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‘सूबेदार’ मेरे लिए सिर्फ फिल्म नहीं, बड़ा मौका रही:गौरव कुमार बोले- अनिल कपूर सर के साथ काम करना सपना पूरा होने जैसा था

‘सूबेदार’ मेरे लिए सिर्फ फिल्म नहीं, बड़ा मौका रही:गौरव कुमार बोले- अनिल कपूर सर के साथ काम करना सपना पूरा होने जैसा था

रायबरेली से निकलकर हिंदी और तेलुगु सिनेमा में अपनी पहचान बना रहे गौरव कुमार एक बहुमुखी अभिनेता और फिल्ममेकर हैं। हाल ही में वे अनिल कपूर की फिल्म ‘सूबेदार’ में नजर आए हैं। अपनी सफल फिल्म ‘रायबरेली’ के बाद अब वे ‘प्रधानी’, ‘लाल दाना’ और ‘सूअर’ जैसे प्रोजेक्ट्स के जरिए नई संभावनाओं की तलाश कर रहे हैं। उनसे खास बातचीत… ‘सूबेदार’ में काम करने का मौका कैसे मिला? कास्टिंग प्रोसेस कैसा रहा? सच कहूं तो यह एक इत्तेफाक जैसा था। ‘कास्टिंग बे’ ने लखनऊ में पांच दिन का ऑडिशन रखा था। मुझे लगा शायद यह फेक होगा, क्योंकि पांच दिन लंबा ऑडिशन? लेकिन एक दोस्त जबरदस्ती ले गया। वहां कास्टिंग डायरेक्टर्स को मेरा लुक पसंद आया, फिर दो बार और ऑडिशन हुआ। जब उन्होंने बताया कि फिल्म में अनिल कपूर जी हैं, तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। बचपन से उनकी ‘नायक’ जैसी फिल्में देखी हैं, हम उनके काम के कायल रहे हैं। ऑडिशन के दौरान मैंने किसी को यह नहीं बताया था कि मैं पहले भी 2-3 फिल्में कर चुका हूं। ‘रायबरेली’ नाम की फिल्म में मैंने सोलो रोल किया है। सेट पर अनिल कपूर के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? आज भी वे 20-25 साल के लड़के जैसी एनर्जी रखते हैं। मेरा 15 दिन का शेड्यूल था, जिसमें उनके साथ स्क्रीन स्पेस मिला। वे अपने काम के प्रति बेहद ईमानदार और गंभीर हैं। डायरेक्टर जो कहते हैं, वही करते हैं। शूट के बाद वे मस्ती-मजाक भी करते थे। उन्होंने मुझसे ‘नायक’ फिल्म के कई किस्से साझा किए, खासकर कीचड़ वाला सीन, बताते थे कि वह कितना मेहनत भरा था। फिल्म में आपके किरदार और सह-कलाकारों के बारे में बताएं? फिल्म में मुझे अच्छा-खासा स्क्रीन स्पेस मिला है। मैं फैजल मलिक (सीरीज ‘पंचायत’ फेम) के राइट हैंड के तौर पर हूं । फैजल भाई बेहद शानदार इंसान हैं। उनके साथ काम करके बहुत मजा आया। इसके अलावा परेश रावल जी के बेटे आदित्य रावल भी फिल्म में हैं, उन्होंने भी जबरदस्त काम किया है। क्या आपने सेट पर बताया कि आप खुद फिल्म बना चुके हैं? सौरभ शुक्ला और फैजल मलिक को हमने यह बात बताई, क्योंकि उनका थिएटर से गहरा जुड़ाव रहा है। उन्होंने इसकी काफी तारीफ की। जब हमने बताया कि हम भारतेंदु नाट्य अकादमी से पासआउट हैं, तो वे और भी खुश हुए। उन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा- ‘बहुत बढ़िया, यह तो और भी अच्छी बात है।” उनका मानना है कि जितना सीखकर और पढ़कर जाएंगे, वह अनुभव आगे जरूर काम आएगा। इंडिपेंडेंट फिल्मों और बड़े बैनर के साथ काम करने में क्या अंतर है? सबसे बड़ा अंतर प्रोफेशनलिज्म और ईमानदारी का है। बड़े स्टार्स समय से सेट पर आते हैं और काम के दौरान पूरी तरह गंभीर रहते हैं। डायरेक्टर सुरेश त्रिवेणी और अनिल कपूर जी ने मेरे काम और लुक की तारीफ की। यहां तक कि उनके बॉडीगार्ड ने आकर बताया कि सर आपकी बहुत तारीफ कर रहे थे। यह मेरे लिए बहुत बड़ा प्लस पॉइंट है। ‘सूबेदार’ एक सस्पेंस थ्रिलर है और उम्मीद है कि इसके दूसरे पार्ट में भी मेरा किरदार नजर आए। सोशल मीडिया के दौर को एक एक्टर के तौर पर कैसे देखते हैं? सोशल मीडिया आज की जरूरत है। कास्टिंग एजेंसियां अब फॉलोअर्स भी देखती हैं, क्योंकि वे प्रमोशन में काम आते हैं। मैं भी अब अच्छे और संदेशपूर्ण कंटेंट पर काम करने जा रहा हूं। लेकिन एक बात जरूर कहूंगा,एक्टिंग और यूट्यूबिंग में फर्क है। जो लोग मुंबई आना चाहते हैं, उन्हें सीखकर आना चाहिए। पढ़ाई बहुत जरूरी है। सिर्फ किसी के कहने पर कि “तुम हीरो लगते हो” या “मुंबई जाकर ट्राई करो”, बिना सोचे-समझे कदम न उठाएं। सबसे जरूरी है खुद को समझना कि आप अभिनय कर सकते हैं या नहीं। क्या आपने किसी टैलेंट एजेंसी से जुड़ने की कोशिश की? अभी मैं किसी एजेंसी से जुड़ा नहीं हूं, लेकिन इसके बारे में अच्छी जानकारी ली है। आमतौर पर एजेंसियां 2 या 5 साल का एग्रीमेंट करती हैं। उस दौरान आप जो भी काम करते हैं, वह उनकी जानकारी और अनुमति से होता है। यह सिस्टम प्रोफेशनल है। अगर आप पारदर्शिता रखते हैं और उनसे सलाह लेते हैं, तो वे आपके करियर को सपोर्ट करती हैं। इस वक्त आप किन प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं? मेरी एक फिल्म ‘सूअर’ OTT के लिए आने वाली है, जिसमें मेरा लुक बिल्कुल अलग होगा। इसके अलावा ‘लाल दाना’ और ‘प्रधानी’ की शूटिंग पूरी हो चुकी है। ‘प्रधानी’ एक रियलिस्टिक फिल्म है, बिल्कुल ‘पंचायत’ की तरह, जिसमें गांव की राजनीति और प्रधान के कामकाज को असली अंदाज में दिखाया गया है। ‘रायबरेली 2’ का क्या अपडेट है? ‘रायबरेली’ को बहुत प्यार मिला। अब हम ‘रायबरेली 2’ की तैयारी कर रहे हैं और कोशिश है कि इसकी शूटिंग इसी साल शुरू हो। मेरा मकसद लोकल टैलेंट को मौका देना है, जो आर्थिक कारणों से मुंबई नहीं जा पाते। पॉजिटिव के साथ कुछ निगेटिव फीडबैक भी मिला, इसलिए अगली फिल्म में उन कमियों को दूर करने की कोशिश करूंगा। एक दिलचस्प बात यह रही कि मुंबई में ऑडिशन के दौरान लोग ‘रायबरेली’ को ‘बरेली’ समझ रहे थे। तभी सोचा कि अपने शहर के नाम से फिल्म बनाऊंगा, ताकि उसकी पहचान बने। ‘रायबरेली’ की फंडिंग कैसे हुई थी? फिल्म की फंडिंग हमारे मित्र विनीत यादव (इटावा/मैनपुरी) के जरिए हुई। शुरुआत में वे थोड़ा हिचकिचा रहे थे, लेकिन हमने उन्हें कन्विंस किया और लोकेशन व अन्य व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी खुद ली। अब यूपी सरकार भी फिल्मों को बढ़ावा दे रही है। अगर 70 प्रतिशत शूट यूपी में होता है, तो सब्सिडी मिलती है, जिससे फिल्ममेकर्स को काफी मदद मिलती है।

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