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Online Games Health Impact; Teen Dopamine Addiction

Online Games Health Impact; Teen Dopamine Addiction

6 घंटे पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल

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सवाल- मैं अजमेर से हूं। मेरा 15 साल का बेटा है। पिछले कुछ समय से उसे ऑनलाइन गेम खेलने की आदत हो गई है। वह रोज घंटों मोबाइल या कंप्यूटर पर गेम खेलता रहता है। हम दोनों वर्किंग हैं। जब वह छोटा था, तब अक्सर उसे मोबाइल पकड़ा देते थे ताकि वो व्यस्त रहे।

स्कूल से भी शिकायत आ रही है कि पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता। परफॉर्मेंस लगातार कमजोर हो रहा है। कुछ बोलो तो गुस्सा हो जाता है। हमें उसकी सेहत, पढ़ाई और भविष्य की चिंता है। बतौर पेरेंट्स हमें क्या करना चाहिए?

एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर

जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। आपकी चिंता जायज है, लेकिन बतौर काउंसलर सबसे पहले मैं यह कहना चाहूंगी कि खुद को ‘दोषी’ मानना बंद करें। आपने अनजाने में बच्चे को गैजेट्स दिए ताकि आप काम कर सकें। उस समय आपको इसके दुष्परिणामों का पता नहीं था। लेकिन अब उसे गेमिंग की लत लग चुकी है तो समय दोष देने का नहीं, बल्कि ‘डैमेज कंट्रोल’ का है।

आपका बेटा ‘डोपामिन लूप’ में फंसा हुआ है। ऑनलाइन गेम्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि हर लेवल पार करने पर खुशी का एहसास कराने वाला ‘डोपामिन’ हॉर्मोन रिलीज होता है। ऐसे में बच्चों का ऑनलाइन गेम्स की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक है। लेकिन जब इससे रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे तो यह चिंता की बात है। सही स्ट्रैटेजी और धैर्य के साथ इस स्थिति को बदला जा सकता है।

बच्चों को ऑनलाइन गेमिंग की लत क्यों लगती है?

किशोरावस्था में बच्चों का दिमाग तेजी से बदल रहा होता है। इस उम्र में उन्हें रोमांच और उपलब्धि की जरूरत महसूस होती है। ऑनलाइन गेम्स इन सभी जरूरतों को पूरा करते हैं। यही वजह है कि बच्चे उनमें जल्दी उलझ जाते हैं।

इसके अलावा गेम्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि हर मिनट कोई नया रिवॉर्ड, लेवल या चैलेंज मिले। इसलिए बच्चे को बार-बार खेलने की इच्छा होती है। अगर घर में अकेलापन हो या बच्चे के पास समय बिताने के सीमित विकल्प हों तो गेमिंग धीरे-धीरे लत बन जाती है। गेमिंग की लत के कई कारण हो सकते हैं।

ऑनलाइन गेमिंग एडिक्शन का बच्चे पर प्रभाव

पेरेंट्स को लगता है कि ऑनलाइन गेम की लत सिर्फ पढ़ाई को प्रभावित करती है। लेकिन वास्तव में इसका असर बच्चे की मेंटल और फिजिकल हेल्थ पर पड़ता है। जैसेकि-

  • ज्यादा स्क्रीन टाइम से आंखों पर प्रेशर पड़ता है।
  • नींद की क्वालिटी खराब होती है।
  • फिजिकल एक्टिविटी कम हो जाती है।
  • इससे लंबे समय में मोटापा हो सकता है।
  • थकान और सिरदर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
  • बच्चे के स्वभाव में चिड़चिड़ापन हो सकता है।
  • जब उन्हें गेम खेलने से रोका जाता है तो वे गुस्सा या निराशा दिखा सकते हैं।
  • फोकस कम होता है, जिसका असर पढ़ाई और व्यवहार पर पड़ता है।

कैसे समझें कि बच्चे को ऑनलाइन गेम का एडिक्शन है?

अगर बच्चे कभी-कभार मनोरंजन के लिए गेम खेलते हैं तो यह सामान्य है। लेकिन जब इससे बच्चे का व्यवहार, पढ़ाई, दिनचर्या और मूड प्रभावित होने लगे तो यह गेमिंग लत का संकेत है। इन संकेतों को नीचे ग्राफिक्स में देखें–

गेम एडिक्शन कम करने के लिए क्या करें?

बच्चों को मोबाइल या गेम को पूरी तरह दूर करना सही नहीं है। इसलिए लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि बच्चा गेम बिल्कुल न खेले, बल्कि यह होना चाहिए कि उसका स्क्रीन टाइम बैलेंस्ड रहे। आपने बताया कि टाइम की कमी थी तो आपने बच्चे को फोन पकड़ा दिया। लेकिन अब अगर आपको बच्चे को गेमिंग की लत से बचाना है तो उसे टाइम देना पड़ेगा। बच्चे काे गेम एडिक्शन से बचाने के लिए सबसे जरूरी है पेरेंट्स का समय देना।

  • अगर बच्चा रोज 5-6 घंटे गेम खेलता है तो धीरे-धीरे इसे कम करें।
  • रोकने या डांटने की बजाय बच्चे के साथ कनेक्शन बढ़ाएं।
  • बच्चों को गेम में जो खुशी और उत्साह मिलता है, वह उसे दूसरे विकल्पाें से देने की कोशिश करें।
  • बच्चे के साथ समय बिताएं। उसके साथ क्रिएटिव एक्टिविटीज करें।
  • परिवार के साथ घूमना, खेलना, पिकनिक या आउटडोर एक्टिविटीज करना बच्चों को स्क्रीन से दूर रखने में मदद करता है।

याद रखें, अगर बच्चे को परिवार का साथ और मजेदार विकल्प मिलेंगे तो धीरे-धीरे वह गेम की लत से खुद-ब-खुद बाहर निकलेगा। साथ ही कुछ और बातों का ध्यान रखें-

पेरेंट्स न करें ये गलतियां

जब बच्चों में किसी भी तरह की आदत या लत विकसित हो जाती है तो पेरेंट्स घबराकर तुरंत सख्त कदम उठाने लगते हैं। लेकिन कई बार अनजाने में की गई कुछ गलतियां समस्या को कम करने की बजाय और बढ़ा देती हैं।

इसलिए जरूरी है कि आप इस स्थिति को धैर्य और समझदारी के साथ संभालें। बच्चे को बार-बार डांटना, उसकी तुलना करना या अचानक सारे गैजेट्स छीन लेना उसे ज्यादा जिद्दी, चिड़चिड़ा बना सकता है। इसलिए पेरेंट्स इन गलतियों से बचें-

  • अचानक मोबाइल या गेम पूरी तरह बंद कर देना।
  • हर समय डांटना या सजा देना।
  • दूसरे बच्चों से तुलना करना।
  • उसकी बात सुने बिना जज करना।
  • पढ़ाई को लेकर ज्यादा दबाव बनाना।
  • खुद लगातार मोबाइल में व्यस्त रहना।
  • केवल बच्चे पर प्रतिबंध लगाना।
  • बच्चे को लंबे समय तक अकेला छोड़ देना।
  • केवल प्रतिबंध लगाना, विकल्प न देना।
  • समस्या को नजरअंदाज करना या बहुत देर से कदम उठाना।

अंत में यही कहूंगी कि ऑनलाइन गेमिंग आज के समय की एक सामान्य लेकिन चुनौतीपूर्ण समस्या है। ऐसी स्थिति में पेरेंट्स का धैर्य, समझ और सहयोग बड़ी भूमिका निभाता है। अगर बच्चे को सही मार्गदर्शन और परिवार का साथ मिलता है तो वह धीरे-धीरे इस लत से उबर जाते हैं।

………………….

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इसके अलावा गेम्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि हर मिनट कोई नया रिवॉर्ड, लेवल या चैलेंज मिले। इसलिए बच्चे को बार-बार खेलने की इच्छा होती है। अगर घर में अकेलापन हो या बच्चे के पास समय बिताने के सीमित विकल्प हों तो गेमिंग धीरे-धीरे लत बन जाती है। गेमिंग की लत के कई कारण हो सकते हैं।

ऑनलाइन गेमिंग एडिक्शन का बच्चे पर प्रभाव

पेरेंट्स को लगता है कि ऑनलाइन गेम की लत सिर्फ पढ़ाई को प्रभावित करती है। लेकिन वास्तव में इसका असर बच्चे की मेंटल और फिजिकल हेल्थ पर पड़ता है। जैसेकि-

  • ज्यादा स्क्रीन टाइम से आंखों पर प्रेशर पड़ता है।
  • नींद की क्वालिटी खराब होती है।
  • फिजिकल एक्टिविटी कम हो जाती है।
  • इससे लंबे समय में मोटापा हो सकता है।
  • थकान और सिरदर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
  • बच्चे के स्वभाव में चिड़चिड़ापन हो सकता है।
  • जब उन्हें गेम खेलने से रोका जाता है तो वे गुस्सा या निराशा दिखा सकते हैं।
  • फोकस कम होता है, जिसका असर पढ़ाई और व्यवहार पर पड़ता है।

कैसे समझें कि बच्चे को ऑनलाइन गेम का एडिक्शन है?

अगर बच्चे कभी-कभार मनोरंजन के लिए गेम खेलते हैं तो यह सामान्य है। लेकिन जब इससे बच्चे का व्यवहार, पढ़ाई, दिनचर्या और मूड प्रभावित होने लगे तो यह गेमिंग लत का संकेत है। इन संकेतों को नीचे ग्राफिक्स में देखें–

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  • अगर बच्चा रोज 5-6 घंटे गेम खेलता है तो धीरे-धीरे इसे कम करें।
  • रोकने या डांटने की बजाय बच्चे के साथ कनेक्शन बढ़ाएं।
  • बच्चों को गेम में जो खुशी और उत्साह मिलता है, वह उसे दूसरे विकल्पाें से देने की कोशिश करें।
  • बच्चे के साथ समय बिताएं। उसके साथ क्रिएटिव एक्टिविटीज करें।
  • परिवार के साथ घूमना, खेलना, पिकनिक या आउटडोर एक्टिविटीज करना बच्चों को स्क्रीन से दूर रखने में मदद करता है।

याद रखें, अगर बच्चे को परिवार का साथ और मजेदार विकल्प मिलेंगे तो धीरे-धीरे वह गेम की लत से खुद-ब-खुद बाहर निकलेगा। साथ ही कुछ और बातों का ध्यान रखें-

पेरेंट्स न करें ये गलतियां

जब बच्चों में किसी भी तरह की आदत या लत विकसित हो जाती है तो पेरेंट्स घबराकर तुरंत सख्त कदम उठाने लगते हैं। लेकिन कई बार अनजाने में की गई कुछ गलतियां समस्या को कम करने की बजाय और बढ़ा देती हैं।

इसलिए जरूरी है कि आप इस स्थिति को धैर्य और समझदारी के साथ संभालें। बच्चे को बार-बार डांटना, उसकी तुलना करना या अचानक सारे गैजेट्स छीन लेना उसे ज्यादा जिद्दी, चिड़चिड़ा बना सकता है। इसलिए पेरेंट्स इन गलतियों से बचें-

  • अचानक मोबाइल या गेम पूरी तरह बंद कर देना।
  • हर समय डांटना या सजा देना।
  • दूसरे बच्चों से तुलना करना।
  • उसकी बात सुने बिना जज करना।
  • पढ़ाई को लेकर ज्यादा दबाव बनाना।
  • खुद लगातार मोबाइल में व्यस्त रहना।
  • केवल बच्चे पर प्रतिबंध लगाना।
  • बच्चे को लंबे समय तक अकेला छोड़ देना।
  • केवल प्रतिबंध लगाना, विकल्प न देना।
  • समस्या को नजरअंदाज करना या बहुत देर से कदम उठाना।

अंत में यही कहूंगी कि ऑनलाइन गेमिंग आज के समय की एक सामान्य लेकिन चुनौतीपूर्ण समस्या है। ऐसी स्थिति में पेरेंट्स का धैर्य, समझ और सहयोग बड़ी भूमिका निभाता है। अगर बच्चे को सही मार्गदर्शन और परिवार का साथ मिलता है तो वह धीरे-धीरे इस लत से उबर जाते हैं।

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10 साल की उम्र में बच्चे अपने विचारों को साफ तरीके से रखना सीख रहे होते हैं। उनमें लॉजिकल ब्रेन विकसित हो रहा होता है। लेकिन ‘सोशल इंटेलिजेंस’ (सामाजिक समझ) अभी पूरी तरह मेच्यौर नहीं हुई होती है। पूरी खबर पढ़िए…

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