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India-Russia Urea Plant to Cut Mideast Dependence

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नई दिल्ली26 मिनट पहले

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यूरिया संकट के बीच भारत और रूस ने जॉइंट वेंचर में फर्टिलाइजर प्लांट लगाने की प्रक्रिया तेज कर दी हैं। यह प्लांट रूस में लगाया जा रहा है जो अगले दो साल में बनकर तैयार हो जाएगा। इसे लेकर हाल ही में एक भारतीय दल ने रूस का दौरा किया है।

भारत और रूस के इस साझा प्रोजेक्ट में करीब 20 हजार करोड़ रुपए का निवेश होना है। रूस में लगने वाले 20 लाख टन क्षमता के यूरिया प्रोजेक्ट में इंडियन पोटाश लिमिटेड, RCF और NFL शामिल हैं। इस प्रोजेक्ट के जरिए भारत खाद के आयात पर निर्भरता कम करना चाहता है।

मिडल-ईस्ट पर निर्भरता कम करने की तैयारी

भारत अपनी खेती के लिए नाइट्रोजन आधारित खाद ‘यूरिया’ पर बहुत ज्यादा निर्भर है। वर्तमान में भारत अपनी जरूरत का करीब 71% यूरिया मिडल-ईस्ट के देशों से आयात करता है।

भारत की 3 सरकारी कंपनियां प्रोजेक्ट में शामिल

भारतीय कंपनियां इंडियन पोटाश लिमिटेड (IPL), राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (RCFL) और नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (NFL) मिलकर ₹10 हजार करोड़ का निवेश करेंगी। बाकी के ₹10 हजार करोड़ रूस की केमिकल कंपनी ‘यूरालकेम ग्रुप’ लगाएगी।

भारत के लिए यूरिया का स्थायी स्रोत बनेगा प्लांट

इंडियन पोटाश के MD पीएस गहलोत ने कहा कि प्रोजेक्ट कंसल्टेंट PDIL ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। यह प्लांट भारत के लिए यूरिया का एक स्थायी स्रोत बनेगा।

प्रोजेक्ट्स एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड (PDIL) इस प्रोजेक्ट में की भूमिका निभा रहा है, जिसने प्लांट की डिजाइनिंग और व्यावहारिकता (Pre-feasibility report) तैयार की है।

प्रोजेक्ट्स एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड (PDIL) इस प्रोजेक्ट में की भूमिका निभा रहा है, जिसने प्लांट की डिजाइनिंग और व्यावहारिकता (Pre-feasibility report) तैयार की है।

भारत में यूरिया का उत्पादन कम, खपत ज्यादा

  • सालाना खपत: करीब 400 लाख मीट्रिक टन।
  • घरेलू उत्पादन: करीब 300 लाख मीट्रिक टन।
  • खाद की कमी: लगभग 100 लाख मीट्रिक टन।
  • इंपोर्ट पर खर्च: यूरिया की कमी को पूरा करने के लिए भारत पूरी तरह इम्पोर्ट पर निर्भर है। 2025 में भारत ने यूरिया आयात पर करीब ₹20 हजार करोड़ खर्च किए।

वैकल्पिक रास्तों से मंगाया जा रहा है यूरिया

अमेरिका-ईरान तनाव के कारण पैदा हुए संकट को देखते हुए सरकार ने 2026 के लिए 25 लाख टन यूरिया के आयात को मंजूरी दी है। यह सप्लाई ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ के रास्ते को छोड़कर अल्जीरिया, नाइजीरिया, ओमान और रूस से सीधे मंगवाई जा रही है।

2025 में पुतिन की भारत यात्रा में रखी थी प्रोजेक्ट की नींव

इस प्रोजेक्ट की नींव दिसंबर 2025 में रखी गई थी, जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आए थे। पीएम मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की मौजूदगी में दोनों देशों में MoU साइन हुआ था।

क्यों जरूरी है यूरिया?

यूरिया मिट्टी को जरूरी नाइट्रोजन देता है, जो पौधों के लिए जरूरी है। चावल, गेहूं और मक्के जैसी फसलों में सही मात्रा में यूरिया का इस्तेमाल पैदावार को 20 से 50% तक बढ़ा देता है। यही वजह है कि सरकार इसकी सप्लाई में कमी नहीं आने देना चाहती।

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भारत और रूस के इस साझा प्रोजेक्ट में करीब 20 हजार करोड़ रुपए का निवेश होना है। रूस में लगने वाले 20 लाख टन क्षमता के यूरिया प्रोजेक्ट में इंडियन पोटाश लिमिटेड, RCF और NFL शामिल हैं। इस प्रोजेक्ट के जरिए भारत खाद के आयात पर निर्भरता कम करना चाहता है।

मिडल-ईस्ट पर निर्भरता कम करने की तैयारी

भारत अपनी खेती के लिए नाइट्रोजन आधारित खाद ‘यूरिया’ पर बहुत ज्यादा निर्भर है। वर्तमान में भारत अपनी जरूरत का करीब 71% यूरिया मिडल-ईस्ट के देशों से आयात करता है।

भारत की 3 सरकारी कंपनियां प्रोजेक्ट में शामिल

भारतीय कंपनियां इंडियन पोटाश लिमिटेड (IPL), राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (RCFL) और नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (NFL) मिलकर ₹10 हजार करोड़ का निवेश करेंगी। बाकी के ₹10 हजार करोड़ रूस की केमिकल कंपनी ‘यूरालकेम ग्रुप’ लगाएगी।

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  • सालाना खपत: करीब 400 लाख मीट्रिक टन।
  • घरेलू उत्पादन: करीब 300 लाख मीट्रिक टन।
  • खाद की कमी: लगभग 100 लाख मीट्रिक टन।
  • इंपोर्ट पर खर्च: यूरिया की कमी को पूरा करने के लिए भारत पूरी तरह इम्पोर्ट पर निर्भर है। 2025 में भारत ने यूरिया आयात पर करीब ₹20 हजार करोड़ खर्च किए।

वैकल्पिक रास्तों से मंगाया जा रहा है यूरिया

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2025 में पुतिन की भारत यात्रा में रखी थी प्रोजेक्ट की नींव

इस प्रोजेक्ट की नींव दिसंबर 2025 में रखी गई थी, जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आए थे। पीएम मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की मौजूदगी में दोनों देशों में MoU साइन हुआ था।

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