कुव्वत उसका दिमाग है और दिमाग का सबसे असरदार औजार है- एक अच्छा सवाल। इंसान और बाकी तमाम जीव-जंतुओं के बीच सबसे बड़ा फर्क सिर्फ यह नहीं है कि इंसान दो पैरों पर चलता है, औजार बनाता है या आसमान छूती इमारतें खड़ी कर लेता है। असली फर्क यह है कि इंसान सवाल पूछता है। वह सिर्फ यह नहीं देखता कि सूरज हर सुबह निकलता है; वह जानना चाहता है कि सूरज उगता हुआ दिखाई क्यों देता है। वह किसी बात को महज इसलिए सच नहीं मान लेता कि सब उसे सच मानते हैं; वह पूछता है आखिर यह सच क्यों है, और यही जिज्ञासा, यही सवाल करने की बेचैनी इंसान को इंसान बनाती है। किसी छोटे बच्चे को देखिए। दुनिया में आने के कुछ ही सालों में वह सवालों की चलती-फिरती मशीन बन जाता है। यह क्या है? वह कौन है? ऐसा क्यों है? वैसा क्यों नहीं है? अगर हम गौर से देखें, तो समझ आएगा कि जिज्ञासा इंसान की सबसे स्वाभाविक फितरत है। इतिहास गवाह है कि जिस समाज ने सवालों को दबाया, वह ठहर गया; और जिसने सवालों का इस्तकबाल किया, वह आगे बढ़ता गया। जरा सोचिए, विज्ञान की पूरी इमारत किस बुनियाद पर खड़ी है? किसी दिन न्यूटन के दिमाग में यह सवाल कौंधा कि पेड़ से गिरता हुआ सेब हमेशा नीचे ही क्यों आता है, ऊपर क्यों नहीं चला जाता। अगर कुछ सवाल कभी न पूछे गए होते तो शायद हम आज भी अंधविश्वासों और गलत धारणाओं के जंगल में भटक रहे होते। विज्ञान जवाबों नहीं, सवालों से जन्म लेता है। सवाल सिर्फ विज्ञान के दायरे तक ही नहीं रहते हैं। अदब, फन और फलसफा भी सवालों की कोख से ही जन्म लेते हैं। एक शायर जब पूछता है कि इंसान दु:खी क्यों है, मोहब्बत क्या है, तन्हाई क्यों है, इंसाफ किसे कहते हैं, तब शायरी पैदा होती है। एक लेखक जब अपने समाज से सवाल करता है, एक फिल्मकार जब अपने दौर की उलझनों, नाइंसाफियों और विसंगतियों पर उंगली रखता है, तब मायने रखने वाला सिनेमा बनता है। कला का काम तैयार जवाब बांटना नहीं, ऐसे सवाल पैदा करना है जो हमें अपने बारे में कुछ नया सोचने पर मजबूर कर दें। मुझे तब फिक्र होती है, जब लोग किसी फिल्म, किताब या खयाल से असहमत होने के बजाय उसे चुप करा देना चाहते हैं। किसी सवाल को सिर्फ इसलिए दबा देना कि वह असुविधाजनक है, किसी आत्मविश्वास से भरे समाज की निशानी नहीं हो सकती। अगर कोई बच्चा पूछ ले कि यह नियम क्यों है, तो उसे चुप करा दिया जाता है। अगर कोई नौजवान जानना चाहे कि यह परंपरा किस बुनियाद पर बनी है, तो उससे कहा जाता है, बहुत सवाल मत करो। अगर कोई नागरिक सरकार से पूछ ले कि यह फैसला क्यों लिया गया, तो उसे विरोधी मान लिया जाता है। जबकि सच यह है कि सवाल पूछना विरोध नहीं, बल्कि समाज में अपनी हिस्सेदारी निभाने का तरीका है। जो शख्स सवाल पूछ रहा है, वह बता रहा है कि उसे समाज की फिक्र है। धर्म और आस्था के मामले में भी यही बात लागू होती है। आस्था का सम्मान करने का यह हरगिज मतलब नहीं कि इंसान अपनी सोचने-समझने की ताकत पर ताला लगा दे। पर सवाल पूछना और हर बात का विरोध करना एक ही चीज नहीं हैं। कुछ लोग समझते हैं हर बात में नुक्स निकालना ही अक्लमंदी की निशानी है। ऐसा नहीं है। सवाल पूछने का मकसद सच तक पहुंचना होना चाहिए। अगर आपका इरादा सामने वाले को नीचा दिखाना भर है, तो वह जिज्ञासा नहीं, अहंकार है, लेकिन अगर आपकी कोशिश समझने की है, सीखने की है, सच के थोड़ा और करीब जाने की है, तो आपका सवाल पूछना एक रचनात्मक सरोकार बन जाता है। बौद्धिक ईमानदारी की पहली शर्त यही है कि इंसान जो सवाल दूसरों से पूछता है, उसे अपने आप से भी पूछे। हम अक्सर दूसरों के खयालों को कसौटी पर कसते हैं, लेकिन अपने यकीनों की जांच नहीं करते। हमें खुद से भी यह पूछने का हौसला होना चाहिए कि मैं जो मानता हूं, उसे मानने की बुनियाद क्या है। कहीं ऐसा तो नहीं कि मैंने कोई राय सिर्फ इसलिए अपना ली क्योंकि मेरे आसपास के ज्यादातर लोग उसे सही मानते हैं? अपने ही विश्वासों से सवाल करना आसान नहीं होता, लेकिन यही मानसिक परिपक्वता की सबसे बड़ी निशानी है। आज के दौर में, जब जानकारी पहले से कहीं ज्यादा और कहीं तेजी से हमारे सामने आती है, तब सवाल पूछने की जरूरत और भी बढ़ जाती है। इंटरनेट पर हर रोज लाखों दावे किए जाते हैं। हर विचार के हक में भी दलीलें मिल जाती हैं और उसके खिलाफ भी। ऐसे में आंख मूंदकर किसी बात को सच मान लेना खतरनाक हो सकता है। हमें पूछना होगा- इसका स्रोत क्या है? इसका सबूत क्या है? इसकी दलील क्या है? यही आलोचनात्मक सोच हमें भ्रम, अफवाह और प्रचार के जाल से बचाती है।सवाल पूछना सिर्फ हमारा अधिकार नहीं, हमारी जिम्मेदारी भी है। जो समाज सवाल पूछना छोड़ देता है, वह धीरे-धीरे सोचने की अपनी ताकत खो देता है, और जो इंसान सवाल पूछना छोड़ देता है, वह सीखना भी छोड़ देता है। (संपादन और समन्वय- अरविंद मण्डलोई)

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