Tuesday, 04 Aug 2026 | 01:59 PM

Trending :

बंगाल में दो मुख्य चुनाव पर जीत हुमायूँ कबीर! बीजेपी सरकार में बाबरी मस्जिद जाएगी या सिर्फ वोटर्स की हिस्सेदारी

बंगाल में दो मुख्य चुनाव पर जीत हुमायूँ कबीर! बीजेपी सरकार में बाबरी मस्जिद जाएगी या सिर्फ वोटर्स की हिस्सेदारी

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक चेहरा सबसे बड़ी चर्चा का विषय बन गया- हुमायूं कबीर. ममता बनर्जी की टीएमसी से निलंबित इस नेता ने अपनी नवगठित आम जनता पार्टी (एजेयूपी) के बैनर पर न केवल रेजिनगर बल्कि नोएडा सीट पर भी शानदार जीत दर्ज की। मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने के वादे ने उन्हें बीजेपी बंगाल में एक बड़े संकट की ओर भी धकेल दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हुमायूँ कबीर अपने वादे को पूरा कर लेगा, या फिर बाबरी मस्जिद अगले 5-10 संतों का एक स्थायी आकर्षण बनकर रहेगा?

हुमायूँ कबीर की ऐतिहासिक जीत: बीजेपी और टीएमसी दोनों के लिए बड़ा झटका

हुमायूं कबीर ने 2026 के विधानसभा चुनाव में दो चरणों में जीत दर्ज कर बंगाल की राजनीति में भूचाल ला दिया। रेजीनगर सीट पर बिजनेस एसोसिएट बापन घोष को 58,876 से उन्होंने बड़े अंतर से हराया। कबीर को 1,23,536 वोट मिले, जबकि बीजेपी को सिर्फ 64,660 वोट मिले और टीएमसी 41,718 वोट के साथ तीसरे स्थान पर खिसक गई।

नौडा सीट पर भी कबीर ने बीजेपी के राणा मंडल को 27,943 से इंटरेस्ट से हराया। यह जीत बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि पूरे बंगाल में बीजेपी-टीएमसी के बाहर जो 6 लोग शामिल हुए, उनमें से सभी मुस्लिमों ने भाग लिया। इनमें अकेले हुमायूँ कबीर के नाम के दो दर्शन हैं। खुद कबीर ने यह जीत अल्पसंख्यकों के साथ होने पर अन्याय का जवाब देते हुए कहा कि उनकी पार्टी महज चार महीने पहले बनी थी, इसलिए यह बदनामी और भी खास है।

बाबरी मस्जिद का सपना: नींव रखी जाती है, लेकिन राह आसान नहीं

हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद की सूची को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। उन्होंने 6 दिसंबर 2025 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस की 33वीं मस्जिद के दिन मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में मस्जिद की रिकॉर्डिंग रखी। यह जमीन लगभग 11 एकड़ की निजी जमीन पर है और पूरे प्रोजेक्ट की लागत 86 करोड़ रुपये है। कबीर ने मस्जिद को दो साल में पूरा करने का दावा किया है और बांग्लादेश और मध्य पूर्व से धन मंत्रालय की मदद के लिए भी ली जा रही है।

लेकिन अब सबसे बड़ी बाधा यह है कि बंगाल में सत्ता परिवर्तन का भुगतान हो गया है और बीजेपी की सरकार आ गई है। गृह मंत्री अमित शाह ने साफा कह दिया के दौरान चुनावी प्रचार करते हुए कहा, ‘यह भारत है और यहां कोई भी आदमी बाबरी मस्जिद नहीं बना सकता।’ अगर बीजेपी की सरकार बनी है तो हम बंगाल की धरती पर बाबरी मस्जिद नहीं बनेंगे, इसके लिए हमें कुछ भी करना पड़ेगा।’

कानूनी-प्रशासकीय अवरोधों का जाल

हालांकि जमीन निजी है, लेकिन बीजेपी सरकार के पास निर्माण पर कई तरह से रोक है:

  • पहला रास्ता: भूमि उपयोग एवं भवन निर्माण का स्वामित्व है। कोई भी बड़ा धार्मिक ढाँचा बनाने के लिए स्थानीय नगर चोर और राज्य सरकार की अनुमति अनिवार्य है, जिसे भाजपा सरकार आसानी से रोक सकती है।
  • दूसरा रास्ता: शांति भंग और सांप्रदायिक तनाव का तर्क है। सरकार ने यह निष्कर्ष निकाला है कि इस क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव का खतरा है।
  • तीसरा रास्ता: प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और पशुपालन विभाग के लिए फंडिंग की जांच। कबीर पर पहले से ही उनके रिश्तेदार की फैक्ट्री से जुड़े होने का आरोप है और 10 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की गई है।

तो क्या अगले 5-10 सामुद्रिक बाजारों के निवेशक रहेंगे रहेंगे बाबरी मस्जिद?

यह प्रश्न और भी दिलचस्प हो जाता है। पॉलिटिकल शास्त्रियों का साफ मानना ​​है कि बाबरी मस्जिद का खंडहर बंगाल की राजनीति में एक स्थायी किस्सा रहेगा, जो हर चुनाव में गूंजता रहेगा। इसके कई ठोस कारण हैं:

  • हुमायूं कबीर के लिए इस मस्जिद ने अपनी पूरी राजनीति की धज्जियां उड़ा दी हैं। अगर वह पीछे हटते हैं तो उनके बीच की पूछताछ खत्म हो जाएगी। उनकी राजनीतिक मजबूरी उन्हें इस मुद्दे पर मजबूरन कायम रखने के लिए मजबूर करती है।
  • बीजेपी के लिए भी यह किसी भी आभूषण से कम नहीं है। मुर्शिदाबाद में 66% मुस्लिम आबादी है। बाबरी मस्जिद का विरोध, हिंदू झील वहां के ध्रुवीकरण का सबसे मजबूत हथियार बन गया है। 2021 में जहां बीजेपी को मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तरी डायनाजपुर की 43 सीटें मिलीं, वहीं 2026 में यह संख्या 19 हो गई। बीजेपी इस मुद्दे को आने वाले नगर निकाय और पंचायत चुनाव में भी शामिल करेगी।
  • कबीर ने अब खुद को अखिल भारतीय स्तर पर मुस्लिम अस्मिता की राजनीति का चेहरा बनाने की कोशिश शुरू कर दी है। असदुद्दीन ओवैसी के AIMIM से उनके गठबंधन (जो बाद में टूट गया) का कहना है कि वह सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं रहना चाहते। बाबरी मस्जिद न बनने की स्थिति में भी ये ‘मुसलमानों के साथ अन्याय’ और ‘बीजेपी के अनाचार’ की नैरेटिविटी को आगे बढ़ाने का मकसद बनेगा।
  • 2028 के मुस्लिम चुनाव और 2031 के अगले विधानसभा चुनाव में बाबरी मस्जिद का मामला एक बार फिर से केंद्र में बंटा, मस्जिद बनी हो या नहीं। बीजेपी दल और वाम दल भी इसे बीजेपी पर हमला करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं, जबकि बीजेपी इसे अपने अविश्वास के लिए कांग्रेस को मजबूत करने का उद्योग बनाएगी।

सोसाइटी, बीजेपी सरकार के नेतृत्व वाली बाबरी मस्जिद का निर्माण पूरा हो पाना मुश्किल लग रहा है। अगर कबीर कानूनी लड़ाई के जहाज़ हैं, तो यह मामला सागरों तक अदालतों में घिसटता रहेगा और 2030 तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आएगा। दूसरी ओर, भाजपा सरकार की हर कार्रवाई भाजपा को ‘मुस्लिम विरोधी’ साबित करने का मौका बनी रहेगी।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

लेटेस्ट टॉप अपडेट

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets
16 मार्च को 37 सीटों के लिए राज्यसभा चुनाव: पूर्ण कार्यक्रम देखें, सेवानिवृत्त होने वाले सांसदों के नाम और अधिक | राजनीति समाचार

February 18, 2026/
4:58 pm

आखरी अपडेट:फ़रवरी 18, 2026, 16:58 IST चुनाव 10 राज्यों में होंगे: महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, असम, छत्तीसगढ़, हरियाणा,...

RAS Mains 2024 Answer Book View & Download

June 22, 2026/
3:13 pm

राजस्थान लोक सेवा आयोग की ओर से राजस्थान राज्य एवं अधीनस्थ सेवाएं संयुक्त प्रतियोगी (मुख्य) परीक्षा- 2024 (RAS) के कैंडिडेट्स...

SSB Paramedical Recruitment 83 Posts UP

March 18, 2026/
8:00 pm

59 मिनट पहले कॉपी लिंक आज की सरकारी नौकरी में जानकारी IIFCL में ग्रेड ए की 37 वैकेंसी की, SSB...

मूवी रिव्यू:मुद्दे बड़े, स्टार्स दमदार… फिर भी अधूरी रह गई ‘कर्तव्य’, सैफ की मेहनत भी नहीं बचा पाई फिल्म

May 15, 2026/
2:42 pm

ओटीटी के दौर में ऐसी फिल्मों की कमी नहीं है जो समाज के कड़वे सच को सामने लाने का दावा...

राजनीति

बंगाल में दो मुख्य चुनाव पर जीत हुमायूँ कबीर! बीजेपी सरकार में बाबरी मस्जिद जाएगी या सिर्फ वोटर्स की हिस्सेदारी

बंगाल में दो मुख्य चुनाव पर जीत हुमायूँ कबीर! बीजेपी सरकार में बाबरी मस्जिद जाएगी या सिर्फ वोटर्स की हिस्सेदारी

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक चेहरा सबसे बड़ी चर्चा का विषय बन गया- हुमायूं कबीर. ममता बनर्जी की टीएमसी से निलंबित इस नेता ने अपनी नवगठित आम जनता पार्टी (एजेयूपी) के बैनर पर न केवल रेजिनगर बल्कि नोएडा सीट पर भी शानदार जीत दर्ज की। मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने के वादे ने उन्हें बीजेपी बंगाल में एक बड़े संकट की ओर भी धकेल दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हुमायूँ कबीर अपने वादे को पूरा कर लेगा, या फिर बाबरी मस्जिद अगले 5-10 संतों का एक स्थायी आकर्षण बनकर रहेगा?

हुमायूँ कबीर की ऐतिहासिक जीत: बीजेपी और टीएमसी दोनों के लिए बड़ा झटका

हुमायूं कबीर ने 2026 के विधानसभा चुनाव में दो चरणों में जीत दर्ज कर बंगाल की राजनीति में भूचाल ला दिया। रेजीनगर सीट पर बिजनेस एसोसिएट बापन घोष को 58,876 से उन्होंने बड़े अंतर से हराया। कबीर को 1,23,536 वोट मिले, जबकि बीजेपी को सिर्फ 64,660 वोट मिले और टीएमसी 41,718 वोट के साथ तीसरे स्थान पर खिसक गई।

नौडा सीट पर भी कबीर ने बीजेपी के राणा मंडल को 27,943 से इंटरेस्ट से हराया। यह जीत बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि पूरे बंगाल में बीजेपी-टीएमसी के बाहर जो 6 लोग शामिल हुए, उनमें से सभी मुस्लिमों ने भाग लिया। इनमें अकेले हुमायूँ कबीर के नाम के दो दर्शन हैं। खुद कबीर ने यह जीत अल्पसंख्यकों के साथ होने पर अन्याय का जवाब देते हुए कहा कि उनकी पार्टी महज चार महीने पहले बनी थी, इसलिए यह बदनामी और भी खास है।

बाबरी मस्जिद का सपना: नींव रखी जाती है, लेकिन राह आसान नहीं

हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद की सूची को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। उन्होंने 6 दिसंबर 2025 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस की 33वीं मस्जिद के दिन मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में मस्जिद की रिकॉर्डिंग रखी। यह जमीन लगभग 11 एकड़ की निजी जमीन पर है और पूरे प्रोजेक्ट की लागत 86 करोड़ रुपये है। कबीर ने मस्जिद को दो साल में पूरा करने का दावा किया है और बांग्लादेश और मध्य पूर्व से धन मंत्रालय की मदद के लिए भी ली जा रही है।

लेकिन अब सबसे बड़ी बाधा यह है कि बंगाल में सत्ता परिवर्तन का भुगतान हो गया है और बीजेपी की सरकार आ गई है। गृह मंत्री अमित शाह ने साफा कह दिया के दौरान चुनावी प्रचार करते हुए कहा, ‘यह भारत है और यहां कोई भी आदमी बाबरी मस्जिद नहीं बना सकता।’ अगर बीजेपी की सरकार बनी है तो हम बंगाल की धरती पर बाबरी मस्जिद नहीं बनेंगे, इसके लिए हमें कुछ भी करना पड़ेगा।’

कानूनी-प्रशासकीय अवरोधों का जाल

हालांकि जमीन निजी है, लेकिन बीजेपी सरकार के पास निर्माण पर कई तरह से रोक है:

  • पहला रास्ता: भूमि उपयोग एवं भवन निर्माण का स्वामित्व है। कोई भी बड़ा धार्मिक ढाँचा बनाने के लिए स्थानीय नगर चोर और राज्य सरकार की अनुमति अनिवार्य है, जिसे भाजपा सरकार आसानी से रोक सकती है।
  • दूसरा रास्ता: शांति भंग और सांप्रदायिक तनाव का तर्क है। सरकार ने यह निष्कर्ष निकाला है कि इस क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव का खतरा है।
  • तीसरा रास्ता: प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और पशुपालन विभाग के लिए फंडिंग की जांच। कबीर पर पहले से ही उनके रिश्तेदार की फैक्ट्री से जुड़े होने का आरोप है और 10 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की गई है।

तो क्या अगले 5-10 सामुद्रिक बाजारों के निवेशक रहेंगे रहेंगे बाबरी मस्जिद?

यह प्रश्न और भी दिलचस्प हो जाता है। पॉलिटिकल शास्त्रियों का साफ मानना ​​है कि बाबरी मस्जिद का खंडहर बंगाल की राजनीति में एक स्थायी किस्सा रहेगा, जो हर चुनाव में गूंजता रहेगा। इसके कई ठोस कारण हैं:

  • हुमायूं कबीर के लिए इस मस्जिद ने अपनी पूरी राजनीति की धज्जियां उड़ा दी हैं। अगर वह पीछे हटते हैं तो उनके बीच की पूछताछ खत्म हो जाएगी। उनकी राजनीतिक मजबूरी उन्हें इस मुद्दे पर मजबूरन कायम रखने के लिए मजबूर करती है।
  • बीजेपी के लिए भी यह किसी भी आभूषण से कम नहीं है। मुर्शिदाबाद में 66% मुस्लिम आबादी है। बाबरी मस्जिद का विरोध, हिंदू झील वहां के ध्रुवीकरण का सबसे मजबूत हथियार बन गया है। 2021 में जहां बीजेपी को मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तरी डायनाजपुर की 43 सीटें मिलीं, वहीं 2026 में यह संख्या 19 हो गई। बीजेपी इस मुद्दे को आने वाले नगर निकाय और पंचायत चुनाव में भी शामिल करेगी।
  • कबीर ने अब खुद को अखिल भारतीय स्तर पर मुस्लिम अस्मिता की राजनीति का चेहरा बनाने की कोशिश शुरू कर दी है। असदुद्दीन ओवैसी के AIMIM से उनके गठबंधन (जो बाद में टूट गया) का कहना है कि वह सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं रहना चाहते। बाबरी मस्जिद न बनने की स्थिति में भी ये ‘मुसलमानों के साथ अन्याय’ और ‘बीजेपी के अनाचार’ की नैरेटिविटी को आगे बढ़ाने का मकसद बनेगा।
  • 2028 के मुस्लिम चुनाव और 2031 के अगले विधानसभा चुनाव में बाबरी मस्जिद का मामला एक बार फिर से केंद्र में बंटा, मस्जिद बनी हो या नहीं। बीजेपी दल और वाम दल भी इसे बीजेपी पर हमला करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं, जबकि बीजेपी इसे अपने अविश्वास के लिए कांग्रेस को मजबूत करने का उद्योग बनाएगी।

सोसाइटी, बीजेपी सरकार के नेतृत्व वाली बाबरी मस्जिद का निर्माण पूरा हो पाना मुश्किल लग रहा है। अगर कबीर कानूनी लड़ाई के जहाज़ हैं, तो यह मामला सागरों तक अदालतों में घिसटता रहेगा और 2030 तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आएगा। दूसरी ओर, भाजपा सरकार की हर कार्रवाई भाजपा को ‘मुस्लिम विरोधी’ साबित करने का मौका बनी रहेगी।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हेल्थ & फिटनेस

विज्ञापन

राजनीति

लेटेस्ट टॉप अपडेट

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets

Live Cricket

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.