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मोबाइल का स्क्रीन बच्चों को बना रहा वर्चुअल ऑटिज्म का शिकार, नहीं हो पा रहा समाजिक विकास, एक्सपर्ट से जाने बचाव का तरीका

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माता-पिता की व्यस्तता और डिजिटल बेबीसिटिंग की आदत ने बच्चों को वर्चुअल ऑटिज्म की ओर धकेल दिया है. विशेषज्ञों की मानें तो यह कोई जन्मजात विकार नहीं, बल्कि ज्यादा स्क्रीन टाइम के चलते पैदा हुई एक गंभीर स्थिति है. इसका असर बच्चों के तंत्रिका तंत्र पर सबसे ज्यादा होता है. देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार उपाध्याय का कहना है कि यह बात गलत है कि बच्चों और युवाओं की रुचि किताबों की तरफ कम हो रही हैं, ऐसा नहीं है बल्कि उनकी रुचि का स्वरूप बदल रहा है.

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देहरादून: एक दौर था जब बच्चों का बचपन रंगीन कॉमिक्स के पन्नों, चंदामामा की कहानियों और चाचा चौधरी के दिमाग की फुर्ती के बीच बीतता था. वे किताबें केवल कागज का टुकड़ा नहीं थीं, बल्कि बच्चों की कल्पनाशीलता को पंख देने का ज़रिया थीं और वहीं से बच्चे में रीडिंग हैबिट पैदा होती थी लेकिन आज, तकनीक के शोर ने उस मासूमियत को खामोश कर दिया है. आज के समय में मोबाइल फोन बच्चों का सबसे करीबी साथी बन गया है.

वर्चुअल ऑटिज्म बच्चों के लिए खतरा

माता-पिता की व्यस्तता और डिजिटल बेबीसिटिंग की आदत ने बच्चों को वर्चुअल ऑटिज्म की ओर धकेल दिया है. विशेषज्ञों की मानें तो यह कोई जन्मजात विकार नहीं, बल्कि ज्यादा स्क्रीन टाइम के चलते पैदा हुई एक गंभीर स्थिति है. इसका असर बच्चों के तंत्रिका तंत्र पर सबसे ज्यादा होता है. देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार उपाध्याय का कहना है कि यह बात गलत है कि बच्चों और युवाओं की रुचि किताबों की तरफ कम हो रही हैं, ऐसा नहीं है बल्कि उनकी रुचि का स्वरूप बदल रहा है. उन्होंने कहा मेरी पीढ़ी में अगर छुपी हुई किताबों को पढ़ने का दौर था लेकिन अब यह बच्चे गैजेट्स के साथ चीजों को सीखती है.

नहीं हो पाता है बच्चों का सामाजिक विकास

देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल की मनोवैज्ञानिक डॉ जया नवानी बताती हैं कि आज के समय में पेरेंट्स अपना समय बचाने और बच्चों को व्यस्त करने के लिए उसे फोन देते हैं. ऐसे में उसका स्क्रीन टाइम बढ़ जाता है लेकिन उसका सामाजिक विकास नहीं हो पता है और वह लोगों से ज्यादा बातचीत नहीं करता है. बच्चा जब मानवीय संवेदनाओं की बजाय निर्जीव स्क्रीन से जुड़ जाता है. वह बाहरी दुनिया से कटकर वर्चुअल दुनिया में सिमटा रह जाता है, उसका बौद्धिक विकास नहीं हो पाता है. उन्होंने बताया कि जब आपका बच्चा आई कॉन्टेक्ट न कर सके,आप इसे उसे बुलाएं तो कोई प्रतिक्रिया न दे और अपने काम में लगा रहे तो यह वर्चुअल ऑटिज्म होने की ओर संकेत दे सकता है. इसलिए आप अपने लाडले को इसका शिकार न होने दे. उसके साथ वक्त बताएं, आउटडोर गेम्स में लगाइए जिससे उसका दिमाग ही नहीं शेयर भी फिट रहेगा.

About the Author

Rajneesh Kumar Yadav

मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें

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देहरादून: एक दौर था जब बच्चों का बचपन रंगीन कॉमिक्स के पन्नों, चंदामामा की कहानियों और चाचा चौधरी के दिमाग की फुर्ती के बीच बीतता था. वे किताबें केवल कागज का टुकड़ा नहीं थीं, बल्कि बच्चों की कल्पनाशीलता को पंख देने का ज़रिया थीं और वहीं से बच्चे में रीडिंग हैबिट पैदा होती थी लेकिन आज, तकनीक के शोर ने उस मासूमियत को खामोश कर दिया है. आज के समय में मोबाइल फोन बच्चों का सबसे करीबी साथी बन गया है.

वर्चुअल ऑटिज्म बच्चों के लिए खतरा

माता-पिता की व्यस्तता और डिजिटल बेबीसिटिंग की आदत ने बच्चों को वर्चुअल ऑटिज्म की ओर धकेल दिया है. विशेषज्ञों की मानें तो यह कोई जन्मजात विकार नहीं, बल्कि ज्यादा स्क्रीन टाइम के चलते पैदा हुई एक गंभीर स्थिति है. इसका असर बच्चों के तंत्रिका तंत्र पर सबसे ज्यादा होता है. देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार उपाध्याय का कहना है कि यह बात गलत है कि बच्चों और युवाओं की रुचि किताबों की तरफ कम हो रही हैं, ऐसा नहीं है बल्कि उनकी रुचि का स्वरूप बदल रहा है. उन्होंने कहा मेरी पीढ़ी में अगर छुपी हुई किताबों को पढ़ने का दौर था लेकिन अब यह बच्चे गैजेट्स के साथ चीजों को सीखती है.

नहीं हो पाता है बच्चों का सामाजिक विकास

देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल की मनोवैज्ञानिक डॉ जया नवानी बताती हैं कि आज के समय में पेरेंट्स अपना समय बचाने और बच्चों को व्यस्त करने के लिए उसे फोन देते हैं. ऐसे में उसका स्क्रीन टाइम बढ़ जाता है लेकिन उसका सामाजिक विकास नहीं हो पता है और वह लोगों से ज्यादा बातचीत नहीं करता है. बच्चा जब मानवीय संवेदनाओं की बजाय निर्जीव स्क्रीन से जुड़ जाता है. वह बाहरी दुनिया से कटकर वर्चुअल दुनिया में सिमटा रह जाता है, उसका बौद्धिक विकास नहीं हो पाता है. उन्होंने बताया कि जब आपका बच्चा आई कॉन्टेक्ट न कर सके,आप इसे उसे बुलाएं तो कोई प्रतिक्रिया न दे और अपने काम में लगा रहे तो यह वर्चुअल ऑटिज्म होने की ओर संकेत दे सकता है. इसलिए आप अपने लाडले को इसका शिकार न होने दे. उसके साथ वक्त बताएं, आउटडोर गेम्स में लगाइए जिससे उसका दिमाग ही नहीं शेयर भी फिट रहेगा.

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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें

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