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बेडू सिर्फ फल नहीं! पहाड़ों में इसे मानते हैं देसी दवा, मस्सों से लेकर पेट तक की परेशानी में करता है असर

बेडू सिर्फ फल नहीं! पहाड़ों में इसे मानते हैं देसी दवा, मस्सों से लेकर पेट तक की परेशानी में करता है असर

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Wild Fig Health Benefits: उत्तराखंड के पहाड़ों में पाया जाने वाला बेडू सिर्फ एक जंगली फल नहीं है, बल्कि यह अपने आप में एक चलती-फिरती औषधालय है. सदियों से पहाड़ी गांवों में लोग छोटी-मोटी बीमारियों और त्वचा की समस्याओं के लिए इसी पेड़ के ‘चोप’ (दूधिया रस) और फलों पर भरोसा करते आए हैं. चाहे जिद्दी मस्से हटाना हो या शरीर में चुभा बारीक कांटा बाहर निकालना, बेडू का यह रस हर मुश्किल का देसी समाधान माना जाता है.

बेडू के चोप का सबसे ज्यादा यूज मस्सों को हटाने के लिए किया जाता है. ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इसे सावधानी से मस्से पर लगाते हैं, मान्यता है कि लगातार कुछ दिनों तक लगाने पर मस्सा सूखने लगता है, धीरे-धीरे गिर सकता है. हालांकि इसे त्वचा के सामान्य हिस्से पर लगाने से जलन हो सकती है, इसलिए बहुत सावधानी जरूरी है. डॉ ऐजल पटेल ने लोकल 18 को बताया कि यदि मस्सा बड़ा हो, दर्द करे या रंग बदल रहा हो तो डॉक्टर को दिखाना चाहिए. फिर भी पहाड़ के गांवों में यह तरीका वर्षों से अपनाया जाता रहा है. यही कारण है कि बेडू को घरेलू देसी दवा के रूप में खास पहचान मिली हुई है.

Relief from minor cuts and injuries

स्थानीय जानकार किशन मलड़ा बताते हैं कि बेडू का चोप छोटे कट, छिलने या हल्की चोट पर भी लगाया जाता है. इससे घाव जल्दी सूखता है, भरने में मदद मिलती है. कई बुजुर्ग कहते हैं कि यह दर्द कम करने में भी सहायक महसूस होता है. हालांकि खुले और गहरे घाव पर इसका प्रयोग बिना सलाह के नहीं करना चाहिए. यदि घाव में सूजन, पस या ज्यादा दर्द हो तो तुरंत चिकित्सा लेनी चाहिए. गांवों में पुराने समय से जब अस्पताल दूर होते थे, तब ऐसे घरेलू उपायों का सहारा लिया जाता था. आज भी कई लोग प्राथमिक उपचार के रूप में इसे जानते हैं.

Use in boils and skin problems

बेडू के चोप को कुछ लोग फोड़े-फुंसी, दाद, खुजली और हल्के त्वचा संक्रमण में भी उपयोगी मानते हैं. ग्रामीण इलाकों में इसे बहुत कम मात्रा में प्रभावित स्थान पर लगाया जाता है. इससे त्वचा सूखती है, आराम मिल सकता है. लेकिन हर त्वचा अलग होती है, इसलिए कई लोगों को जलन या एलर्जी भी हो सकती है. ऐसे में पहले थोड़ी मात्रा में जांच करना बेहतर माना जाता है. यदि त्वचा लाल हो जाए या तेज जलन हो तो तुरंत बंद करना चाहिए. त्वचा रोग बढ़ने पर डॉक्टर की सलाह सबसे जरूरी मानी जाती है.

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Considered to be rich in nutrition

बेडू फल में कई प्राकृतिक पोषक तत्व पाए जाने की बात कही जाती है. इसमें फाइबर, प्राकृतिक शर्करा, सूक्ष्म पोषक तत्व और ऊर्जा देने वाले तत्व मौजूद होते हैं. पहाड़ों में मेहनत करने वाले लोग इसे मौसमी फल के रूप में खाते रहे हैं. यह शरीर को ताकत देने और कमजोरी दूर करने में सहायक माना जाता है. बच्चों और बुजुर्गों के लिए भी पका हुआ बेडू अच्छा विकल्प माना जाता है. स्थानीय लोग इसे प्रकृति का तोहफा बताते हैं. यदि इसे संतुलित आहार का हिस्सा बनाया जाए तो मौसमी फल के रूप में लाभ मिल सकता है.

Fruits beneficial for the digestive system

बेडू का पका फल खाने में स्वादिष्ट होने के साथ पाचन के लिए भी अच्छा माना जाता है. इसके सेवन से कब्ज, गैस और पेट भारी होने जैसी समस्याओं में राहत मिल सकती है. इसमें प्राकृतिक रेशा पाया जाता है, जो पेट साफ रखने में मदद करता है. पहाड़ों में लोग इसे सीजन के दौरान ताजा खाते हैं. कुछ लोग इसे सुखाकर भी उपयोग करते हैं. यदि सीमित मात्रा में खाया जाए तो यह शरीर को ऊर्जा भी देता है. हालांकि अधिक मात्रा में खाने से कुछ लोगों को पेट ढीला होने की परेशानी हो सकती है, इसलिए संतुलन जरूरी है.

Precautions are necessary before use

हालांकि बेडू फल और उसके चोप के कई पारंपरिक उपयोग बताए जाते हैं, लेकिन हर व्यक्ति पर असर अलग हो सकता है. चोप त्वचा पर तेज हो सकता है, इसलिए आंख, चेहरे या संवेदनशील हिस्सों से दूर रखना चाहिए. बच्चों और बुजुर्गों पर उपयोग से पहले सावधानी जरूरी है. यदि जलन, सूजन या एलर्जी हो तो तुरंत बंद कर देना चाहिए. किसी गंभीर बीमारी, बड़े घाव या लंबे समय की त्वचा समस्या में केवल घरेलू नुस्खों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. सही जानकारी और सावधानी से ही लाभ लिया जा सकता है.

Fruit associated with mountain culture

बेडू सिर्फ फल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति और लोकजीवन से भी जुड़ा है. कई लोकगीतों और कहावतों में इसका जिक्र मिलता है. गांवों में बच्चे पेड़ों से बेडू तोड़कर खाते थे, बुजुर्ग इसके गुण बताते थे. पहाड़ के पारंपरिक खानपान में यह फल खास स्थान रखता है. आज आधुनिक जीवनशैली के बीच कई लोग पुराने पौष्टिक फलों की ओर लौट रहे हैं. बेडू भी उन्हीं फलों में शामिल है, जिसकी पहचान अब फिर बढ़ रही है. बागेश्वर समेत कई क्षेत्रों में लोग इसे प्राकृतिक और देसी स्वास्थ्य विकल्प मानते हैं.

The old way to remove a thorn

पहाड़ के गांवों में बेडू के चोप का उपयोग शरीर में चुभे छोटे कांटे को बाहर निकालने के लिए भी किया जाता है. कांटा चुभने वाली जगह पर थोड़ा चोप लगाया जाता है, जिससे त्वचा नरम होती है, कांटा निकालना आसान हो जाता है. यह पारंपरिक तरीका आज भी कुछ गांवों में अपनाया जाता है. हालांकि यदि कांटा गहरा चला जाए, सूजन बढ़े या संक्रमण हो जाए तो डॉक्टर के पास जाना जरूरी है. बच्चों पर इसका उपयोग बहुत सावधानी से करना चाहिए. पुराने समय में घरेलू उपचारों में बेडू का यह उपयोग काफी लोकप्रिय माना जाता था.

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बेडू सिर्फ फल नहीं! पहाड़ों में इसे मानते हैं देसी दवा, मस्सों से लेकर पेट तक की परेशानी में करता है असर

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Wild Fig Health Benefits: उत्तराखंड के पहाड़ों में पाया जाने वाला बेडू सिर्फ एक जंगली फल नहीं है, बल्कि यह अपने आप में एक चलती-फिरती औषधालय है. सदियों से पहाड़ी गांवों में लोग छोटी-मोटी बीमारियों और त्वचा की समस्याओं के लिए इसी पेड़ के ‘चोप’ (दूधिया रस) और फलों पर भरोसा करते आए हैं. चाहे जिद्दी मस्से हटाना हो या शरीर में चुभा बारीक कांटा बाहर निकालना, बेडू का यह रस हर मुश्किल का देसी समाधान माना जाता है.

बेडू के चोप का सबसे ज्यादा यूज मस्सों को हटाने के लिए किया जाता है. ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इसे सावधानी से मस्से पर लगाते हैं, मान्यता है कि लगातार कुछ दिनों तक लगाने पर मस्सा सूखने लगता है, धीरे-धीरे गिर सकता है. हालांकि इसे त्वचा के सामान्य हिस्से पर लगाने से जलन हो सकती है, इसलिए बहुत सावधानी जरूरी है. डॉ ऐजल पटेल ने लोकल 18 को बताया कि यदि मस्सा बड़ा हो, दर्द करे या रंग बदल रहा हो तो डॉक्टर को दिखाना चाहिए. फिर भी पहाड़ के गांवों में यह तरीका वर्षों से अपनाया जाता रहा है. यही कारण है कि बेडू को घरेलू देसी दवा के रूप में खास पहचान मिली हुई है.

Relief from minor cuts and injuries

स्थानीय जानकार किशन मलड़ा बताते हैं कि बेडू का चोप छोटे कट, छिलने या हल्की चोट पर भी लगाया जाता है. इससे घाव जल्दी सूखता है, भरने में मदद मिलती है. कई बुजुर्ग कहते हैं कि यह दर्द कम करने में भी सहायक महसूस होता है. हालांकि खुले और गहरे घाव पर इसका प्रयोग बिना सलाह के नहीं करना चाहिए. यदि घाव में सूजन, पस या ज्यादा दर्द हो तो तुरंत चिकित्सा लेनी चाहिए. गांवों में पुराने समय से जब अस्पताल दूर होते थे, तब ऐसे घरेलू उपायों का सहारा लिया जाता था. आज भी कई लोग प्राथमिक उपचार के रूप में इसे जानते हैं.

Use in boils and skin problems

बेडू के चोप को कुछ लोग फोड़े-फुंसी, दाद, खुजली और हल्के त्वचा संक्रमण में भी उपयोगी मानते हैं. ग्रामीण इलाकों में इसे बहुत कम मात्रा में प्रभावित स्थान पर लगाया जाता है. इससे त्वचा सूखती है, आराम मिल सकता है. लेकिन हर त्वचा अलग होती है, इसलिए कई लोगों को जलन या एलर्जी भी हो सकती है. ऐसे में पहले थोड़ी मात्रा में जांच करना बेहतर माना जाता है. यदि त्वचा लाल हो जाए या तेज जलन हो तो तुरंत बंद करना चाहिए. त्वचा रोग बढ़ने पर डॉक्टर की सलाह सबसे जरूरी मानी जाती है.

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Considered to be rich in nutrition

बेडू फल में कई प्राकृतिक पोषक तत्व पाए जाने की बात कही जाती है. इसमें फाइबर, प्राकृतिक शर्करा, सूक्ष्म पोषक तत्व और ऊर्जा देने वाले तत्व मौजूद होते हैं. पहाड़ों में मेहनत करने वाले लोग इसे मौसमी फल के रूप में खाते रहे हैं. यह शरीर को ताकत देने और कमजोरी दूर करने में सहायक माना जाता है. बच्चों और बुजुर्गों के लिए भी पका हुआ बेडू अच्छा विकल्प माना जाता है. स्थानीय लोग इसे प्रकृति का तोहफा बताते हैं. यदि इसे संतुलित आहार का हिस्सा बनाया जाए तो मौसमी फल के रूप में लाभ मिल सकता है.

Fruits beneficial for the digestive system

बेडू का पका फल खाने में स्वादिष्ट होने के साथ पाचन के लिए भी अच्छा माना जाता है. इसके सेवन से कब्ज, गैस और पेट भारी होने जैसी समस्याओं में राहत मिल सकती है. इसमें प्राकृतिक रेशा पाया जाता है, जो पेट साफ रखने में मदद करता है. पहाड़ों में लोग इसे सीजन के दौरान ताजा खाते हैं. कुछ लोग इसे सुखाकर भी उपयोग करते हैं. यदि सीमित मात्रा में खाया जाए तो यह शरीर को ऊर्जा भी देता है. हालांकि अधिक मात्रा में खाने से कुछ लोगों को पेट ढीला होने की परेशानी हो सकती है, इसलिए संतुलन जरूरी है.

Precautions are necessary before use

हालांकि बेडू फल और उसके चोप के कई पारंपरिक उपयोग बताए जाते हैं, लेकिन हर व्यक्ति पर असर अलग हो सकता है. चोप त्वचा पर तेज हो सकता है, इसलिए आंख, चेहरे या संवेदनशील हिस्सों से दूर रखना चाहिए. बच्चों और बुजुर्गों पर उपयोग से पहले सावधानी जरूरी है. यदि जलन, सूजन या एलर्जी हो तो तुरंत बंद कर देना चाहिए. किसी गंभीर बीमारी, बड़े घाव या लंबे समय की त्वचा समस्या में केवल घरेलू नुस्खों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. सही जानकारी और सावधानी से ही लाभ लिया जा सकता है.

Fruit associated with mountain culture

बेडू सिर्फ फल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति और लोकजीवन से भी जुड़ा है. कई लोकगीतों और कहावतों में इसका जिक्र मिलता है. गांवों में बच्चे पेड़ों से बेडू तोड़कर खाते थे, बुजुर्ग इसके गुण बताते थे. पहाड़ के पारंपरिक खानपान में यह फल खास स्थान रखता है. आज आधुनिक जीवनशैली के बीच कई लोग पुराने पौष्टिक फलों की ओर लौट रहे हैं. बेडू भी उन्हीं फलों में शामिल है, जिसकी पहचान अब फिर बढ़ रही है. बागेश्वर समेत कई क्षेत्रों में लोग इसे प्राकृतिक और देसी स्वास्थ्य विकल्प मानते हैं.

The old way to remove a thorn

पहाड़ के गांवों में बेडू के चोप का उपयोग शरीर में चुभे छोटे कांटे को बाहर निकालने के लिए भी किया जाता है. कांटा चुभने वाली जगह पर थोड़ा चोप लगाया जाता है, जिससे त्वचा नरम होती है, कांटा निकालना आसान हो जाता है. यह पारंपरिक तरीका आज भी कुछ गांवों में अपनाया जाता है. हालांकि यदि कांटा गहरा चला जाए, सूजन बढ़े या संक्रमण हो जाए तो डॉक्टर के पास जाना जरूरी है. बच्चों पर इसका उपयोग बहुत सावधानी से करना चाहिए. पुराने समय में घरेलू उपचारों में बेडू का यह उपयोग काफी लोकप्रिय माना जाता था.

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