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Workplace Perfectionism Impact; Career Performance Reviews

Workplace Perfectionism Impact; Career Performance Reviews
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19 मिनट पहले

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सवाल- मैं 29 साल का हूं और एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता हूं। मैं बचपन से ही बिल्कुल परफेक्शनिस्ट रहा हूं। हर छोटी-छोटी चीज की एकदम डिटेल में चला जाता हूं। टीम के लोग कहते हैं कि मैं अनावश्यक रूप से काम को खींचता हूं।

लेकिन प्रॉब्लम ये है कि अगर काम 100% परफेक्ट न हो तो मैं सबमिट ही नहीं कर पाता। इस चक्कर में डेडलाइन मिस हो जाती है। परफेक्ट न कर पाने और डेडलाइन मिस करने के डर से मैं नए प्रोजेक्ट नहीं लेता। अब इसका असर मेरे परफॉर्मेंस रिव्यू और करियर पर पड़ रहा है। अच्छा करने की कोशिश में मेरे करियर को नुकसान हो रहा है। मैं बैलेंस कैसे बनाऊं?

एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।

सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। आप जो बता रहे हैं, वह सिर्फ ‘ज्यादा मेहनती’ या ‘डिटेल पर ध्यान देने वाला’ होने की बात नहीं है। शुरू में परफेक्शन की आदत आपको आगे बढ़ाती है, लेकिन जब यही आदत काम पूरा करने से रोकने लगे, डेडलाइन मिस होने लगे और नए मौके लेने से डर लगने लगे—तो हमें इसे थोड़ा अलग तरीके से समझने की जरूरत है।

हेल्दी परफेक्शनिज्म

अपने लिए हाई स्टैंडर्ड रखना अपने आप में कोई समस्या नहीं है। परफेक्शनिज्म एक अच्छी बात हो सकती है, अगर वो हेल्दी परफेक्शनिज्म हो। जैसेकि यह आपको-

  • अनुशासित बनाता है।
  • अपने काम में गर्व महसूस कराता है।
  • एक जिम्मेदार व्यक्ति बनाता है।
  • डिटेलिंग पर ध्यान देना सिखाता है।
  • अच्छा काम करने की प्रेरणा देता है।

ये सभी बहुत अच्छे गुण हैं, जो आपकी ग्रोथ में मदद करते हैं।

अनहेल्दी परफेक्शनिज्म

लेकिन अब सवाल ये है कि हेल्दी परफेक्शनिज्म कब अनहेल्दी यानी नुकसानदायक परफेक्शनिज्म में बदल जाता है। समस्या तब शुरू होती है, जब आपके हाई स्टैंडर्ड्स के साथ एक तरह का डर जुड़ जाता है। तब व्यक्ति अच्छा और परफेक्ट काम सिर्फ अच्छा करने के लिए नहीं करता। वो ये काम किसी डर से करता है। जैसेकि-

  • गलती होने का डर
  • लोगों की आलोचना का डर
  • शर्मिंदगी का डर
  • ये डर कि “मैं अच्छा नहीं हूं।”

आपके भीतर क्या चल रहा है?

इसके पीछे अक्सर कुछ छिपे हुए विश्वास काम कर रहे होते हैं। जैसेकि-

  • “अगर मैं परफेक्ट काम करूंगा, तभी लोग मुझे स्वीकार करेंगे।”
  • “तभी मुझे सम्मान मिलेगा।”
  • “तभी मैं सुरक्षित या कंट्रोल में रहूंगा।”

और इसके उलट ये डर सताता है-

  • “अगर गलती हुई तो लोग मुझे जज करेंगे।”
  • “मुझे शर्मिंदगी होगी।”
  • “लोग मुझे कमतर समझेंगे।”

ऐसा सोचने पर व्यक्ति सच को बहुत सीमित फ्रेम में देखने लगता है। जैसकि–

  • परफेक्ट या फेल
  • तारीफ या शर्मिंदगी
  • मंजूरी या रिजेक्शन
  • आसमान या गर्त

इसका असर काम पर कैसे दिखता है?

इन मानसिकता का असर काम पर भी पड़ता है और धीरे-धीरे कुछ पैटर्न बनने लगते हैं। सभी पैटर्न नीचे ग्राफिक में देखें–

बाहर से देखकर लगता है कि यह “बहुत मेहनत” का काम है, लेकिन अगर भीतर उतरकर देखें तो यहां एंग्जाइटी और सेल्फ डाउट का एक खेल चल रहा होता होता है। नीचे ग्राफिक में हेल्दी और अनहेल्दी परफेक्शनिज्म का फर्क देखें।

इस केस में साफ है—

  • परफेक्शनिज्म अब आपकी मदद नहीं कर रहा, बल्कि आपके परफॉर्मेंस को नुकसान पहुंचा रहा है।
  • डेडलाइन मिस होना, नए काम से बचना और डिटेल में फंस जाना—ये संकेत हैं कि स्टैंडर्ड्स अब काम की जरूरत के अनुसार नहीं हैं।
  • समस्या क्षमता की नहीं है, बल्कि ‘गलती का डर’ इतना बढ़ गया है कि काम पूरा करने की क्षमता दब गई है।
  • अच्छा काम, परफेक्ट काम के पीछे कुर्बान हो रहा है।

आपका परफेक्शनिज्म अच्छा है या नुकसानदायक

करें सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट

यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक में कुल 16 सवाल हैं। इन सवालों को 0 से 4 के स्केल पर रेट करें और अंत में अपने स्कोर की एनालिसिस करें। अगर आपका टोटल स्कोर 49 से ज्यादा है तो आपको प्रोफेशनल हेल्प लेनी चाहिए।

CBT आधारित मैनेजमेंट प्लान

1. परफेक्शनिस्ट सोच को पहचानना और बदलना

काम करते समय रुककर देखें- आपके दिमाग में क्या चल रहा है?

  • “परफेक्ट नहीं है तो मैं सबमिट नहीं कर सकता।”
  • “अगर गलती हुई तो मेरी इमेज खराब हो जाएगी।”

नोट: ये विचार अक्सर अपने-आप आते हैं, लेकिन इन्हें नोटिस करना जरूरी है।

खुद से सवाल पूछें (रियलिटी चेक)

हर विचार को तुरंत सच मानने के बजाय सवाल करें—

  • क्या सच में ऐसा पहले हुआ है?
  • क्या हर छोटी गलती पर लोग मुझे जज करते हैं?
  • क्या कोई ऐसा उदाहरण है, जब ‘परफेक्ट’ न होने पर भी काम ठीक चला?

नोट: इससे आपको दिखेगा कि आपका डर अक्सर चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहा होता है।

बैलेंस्ड सोच बनाएं

अब उसी सोच को थोड़ा संतुलित तरीके से बदलें—

  • “काम उपयोगी और समझ में आने वाला होना चाहिए, हर बार परफेक्ट होना जरूरी नहीं।”
  • “समय पर अच्छा काम देना, देर से परफेक्ट काम देने से बेहतर है।”

नोट: यह सोच आपको आगे बढ़ने में मदद करती है, रोकती नहीं है।

100% की जगह ‘काफी अच्छा’ सोचें

खुद से सवाल पूछें—

  • “क्या ये काम अपने मकसद को पूरा कर रहा है?”
  • “क्या इससे सामने वाले को जरूरी जानकारी मिल रही है?”

नोट: अगर जवाब ‘हां’ है, तो इसका मतलब है कि काम तैयार है।

डेली यूज के लिए छोटा सा अभ्यास

जब भी अटकें तो ये 3 स्टेप फॉलो करें:

  • मैं अभी क्या सोच रहा हूं?
  • क्या यह पूरी तरह सच है या मेरा डर है?
  • इसका एक ज्यादा संतुलित जवाब क्या हो सकता है?

याद रखने वाली जरूरी बात

“आपका लक्ष्य परफेक्ट बनना नहीं, बल्कि काम को समय पर और प्रभावी तरीके से पूरा करना है।”

2. ब्लैक-एंड-व्हाइट सोच छोड़ें

आप जीवन को ब्लैक-एंड-व्हाइट तरीके से देखते और सोचते हैं। जैसे-

  • ये बेस्ट है या वर्स्ट है।
  • छोटी सी गलती मतलब पूरा काम खराब।
  • काम पूरा होने पर भी संतुष्टि नहीं।

इस सोच को बदलने के लिए ये स्टेप फॉलो करें।

1. सवाल बदलें

गलत सवाल- “क्या ये परफेक्ट है?”

सही सवाल– “क्या ये सही और उपयोगी है?”

नोट: इससे फोकस क्वालिटी से हटकर उपयोगिता पर आता है।

2. ‘काफी अच्छा’ को स्वीकार करें

हर काम 100% परफेक्ट होना जरूरी नहीं, 80–90% तक अच्छा होना काफी है।

नोट: सोचें कि क्या यह काम अपने उद्देश्य को पूरा कर रहा है? अगर हां, तो यह पर्याप्त है।

3. स्केल में सोचना शुरू करें (0–10)

परफेक्ट/फेल की जगह खुद से पूछें—

“यह काम 10 में से कितना है?”

अगर जवाब 7–8 है, तो यह अच्छा काम है

नोट: इससे सोच में संतुलन आता है। मध्यम मार्ग समझ में आता है।

4. गलती को ‘फेलियर’ नहीं, ‘फीडबैक’ मानें

  • हर गलती सीखने के प्रोसेस का हिस्सा है।
  • गलती का मतलब ये नहीं कि पूरा काम खराब है।

नोट: इस सोच से डर कम होता है और आप आगे बढ़ पाते हैं।

3. काम की अहमियत के अनुसार मेहनत करें

काम को तीन श्रेणियों में बांटें–

1. हाई प्रिऑरिटी– ‘बेहतरीन काम’

  • ऐसे काम जो आपके करियर, टीम या रिजल्ट पर सीधा असर डालते हैं।
  • जैसे प्रेजेंटेशन, क्लाइंट रिपोर्ट, परफॉर्मेंस से जुड़ा काम
  • इसमें डिटेलिंग, क्वालिटी और समय, तीनों पर ध्यान दें
  • यहां अपना बेस्ट दें।

सोच: “यह काम मेरी पहचान दिखाता है, इसे बेस्ट करना जरूरी है।”

2. मीडियम प्रिऑरिटी– “अच्छा और साफ काम”

  • ऐसे काम जो जरूरी हैं, लेकिन उनमें परफेक्शन की जरूरत नहीं।
  • जैसे: इंटरनल अपडेट्स, टीम नोट्स, सामान्य रिपोर्ट।
  • काम स्पष्ट, सही और समझ में आने वाला होना चाहिए।
  • अनावश्यक डिटेलिंग में न उलझें।

सोच: “यह काम सही होना चाहिए, पर परफेक्ट होना जरूरी नहीं है।”

3. लो प्रिऑरिटी– “बस पूरा करना”

  • ऐसे काम जिनका असर बहुत कम है।
  • जैसे: रूटीन ईमेल, छोटे टास्क, फॉर्म भरना
  • जल्दी और सिंपल तरीके से खत्म करें।
  • यहां ज्यादा सोचने/सुधारने की जरूरत नहीं है।

सोच: इंपॉर्टेंस के हिसाब से इस काम को ज्यादा वक्त देना सही नहीं है।”

4. पहले से तय करें “काम कब पूरा है”

प्रॉब्लम- हमें पता ही नहीं होता कि काम कब “पूरा” माना जाए। इसलिए हम उसे बार-बार सुधारते रहते हैं।

सॉल्यूशन- काम शुरू करने से पहले उसकी टाइम लाइन तय करें।

1. पहले क्लियर करें– क्या करना है

  • काम का उद्देश्य तय करें।
  • क्या-क्या शामिल होगा, क्या नहीं।

सोच: “मुझे बस इतना करना है, इससे ज्यादा नहीं।”

2. समय पहले तय करें

हर काम के लिए एक लिमिट सेट करें, जैसे-

ईमेल: 10 मिनट

रिपोर्ट: 30–40 मिनट

सोच: समय तय होने से आप अनावश्यक डिटेल में नहीं फंसते।

3. समय पूरा होते ही रुकें

  • चाहे थोड़ा सुधार बाकी लगे, फिर भी रुक जाएं।
  • जरूरत हो तो सिर्फ एक क्विक रिव्यू करें और सबमिट करें।

सोच: ये आदत अनहेल्दी परफेक्शनिज्म को कंट्रोल करती है

याद रखने वाली बात

“अगर “खत्म होने की लाइन” तय नहीं होगी तो काम कभी खत्म नहीं होगा। समय पर पूरा काम, देरी के परफेक्ट काम से बेहतर है।”

5. एक्सपेरिमेंट करें

प्रॉब्लम: परफेक्शनिज्म में हमारा दिमाग मान लेता है कि अगर काम 100% परफेक्ट नहीं हुआ, तो जरूर कुछ गलत होगा।

सॉल्यूशन: इस डर को तोड़ने का सबसे अच्छा तरीका है- छोटे-छोटे एक्सपेरिमेंट करना।

एक्सपेरिमेंट कैसे करें?

  • जानबूझकर 85–90% पर रुकें
  • काम को अच्छा, साफ बनाएं, लेकिन परफेक्ट बनाने में समय/ऊर्जा न लगाएं।

सोच: “यह काम पर्याप्त अच्छा है, अब इसे भेज सकता हूं।”

6. क्रॉस चेकिंग कम करें

बार-बार चेक करने से काम बेहतर नहीं होता, सिर्फ लेट होता है। इसलिए नियम बनाएं:

  • 1 बार कंटेंट देखें।
  • 1 बार एरर/गलतियां देखें।
  • फिर सीधे सबमिट करें

7. बचने की आदत छोड़ें

  • डर की वजह से काम को टालते रहना परफेक्शनिज्म को बढ़ाता है।
  • हर हफ्ते जानबूझकर एक नया काम लें।
  • बड़े काम को छोटे हिस्सों में बांटें।

सोच: “पूरा नहीं, छोटा हिस्सा शुरू करता हूं।”

8. सेल्फ-वर्थ को काम से अलग रखें

गलत सोच: काम से मेरी पहचान है। काम खराब हुआ तो इसका मतलब कि मैं ही खराब हूं।

सही सोच: मेरी पहचान सिर्फ मेरे काम से नहीं है। मैं परफेक्शन की कोशिश करता हूं। उससे मेरा महत्व तय नहीं होता।

9. ताकत रखें, जिद छोड़ें

रखें:

  • अनुशासन
  • मेहनत
  • गुणवत्ता

छोड़ें:

  • डर
  • देरी
  • बार-बार चेक करना

डेली प्रैक्टिस

हर दिन के अंत में खुद से पूछें—

  • आज मैंने क्या पूरा किया?
  • कहां जरूरत से ज्यादा समय लगाया?
  • क्या वह सच में जरूरी था?

नोट: यही छोटे बदलाव धीरे-धीरे बड़ा फर्क लाते हैं।

निष्कर्ष

परफेक्शन की चाह अच्छी है, लेकिन जब यह रुकावट बनने लगे तो समस्या बन जाती है। लक्ष्य “हर बार परफेक्ट” नहीं, बल्कि “समय पर अच्छा काम” होना चाहिए। जब आप 100% की जिद छोड़कर 80–90% पर फोकस करते हैं, तो काम की स्पीड, आत्मविश्वास और मौके, तीनों बढ़ते हैं। इसलिए जीवन में सबसे जरूरी चीज है संतुलन, जिसे बुद्ध ने मध्यम मार्ग कहा है।

……………… ये खबर भी पढ़िए मेंटल हेल्थ- भीड़ में भी अकेली हूं:कोई मुझे समझता नहीं, किसी को मेरी परवाह नहीं, सब हैं, लेकिन दिल का साथी कोई नहीं, क्या करूं?

इमोशनल लोनलीनेस (भावनात्मक अकेलापन) आज मेंटल हेल्थ डिसकशन का एक महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। पहली नजर में यह साधारण ‘अकेलेपन’ जैसा लगता है, लेकिन मनोविज्ञान इसे कहीं अधिक गहराई से समझता है। आगे पढ़िए…

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19 मिनट पहले

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सवाल- मैं 29 साल का हूं और एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता हूं। मैं बचपन से ही बिल्कुल परफेक्शनिस्ट रहा हूं। हर छोटी-छोटी चीज की एकदम डिटेल में चला जाता हूं। टीम के लोग कहते हैं कि मैं अनावश्यक रूप से काम को खींचता हूं।

लेकिन प्रॉब्लम ये है कि अगर काम 100% परफेक्ट न हो तो मैं सबमिट ही नहीं कर पाता। इस चक्कर में डेडलाइन मिस हो जाती है। परफेक्ट न कर पाने और डेडलाइन मिस करने के डर से मैं नए प्रोजेक्ट नहीं लेता। अब इसका असर मेरे परफॉर्मेंस रिव्यू और करियर पर पड़ रहा है। अच्छा करने की कोशिश में मेरे करियर को नुकसान हो रहा है। मैं बैलेंस कैसे बनाऊं?

एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।

सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। आप जो बता रहे हैं, वह सिर्फ ‘ज्यादा मेहनती’ या ‘डिटेल पर ध्यान देने वाला’ होने की बात नहीं है। शुरू में परफेक्शन की आदत आपको आगे बढ़ाती है, लेकिन जब यही आदत काम पूरा करने से रोकने लगे, डेडलाइन मिस होने लगे और नए मौके लेने से डर लगने लगे—तो हमें इसे थोड़ा अलग तरीके से समझने की जरूरत है।

हेल्दी परफेक्शनिज्म

अपने लिए हाई स्टैंडर्ड रखना अपने आप में कोई समस्या नहीं है। परफेक्शनिज्म एक अच्छी बात हो सकती है, अगर वो हेल्दी परफेक्शनिज्म हो। जैसेकि यह आपको-

  • अनुशासित बनाता है।
  • अपने काम में गर्व महसूस कराता है।
  • एक जिम्मेदार व्यक्ति बनाता है।
  • डिटेलिंग पर ध्यान देना सिखाता है।
  • अच्छा काम करने की प्रेरणा देता है।

ये सभी बहुत अच्छे गुण हैं, जो आपकी ग्रोथ में मदद करते हैं।

अनहेल्दी परफेक्शनिज्म

लेकिन अब सवाल ये है कि हेल्दी परफेक्शनिज्म कब अनहेल्दी यानी नुकसानदायक परफेक्शनिज्म में बदल जाता है। समस्या तब शुरू होती है, जब आपके हाई स्टैंडर्ड्स के साथ एक तरह का डर जुड़ जाता है। तब व्यक्ति अच्छा और परफेक्ट काम सिर्फ अच्छा करने के लिए नहीं करता। वो ये काम किसी डर से करता है। जैसेकि-

  • गलती होने का डर
  • लोगों की आलोचना का डर
  • शर्मिंदगी का डर
  • ये डर कि “मैं अच्छा नहीं हूं।”

आपके भीतर क्या चल रहा है?

इसके पीछे अक्सर कुछ छिपे हुए विश्वास काम कर रहे होते हैं। जैसेकि-

  • “अगर मैं परफेक्ट काम करूंगा, तभी लोग मुझे स्वीकार करेंगे।”
  • “तभी मुझे सम्मान मिलेगा।”
  • “तभी मैं सुरक्षित या कंट्रोल में रहूंगा।”

और इसके उलट ये डर सताता है-

  • “अगर गलती हुई तो लोग मुझे जज करेंगे।”
  • “मुझे शर्मिंदगी होगी।”
  • “लोग मुझे कमतर समझेंगे।”

ऐसा सोचने पर व्यक्ति सच को बहुत सीमित फ्रेम में देखने लगता है। जैसकि–

  • परफेक्ट या फेल
  • तारीफ या शर्मिंदगी
  • मंजूरी या रिजेक्शन
  • आसमान या गर्त

इसका असर काम पर कैसे दिखता है?

इन मानसिकता का असर काम पर भी पड़ता है और धीरे-धीरे कुछ पैटर्न बनने लगते हैं। सभी पैटर्न नीचे ग्राफिक में देखें–

बाहर से देखकर लगता है कि यह “बहुत मेहनत” का काम है, लेकिन अगर भीतर उतरकर देखें तो यहां एंग्जाइटी और सेल्फ डाउट का एक खेल चल रहा होता होता है। नीचे ग्राफिक में हेल्दी और अनहेल्दी परफेक्शनिज्म का फर्क देखें।

इस केस में साफ है—

  • परफेक्शनिज्म अब आपकी मदद नहीं कर रहा, बल्कि आपके परफॉर्मेंस को नुकसान पहुंचा रहा है।
  • डेडलाइन मिस होना, नए काम से बचना और डिटेल में फंस जाना—ये संकेत हैं कि स्टैंडर्ड्स अब काम की जरूरत के अनुसार नहीं हैं।
  • समस्या क्षमता की नहीं है, बल्कि ‘गलती का डर’ इतना बढ़ गया है कि काम पूरा करने की क्षमता दब गई है।
  • अच्छा काम, परफेक्ट काम के पीछे कुर्बान हो रहा है।

आपका परफेक्शनिज्म अच्छा है या नुकसानदायक

करें सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट

यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक में कुल 16 सवाल हैं। इन सवालों को 0 से 4 के स्केल पर रेट करें और अंत में अपने स्कोर की एनालिसिस करें। अगर आपका टोटल स्कोर 49 से ज्यादा है तो आपको प्रोफेशनल हेल्प लेनी चाहिए।

CBT आधारित मैनेजमेंट प्लान

1. परफेक्शनिस्ट सोच को पहचानना और बदलना

काम करते समय रुककर देखें- आपके दिमाग में क्या चल रहा है?

  • “परफेक्ट नहीं है तो मैं सबमिट नहीं कर सकता।”
  • “अगर गलती हुई तो मेरी इमेज खराब हो जाएगी।”

नोट: ये विचार अक्सर अपने-आप आते हैं, लेकिन इन्हें नोटिस करना जरूरी है।

खुद से सवाल पूछें (रियलिटी चेक)

हर विचार को तुरंत सच मानने के बजाय सवाल करें—

  • क्या सच में ऐसा पहले हुआ है?
  • क्या हर छोटी गलती पर लोग मुझे जज करते हैं?
  • क्या कोई ऐसा उदाहरण है, जब ‘परफेक्ट’ न होने पर भी काम ठीक चला?

नोट: इससे आपको दिखेगा कि आपका डर अक्सर चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहा होता है।

बैलेंस्ड सोच बनाएं

अब उसी सोच को थोड़ा संतुलित तरीके से बदलें—

  • “काम उपयोगी और समझ में आने वाला होना चाहिए, हर बार परफेक्ट होना जरूरी नहीं।”
  • “समय पर अच्छा काम देना, देर से परफेक्ट काम देने से बेहतर है।”

नोट: यह सोच आपको आगे बढ़ने में मदद करती है, रोकती नहीं है।

100% की जगह ‘काफी अच्छा’ सोचें

खुद से सवाल पूछें—

  • “क्या ये काम अपने मकसद को पूरा कर रहा है?”
  • “क्या इससे सामने वाले को जरूरी जानकारी मिल रही है?”

नोट: अगर जवाब ‘हां’ है, तो इसका मतलब है कि काम तैयार है।

डेली यूज के लिए छोटा सा अभ्यास

जब भी अटकें तो ये 3 स्टेप फॉलो करें:

  • मैं अभी क्या सोच रहा हूं?
  • क्या यह पूरी तरह सच है या मेरा डर है?
  • इसका एक ज्यादा संतुलित जवाब क्या हो सकता है?

याद रखने वाली जरूरी बात

“आपका लक्ष्य परफेक्ट बनना नहीं, बल्कि काम को समय पर और प्रभावी तरीके से पूरा करना है।”

2. ब्लैक-एंड-व्हाइट सोच छोड़ें

आप जीवन को ब्लैक-एंड-व्हाइट तरीके से देखते और सोचते हैं। जैसे-

  • ये बेस्ट है या वर्स्ट है।
  • छोटी सी गलती मतलब पूरा काम खराब।
  • काम पूरा होने पर भी संतुष्टि नहीं।

इस सोच को बदलने के लिए ये स्टेप फॉलो करें।

1. सवाल बदलें

गलत सवाल- “क्या ये परफेक्ट है?”

सही सवाल– “क्या ये सही और उपयोगी है?”

नोट: इससे फोकस क्वालिटी से हटकर उपयोगिता पर आता है।

2. ‘काफी अच्छा’ को स्वीकार करें

हर काम 100% परफेक्ट होना जरूरी नहीं, 80–90% तक अच्छा होना काफी है।

नोट: सोचें कि क्या यह काम अपने उद्देश्य को पूरा कर रहा है? अगर हां, तो यह पर्याप्त है।

3. स्केल में सोचना शुरू करें (0–10)

परफेक्ट/फेल की जगह खुद से पूछें—

“यह काम 10 में से कितना है?”

अगर जवाब 7–8 है, तो यह अच्छा काम है

नोट: इससे सोच में संतुलन आता है। मध्यम मार्ग समझ में आता है।

4. गलती को ‘फेलियर’ नहीं, ‘फीडबैक’ मानें

  • हर गलती सीखने के प्रोसेस का हिस्सा है।
  • गलती का मतलब ये नहीं कि पूरा काम खराब है।

नोट: इस सोच से डर कम होता है और आप आगे बढ़ पाते हैं।

3. काम की अहमियत के अनुसार मेहनत करें

काम को तीन श्रेणियों में बांटें–

1. हाई प्रिऑरिटी– ‘बेहतरीन काम’

  • ऐसे काम जो आपके करियर, टीम या रिजल्ट पर सीधा असर डालते हैं।
  • जैसे प्रेजेंटेशन, क्लाइंट रिपोर्ट, परफॉर्मेंस से जुड़ा काम
  • इसमें डिटेलिंग, क्वालिटी और समय, तीनों पर ध्यान दें
  • यहां अपना बेस्ट दें।

सोच: “यह काम मेरी पहचान दिखाता है, इसे बेस्ट करना जरूरी है।”

2. मीडियम प्रिऑरिटी– “अच्छा और साफ काम”

  • ऐसे काम जो जरूरी हैं, लेकिन उनमें परफेक्शन की जरूरत नहीं।
  • जैसे: इंटरनल अपडेट्स, टीम नोट्स, सामान्य रिपोर्ट।
  • काम स्पष्ट, सही और समझ में आने वाला होना चाहिए।
  • अनावश्यक डिटेलिंग में न उलझें।

सोच: “यह काम सही होना चाहिए, पर परफेक्ट होना जरूरी नहीं है।”

3. लो प्रिऑरिटी– “बस पूरा करना”

  • ऐसे काम जिनका असर बहुत कम है।
  • जैसे: रूटीन ईमेल, छोटे टास्क, फॉर्म भरना
  • जल्दी और सिंपल तरीके से खत्म करें।
  • यहां ज्यादा सोचने/सुधारने की जरूरत नहीं है।

सोच: इंपॉर्टेंस के हिसाब से इस काम को ज्यादा वक्त देना सही नहीं है।”

4. पहले से तय करें “काम कब पूरा है”

प्रॉब्लम- हमें पता ही नहीं होता कि काम कब “पूरा” माना जाए। इसलिए हम उसे बार-बार सुधारते रहते हैं।

सॉल्यूशन- काम शुरू करने से पहले उसकी टाइम लाइन तय करें।

1. पहले क्लियर करें– क्या करना है

  • काम का उद्देश्य तय करें।
  • क्या-क्या शामिल होगा, क्या नहीं।

सोच: “मुझे बस इतना करना है, इससे ज्यादा नहीं।”

2. समय पहले तय करें

हर काम के लिए एक लिमिट सेट करें, जैसे-

ईमेल: 10 मिनट

रिपोर्ट: 30–40 मिनट

सोच: समय तय होने से आप अनावश्यक डिटेल में नहीं फंसते।

3. समय पूरा होते ही रुकें

  • चाहे थोड़ा सुधार बाकी लगे, फिर भी रुक जाएं।
  • जरूरत हो तो सिर्फ एक क्विक रिव्यू करें और सबमिट करें।

सोच: ये आदत अनहेल्दी परफेक्शनिज्म को कंट्रोल करती है

याद रखने वाली बात

“अगर “खत्म होने की लाइन” तय नहीं होगी तो काम कभी खत्म नहीं होगा। समय पर पूरा काम, देरी के परफेक्ट काम से बेहतर है।”

5. एक्सपेरिमेंट करें

प्रॉब्लम: परफेक्शनिज्म में हमारा दिमाग मान लेता है कि अगर काम 100% परफेक्ट नहीं हुआ, तो जरूर कुछ गलत होगा।

सॉल्यूशन: इस डर को तोड़ने का सबसे अच्छा तरीका है- छोटे-छोटे एक्सपेरिमेंट करना।

एक्सपेरिमेंट कैसे करें?

  • जानबूझकर 85–90% पर रुकें
  • काम को अच्छा, साफ बनाएं, लेकिन परफेक्ट बनाने में समय/ऊर्जा न लगाएं।

सोच: “यह काम पर्याप्त अच्छा है, अब इसे भेज सकता हूं।”

6. क्रॉस चेकिंग कम करें

बार-बार चेक करने से काम बेहतर नहीं होता, सिर्फ लेट होता है। इसलिए नियम बनाएं:

  • 1 बार कंटेंट देखें।
  • 1 बार एरर/गलतियां देखें।
  • फिर सीधे सबमिट करें

7. बचने की आदत छोड़ें

  • डर की वजह से काम को टालते रहना परफेक्शनिज्म को बढ़ाता है।
  • हर हफ्ते जानबूझकर एक नया काम लें।
  • बड़े काम को छोटे हिस्सों में बांटें।

सोच: “पूरा नहीं, छोटा हिस्सा शुरू करता हूं।”

8. सेल्फ-वर्थ को काम से अलग रखें

गलत सोच: काम से मेरी पहचान है। काम खराब हुआ तो इसका मतलब कि मैं ही खराब हूं।

सही सोच: मेरी पहचान सिर्फ मेरे काम से नहीं है। मैं परफेक्शन की कोशिश करता हूं। उससे मेरा महत्व तय नहीं होता।

9. ताकत रखें, जिद छोड़ें

रखें:

  • अनुशासन
  • मेहनत
  • गुणवत्ता

छोड़ें:

  • डर
  • देरी
  • बार-बार चेक करना

डेली प्रैक्टिस

हर दिन के अंत में खुद से पूछें—

  • आज मैंने क्या पूरा किया?
  • कहां जरूरत से ज्यादा समय लगाया?
  • क्या वह सच में जरूरी था?

नोट: यही छोटे बदलाव धीरे-धीरे बड़ा फर्क लाते हैं।

निष्कर्ष

परफेक्शन की चाह अच्छी है, लेकिन जब यह रुकावट बनने लगे तो समस्या बन जाती है। लक्ष्य “हर बार परफेक्ट” नहीं, बल्कि “समय पर अच्छा काम” होना चाहिए। जब आप 100% की जिद छोड़कर 80–90% पर फोकस करते हैं, तो काम की स्पीड, आत्मविश्वास और मौके, तीनों बढ़ते हैं। इसलिए जीवन में सबसे जरूरी चीज है संतुलन, जिसे बुद्ध ने मध्यम मार्ग कहा है।

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