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Govt Must Initiate, Gather Resources for Rajasthan Regional Center

Govt Must Initiate, Gather Resources for Rajasthan Regional Center

जयपुर3 घंटे पहले

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राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के निदेशक चितरंजन त्रिपाठी ने राजस्थान में एनएसडी का क्षेत्रीय केंद्र (रीजनल सेंटर) स्थापित किए जाने की मांग का समर्थन किया है। उन्होंने कहा- एक रंगकर्मी होने के नाते वह चाहते हैं कि देश के हर राज्य में एनएसडी का एक केंद्र हो।

जयपुर में आयोजित थिएटर वर्कशॉप कोलाज ऑफ किलकारी के समापन पर त्रिपाठी ने कहा कि हर स्कूल में थिएटर विषय होना चाहिए। उन्होंने शिक्षा, समाज में कला, संगीत और रंगमंच के प्रति बने नजरिए को ‘चिंटू और पिंटू’ की काल्पनिक थ्योरी से समझाया। उन्होंने कहा-

हर स्कूल में दो तरह के छात्र होते हैं। एक पिंटू, जो गणित में 98 प्रतिशत अंक लाता है और दूसरा चिंटू 85 प्रतिशत अंक लाता है। चिंटू बेहतरीन गायक, तबला वादक या कलाकार भी है। उन्होंने कहा कि स्कूलों में आमतौर पर पिंटू को ज्यादा महत्व मिलता है।

शिक्षक उसे अपना ब्लू-आइड बॉय मानते हैं, क्योंकि समाज यह मान बैठा है कि अच्छे अंक लाने वाला ही आगे चलकर बड़ी उपलब्धियां हासिल करेगा। वहीं चिंटू की कला और प्रतिभा को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता।

चितरंजन त्रिपाठी ने कहा कि मैं चाहता हूं कि हर राज्य में एनएसडी का रीजनल सेंटर बनें।

चितरंजन त्रिपाठी ने कहा कि मैं चाहता हूं कि हर राज्य में एनएसडी का रीजनल सेंटर बनें।

कला को व्यक्तित्व विकास का हिस्सा मानना अहम

त्रिपाठी ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि जैसे ही किसी स्कूल में कोई मंत्री, सांसद, कलेक्टर या अन्य गणमान्य व्यक्ति आने वाले होते हैं, अचानक स्कूल प्रशासन को चिंटू की याद आ जाती है। क्योंकि स्वागत समारोह में गीत भी चाहिए, सांस्कृतिक कार्यक्रम भी चाहिए और मंच पर प्रस्तुति भी चाहिए। तब वही छात्र, जिसे पूरे साल सामान्य नजर से देखा जाता है, अचानक महत्वपूर्ण हो जाता है।

उन्होंने कहा कि चिंटू और उसके जैसे अन्य कलाकार बच्चों को बुलाया जाता है, उन्हें देशभक्ति गीत सिखाए जाते हैं, मंच पर प्रस्तुतियों की तैयारी करवाई जाती है और कुछ समय के लिए उन्हें विशेष महत्व दिया जाता है। उस समय चिंटू को लगता है कि उसकी कला की कद्र हो रही है।

त्रिपाठी ने कहा कि दुखद स्थिति यह है कि जैसे ही कार्यक्रम समाप्त होता है, वही सम्मान खत्म हो जाता है। मंच पर तालियां बजती हैं, अतिथि बच्चों की तारीफ करते हैं, लेकिन अगले ही दिन चिंटू फिर उसी स्थिति में पहुंच जाता है, जहां उसे केवल एक्स्ट्रा एक्टिविटी करने वाला छात्र माना जाता है।

त्रिपाठी के अनुसार समाज और शिक्षा व्यवस्था की यही सबसे बड़ी विडंबना है कि कला, संगीत और रंगमंच का उपयोग तो किया जाता है, लेकिन उन्हें शिक्षा और व्यक्तित्व विकास के मुख्य हिस्से के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता।

मैं तो चाहता हूं कि हर राज्य में एनएसडी का केंद्र हो

चितरंजन त्रिपाठी ने कहा कि एक थिएटर कलाकार होने के नाते उनकी पहली इच्छा यही है कि राजस्थान सहित देश के हर राज्य में एनएसडी का एक क्षेत्रीय केंद्र स्थापित हो। इससे स्थानीय कलाकारों को दिल्ली आने की आवश्यकता कम होगी और उन्हें अपने प्रदेश में ही उच्चस्तरीय रंगमंच प्रशिक्षण उपलब्ध हो सकेगा। हालांकि इसके लिए केवल इच्छा पर्याप्त नहीं है, बल्कि संसाधन, आधारभूत ढांचा और सरकारों के बीच समन्वय भी जरूरी है।

त्रिपाठी ने कहा कि जब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्थापना हुई थी, तब इसकी मूल अवधारणा में यह भावना शामिल थी कि देश के विभिन्न राज्यों तक रंगमंच की शिक्षा और प्रशिक्षण पहुंचे। लेकिन किसी भी नए केंद्र की स्थापना के लिए भवन, भूमि, वित्तीय संसाधन, तकनीकी सुविधाएं और प्रशिक्षित मानव संसाधन जैसी कई बुनियादी आवश्यकताएं होती हैं।

कार्यक्रम में उन्होंने चिंटू और पिंटू की थ्यौरी को भी समझाया।

कार्यक्रम में उन्होंने चिंटू और पिंटू की थ्यौरी को भी समझाया।

सरकारों के स्तर पर सहमति बनना जरूरी

त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि एनएसडी का निदेशक होने के नाते वह कोई ऐसा वादा नहीं करना चाहते जो व्यावहारिक रूप से उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है। उन्होंने कहा कि किसी भी नए केंद्र की स्थापना केंद्र और राज्य सरकार के बीच आपसी सहमति और सहयोग से ही संभव हो सकती है।

उन्होंने कहा कि अगर मैं मंच पर बैठकर यह कह दूं कि कल से राजस्थान में एनएसडी का सेंटर शुरू हो जाएगा, तो वह सही बात नहीं होगी। यह एक लंबी प्रक्रिया है, जिसमें सरकारों के स्तर पर चर्चा, संसाधनों की व्यवस्था और ठोस योजना की जरूरत होती है।

त्रिपाठी ने कहा कि राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत, लोकनाट्य परंपराएं और रंगकर्म की सक्रियता इसे ऐसे केंद्र के लिए उपयुक्त बनाती हैं। राज्य में बड़ी संख्या में युवा रंगमंच, लोककला और अभिनय से जुड़ना चाहते हैं। यदि यहां एनएसडी का क्षेत्रीय केंद्र स्थापित होता है तो इससे प्रदेश के कलाकारों को राष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण और अवसर मिल सकते हैं।

जयपुर में राजस्थानी परम्परा के अनुसार चितरंजन त्रिपाठी का स्वागत किया गया।

जयपुर में राजस्थानी परम्परा के अनुसार चितरंजन त्रिपाठी का स्वागत किया गया।

थिएटर तनाव दूर करता है, जीवन को गहराई देता है

चितरंजन त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय रंगमंच की परंपरा हजारों साल पुरानी है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में भी यह स्पष्ट लिखा गया है कि नाटक दुख, अवसाद और तनाव को दूर करता है।

उन्होंने कहा कि रंगमंच व्यक्ति को विभिन्न किरदारों के माध्यम से अलग-अलग दृष्टिकोण समझने का अवसर देता है। जब कोई बच्चा मंच पर पुलिस अधिकारी, किसान, राजा या किसी सामान्य व्यक्ति की भूमिका निभाता है तो वह दुनिया को नए नजरिए से देखना सीखता है। यही प्रक्रिया उसे अधिक संवेदनशील और समझदार बनाती है।”

हर स्कूल में थिएटर विषय होना चाहिए

त्रिपाठी ने कहा कि आज के दौर में स्कूलों में थिएटर को अतिरिक्त गतिविधि (एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी) के रूप में देखा जाता है, जबकि यह शिक्षा का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं जहां भी जाता हूं, स्कूलों से यही कहता हूं कि थिएटर को एक विषय के रूप में शामिल किया जाना चाहिए।

रंगमंच बच्चों में आत्मविश्वास पैदा करता है। यह केवल अभिनय नहीं सिखाता, बल्कि जीवन जीने का सलीका सिखाता है। चाहे बच्चा आगे चलकर डॉक्टर बने, इंजीनियर बने या किसी भी क्षेत्र में जाए, थिएटर से जुड़ाव उसे बेहतर इंसान बनाता है।

उन्होंने कहा कि इस समय देशभर में अलग-अलग जगहों पर थिएटर वर्कशाप चल रही है।

उन्होंने कहा कि इस समय देशभर में अलग-अलग जगहों पर थिएटर वर्कशाप चल रही है।

92 शहरों में चल रही हैं थिएटर वर्कशॉप्स

एनएसडी के कार्यों की जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने कहा कि पहले गर्मी की छुट्टियों में 10-15 कार्यशालाएं आयोजित होती थीं, लेकिन इस वर्ष देशभर में एक महीने के भीतर 92 थिएटर वर्कशॉप्स आयोजित की जा रही हैं।

हम चाहते हैं कि थिएटर गांवों, कस्बों और उन बच्चों तक पहुंचे जो कभी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में पढ़ने का अवसर नहीं पा सकते। आज एनएसडी केवल कलाकारों के साथ नहीं, बल्कि ट्रांसजेंडर समुदाय, वरिष्ठ नागरिकों, जेल बंदियों, झुग्गी-बस्ती के बच्चों, रिमांड होम के बच्चों और समाज के वंचित वर्गों के साथ भी रंगमंच की कार्यशालाएं आयोजित कर रहा है।

अंग्रेजों ने थिएटर को ‘एक्स्ट्रा करिकुलर’ बना दिया

त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय परंपरा में कला और नाट्यशास्त्र को पंचम वेद का दर्जा दिया गया था। मंदिरों में नाट्य मंडप बनाए जाते थे ताकि लोग दिनभर की थकान के बाद नाटक देखकर मानसिक ऊर्जा प्राप्त कर सकें।

उन्होंने कहा कि थिएटर कभी मुख्यधारा में था। अंग्रेजों के आने के बाद इसे धीरे-धीरे ‘एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी’ बना दिया गया। अब समय आ गया है कि इसे फिर से मुख्यधारा में लाया जाए।

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हर स्कूल में दो तरह के छात्र होते हैं। एक पिंटू, जो गणित में 98 प्रतिशत अंक लाता है और दूसरा चिंटू 85 प्रतिशत अंक लाता है। चिंटू बेहतरीन गायक, तबला वादक या कलाकार भी है। उन्होंने कहा कि स्कूलों में आमतौर पर पिंटू को ज्यादा महत्व मिलता है।

शिक्षक उसे अपना ब्लू-आइड बॉय मानते हैं, क्योंकि समाज यह मान बैठा है कि अच्छे अंक लाने वाला ही आगे चलकर बड़ी उपलब्धियां हासिल करेगा। वहीं चिंटू की कला और प्रतिभा को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता।

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उन्होंने कहा कि चिंटू और उसके जैसे अन्य कलाकार बच्चों को बुलाया जाता है, उन्हें देशभक्ति गीत सिखाए जाते हैं, मंच पर प्रस्तुतियों की तैयारी करवाई जाती है और कुछ समय के लिए उन्हें विशेष महत्व दिया जाता है। उस समय चिंटू को लगता है कि उसकी कला की कद्र हो रही है।

त्रिपाठी ने कहा कि दुखद स्थिति यह है कि जैसे ही कार्यक्रम समाप्त होता है, वही सम्मान खत्म हो जाता है। मंच पर तालियां बजती हैं, अतिथि बच्चों की तारीफ करते हैं, लेकिन अगले ही दिन चिंटू फिर उसी स्थिति में पहुंच जाता है, जहां उसे केवल एक्स्ट्रा एक्टिविटी करने वाला छात्र माना जाता है।

त्रिपाठी के अनुसार समाज और शिक्षा व्यवस्था की यही सबसे बड़ी विडंबना है कि कला, संगीत और रंगमंच का उपयोग तो किया जाता है, लेकिन उन्हें शिक्षा और व्यक्तित्व विकास के मुख्य हिस्से के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता।

मैं तो चाहता हूं कि हर राज्य में एनएसडी का केंद्र हो

चितरंजन त्रिपाठी ने कहा कि एक थिएटर कलाकार होने के नाते उनकी पहली इच्छा यही है कि राजस्थान सहित देश के हर राज्य में एनएसडी का एक क्षेत्रीय केंद्र स्थापित हो। इससे स्थानीय कलाकारों को दिल्ली आने की आवश्यकता कम होगी और उन्हें अपने प्रदेश में ही उच्चस्तरीय रंगमंच प्रशिक्षण उपलब्ध हो सकेगा। हालांकि इसके लिए केवल इच्छा पर्याप्त नहीं है, बल्कि संसाधन, आधारभूत ढांचा और सरकारों के बीच समन्वय भी जरूरी है।

त्रिपाठी ने कहा कि जब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्थापना हुई थी, तब इसकी मूल अवधारणा में यह भावना शामिल थी कि देश के विभिन्न राज्यों तक रंगमंच की शिक्षा और प्रशिक्षण पहुंचे। लेकिन किसी भी नए केंद्र की स्थापना के लिए भवन, भूमि, वित्तीय संसाधन, तकनीकी सुविधाएं और प्रशिक्षित मानव संसाधन जैसी कई बुनियादी आवश्यकताएं होती हैं।

कार्यक्रम में उन्होंने चिंटू और पिंटू की थ्यौरी को भी समझाया।

कार्यक्रम में उन्होंने चिंटू और पिंटू की थ्यौरी को भी समझाया।

सरकारों के स्तर पर सहमति बनना जरूरी

त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि एनएसडी का निदेशक होने के नाते वह कोई ऐसा वादा नहीं करना चाहते जो व्यावहारिक रूप से उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है। उन्होंने कहा कि किसी भी नए केंद्र की स्थापना केंद्र और राज्य सरकार के बीच आपसी सहमति और सहयोग से ही संभव हो सकती है।

उन्होंने कहा कि अगर मैं मंच पर बैठकर यह कह दूं कि कल से राजस्थान में एनएसडी का सेंटर शुरू हो जाएगा, तो वह सही बात नहीं होगी। यह एक लंबी प्रक्रिया है, जिसमें सरकारों के स्तर पर चर्चा, संसाधनों की व्यवस्था और ठोस योजना की जरूरत होती है।

त्रिपाठी ने कहा कि राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत, लोकनाट्य परंपराएं और रंगकर्म की सक्रियता इसे ऐसे केंद्र के लिए उपयुक्त बनाती हैं। राज्य में बड़ी संख्या में युवा रंगमंच, लोककला और अभिनय से जुड़ना चाहते हैं। यदि यहां एनएसडी का क्षेत्रीय केंद्र स्थापित होता है तो इससे प्रदेश के कलाकारों को राष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण और अवसर मिल सकते हैं।

जयपुर में राजस्थानी परम्परा के अनुसार चितरंजन त्रिपाठी का स्वागत किया गया।

जयपुर में राजस्थानी परम्परा के अनुसार चितरंजन त्रिपाठी का स्वागत किया गया।

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उन्होंने कहा कि रंगमंच व्यक्ति को विभिन्न किरदारों के माध्यम से अलग-अलग दृष्टिकोण समझने का अवसर देता है। जब कोई बच्चा मंच पर पुलिस अधिकारी, किसान, राजा या किसी सामान्य व्यक्ति की भूमिका निभाता है तो वह दुनिया को नए नजरिए से देखना सीखता है। यही प्रक्रिया उसे अधिक संवेदनशील और समझदार बनाती है।”

हर स्कूल में थिएटर विषय होना चाहिए

त्रिपाठी ने कहा कि आज के दौर में स्कूलों में थिएटर को अतिरिक्त गतिविधि (एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी) के रूप में देखा जाता है, जबकि यह शिक्षा का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं जहां भी जाता हूं, स्कूलों से यही कहता हूं कि थिएटर को एक विषय के रूप में शामिल किया जाना चाहिए।

रंगमंच बच्चों में आत्मविश्वास पैदा करता है। यह केवल अभिनय नहीं सिखाता, बल्कि जीवन जीने का सलीका सिखाता है। चाहे बच्चा आगे चलकर डॉक्टर बने, इंजीनियर बने या किसी भी क्षेत्र में जाए, थिएटर से जुड़ाव उसे बेहतर इंसान बनाता है।

उन्होंने कहा कि इस समय देशभर में अलग-अलग जगहों पर थिएटर वर्कशाप चल रही है।

उन्होंने कहा कि इस समय देशभर में अलग-अलग जगहों पर थिएटर वर्कशाप चल रही है।

92 शहरों में चल रही हैं थिएटर वर्कशॉप्स

एनएसडी के कार्यों की जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने कहा कि पहले गर्मी की छुट्टियों में 10-15 कार्यशालाएं आयोजित होती थीं, लेकिन इस वर्ष देशभर में एक महीने के भीतर 92 थिएटर वर्कशॉप्स आयोजित की जा रही हैं।

हम चाहते हैं कि थिएटर गांवों, कस्बों और उन बच्चों तक पहुंचे जो कभी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में पढ़ने का अवसर नहीं पा सकते। आज एनएसडी केवल कलाकारों के साथ नहीं, बल्कि ट्रांसजेंडर समुदाय, वरिष्ठ नागरिकों, जेल बंदियों, झुग्गी-बस्ती के बच्चों, रिमांड होम के बच्चों और समाज के वंचित वर्गों के साथ भी रंगमंच की कार्यशालाएं आयोजित कर रहा है।

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उन्होंने कहा कि थिएटर कभी मुख्यधारा में था। अंग्रेजों के आने के बाद इसे धीरे-धीरे ‘एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी’ बना दिया गया। अब समय आ गया है कि इसे फिर से मुख्यधारा में लाया जाए।

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