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Varun Dhawan Daughter Disease; Hip Dysplasia Symptoms

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  • Varun Dhawan Daughter Disease; Hip Dysplasia Symptoms | DDH Diagnosis Process

35 मिनट पहलेलेखक: गौरव तिवारी

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बॉलीवुड एक्टर वरुण धवन ने कुछ दिन पहले एक इंटरव्यू में बताया था कि उनकी बेटी लारा को डेढ़ साल की उम्र में DDH डायग्नोज हुआ था। DDH यानी ‘डेवलपमेंटल डिस्प्लेसिया ऑफ हिप।’ यह कंडीशन हिप जॉइंट के पूरी तरह विकसित न हो पाने से बनती है।

वरुण ने बताया कि अर्ली डायग्नोसिस से उनकी बेटी की रिकवरी में मदद मिली। इस कंडीशन का जितनी जल्दी पता चल जाए, इलाज उतना ही आसान होता है। इसके लिए अवेयरनेस जरूरी है।

इसलिए ‘फिजिकल हेल्थ’ में आज DDH कंडीशन की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-

  • इसके शुरुआती लक्षण क्या होते हैं?
  • किन बच्चों में DDH का रिस्क ज्यादा होता है?
  • इससे बचाव के उपाय क्या हैं?

सवाल- वरुण धवन की बेटी को हुई बीमारी DDH क्या है?

जवाब- इसकी डिटेल नीचे पॉइंटर्स में देखिए–

  • DDH एक जन्मजात कंडीशन है।
  • यह हिप जॉइंट ठीक से विकसित न होने पर बनती है।
  • इस वजह से जांघ की हड्डी का बॉल, हिप सॉकेट में सही से फिट नहीं हो पाता है।
  • इसके कारण हिप जॉइंट ढीला, अस्थिर (अनस्टेबल) या डिसलोकेट हो सकता है।

सवाल- DDH कितनी कॉमन बीमारी है? यह बच्चों को ही क्यों होती है?

जवाब- ‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ के मुताबिक, भारत में यह कंडीशन हर 1000 में 2-3 बच्चों को होती है। यह सामान्य बीमारी है, लेकिन इसका पता अक्सर देर से चलता है।

यह जन्म से पहले के डेवलपमेंट से जुड़ी कंडीशन है। इसलिए बच्चों को होती है।

सवाल- DDH का पता कैसे चलता है?

जवाब- डॉक्टर इसके लिए मुख्य रूप से दो टेस्ट करते हैं, जिनसे हिप जॉइंट के ढीलेपन या डिसलोकेशन का पता चलता है-

  1. ऑर्टोलनी (Ortolani)- इसमें डॉक्टर बच्चे के हिप को प्रेस करके चेक करते हैं कि ये अनस्टेबल तो नहीं है।
  2. बारलो (Barlow)- इसमें बच्चे के हिप को अंदर की ओर दबाकर देखते हैं कि जॉइंट अपनी जगह से खिसक तो नहीं रहा है।

अगर डॉक्टर को DDH के लक्षण दिखते हैं तो इमेजिंग टेस्ट भी कराते हैं। शिशुओं के मामले में अल्ट्रासाउंड कराते हैं, क्योंकि उनकी हड्डियां पूरी तरह विकसित नहीं हुई होती हैं। 6 महीने के बाद बच्चे का एक्स-रे भी किया जा सकता है।

सवाल- छोटे बच्चों में DDH के शुरुआती लक्षण क्या होते हैं?

जवाब- कूल्हे का जोड़ सही से विकसित नहीं होने के कारण एक पैर दूसरे से छोटा दिख सकता है। जांघ या हिप के स्किन फोल्ड्स असमान होते हैं। बच्चे को पैर फैलाने में परेशानी होती है। चलने पर लंगड़ाहट दिख सकती है। सभी लक्षण ग्राफिक में देखिए-

सवाल- क्या DDH जन्म से ही होता है या बाद में भी डेवलप हो सकता है?

जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए-

  • जन्म के समय मौजूद हो सकता है, पर ऐसा हमेशा नहीं होता है।
  • कुछ मामलों में कूल्हे का जोड़ जन्म के बाद धीरे-धीरे असामान्य तरीके से विकसित हो सकता है।
  • इसलिए इसे डेवलपमेंटल कंडीशन कहा जाता है यानी शारीरिक विकास के साथ बदलने वाली कंडीशन।
  • इसलिए शुरुआती महीनों में स्क्रीनिंग बहुत जरूरी होती है।
  • समय पर डायग्नोसिस से इलाज सरल और सफल होता है।

सवाल- अगर DDH का समय पर इलाज न हो तो क्या हो सकता है?

जवाब- अगर DDH का सही समय पर इलाज न हो तो–

  • कूल्हे का जोड़ स्थायी रूप से डिसलोकेट हो सकता है।
  • चलने में लंगड़ाहट हो सकती है। व्यक्ति परमानेंट लंगड़ा हो सकता है।
  • खड़े होने और चलने में बैलेंस बिगड़ सकता है।
  • कूल्हे में दर्द और जकड़न बढ़ सकती है।

सभी रिस्क ग्राफिक में देखिए-

सवाल- किन बच्चों में DDH का जोखिम ज्यादा होता है?

जवाब- कुछ बच्चों को DDH का रिस्क ज्यादा होता है, खासतौर पर जिनका जन्म ब्रीच पोजिशन (उल्टी पोजिशन) में होता है। डिटेल नीचे ग्राफिक में देखिए-

सवाल- DDH का इलाज क्या है? क्या यह पूरी तरह ठीक हो सकता है?

जवाब- इसके लिए डॉक्टर्स ये ट्रीटमेंट देते हैं-

  • शुरुआती स्टेज में पैवलिक हार्नेस (खास तरह का बेल्ट/सपोर्ट) से कूल्हे को सही पोजिशन में रखा जाता है।
  • 6 महीने के बाद ब्रेस या कास्टिंग (हिप्स सही पोजिशन में रखने के लिए सपोर्ट डिवाइस) की जरूरत पड़ सकती है।
  • गंभीर मामलों में सर्जरी की जाती है।
  • जल्दी इलाज मिलने से पूरी तरह ठीक होने की संभावना होती है।
  • देर से डायग्नोसिस होने पर इलाज थोड़ा मुश्किल हो सकता है।

सवाल- DDH का शुरुआती इलाज इतना जरूरी क्यों है?

जवाब- शुरुआती महीनों में हिप आसानी से सही पोजिशन में लाया जा सकता है, क्योंकि इस उम्र में हड्डियां डेवलपिंग स्टेज में होती हैं। समय से इलाज मिलने पर-

  • सर्जरी की नौबत नहीं आती है।
  • बच्चे का विकास सामान्य रहता है। वह आराम से चल-फिर सकता है।
  • दर्द व लंगड़ाहट जैसे कॉम्प्लिकेशन रोके जा सकते हैं।
  • भविष्य में जॉइंट डैमेज का रिस्क कम होता है।
  • देर होने पर जॉइंट सख्त और अस्थिर हो जाता है तो इलाज में मुश्किल होती है।

सवाल- क्या बड़े बच्चों या एडल्ट्स में भी यह समस्या हो सकती है?

जवाब- हां, DDH की समस्या बड़े बच्चों या एडल्ट्स में भी दिख सकती है।

  • यह आमतौर पर बचपन में अनडायग्नोज्ड रह जाने पर बाद में सामने आती है।
  • इसके कारण कम उम्र में ही ऑस्टियोआर्थराइटिस (जोड़ों की बीमारी) हो सकता है।

सवाल- पेरेंट्स को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, ताकि बच्चों को DDH से बचाया जा सके?

जवाब- बच्चे की टांगों को कसकर सीधा बांधने से बचें यानी सेफ स्वैडलिंग करें।

  • ‘न्यू बॉर्न चेकअप’ नियमित रूप से कराएं।
  • बच्चे के पैरों की मूवमेंट पर ध्यान दें।
  • किसी भी असामान्यता पर तुरंत डॉक्टर से मिलें।
  • बेबी कैरिअर्स में हिप-फ्रेंडली पोजिशन रखें (M-शेप में)।
  • अगर फैमिली हिस्ट्री हो तो एक्स्ट्रा स्क्रीनिंग करवाएं।
  • अवेयरनेस और समय पर स्क्रीनिंग सबसे जरूरी है।

……………… ये खबर भी पढ़िए फिजिकल हेल्थ- कोलेस्ट्रॉल पर 8 साल बाद आई नई गाइडलाइन: LDL 100 से नीचे रखें, 20 साल की उम्र से कराएं टेस्ट, जानें जरूरी बातें

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बॉलीवुड एक्टर वरुण धवन ने कुछ दिन पहले एक इंटरव्यू में बताया था कि उनकी बेटी लारा को डेढ़ साल की उम्र में DDH डायग्नोज हुआ था। DDH यानी ‘डेवलपमेंटल डिस्प्लेसिया ऑफ हिप।’ यह कंडीशन हिप जॉइंट के पूरी तरह विकसित न हो पाने से बनती है।

वरुण ने बताया कि अर्ली डायग्नोसिस से उनकी बेटी की रिकवरी में मदद मिली। इस कंडीशन का जितनी जल्दी पता चल जाए, इलाज उतना ही आसान होता है। इसके लिए अवेयरनेस जरूरी है।

इसलिए ‘फिजिकल हेल्थ’ में आज DDH कंडीशन की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-

  • इसके शुरुआती लक्षण क्या होते हैं?
  • किन बच्चों में DDH का रिस्क ज्यादा होता है?
  • इससे बचाव के उपाय क्या हैं?

सवाल- वरुण धवन की बेटी को हुई बीमारी DDH क्या है?

जवाब- इसकी डिटेल नीचे पॉइंटर्स में देखिए–

  • DDH एक जन्मजात कंडीशन है।
  • यह हिप जॉइंट ठीक से विकसित न होने पर बनती है।
  • इस वजह से जांघ की हड्डी का बॉल, हिप सॉकेट में सही से फिट नहीं हो पाता है।
  • इसके कारण हिप जॉइंट ढीला, अस्थिर (अनस्टेबल) या डिसलोकेट हो सकता है।

सवाल- DDH कितनी कॉमन बीमारी है? यह बच्चों को ही क्यों होती है?

जवाब- ‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ के मुताबिक, भारत में यह कंडीशन हर 1000 में 2-3 बच्चों को होती है। यह सामान्य बीमारी है, लेकिन इसका पता अक्सर देर से चलता है।

यह जन्म से पहले के डेवलपमेंट से जुड़ी कंडीशन है। इसलिए बच्चों को होती है।

सवाल- DDH का पता कैसे चलता है?

जवाब- डॉक्टर इसके लिए मुख्य रूप से दो टेस्ट करते हैं, जिनसे हिप जॉइंट के ढीलेपन या डिसलोकेशन का पता चलता है-

  1. ऑर्टोलनी (Ortolani)- इसमें डॉक्टर बच्चे के हिप को प्रेस करके चेक करते हैं कि ये अनस्टेबल तो नहीं है।
  2. बारलो (Barlow)- इसमें बच्चे के हिप को अंदर की ओर दबाकर देखते हैं कि जॉइंट अपनी जगह से खिसक तो नहीं रहा है।

अगर डॉक्टर को DDH के लक्षण दिखते हैं तो इमेजिंग टेस्ट भी कराते हैं। शिशुओं के मामले में अल्ट्रासाउंड कराते हैं, क्योंकि उनकी हड्डियां पूरी तरह विकसित नहीं हुई होती हैं। 6 महीने के बाद बच्चे का एक्स-रे भी किया जा सकता है।

सवाल- छोटे बच्चों में DDH के शुरुआती लक्षण क्या होते हैं?

जवाब- कूल्हे का जोड़ सही से विकसित नहीं होने के कारण एक पैर दूसरे से छोटा दिख सकता है। जांघ या हिप के स्किन फोल्ड्स असमान होते हैं। बच्चे को पैर फैलाने में परेशानी होती है। चलने पर लंगड़ाहट दिख सकती है। सभी लक्षण ग्राफिक में देखिए-

सवाल- क्या DDH जन्म से ही होता है या बाद में भी डेवलप हो सकता है?

जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए-

  • जन्म के समय मौजूद हो सकता है, पर ऐसा हमेशा नहीं होता है।
  • कुछ मामलों में कूल्हे का जोड़ जन्म के बाद धीरे-धीरे असामान्य तरीके से विकसित हो सकता है।
  • इसलिए इसे डेवलपमेंटल कंडीशन कहा जाता है यानी शारीरिक विकास के साथ बदलने वाली कंडीशन।
  • इसलिए शुरुआती महीनों में स्क्रीनिंग बहुत जरूरी होती है।
  • समय पर डायग्नोसिस से इलाज सरल और सफल होता है।

सवाल- अगर DDH का समय पर इलाज न हो तो क्या हो सकता है?

जवाब- अगर DDH का सही समय पर इलाज न हो तो–

  • कूल्हे का जोड़ स्थायी रूप से डिसलोकेट हो सकता है।
  • चलने में लंगड़ाहट हो सकती है। व्यक्ति परमानेंट लंगड़ा हो सकता है।
  • खड़े होने और चलने में बैलेंस बिगड़ सकता है।
  • कूल्हे में दर्द और जकड़न बढ़ सकती है।

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  • शुरुआती स्टेज में पैवलिक हार्नेस (खास तरह का बेल्ट/सपोर्ट) से कूल्हे को सही पोजिशन में रखा जाता है।
  • 6 महीने के बाद ब्रेस या कास्टिंग (हिप्स सही पोजिशन में रखने के लिए सपोर्ट डिवाइस) की जरूरत पड़ सकती है।
  • गंभीर मामलों में सर्जरी की जाती है।
  • जल्दी इलाज मिलने से पूरी तरह ठीक होने की संभावना होती है।
  • देर से डायग्नोसिस होने पर इलाज थोड़ा मुश्किल हो सकता है।

सवाल- DDH का शुरुआती इलाज इतना जरूरी क्यों है?

जवाब- शुरुआती महीनों में हिप आसानी से सही पोजिशन में लाया जा सकता है, क्योंकि इस उम्र में हड्डियां डेवलपिंग स्टेज में होती हैं। समय से इलाज मिलने पर-

  • सर्जरी की नौबत नहीं आती है।
  • बच्चे का विकास सामान्य रहता है। वह आराम से चल-फिर सकता है।
  • दर्द व लंगड़ाहट जैसे कॉम्प्लिकेशन रोके जा सकते हैं।
  • भविष्य में जॉइंट डैमेज का रिस्क कम होता है।
  • देर होने पर जॉइंट सख्त और अस्थिर हो जाता है तो इलाज में मुश्किल होती है।

सवाल- क्या बड़े बच्चों या एडल्ट्स में भी यह समस्या हो सकती है?

जवाब- हां, DDH की समस्या बड़े बच्चों या एडल्ट्स में भी दिख सकती है।

  • यह आमतौर पर बचपन में अनडायग्नोज्ड रह जाने पर बाद में सामने आती है।
  • इसके कारण कम उम्र में ही ऑस्टियोआर्थराइटिस (जोड़ों की बीमारी) हो सकता है।

सवाल- पेरेंट्स को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, ताकि बच्चों को DDH से बचाया जा सके?

जवाब- बच्चे की टांगों को कसकर सीधा बांधने से बचें यानी सेफ स्वैडलिंग करें।

  • ‘न्यू बॉर्न चेकअप’ नियमित रूप से कराएं।
  • बच्चे के पैरों की मूवमेंट पर ध्यान दें।
  • किसी भी असामान्यता पर तुरंत डॉक्टर से मिलें।
  • बेबी कैरिअर्स में हिप-फ्रेंडली पोजिशन रखें (M-शेप में)।
  • अगर फैमिली हिस्ट्री हो तो एक्स्ट्रा स्क्रीनिंग करवाएं।
  • अवेयरनेस और समय पर स्क्रीनिंग सबसे जरूरी है।

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अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन (AHA) और अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी (ACC) ने कोलेस्ट्रॉल पर नई गाइडलाइन जारी की है। यह अपडेट इसलिए अहम है, क्योंकि इसने कोलेस्ट्रॉल के पुराने पैरामीटर्स को पूरी तरह बदल दिया है। आगे पढ़िए…

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