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नौरादेही अभ्यारण्य में अद्भुत पंचधारा रहस्यमयी तीर्थ स्थल:उमर वृक्ष की जड़ों से बहती पांच जलधाराएं; 40 साल पुराना हिंगलाज माता मंदिर

नौरादेही अभ्यारण्य में अद्भुत पंचधारा रहस्यमयी तीर्थ स्थल:उमर वृक्ष की जड़ों से बहती पांच जलधाराएं; 40 साल पुराना हिंगलाज माता मंदिर

नरसिंहपुर जिले में जबलपुर-भोपाल नेशनल हाईवे-45 से लगभग 10 किलोमीटर अंदर नौरादेही अभ्यारण्य स्थित है। यहां पंचधारा तीर्थ अपनी अद्भुत प्राकृतिक संरचना और धार्मिक महत्व के कारण विशेष पहचान रखता है। दुर्गम रास्तों के बावजूद यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इस तीर्थ की सबसे अनोखी विशेषता एक विशाल उमर वृक्ष है। इसकी अलग-अलग जड़ों से पांच जलधाराएं लगातार प्रवाहित होती हैं। इन धाराओं का कोई स्पष्ट स्रोत दिखाई नहीं देता, जिससे यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए चमत्कारिक और पवित्र माना जाता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस जल में औषधीय गुण हैं। 40 वर्ष पहले शंकराचार्य स्वामी बनवाया था पंचधारा के ठीक सामने हिंगलाज माता मंदिर स्थित है। इसका निर्माण लगभग 40 वर्ष पूर्व ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने कराया था। यह मंदिर लगभग 900 वर्गफुट क्षेत्र में फैला है और इसकी ऊंचाई करीब 50 फीट है। मंदिर के गर्भगृह में माता हिंगलाज की पिंडी स्वरूप प्रतिमा स्थापित है। गर्भगृह का क्षेत्र लगभग 100 वर्गफुट है, और चैनल गेट से इसकी दूरी 13 फीट है। दुर्गम रास्ते के बावजूद पहुंचते श्रद्धालु मंदिर मंदिर तक पहुंचने का रास्ता काफी दुर्गम है। श्रद्धालुओं को नेशनल हाईवे से लगभग 10 किलोमीटर का पथरीला और कठिन मार्ग तय करना पड़ता है। प्राकृतिक वन क्षेत्र और ऊबड़-खाबड़ रास्ते के बावजूद, बड़ी संख्या में भक्त यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। पुजारी बोले- मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं मंदिर के पुजारी राम बालक द्विवेदी के अनुसार, यह स्थान हिंगलाज माता का ब्रह्मरंध्र स्वरूप माना जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सती के अंगों के विखंडन के बाद इस स्थान का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। यह भी कहा जाता है कि जगतगुरु शंकराचार्य को स्वप्न में माता के दर्शन हुए थे। इसके बाद उन्होंने भेड़ाघाट क्षेत्र से माता की पिंडी प्राप्त कर इस निर्जन और शांत स्थल पर प्राण-प्रतिष्ठा की थी। माता ने स्वयं इस स्थान को अपना निवास चुना था। प्राचीन तपोभूमि, जल में औषधीय गुण मौजूद पुजारी के अनुसार यह क्षेत्र प्राचीन काल से संत-महात्माओं की तपोभूमि रहा है। मान्यता है कि आदि गुरु शंकराचार्य के गुरु गोविंदपादाचार्य और उनके गुरु गौड़पादाचार्य ने भी यहां तपस्या की थी। यहां बहने वाले जल को वन औषधि के रूप में देखा जाता है, जो पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में सहायक माना जाता है। टाइगर रिजर्व क्षेत्र में स्थित, प्राकृतिक जोखिम दूसरे पुजारी अमिताभानंद के अनुसार, यह क्षेत्र वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व के अंतर्गत आता है, जहां सख्त वन नियम लागू हैं। जंगल में शेर, भालू जैसे वन्यजीवों की मौजूदगी के कारण यहां विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है। स्थानीय पुजारियों और श्रद्धालुओं ने शासन से इस पवित्र स्थल के संरक्षण और यहां तक पहुंचने के लिए बेहतर सड़क व मूलभूत सुविधाओं की मांग की है। उनका कहना है कि यदि सुविधाएं विकसित की जाएं, तो यह स्थान प्रदेश के प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थलों में शामिल हो सकता है। नवरात्रि में बढ़ती भीड़, शांत वातावरण देता अनुभव सामान्य समय में तो कठिन मनर्ग के कारण लोग नहीं जा पाते लेकिन विशेष त्यौहार और नवरात्रि के दौरान यहां श्रद्धालुओं की संख्या में बढ़ोतरी हो जाती है। लेकिन प्राकृतिक शांति और आध्यात्मिक वातावरण श्रद्धालुओं को विशेष अनुभव प्रदान करता है।

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नौरादेही अभ्यारण्य में अद्भुत पंचधारा रहस्यमयी तीर्थ स्थल:उमर वृक्ष की जड़ों से बहती पांच जलधाराएं; 40 साल पुराना हिंगलाज माता मंदिर

नरसिंहपुर जिले में जबलपुर-भोपाल नेशनल हाईवे-45 से लगभग 10 किलोमीटर अंदर नौरादेही अभ्यारण्य स्थित है। यहां पंचधारा तीर्थ अपनी अद्भुत प्राकृतिक संरचना और धार्मिक महत्व के कारण विशेष पहचान रखता है। दुर्गम रास्तों के बावजूद यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इस तीर्थ की सबसे अनोखी विशेषता एक विशाल उमर वृक्ष है। इसकी अलग-अलग जड़ों से पांच जलधाराएं लगातार प्रवाहित होती हैं। इन धाराओं का कोई स्पष्ट स्रोत दिखाई नहीं देता, जिससे यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए चमत्कारिक और पवित्र माना जाता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस जल में औषधीय गुण हैं। 40 वर्ष पहले शंकराचार्य स्वामी बनवाया था पंचधारा के ठीक सामने हिंगलाज माता मंदिर स्थित है। इसका निर्माण लगभग 40 वर्ष पूर्व ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने कराया था। यह मंदिर लगभग 900 वर्गफुट क्षेत्र में फैला है और इसकी ऊंचाई करीब 50 फीट है। मंदिर के गर्भगृह में माता हिंगलाज की पिंडी स्वरूप प्रतिमा स्थापित है। गर्भगृह का क्षेत्र लगभग 100 वर्गफुट है, और चैनल गेट से इसकी दूरी 13 फीट है। दुर्गम रास्ते के बावजूद पहुंचते श्रद्धालु मंदिर मंदिर तक पहुंचने का रास्ता काफी दुर्गम है। श्रद्धालुओं को नेशनल हाईवे से लगभग 10 किलोमीटर का पथरीला और कठिन मार्ग तय करना पड़ता है। प्राकृतिक वन क्षेत्र और ऊबड़-खाबड़ रास्ते के बावजूद, बड़ी संख्या में भक्त यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। पुजारी बोले- मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं मंदिर के पुजारी राम बालक द्विवेदी के अनुसार, यह स्थान हिंगलाज माता का ब्रह्मरंध्र स्वरूप माना जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सती के अंगों के विखंडन के बाद इस स्थान का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। यह भी कहा जाता है कि जगतगुरु शंकराचार्य को स्वप्न में माता के दर्शन हुए थे। इसके बाद उन्होंने भेड़ाघाट क्षेत्र से माता की पिंडी प्राप्त कर इस निर्जन और शांत स्थल पर प्राण-प्रतिष्ठा की थी। माता ने स्वयं इस स्थान को अपना निवास चुना था। प्राचीन तपोभूमि, जल में औषधीय गुण मौजूद पुजारी के अनुसार यह क्षेत्र प्राचीन काल से संत-महात्माओं की तपोभूमि रहा है। मान्यता है कि आदि गुरु शंकराचार्य के गुरु गोविंदपादाचार्य और उनके गुरु गौड़पादाचार्य ने भी यहां तपस्या की थी। यहां बहने वाले जल को वन औषधि के रूप में देखा जाता है, जो पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में सहायक माना जाता है। टाइगर रिजर्व क्षेत्र में स्थित, प्राकृतिक जोखिम दूसरे पुजारी अमिताभानंद के अनुसार, यह क्षेत्र वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व के अंतर्गत आता है, जहां सख्त वन नियम लागू हैं। जंगल में शेर, भालू जैसे वन्यजीवों की मौजूदगी के कारण यहां विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है। स्थानीय पुजारियों और श्रद्धालुओं ने शासन से इस पवित्र स्थल के संरक्षण और यहां तक पहुंचने के लिए बेहतर सड़क व मूलभूत सुविधाओं की मांग की है। उनका कहना है कि यदि सुविधाएं विकसित की जाएं, तो यह स्थान प्रदेश के प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थलों में शामिल हो सकता है। नवरात्रि में बढ़ती भीड़, शांत वातावरण देता अनुभव सामान्य समय में तो कठिन मनर्ग के कारण लोग नहीं जा पाते लेकिन विशेष त्यौहार और नवरात्रि के दौरान यहां श्रद्धालुओं की संख्या में बढ़ोतरी हो जाती है। लेकिन प्राकृतिक शांति और आध्यात्मिक वातावरण श्रद्धालुओं को विशेष अनुभव प्रदान करता है।

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