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Naomi was criticized for withdrawing from the French Open, Naomi Osaka

Naomi was criticized for withdrawing from the French Open, Naomi Osaka
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न्यूयॉर्क13 मिनट पहले

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मशहूर टेनिस खिलाड़ी नाओमी ओसाका।- फाइल फोटो

दुनिया अक्सर कामयाबी को सिर्फ उपलब्धियों में मापती है। कितने मैच जीते, कितने रिकॉर्ड बनाए, कितनी बार लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरे। लेकिन बहुत कम लोग यह समझ पाते हैं कि किसी इंसान की असली ताकत सिर्फ उसके किए हुए कामों में नहीं, बल्कि उन चीजों में भी छिपी होती है जिन्हें करने से उसने इनकार किया। दुनिया की मशहूर टेनिस खिलाड़ी नाओमी ओसाका की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। उन्होंने सिर्फ जीतना नहीं सीखा, बल्कि सही समय पर ‘ना’ कहना भी सीखा और शायद यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया।

जापान की ओसाका जैसे-जैसे सफल होती गईं, वैसे-वैसे उनके आसपास उम्मीदों का दायरा भी बढ़ता गया जैसे कि शानदार प्रदर्शन, मुस्कुराहट, इंटरव्यू, हर मंच पर मौजूदगी। ओसाका भी लंबे समय तक हर किसी को खुश रखने की कोशिश करती रहीं। वे बताती हैं, ‘मुझे हमेशा लगता था कि अगर मैंने किसी चीज के लिए मना किया तो लोग निराश हो जाएंगे।’ लेकिन धीरे-धीरे यह आदत बोझ बनने लगी। लगातार काम, मानसिक दबाव, खुद को हर समय साबित करने की कोशिश ने उन्हें थका दिया। बाहर से वे सफल खिलाड़ी दिखती थीं, लेकिन अंदर एक संघर्ष चल रहा था।

फिर उन्होंने साल 2021 के फ्रेंच ओपन से हटने का फैसला कर लिया। यह फैसला खेल जगत के लिए चौंकाने वाला था। आलोचना भी हुई, सवाल भी उठे। लेकिन ओसाका के लिए यह सिर्फ एक फैसला नहीं था, बल्कि खुद को बचाने की शुरुआत थी। वे कहती हैं, ‘उस समय मैंने पहली बार समझा कि मुझे हर वह चीज करने की जरूरत नहीं है, जिसकी लोग मुझसे उम्मीद करते हैं। खुद को बचाना भी जरूरी होता है।’ यही वह मोड़ था, जहां ‘ना’ कहना उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया। उन्होंने महसूस किया कि हर बार दूसरों को खुश करने की कोशिश में इंसान खुद को खो देता है। कई बार इंकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि खुद के प्रति जिम्मेदारी होती है।

ओसाका ने धीरे-धीरे सीमाएं तय करनी शुरू कीं। उन्होंने उन कामों से दूरी बनानी शुरू की, जिनमें उनका मन नहीं लगता था। मानसिक शांति को प्राथमिकता देना सीखा। मां बनने के बाद उनकी सोच और मजबूत हो गई। अब उनका हर फैसला सिर्फ उनके लिए नहीं, बल्कि बेटी के लिए भी था। ओसाका ने बताया, ‘अब जब मैं ‘ना’ कहती हूं, तो अपराधबोध नहीं होता क्योंकि मैं जानती हूं कि मैं अपनी शांति और परिवार की सुरक्षा के लिए ऐसा कर रही हूं।’

28 वर्षीय ओसाका की कहानी सिर्फ सफल खिलाड़ी की कहानी नहीं है। यह उस इंसान की कहानी है, जिसने दुनिया को समझाया कि सफलता सिर्फ हर मौके को पकड़ने से नहीं मिलती। कई बार जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए यह तय करना जरूरी होता है कि हमें क्या नहीं करना है, और शायद इसी वजह से उनका सबसे मजबूत हथियार कोई टेनिस शॉट नहीं, बल्कि सही समय पर कहा गया एक छोटा-सा ‘ना’ बन गया।

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मशहूर टेनिस खिलाड़ी नाओमी ओसाका।- फाइल फोटो

दुनिया अक्सर कामयाबी को सिर्फ उपलब्धियों में मापती है। कितने मैच जीते, कितने रिकॉर्ड बनाए, कितनी बार लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरे। लेकिन बहुत कम लोग यह समझ पाते हैं कि किसी इंसान की असली ताकत सिर्फ उसके किए हुए कामों में नहीं, बल्कि उन चीजों में भी छिपी होती है जिन्हें करने से उसने इनकार किया। दुनिया की मशहूर टेनिस खिलाड़ी नाओमी ओसाका की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। उन्होंने सिर्फ जीतना नहीं सीखा, बल्कि सही समय पर ‘ना’ कहना भी सीखा और शायद यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया।

जापान की ओसाका जैसे-जैसे सफल होती गईं, वैसे-वैसे उनके आसपास उम्मीदों का दायरा भी बढ़ता गया जैसे कि शानदार प्रदर्शन, मुस्कुराहट, इंटरव्यू, हर मंच पर मौजूदगी। ओसाका भी लंबे समय तक हर किसी को खुश रखने की कोशिश करती रहीं। वे बताती हैं, ‘मुझे हमेशा लगता था कि अगर मैंने किसी चीज के लिए मना किया तो लोग निराश हो जाएंगे।’ लेकिन धीरे-धीरे यह आदत बोझ बनने लगी। लगातार काम, मानसिक दबाव, खुद को हर समय साबित करने की कोशिश ने उन्हें थका दिया। बाहर से वे सफल खिलाड़ी दिखती थीं, लेकिन अंदर एक संघर्ष चल रहा था।

फिर उन्होंने साल 2021 के फ्रेंच ओपन से हटने का फैसला कर लिया। यह फैसला खेल जगत के लिए चौंकाने वाला था। आलोचना भी हुई, सवाल भी उठे। लेकिन ओसाका के लिए यह सिर्फ एक फैसला नहीं था, बल्कि खुद को बचाने की शुरुआत थी। वे कहती हैं, ‘उस समय मैंने पहली बार समझा कि मुझे हर वह चीज करने की जरूरत नहीं है, जिसकी लोग मुझसे उम्मीद करते हैं। खुद को बचाना भी जरूरी होता है।’ यही वह मोड़ था, जहां ‘ना’ कहना उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया। उन्होंने महसूस किया कि हर बार दूसरों को खुश करने की कोशिश में इंसान खुद को खो देता है। कई बार इंकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि खुद के प्रति जिम्मेदारी होती है।

ओसाका ने धीरे-धीरे सीमाएं तय करनी शुरू कीं। उन्होंने उन कामों से दूरी बनानी शुरू की, जिनमें उनका मन नहीं लगता था। मानसिक शांति को प्राथमिकता देना सीखा। मां बनने के बाद उनकी सोच और मजबूत हो गई। अब उनका हर फैसला सिर्फ उनके लिए नहीं, बल्कि बेटी के लिए भी था। ओसाका ने बताया, ‘अब जब मैं ‘ना’ कहती हूं, तो अपराधबोध नहीं होता क्योंकि मैं जानती हूं कि मैं अपनी शांति और परिवार की सुरक्षा के लिए ऐसा कर रही हूं।’

28 वर्षीय ओसाका की कहानी सिर्फ सफल खिलाड़ी की कहानी नहीं है। यह उस इंसान की कहानी है, जिसने दुनिया को समझाया कि सफलता सिर्फ हर मौके को पकड़ने से नहीं मिलती। कई बार जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए यह तय करना जरूरी होता है कि हमें क्या नहीं करना है, और शायद इसी वजह से उनका सबसे मजबूत हथियार कोई टेनिस शॉट नहीं, बल्कि सही समय पर कहा गया एक छोटा-सा ‘ना’ बन गया।

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