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Kashmir Pahalgam Terror Attack Anniversary; Baisaran Valley

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नई दिल्ली30 मिनट पहलेलेखक: रमेश पाल

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आज पहलगाम आतंकी हमले को एक साल हो गया। इससे पहले ही कश्मीर के सभी टूरिस्ट स्पॉट्स पर सुरक्षा बढ़ा दी गई। सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट पर हैं। घाटी में काम करने वाले हर पोनी, सर्विस प्रोवाइडर, लोकल गाइड के लिए QR कोड बेस्ड स्पेशल चेकिंग सिस्टम बनाया गया है।

22 अप्रैल 2025 को हुए हमले में आतंकियों ने बैसरन घाटी में घूमने आए सैलानियों पर अंधाधुंध गोलीबारी की थी। इस गोलीबारी में 26 लोगों की मौत हुई थी।

इधर, आतंकी हमले को याद करते हुए पीएम मोदी ने एक पोस्ट में लिखा है-

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पिछले साल आज ही के दिन पहलगाम में हुए भयानक आतंकी हमले में जान गंवाने वाले निर्दोष लोगों को याद कर रहा हूं। उन्हें कभी भुलाया नहीं जाएगा। एक राष्ट्र के तौर पर, हम दुख और संकल्प में एकजुट हैं। भारत आतंकवाद के किसी भी रूप के आगे कभी नहीं झुकेगा। आतंकवादियों के नापाक मंसूबे कभी कामयाब नहीं होंगे।”

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आतंकी हमले की बरसी पर भारतीय सेना के 2 बयान…

  • पहला बयान: कुछ हदें कभी नहीं लांघनी चाहिए। भारत कुछ नहीं भूला। जब इंसानियत की हदें पार की जाती हैं, तो मुंहतोड़ जवाब दिया जाता है। न्याय हो चुका है। भारत एकजुट है।
  • दूसरा बयान: भारत के खिलाफ किए गए हर कृत्य का जवाब मिलना तय है। न्याय जरूर मिलेगा। हमेशा मिलेगा। ऑपरेशन सिंदूर जारी है।

बैसरन में बना स्मारक…

बैसरन घाटी में बना मेमोरियल। इस पर उन लोगों के नाम हैं, जिन्हें आतंकियों ने गोलियों से भून दिया था।

बैसरन घाटी में बना मेमोरियल। इस पर उन लोगों के नाम हैं, जिन्हें आतंकियों ने गोलियों से भून दिया था।

अब पढ़िए उन 4 घरों की दास्तान जहां सन्नाटा आज भी चीखता है…

1. लेफ्टिनेंट विनय नरवाल वक्त गुजरा है, पर मानो दर्द वहीं ठहरा है

पहलगाम में जान गंवाने वाले हरियाणा के करनाल निवासी 26 साल लेफ्टिनेंट विनय नरवाल की 6 दिन पहले शादी हुई थी। वे पत्नी हिमांशी के सा​थ कश्मीर गए थे। माता-पिता के इकलौते बेटे थे। तीन साल पहले ही नौसेना में भर्ती हुए थे।

‘बेटा देवदूत की तरह आया और चला गया… अब तो बस उसकी यादों का अंतहीन सफर बाकी है।’ करनाल के सेक्टर-7 में जब राजेश नरवाल अपने शहीद बेटे नेवी लेफ्टिनेंट विनय नरवाल का जिक्र करते हैं, तो गला रुंध जाता है और शब्द आंसुओं में ढलने लगते हैं।

वे बताते हैं- शादी की तैयारियों के बीच विनय, उनके मामा और मैं शॉपिंग के लिए दिल्ली जा रहे थे। तब विनय ने रास्ते में फ्यूचर प्लान बताया था। उसने कहा था कि उसने तय किया हुआ है कि बच्चों के नाम क्या होंगे। इन्वेस्टमेंट का क्या प्लान है।

50 साल की उम्र के बाद जिंदगी कैसी होगी…। उसने घर को भी दोबारा से बनाने की बात कही थी। हमारा दर्द तो मानो उसी मंजर में ठहर गया है, रह-रहकर दिल रो उठता है। इस गहरे दुख के बीच श्रीमद्भागवत गीता का पाठ ही हमारा एकमात्र संबल है।

पिता को गर्व है कि सरकार ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब दिया, पर उनकी एक टीस बाकी है। वे चाहते हैं, विनय की स्मृति में किसी मेडिकल कॉलेज या यूनिवर्सिटी का नाम रखा जाए, ताकि उसकी सेवा भावना अमर रहे। 1 मई को विनय के जन्मदिन पर परिवार रक्तदान शिविर लगाकर अपने ‘देवदूत’ को याद करेगा।

2. बितान अधिकारी के घर में अब मिठाइयां नहीं बनाई जातीं

कोलकाता के रहने वाले 40 साल के बितान अधिकारी सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे। वे अमेरिका के फ्लोरिडा में टीसीएस में कार्यरत थे। पत्नी और 3 साल के बेटे के साथ छुट्टियां मनाने कश्मीर गए थे। पत्नी व बच्चे के सामने उन्हें गोली मारी गई।

‘अब किसके लिए बनाऊं? जो खाने का शौकीन था, वही चला गया…’ दक्षिण कोलकाता के सूने घर में 75 वर्षीय माया अधिकारी के ये शब्द उनके दर्द को बयां करते हैं। 22 अप्रैल 2025 को बेटे बितान अधिकारी की मौत की खबर ने परिवार को तोड़ दिया। अमेरिका से लौटे बितान ने 15 अप्रैल को ‘पोइला बैसाख’ पर मां से मिलकर आने का वादा किया था, लेकिन घर लौटा उसका शव।

एक साल बाद भी मां का दुख कम नहीं हुआ है। वे कहती हैं कि अब न दूध पीती हैं, न मिठाई बनाती हैं—क्योंकि खाने वाला ही नहीं रहा। 2016 में अमेरिका गए बितान ने 2018 में यह घर बनवाया था और घर की हर चीज उसी ने खरीदी थी। उनकी कोई तस्वीर घर में नहीं रखी गई, क्योंकि उसे देखना मां के लिए असहनीय है। माया अधिकारी बहू से फोन पर बात करती हैं, जो पति को खोने के बाद छोटे बच्चे की जिम्मेदारी संभाल रही है। वे अपने गुरुदेव की पूजा कर इस दुख से उबरने की कोशिश कर रही हैं और 22 अप्रैल को बेटे की याद में घर पर पूजा करेंगी।

3. शुभम द्विवेदी का परिवार हर महीने 22 तारीख को भोज कराता है

कानपुर के रहने वाले 30 साल के कारोबारी शुभम द्विवेदी और ऐशन्या की दो महीने पहले ही शादी हुई थी। परिवार के 11 लोगों के साथ वे पहलगाम गए ​थे। आतंकियों ने पहले उनका नाम पूछा, फिर सिर में गोली मारकर हत्या कर दी।

‘लाइफ पार्टनर के सामने उसके हसबैंड को मार दिया जाए, तो उसे कोई कभी नहीं भूल सकता। ये जिंदगीभर का दुख है।’ कानपुर की ऐशन्या कहती हैं, ‘मुझे नहीं लगता कि मैं कोई एक पल आपको बता पाऊंगी, क्योंकि जब आप किसी को खो देते हो तो हर दिन मुश्किल हो जाता है। चाहे त्योहार हो या एनिवर्सरी।

हमारी शादी के दो महीने ही हुए थे। मैंने उसके साथ कोई एनिवर्सरी नहीं मनाई, न ही कोई त्योहार। जब कभी कुछ अच्छा काम करती हूं, तो बताने का मन होता है, फिर लगता है किससे बताऊं। सबसे ज्यादा 26 फरवरी को शुभम के जन्मदिन और 12 फरवरी को जिस दिन हमारी शादी हुई थी, उस दिन उसकी बहुत ज्यादा याद आई।’

वहीं, पिता संजय द्विवेदी ऑफिस में बेटे की तस्वीर निहारने के बाद ही काम शुरू करते हैं। वे हर महीने की 22 तारीख को शुभम की याद में गांव में भोज कराते हैं। वे कहते हैं- 22 अप्रैल को कानपुर में शुभम को श्रद्धांजलि देने के लिए एक कार्यक्रम किया जा रहा है।

कानपुर के लोगों ने जो साहस, सहयोग और ताकत हमें दी है, उससे हम उस दुख को झेल पाए हैं। हमने शुभम को शहीद का दर्जा देने की मांग की थी और अब भी कर रहे हैं। विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने शुभम के पैतृक गांव में एक गेट भी बनवाया है।

4. संतोष जगदाले ने बेटी को बचाया, लेकिन खुद मारे गए

पहलगाम में जान गंवाने वाले महाराष्ट्र के पुणे निवासी 50 साल के इंटीरियर डिजाइनर संतोष जगदाले परिवार और एक दोस्त के साथ घूमने गए थे। उन्होंने बहादुरी दिखाते हुए आतंकियों का सामना किया और अपनी बेटी की जान बचाते हुए मारे गए। उनके दोस्त की भी मौत हो गई। उनका बलिदान अब परिवार की प्रेरणा है।

‘पापा ने आखिरी पल में भी हिम्मत दी… ‘डरो मत, मैं हूं’ कहते हुए वे हमारे लिए खड़े रहे।’ पहलगाम हमले में पिता संतोष जगदाले को खोने वाली आसावरी जगदाले यह बताते हुए भावुक हो जाती हैं। परिवार के साथ घूमने गए वे पल उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गए। बैसरन घाटी की खूबसूरती के बीच अचानक हुए हमले में परिवार का सहारा ही खत्म हो गया। मां का संसार एक पल में टूट गया और दादी ने अपना बेटा खो दिया। ‘एक बेटी के लिए पिता ही उसका हीरो होता है, हमारे लिए वही सब कुछ थे,’ यह कहते हुए आसावरी की आवाज भर आती है।

शुरुआत में उनके पास बहुत कम पैसे थे, बाद में सरकारी मदद मिली, लेकिन मानसिक दर्द कहीं ज्यादा गहरा था। करीब साढ़े 11 महीने तक संघर्ष करने के बाद उन्हें पुणे नगर निगम में नौकरी मिली, जिससे परिवार को सहारा मिला। आसावरी कहती हैं, ‘पापा आज साथ नहीं हैं, लेकिन उनके शब्द हमेशा मेरे साथ हैं।’ आसावरी ने इस दर्दनाक अनुभव के बाद समाज के लिए कुछ करने का संकल्प लिया है। उन्होंने तय किया है कि अपने वेतन का एक हिस्सा जरूरतमंदों पर खर्च करेंगी। ‘अब घर की जिम्मेदारी मेरी है और देशसेवा ही मेरा पहला लक्ष्य है,’ वे दृढ़ता से कहती हैं।

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यह खबर भी पढ़ें…

पहलगाम हमले की पहली बरसी- बैसरन आज भी बंद: सेना बोली- भारत कुछ नहीं भूला; जो हदें लांघेगा उसे मुंहतोड़ जवाब मिलेगा

श्रीनगर से करीब 95 किमी दूर बैसरन घाटी में 22 अप्रैल 2025 को 26 लोगों को आतंकियों ने गोलियों से भून दिया था। तब से यह घाटी बंद है। बैसरन घाटी में किसी को भी एक तय सीमा से आगे जाने की इजाजत नहीं है। भारतीय सेना ने X हैंडल पर एक पोस्ट में आतंकियों और उनके रहनुमाओं को चेतावनी दी और लिखा- भारत कुछ नहीं भूला है। पढ़ें पूरी खबर…

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नई दिल्ली30 मिनट पहलेलेखक: रमेश पाल

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आज पहलगाम आतंकी हमले को एक साल हो गया। इससे पहले ही कश्मीर के सभी टूरिस्ट स्पॉट्स पर सुरक्षा बढ़ा दी गई। सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट पर हैं। घाटी में काम करने वाले हर पोनी, सर्विस प्रोवाइडर, लोकल गाइड के लिए QR कोड बेस्ड स्पेशल चेकिंग सिस्टम बनाया गया है।

22 अप्रैल 2025 को हुए हमले में आतंकियों ने बैसरन घाटी में घूमने आए सैलानियों पर अंधाधुंध गोलीबारी की थी। इस गोलीबारी में 26 लोगों की मौत हुई थी।

इधर, आतंकी हमले को याद करते हुए पीएम मोदी ने एक पोस्ट में लिखा है-

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पिछले साल आज ही के दिन पहलगाम में हुए भयानक आतंकी हमले में जान गंवाने वाले निर्दोष लोगों को याद कर रहा हूं। उन्हें कभी भुलाया नहीं जाएगा। एक राष्ट्र के तौर पर, हम दुख और संकल्प में एकजुट हैं। भारत आतंकवाद के किसी भी रूप के आगे कभी नहीं झुकेगा। आतंकवादियों के नापाक मंसूबे कभी कामयाब नहीं होंगे।”

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आतंकी हमले की बरसी पर भारतीय सेना के 2 बयान…

  • पहला बयान: कुछ हदें कभी नहीं लांघनी चाहिए। भारत कुछ नहीं भूला। जब इंसानियत की हदें पार की जाती हैं, तो मुंहतोड़ जवाब दिया जाता है। न्याय हो चुका है। भारत एकजुट है।
  • दूसरा बयान: भारत के खिलाफ किए गए हर कृत्य का जवाब मिलना तय है। न्याय जरूर मिलेगा। हमेशा मिलेगा। ऑपरेशन सिंदूर जारी है।

बैसरन में बना स्मारक…

बैसरन घाटी में बना मेमोरियल। इस पर उन लोगों के नाम हैं, जिन्हें आतंकियों ने गोलियों से भून दिया था।

बैसरन घाटी में बना मेमोरियल। इस पर उन लोगों के नाम हैं, जिन्हें आतंकियों ने गोलियों से भून दिया था।

अब पढ़िए उन 4 घरों की दास्तान जहां सन्नाटा आज भी चीखता है…

1. लेफ्टिनेंट विनय नरवाल वक्त गुजरा है, पर मानो दर्द वहीं ठहरा है

पहलगाम में जान गंवाने वाले हरियाणा के करनाल निवासी 26 साल लेफ्टिनेंट विनय नरवाल की 6 दिन पहले शादी हुई थी। वे पत्नी हिमांशी के सा​थ कश्मीर गए थे। माता-पिता के इकलौते बेटे थे। तीन साल पहले ही नौसेना में भर्ती हुए थे।

‘बेटा देवदूत की तरह आया और चला गया… अब तो बस उसकी यादों का अंतहीन सफर बाकी है।’ करनाल के सेक्टर-7 में जब राजेश नरवाल अपने शहीद बेटे नेवी लेफ्टिनेंट विनय नरवाल का जिक्र करते हैं, तो गला रुंध जाता है और शब्द आंसुओं में ढलने लगते हैं।

वे बताते हैं- शादी की तैयारियों के बीच विनय, उनके मामा और मैं शॉपिंग के लिए दिल्ली जा रहे थे। तब विनय ने रास्ते में फ्यूचर प्लान बताया था। उसने कहा था कि उसने तय किया हुआ है कि बच्चों के नाम क्या होंगे। इन्वेस्टमेंट का क्या प्लान है।

50 साल की उम्र के बाद जिंदगी कैसी होगी…। उसने घर को भी दोबारा से बनाने की बात कही थी। हमारा दर्द तो मानो उसी मंजर में ठहर गया है, रह-रहकर दिल रो उठता है। इस गहरे दुख के बीच श्रीमद्भागवत गीता का पाठ ही हमारा एकमात्र संबल है।

पिता को गर्व है कि सरकार ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब दिया, पर उनकी एक टीस बाकी है। वे चाहते हैं, विनय की स्मृति में किसी मेडिकल कॉलेज या यूनिवर्सिटी का नाम रखा जाए, ताकि उसकी सेवा भावना अमर रहे। 1 मई को विनय के जन्मदिन पर परिवार रक्तदान शिविर लगाकर अपने ‘देवदूत’ को याद करेगा।

2. बितान अधिकारी के घर में अब मिठाइयां नहीं बनाई जातीं

कोलकाता के रहने वाले 40 साल के बितान अधिकारी सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे। वे अमेरिका के फ्लोरिडा में टीसीएस में कार्यरत थे। पत्नी और 3 साल के बेटे के साथ छुट्टियां मनाने कश्मीर गए थे। पत्नी व बच्चे के सामने उन्हें गोली मारी गई।

‘अब किसके लिए बनाऊं? जो खाने का शौकीन था, वही चला गया…’ दक्षिण कोलकाता के सूने घर में 75 वर्षीय माया अधिकारी के ये शब्द उनके दर्द को बयां करते हैं। 22 अप्रैल 2025 को बेटे बितान अधिकारी की मौत की खबर ने परिवार को तोड़ दिया। अमेरिका से लौटे बितान ने 15 अप्रैल को ‘पोइला बैसाख’ पर मां से मिलकर आने का वादा किया था, लेकिन घर लौटा उसका शव।

एक साल बाद भी मां का दुख कम नहीं हुआ है। वे कहती हैं कि अब न दूध पीती हैं, न मिठाई बनाती हैं—क्योंकि खाने वाला ही नहीं रहा। 2016 में अमेरिका गए बितान ने 2018 में यह घर बनवाया था और घर की हर चीज उसी ने खरीदी थी। उनकी कोई तस्वीर घर में नहीं रखी गई, क्योंकि उसे देखना मां के लिए असहनीय है। माया अधिकारी बहू से फोन पर बात करती हैं, जो पति को खोने के बाद छोटे बच्चे की जिम्मेदारी संभाल रही है। वे अपने गुरुदेव की पूजा कर इस दुख से उबरने की कोशिश कर रही हैं और 22 अप्रैल को बेटे की याद में घर पर पूजा करेंगी।

3. शुभम द्विवेदी का परिवार हर महीने 22 तारीख को भोज कराता है

कानपुर के रहने वाले 30 साल के कारोबारी शुभम द्विवेदी और ऐशन्या की दो महीने पहले ही शादी हुई थी। परिवार के 11 लोगों के साथ वे पहलगाम गए ​थे। आतंकियों ने पहले उनका नाम पूछा, फिर सिर में गोली मारकर हत्या कर दी।

‘लाइफ पार्टनर के सामने उसके हसबैंड को मार दिया जाए, तो उसे कोई कभी नहीं भूल सकता। ये जिंदगीभर का दुख है।’ कानपुर की ऐशन्या कहती हैं, ‘मुझे नहीं लगता कि मैं कोई एक पल आपको बता पाऊंगी, क्योंकि जब आप किसी को खो देते हो तो हर दिन मुश्किल हो जाता है। चाहे त्योहार हो या एनिवर्सरी।

हमारी शादी के दो महीने ही हुए थे। मैंने उसके साथ कोई एनिवर्सरी नहीं मनाई, न ही कोई त्योहार। जब कभी कुछ अच्छा काम करती हूं, तो बताने का मन होता है, फिर लगता है किससे बताऊं। सबसे ज्यादा 26 फरवरी को शुभम के जन्मदिन और 12 फरवरी को जिस दिन हमारी शादी हुई थी, उस दिन उसकी बहुत ज्यादा याद आई।’

वहीं, पिता संजय द्विवेदी ऑफिस में बेटे की तस्वीर निहारने के बाद ही काम शुरू करते हैं। वे हर महीने की 22 तारीख को शुभम की याद में गांव में भोज कराते हैं। वे कहते हैं- 22 अप्रैल को कानपुर में शुभम को श्रद्धांजलि देने के लिए एक कार्यक्रम किया जा रहा है।

कानपुर के लोगों ने जो साहस, सहयोग और ताकत हमें दी है, उससे हम उस दुख को झेल पाए हैं। हमने शुभम को शहीद का दर्जा देने की मांग की थी और अब भी कर रहे हैं। विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने शुभम के पैतृक गांव में एक गेट भी बनवाया है।

4. संतोष जगदाले ने बेटी को बचाया, लेकिन खुद मारे गए

पहलगाम में जान गंवाने वाले महाराष्ट्र के पुणे निवासी 50 साल के इंटीरियर डिजाइनर संतोष जगदाले परिवार और एक दोस्त के साथ घूमने गए थे। उन्होंने बहादुरी दिखाते हुए आतंकियों का सामना किया और अपनी बेटी की जान बचाते हुए मारे गए। उनके दोस्त की भी मौत हो गई। उनका बलिदान अब परिवार की प्रेरणा है।

‘पापा ने आखिरी पल में भी हिम्मत दी… ‘डरो मत, मैं हूं’ कहते हुए वे हमारे लिए खड़े रहे।’ पहलगाम हमले में पिता संतोष जगदाले को खोने वाली आसावरी जगदाले यह बताते हुए भावुक हो जाती हैं। परिवार के साथ घूमने गए वे पल उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गए। बैसरन घाटी की खूबसूरती के बीच अचानक हुए हमले में परिवार का सहारा ही खत्म हो गया। मां का संसार एक पल में टूट गया और दादी ने अपना बेटा खो दिया। ‘एक बेटी के लिए पिता ही उसका हीरो होता है, हमारे लिए वही सब कुछ थे,’ यह कहते हुए आसावरी की आवाज भर आती है।

शुरुआत में उनके पास बहुत कम पैसे थे, बाद में सरकारी मदद मिली, लेकिन मानसिक दर्द कहीं ज्यादा गहरा था। करीब साढ़े 11 महीने तक संघर्ष करने के बाद उन्हें पुणे नगर निगम में नौकरी मिली, जिससे परिवार को सहारा मिला। आसावरी कहती हैं, ‘पापा आज साथ नहीं हैं, लेकिन उनके शब्द हमेशा मेरे साथ हैं।’ आसावरी ने इस दर्दनाक अनुभव के बाद समाज के लिए कुछ करने का संकल्प लिया है। उन्होंने तय किया है कि अपने वेतन का एक हिस्सा जरूरतमंदों पर खर्च करेंगी। ‘अब घर की जिम्मेदारी मेरी है और देशसेवा ही मेरा पहला लक्ष्य है,’ वे दृढ़ता से कहती हैं।

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श्रीनगर से करीब 95 किमी दूर बैसरन घाटी में 22 अप्रैल 2025 को 26 लोगों को आतंकियों ने गोलियों से भून दिया था। तब से यह घाटी बंद है। बैसरन घाटी में किसी को भी एक तय सीमा से आगे जाने की इजाजत नहीं है। भारतीय सेना ने X हैंडल पर एक पोस्ट में आतंकियों और उनके रहनुमाओं को चेतावनी दी और लिखा- भारत कुछ नहीं भूला है। पढ़ें पूरी खबर…

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