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ताइवान की सड़कों पर भारत विरोधी पोस्टर लगे:चुनाव लड़ रहा उम्मीदवार बोला- भारतीय मजदूरों को मत लाओ, वे अपराधी होते हैं

ताइवान की सड़कों पर भारत विरोधी पोस्टर लगे:चुनाव लड़ रहा उम्मीदवार बोला- भारतीय मजदूरों को भगाओ, विपक्षी सांसद बोले- वे अपराधी होते हैं

ताइवान में स्थानीय चुनाव के दौरान एक निर्दलीय उम्मीदवार ने भारत विरोधी पोस्टर लगाया है। इसमें पगड़ी पहने एक सिख व्यक्ति की तस्वीर पर बड़ा ’नो’ यानी प्रतिबंध का निशान बना हुआ था। पोस्टर का मैसेज था कि भारत से आने वाले प्रवासी मजदूरों का विरोध किया जाए। वे अपराधी होते हैं, उन्हें देश में न आने दिया जाए। यह विवाद ऐसे समय में हुआ है जब ताइवान भारत के साथ हुए श्रम सहयोग समझौते के तहत भारतीय कामगारों को बुलाने की तैयारी कर रहा है। ताइवान की विपक्षी पार्टी कुओमिनतांग यानी KMT भी भारतीय मजदूरों को बुलाने का विरोध कर रही है। सांसद हुआंग चिएन-पिन ने भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों का हवाला दिया था। उन्होंने संसद में कहा था कि भारत में 2022 में महिलाओं के खिलाफ 4.45 लाख से ज्यादा अपराध दर्ज हुए थे, जिनमें 31 हजार से ज्यादा रेप के मामले शामिल थे। ऐसे में भारतीय मजदूरों को लेकर ज्यादा सख्त जांच और निगरानी होनी चाहिए। वे यहां पर महिलाओं के साथ बलात्कार कर सकते हैं। भारतीय बोले- यह नस्लीय भेदभाव है वहीं, ताइवान में रहने वाले एक भारतीय ने सोशल मीडिया पर इसे नस्लीय भेदभाव बताया। उन्होंने कहा कि किसी नीति का विरोध करना अलग बात है, लेकिन किसी समुदाय की पहचान और सांस्कृतिक प्रतीकों को निशाना बनाना गलत है। एक अन्य व्यक्ति ने लिखा कि ताइवान में करीब 7 हजार भारतीय रहते हैं और उनमें से ज्यादातर हाई-टेक और सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में काम करते हैं। इसमें फॉक्सकॉन और TSMC जैसी कंपनियां शामिल हैं। ताइवान की स्थानीय राजनीतिक पार्टी न्यू पावर पार्टी के नेता वांग यी-हेंग ने भी पोस्टर की आलोचना की। उन्होंने कहा कि भारतीय झंडे और पगड़ी पर प्रतिबंध का निशान लगाना बेहद अज्ञानता भरा कदम है। उनके मुताबिक पगड़ी सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि आस्था और सम्मान का प्रतीक है। भारत-ताइवान में मजदूरों को लेकर समझौता हुआ था 2024 में भारत और ताइवान के बीच प्रवासी मजदूरों को लेकर एक अहम समझौता हुआ था। इसे लेबर कोऑपरेशन MOU यानी श्रम सहयोग समझौता कहा गया। इसका मकसद ताइवान में बढ़ती कामगारों की कमी को पूरा करना और भारतीय कामगारों को वहां रोजगार के अवसर देना है। ताइवान कई सालों से श्रमिक संकट का सामना कर रहा है। वहां जन्म दर लगातार गिर रही है, आबादी बूढ़ी हो रही है और युवाओं की संख्या कम होती जा रही है। इसका असर खासकर फैक्ट्री, खेती, निर्माण और बुजुर्गों की देखभाल जैसे क्षेत्रों पर पड़ रहा है। इसी वजह से ताइवान लंबे समय से दूसरे एशियाई देशों जैसे इंडोनेशिया, वियतनाम, फिलीपींस और थाईलैंड से मजदूर बुलाता रहा है। अब उसने भारत को भी इस सूची में शामिल करने का फैसला किया। इस समझौते के तहत करीब 1000 भारतीय मजदूर इस साल के अंत तक ताइवान पहुंचेंगे। इसके बाद अगर व्यवस्था सही चली और उद्योगों की मांग बढ़ी, तो संख्या आगे बढ़ाई जा सकती है। भारतीय मजदूरों पर सख्त नियंत्रण लगाने की मांग जब भारत और ताइवान के बीच भारतीय मजदूरों को लेकर समझौता हुआ था, तब भी ताइवान में इसे लेकर विवाद हुआ था। कई लोगों ने डर जताया था कि भारतीय मजदूरों के आने से अपराध बढ़ सकते हैं और महिलाओं की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। ताइवान पीपुल्स पार्टी के नेता को वेन-जे ने भी कहा था कि भारत से आने वाले मजदूरों पर सख्त नियंत्रण होना चाहिए। उन्होंने दावा किया था कि “भाग जाने वाले विदेशी मजदूर” पहले से ही ताइवान की राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन चुके हैं। दरअसल ताइवान फ्यूजिटिव वर्कर्स की समस्या से जूझ रहा है। इसमें प्रवासी मजदूर कानूनी तौर पर किसी कंपनी या काम के लिए ताइवान आते हैं, लेकिन बाद में अपना तय काम छोड़कर गायब हो जाते हैं। फिर वे बिना अनुमति के दूसरी जगह काम करने लगते हैं या अवैध रूप से रहने लगते हैं। ताइवान के कई नेता इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं। इस बहस के दौरान एक और विवाद तब हुआ जब उस समय की ताइवान की श्रम मंत्री हसू मिंग-चुन ने कहा कि शुरुआत में भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों से मजदूर भर्ती किए जा सकते हैं। उन्होंने इसकी वजह बताते हुए कहा था कि वहां के लोगों की स्किन कलर, खानपान और धार्मिक आदतें ताइवान के लोगों से ज्यादा मिलती-जुलती हैं। उनके इस बयान की काफी आलोचना हुई और लोगों ने इसे नस्लवादी और भेदभावपूर्ण बताया। विवाद बढ़ने के बाद ताइवान के विदेश मंत्रालय को सार्वजनिक तौर पर माफी मांगनी पड़ी थी।

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