Friday, 31 Jul 2026 | 08:18 PM

Trending :

जोमैटो-ब्लिंकइट के 1 लाख डिलीवरी पार्टनर्स ने फाइल किया ITR:₹18 करोड़ का इनकम टैक्स रिफंड मिला; 905 शहरों में 73% पहली बार टैक्सपेयर बने जोमैटो-ब्लिंकइट के 1 लाख डिलीवरी पार्टनर्स ने फाइल किया ITR:₹18 करोड़ का इनकम टैक्स रिफंड मिला; 905 शहरों में 73% पहली बार टैक्सपेयर बने RPSC Warning: Legal Action Against Misleading Social Media Posts पाकिस्तान में गैंगस्टर उजैर बलोच के भाई पर हमला:ल्यारी में अज्ञात हमलावरों ने घर के बाहर गोली मारी, हालत गंभीर मार्सिया का सक्सेस मंत्र; ब्लिस से खड़े किए 5 ब्रांड:1000 करोड़ की मालकिन की सलाह, पहले सर्वाइवल जरूरी, बिजनेस की प्लानिंग बाद में मार्सिया का सक्सेस मंत्र; ब्लिस से खड़े किए 5 ब्रांड:1000 करोड़ की मालकिन की सलाह, पहले सर्वाइवल जरूरी, बिजनेस की प्लानिंग बाद में
EXCLUSIVE

मेरा बंगाल, मेरी उम्मीद:इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा… ‘आमार सोनार बांग्ला’ सिर्फ नोस्टेल्जिया नहीं, एक सुनहरे भविष्य का हकदार

मेरा बंगाल, मेरी उम्मीद:इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा... ‘आमार सोनार बांग्ला’ सिर्फ नोस्टेल्जिया नहीं, एक सुनहरे भविष्य का हकदार
  • Hindi News
  • National
  • Harsh Goenka, Harsh Goenka’s Article, Standing At A Turning Point In History… ‘Amar Sonar Bangla’ Is Not Just Nostalgia, It Deserves A Golden Future.

हर्ष गोयनका. कोलकाता35 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

आरपीजी इंटरप्राइजेज के चेयरमैन हर्ष गोयनका। – फाइल फोटो

‘समय बदलता है, जिंदगी कई मोड़ लेती है, लेकिन कुछ जगहें ऐसी हैं जो कभी साथ नहीं छोड़तीं। वे चुपचाप हमारी यादों, हमारी सोच और हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बनी रहती हैं। ऐसी जगह मेरे लिए बंगाल है। यह मेरी जन्मभूमि है और आज भी ऐसी जगह है जो मुझे सुकून देती है, चाहे मैं दुनिया में कहीं भी चला जाऊं।

संकरी गलियां, पुराने औपनिवेशिक भवन, दोपहर की खामोशी को चीरती ट्राम की घंटियां, स्कूल के मैदानों में गूंजती दोस्तों की हंसी, ये सब मेरी पहचान का हिस्सा हैं। मेरा बचपन बंगाल की उसी लय में बीता। मैदान में क्रिकेट, चाय पर गरमागरम बहस या बस उन सड़कों पर चलना जो कहानियों से भरी लगती थीं। सेंट जेवियर्स कॉलेज की कैंटीन में मेरे विचारों की दुनिया बसती थी। हम बहस करते थे, सवाल पूछते थे, सपने देखते थे।

वो स्वर्णिम काल जब बंगाल सबसे आगे था

बंगाल कभी भी सिर्फ भौगोलिक क्षेत्र नहीं रहा है। एक समय था जब यह पूरे भारत की औद्योगिक धड़कन था। हुगली नदी के किनारे खड़े जूट के कारखाने, हावड़ा के इस्पात संयंत्र, बर्नपुर की कोयला खदानें, ये सब इस राज्य की महत्वाकांक्षा के जीवित प्रतीक थे।

आजादी के बाद के दो दशकों में पश्चिम बंगाल भारत के औद्योगिक रूप से सबसे विकसित राज्यों में गिना जाता था। चितरंजन में रेलवे इंजन बनते थे, दुर्गापुर में इस्पात ढलता था। टाटा, बिड़ला, सिंघानिया, मार्टिन बर्न जैसे व्यापारिक घराने यहीं से पले-बढ़े थे। कोलकाता भारत का व्यापारिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक मुख्यालय था। देश के किसी भी कोने में जाइए, ‘बंगाली बाबू’ की बुद्धिमत्ता और ‘कोलकाता के व्यापारी’ का रुतबा, दोनों का सम्मान होता था।

वाम मोर्चा का लंबा अध्याय और उद्योग का पलायन

फिर 1977 में वाम मोर्चा सत्ता में आया। धीरे-धीरे एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति विकसित हुई जिसमें उद्योग को संदेह की नजर से देखा जाने लगा। तीन दशकों से ज्यादा चले इस शासन में श्रमिक आंदोलनों ने हिंसक रूप लिया, कारखानों में ‘काम बंद, हड़ताल जारी’ की संस्कृति जड़ें जमाने लगीं। उद्योगपतियों ने एक-एक करके कोलकाता छोड़ना शुरू किया। जो कारखाने कभी राज्य की शान थे, वे बंद होने लगे। निवेश मुंबई, दिल्ली और बाद में बेंगलुरु की ओर चला गया। वाम मोर्चे ने बौद्धिक गर्व तो बनाए रखा, लेकिन आर्थिक उद्यमिता को किनारे पर धकेल दिया। बंगाल में नया निवेश आना लगभग बंद हो गया। बंगाल के सर्वश्रेष्ठ दिमाग बाहर जाने लगे चाहे वो इंजीनियर, डॉक्टर, उद्यमी या कलाकार हों। यह उनकी पसंद नहीं, मजबूरी थी।

तृणमूल का दौर- उम्मीदें, और फिर निराशा

2011 में ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे के साथ तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई। जनता को उम्मीद थी कि अब बदलाव आएगा। और कुछ हद तक आया भी। बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ, कनेक्टिविटी बढ़ी। लेकिन उद्योग के मोर्चे पर जो होना चाहिए था, वह नहीं हो सका। बंगाल बिजनेस समिट जैसे आयोजन भव्य होते रहे। हजारों करोड़ के निवेश के वादे, विदेशी प्रतिनिधिमंडल, बड़े मंच और चमकदार घोषणाएं। लेकिन जमीन पर उतरता क्या था? बहुत कम। और इसका सबसे बड़ा कारण था- जमीन।

सिंगूर और नंदीग्राम का जख्म अभी भरा नहीं था। टाटा का नैनो प्रोजेक्ट, जो बंगाल के औद्योगिक पुनर्जन्म का प्रतीक बन सकता था, राजनीतिक हिंसा और अनिश्चितता की भेंट चढ़ गया। यह सिर्फ एक कारखाने का जाना नहीं था, यह एक संदेश था जो पूरे देश के निवेशकों तक पहुंचा कि बंगाल में पूंजी सुरक्षित नहीं है। उसके बाद से हर बड़े निवेशक ने बंगाल की फाइल खोलने से पहले दो बार सोचा। तृणमूल के शासन में राजनीतिक हिंसा, प्रशासनिक पक्षपात और एकाधिकार की शिकायतें भी बढ़ती रहीं। उद्योग को यह भरोसा कभी नहीं मिला कि सरकार उनकी साझेदार है। बंगाल फिर अवसरों की दौड़ में पीछे रहा।

अब एक नई सुबह- भाजपा की जीत और उम्मीद का उजाला

और अब, ऐतिहासिक चुनाव परिणाम के बाद बंगाल में एक नई भावना जागी है। यह राजनीतिक बदलाव उस बंगाल की करवट है जो दशकों से सोया हुआ था। वो जानता था कि उसके भीतर कितनी ताकत है, लेकिन उसे मौका नहीं मिला। राज्य और केंद्र में एक ही पार्टी की सरकार को लेकर भाजपा जिस ‘डबल इंजन’ की बात करती रही है, उसका असली असर अब दिखना चाहिए। यह पल उम्मीद भी लाता है और जिम्मेदारी भी, लेकिन उम्मीद से काम नहीं चलता। नारों से कारखाने नहीं खुलते। इस बार बंगाल को ठोस और साहसी फैसले चाहिए। सबसे पहले जमीन का सवाल हल करना होगा- पारदर्शी, विवाद-मुक्त और डिजिटल।

सिंगूर का सबक याद रहे। कोई भी निवेशक वहां नहीं जाता जहां उसकी जमीन कल छिन सकती है। दूसरा, प्रशासनिक संस्कृति बदलनी होगी। नौकरशाही को ‘ना’ कहने की आदत से ‘हां, और कैसे?’ की आदत में लाना होगा। तीसरा, केमिकल्स, फार्मास्यूटिकल्स, लेदर, फूड प्रोसेसिंग व पोर्ट-आधारित लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में जहां बंगाल की स्वाभाविक ताकत है, वहां केंद्रित निवेश लाना होगा। और सबसे बड़ा काम, प्रवासी बंगालियों को वापस जोड़ना। मुंबई के बोर्डरूम से लेकर सिलिकॉन वैली के स्टार्टअप तक, बंगाली प्रतिभा हर जगह है। उन्हें बुलाइए, भरोसा दीजिए, और उनके लिए घर वापसी को सार्थक बनाइए।

वो बंगाल जो मेरे भीतर बसा है

मेरे मन में फिर वही बंगाल उभरता है जो जिज्ञासु, संवेदनशील और संभावनाओं से भरा हुआ था। वो कोलकाता जहां दोपहर की धूप में चाय की चुस्की के साथ दुनिया बदलने की बातें होती थीं। वो बंगाल जो टैगोर की कविता में था, विवेकानंद के संकल्प में था, बोस की प्रयोगशाला में था। वो बंगाल मरा नहीं है। वो इंतजार कर रहा था। बंगाल पहले भी मुश्किलों से उबर चुका है, विभाजन से, हिंसा से, निराशा से। उसने हर बार अपनी आत्मा बचाई है। और आज, शायद हम फिर उसी मोड़ पर खड़े हैं जहां से इतिहास मुड़ता है।

भावना शुरुआत कर सकती है, लेकिन असली बदलाव के लिए उसे काम में बदलना होगा… और बदलना होगा बहस को निर्णय में, विचार को क्रियान्वयन में, और स्वप्न को वास्तविकता में। बंगाल सिर्फ नोस्टेल्जिया का नहीं, एक सुनहरे भविष्य का हकदार है। क्योंकि उसके पास सब कुछ पहले से है, प्रतिभा, संस्कृति, संघर्ष की ताकत और गहरा गर्व। बस एक चीज चाहिए कि इस बार मौका हाथ से न जाने दें। ‘आमार सोनार बांगला’ (मेरा स्वर्णिम बंगाल)… के फिर से चमकने का वक्त आ गया है।’

(लेखक आरपीजी इंटरप्राइजेज के चेयरमैन हैं)

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

लेटेस्ट टॉप अपडेट

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets
MP, Chhattisgarh Rain Alert | Jammu, Himachal Snowfall Forecast

March 25, 2026/
5:30 am

नई दिल्ली/लखनऊ/देहरादून/शिमला/भोपाल12 मिनट पहले कॉपी लिंक भारतीय मौसम विभाग ने पंजाब, हरियाणा और नई दिल्ली में कल से बारिश और...

IPL 2026 Playoff Scenarios Update; RCB SRH PBKS

May 1, 2026/
7:25 am

स्पोर्ट्स डेस्क42 मिनट पहले कॉपी लिंक रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु को IPL के मौजूदा सीजन में तीसरी हार झेलनी पड़ी। उसे...

लेंसकार्ट के ड्रेस कोड पर विवाद:बिंदी-तिलक पर रोक और हिजाब को मंजूरी देने वाला लेटर वायरल, CEO पीयूष बंसल बोले- यह पुरानी गाइडलाइन

April 16, 2026/
12:51 pm

लेंसकार्ट अपने ऑफिस और स्टोर्स के ड्रेस कोड को लेकर विवादों में घिर गई है। सोशल मीडिया पर कंपनी का...

A vehicle sits charred after being set on fire, on a road in Guadalajara, Jalisco state, Mexico, Sunday, Feb. 22, 2026, after the death of the leader of the Jalisco New Generation Cartel, Nemesio Rubén Oseguera Cervantes, known as"El Mencho." (AP)

February 23, 2026/
7:42 am

आखरी अपडेट:23 फ़रवरी 2026, 07:42 IST सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों के दिनों से लेकर पश्चिम बंगाल में पार्टी की सत्ता...

जॉब - शिक्षा

राजनीति

मेरा बंगाल, मेरी उम्मीद:इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा… ‘आमार सोनार बांग्ला’ सिर्फ नोस्टेल्जिया नहीं, एक सुनहरे भविष्य का हकदार

मेरा बंगाल, मेरी उम्मीद:इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा... ‘आमार सोनार बांग्ला’ सिर्फ नोस्टेल्जिया नहीं, एक सुनहरे भविष्य का हकदार
  • Hindi News
  • National
  • Harsh Goenka, Harsh Goenka’s Article, Standing At A Turning Point In History… ‘Amar Sonar Bangla’ Is Not Just Nostalgia, It Deserves A Golden Future.

हर्ष गोयनका. कोलकाता35 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

आरपीजी इंटरप्राइजेज के चेयरमैन हर्ष गोयनका। – फाइल फोटो

‘समय बदलता है, जिंदगी कई मोड़ लेती है, लेकिन कुछ जगहें ऐसी हैं जो कभी साथ नहीं छोड़तीं। वे चुपचाप हमारी यादों, हमारी सोच और हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बनी रहती हैं। ऐसी जगह मेरे लिए बंगाल है। यह मेरी जन्मभूमि है और आज भी ऐसी जगह है जो मुझे सुकून देती है, चाहे मैं दुनिया में कहीं भी चला जाऊं।

संकरी गलियां, पुराने औपनिवेशिक भवन, दोपहर की खामोशी को चीरती ट्राम की घंटियां, स्कूल के मैदानों में गूंजती दोस्तों की हंसी, ये सब मेरी पहचान का हिस्सा हैं। मेरा बचपन बंगाल की उसी लय में बीता। मैदान में क्रिकेट, चाय पर गरमागरम बहस या बस उन सड़कों पर चलना जो कहानियों से भरी लगती थीं। सेंट जेवियर्स कॉलेज की कैंटीन में मेरे विचारों की दुनिया बसती थी। हम बहस करते थे, सवाल पूछते थे, सपने देखते थे।

वो स्वर्णिम काल जब बंगाल सबसे आगे था

बंगाल कभी भी सिर्फ भौगोलिक क्षेत्र नहीं रहा है। एक समय था जब यह पूरे भारत की औद्योगिक धड़कन था। हुगली नदी के किनारे खड़े जूट के कारखाने, हावड़ा के इस्पात संयंत्र, बर्नपुर की कोयला खदानें, ये सब इस राज्य की महत्वाकांक्षा के जीवित प्रतीक थे।

आजादी के बाद के दो दशकों में पश्चिम बंगाल भारत के औद्योगिक रूप से सबसे विकसित राज्यों में गिना जाता था। चितरंजन में रेलवे इंजन बनते थे, दुर्गापुर में इस्पात ढलता था। टाटा, बिड़ला, सिंघानिया, मार्टिन बर्न जैसे व्यापारिक घराने यहीं से पले-बढ़े थे। कोलकाता भारत का व्यापारिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक मुख्यालय था। देश के किसी भी कोने में जाइए, ‘बंगाली बाबू’ की बुद्धिमत्ता और ‘कोलकाता के व्यापारी’ का रुतबा, दोनों का सम्मान होता था।

वाम मोर्चा का लंबा अध्याय और उद्योग का पलायन

फिर 1977 में वाम मोर्चा सत्ता में आया। धीरे-धीरे एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति विकसित हुई जिसमें उद्योग को संदेह की नजर से देखा जाने लगा। तीन दशकों से ज्यादा चले इस शासन में श्रमिक आंदोलनों ने हिंसक रूप लिया, कारखानों में ‘काम बंद, हड़ताल जारी’ की संस्कृति जड़ें जमाने लगीं। उद्योगपतियों ने एक-एक करके कोलकाता छोड़ना शुरू किया। जो कारखाने कभी राज्य की शान थे, वे बंद होने लगे। निवेश मुंबई, दिल्ली और बाद में बेंगलुरु की ओर चला गया। वाम मोर्चे ने बौद्धिक गर्व तो बनाए रखा, लेकिन आर्थिक उद्यमिता को किनारे पर धकेल दिया। बंगाल में नया निवेश आना लगभग बंद हो गया। बंगाल के सर्वश्रेष्ठ दिमाग बाहर जाने लगे चाहे वो इंजीनियर, डॉक्टर, उद्यमी या कलाकार हों। यह उनकी पसंद नहीं, मजबूरी थी।

तृणमूल का दौर- उम्मीदें, और फिर निराशा

2011 में ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे के साथ तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई। जनता को उम्मीद थी कि अब बदलाव आएगा। और कुछ हद तक आया भी। बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ, कनेक्टिविटी बढ़ी। लेकिन उद्योग के मोर्चे पर जो होना चाहिए था, वह नहीं हो सका। बंगाल बिजनेस समिट जैसे आयोजन भव्य होते रहे। हजारों करोड़ के निवेश के वादे, विदेशी प्रतिनिधिमंडल, बड़े मंच और चमकदार घोषणाएं। लेकिन जमीन पर उतरता क्या था? बहुत कम। और इसका सबसे बड़ा कारण था- जमीन।

सिंगूर और नंदीग्राम का जख्म अभी भरा नहीं था। टाटा का नैनो प्रोजेक्ट, जो बंगाल के औद्योगिक पुनर्जन्म का प्रतीक बन सकता था, राजनीतिक हिंसा और अनिश्चितता की भेंट चढ़ गया। यह सिर्फ एक कारखाने का जाना नहीं था, यह एक संदेश था जो पूरे देश के निवेशकों तक पहुंचा कि बंगाल में पूंजी सुरक्षित नहीं है। उसके बाद से हर बड़े निवेशक ने बंगाल की फाइल खोलने से पहले दो बार सोचा। तृणमूल के शासन में राजनीतिक हिंसा, प्रशासनिक पक्षपात और एकाधिकार की शिकायतें भी बढ़ती रहीं। उद्योग को यह भरोसा कभी नहीं मिला कि सरकार उनकी साझेदार है। बंगाल फिर अवसरों की दौड़ में पीछे रहा।

अब एक नई सुबह- भाजपा की जीत और उम्मीद का उजाला

और अब, ऐतिहासिक चुनाव परिणाम के बाद बंगाल में एक नई भावना जागी है। यह राजनीतिक बदलाव उस बंगाल की करवट है जो दशकों से सोया हुआ था। वो जानता था कि उसके भीतर कितनी ताकत है, लेकिन उसे मौका नहीं मिला। राज्य और केंद्र में एक ही पार्टी की सरकार को लेकर भाजपा जिस ‘डबल इंजन’ की बात करती रही है, उसका असली असर अब दिखना चाहिए। यह पल उम्मीद भी लाता है और जिम्मेदारी भी, लेकिन उम्मीद से काम नहीं चलता। नारों से कारखाने नहीं खुलते। इस बार बंगाल को ठोस और साहसी फैसले चाहिए। सबसे पहले जमीन का सवाल हल करना होगा- पारदर्शी, विवाद-मुक्त और डिजिटल।

सिंगूर का सबक याद रहे। कोई भी निवेशक वहां नहीं जाता जहां उसकी जमीन कल छिन सकती है। दूसरा, प्रशासनिक संस्कृति बदलनी होगी। नौकरशाही को ‘ना’ कहने की आदत से ‘हां, और कैसे?’ की आदत में लाना होगा। तीसरा, केमिकल्स, फार्मास्यूटिकल्स, लेदर, फूड प्रोसेसिंग व पोर्ट-आधारित लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में जहां बंगाल की स्वाभाविक ताकत है, वहां केंद्रित निवेश लाना होगा। और सबसे बड़ा काम, प्रवासी बंगालियों को वापस जोड़ना। मुंबई के बोर्डरूम से लेकर सिलिकॉन वैली के स्टार्टअप तक, बंगाली प्रतिभा हर जगह है। उन्हें बुलाइए, भरोसा दीजिए, और उनके लिए घर वापसी को सार्थक बनाइए।

वो बंगाल जो मेरे भीतर बसा है

मेरे मन में फिर वही बंगाल उभरता है जो जिज्ञासु, संवेदनशील और संभावनाओं से भरा हुआ था। वो कोलकाता जहां दोपहर की धूप में चाय की चुस्की के साथ दुनिया बदलने की बातें होती थीं। वो बंगाल जो टैगोर की कविता में था, विवेकानंद के संकल्प में था, बोस की प्रयोगशाला में था। वो बंगाल मरा नहीं है। वो इंतजार कर रहा था। बंगाल पहले भी मुश्किलों से उबर चुका है, विभाजन से, हिंसा से, निराशा से। उसने हर बार अपनी आत्मा बचाई है। और आज, शायद हम फिर उसी मोड़ पर खड़े हैं जहां से इतिहास मुड़ता है।

भावना शुरुआत कर सकती है, लेकिन असली बदलाव के लिए उसे काम में बदलना होगा… और बदलना होगा बहस को निर्णय में, विचार को क्रियान्वयन में, और स्वप्न को वास्तविकता में। बंगाल सिर्फ नोस्टेल्जिया का नहीं, एक सुनहरे भविष्य का हकदार है। क्योंकि उसके पास सब कुछ पहले से है, प्रतिभा, संस्कृति, संघर्ष की ताकत और गहरा गर्व। बस एक चीज चाहिए कि इस बार मौका हाथ से न जाने दें। ‘आमार सोनार बांगला’ (मेरा स्वर्णिम बंगाल)… के फिर से चमकने का वक्त आ गया है।’

(लेखक आरपीजी इंटरप्राइजेज के चेयरमैन हैं)

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हेल्थ & फिटनेस

विज्ञापन

राजनीति

लेटेस्ट टॉप अपडेट

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets

Live Cricket

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.