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होर्मुज में 90 दिन फंसे रहे रायपुर के रुद्रांश:जहाज के ऊपर से गुजरती थीं मिसाइलें-ड्रोन, सायरन बजते ही इंजन रूम में छिपते थे

होर्मुज में 90 दिन फंसे रहे रायपुर के रुद्रांश:जहाज के ऊपर से गुजरती थीं मिसाइलें-ड्रोन, सायरन बजते ही इंजन रूम में छिपते थे

जैसे ही हमले का सायरन बजता, जहाज के सभी 22 कर्मचारी भागकर नीचे इंजन रूम में छिप जाते थे। आसमान में मिसाइलें, ड्रोन और फाइटर जेट चक्कर काट रहे होते थे और अंदर सब अपनी जान बचाने के लिए भगवान से प्रार्थना करते थे। रायपुर के रहने वाले रुद्रांश चौबे इस कार्गो शिप में असिस्टेंट कैप्टन और चीफ ऑफिसर हैं। उन्होंने मौत के इसी खौफ के बीच ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में 3 महीने बिताए, ईरान और अमेरिका के बीच चल रही जंग के दौरान उनका जहाज ठीक उसी इलाके में फंस गया जहां लड़ाई चल रही थी। कई बार मिसाइलें जहाज के बिल्कुल ऊपर से गुजरीं, एक ड्रोन का टूटा हुआ मलबा भी उनके जहाज पर आकर गिरा। 6 महीने का कॉन्ट्रैक्ट पूरा होने के बाद कंपनी ने एक स्पेशल बोट (नाव) भेजकर रुद्रांश और उनके साथियों को वहां से सुरक्षित बाहर निकाला। पढ़िए पूरा इंटरव्यू:- सवाल: उस समय वहां की स्थिति कैसी थी और आप कैसे फंस गए? जवाब: हम अपना कार्गो डिस्चार्ज करने के लिए होर्मुज स्ट्रेट में गए थे। इसके बाद हमें अगला कार्गो लेना था, तभी पता चला कि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ गया है और होर्मुज में आवाजाही बंद कर दी गई है। इसके बाद करीब 3 महीने तक हम उसी क्षेत्र में रहे। इस दौरान हमने कार्गो लोड और डिस्चार्ज भी किया और भारत लाने के लिए एक और कार्गो लोड किया। लंबे समय तक जहाज एंकर पर खड़ा रहा और हम वहीं फंसे रहे। सवाल: समुद्र के बीच 24 घंटे रहना पड़ता था, उस दौरान स्थिति कैसी थी? जवाब: समुद्र में रहने के दौरान हर समय सतर्क रहना पड़ता था। युद्ध शुरू होने के शुरुआती दिनों में ड्रोन, मिसाइल और लड़ाकू विमानों की गतिविधियां दिखाई देती थीं। रेडियो पर लगातार अलग-अलग तरह के अलर्ट और सूचनाएं मिल रही थीं। जीपीएस स्पूफिंग जैसी घटनाएं भी हो रही थीं। शुरुआत में स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण थी, क्योंकि हमें समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या करना है और कहां जाना है। बाद में डीजी शिपिंग, इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन और हमारी कंपनी की ओर से जारी सुरक्षा दिशा निर्देशों का पालन कर हमने स्थिति का सामना किया। सवाल: पहली ही नौकरी और घर से दूर सीधे युद्ध के मैदान में एंट्री, मौत के इस साए के बीच खुद को और घर वालों की चिंता को कैसे संभाला? जवाब: मेरी कोशिश रहती थी कि हर दिन घरवालों को अपनी स्थिति की जानकारी दूं। समाचारों में वे लगातार हमले और तनाव की खबरें देखते थे, इसलिए उन्हें यह बताना जरूरी था कि मैं सुरक्षित हूं। सैटेलाइट कम्युनिकेशन के जरिए हम संपर्क में रहते थे। हालांकि कई बार जीपीएस स्पूफिंग और तकनीकी समस्याओं के कारण चार-पांच दिन तक बात नहीं हो पाती थी, लेकिन हम किसी तरह एक छोटा मैसेज भेजकर अपने सुरक्षित होने की जानकारी दे देते थे। सवाल: क्या कभी ऐसा हुआ कि ड्रोन या मिसाइल का खतरा आपके जहाज के बेहद करीब पहुंच गया हो? जवाब: जी हां, एक बार जब हमारा जहाज बहरीन के आसपास था, तब हमारे जहाज के ऊपर एक ड्रोन विस्फोट हुआ था। उसके कुछ अवशेष जहाज पर आकर गिरे थे। इस घटना के बाद सभी लोगों को महसूस हुआ कि स्थिति वास्तव में गंभीर है। इसके अलावा मिसाइलें, ड्रोन और लड़ाकू विमान लगातार हमारे ऊपर से गुजरते दिखाई देते थे। शुरुआत में इससे काफी डर लगा, लेकिन बाद में हमने सुरक्षा प्रक्रियाओं का पालन किया और खुद को संभाला। सवाल: उस समय सबसे ज्यादा डर किस बात का लगता था? जवाब: डर यही था कि कहीं कोई मिसाइल या ड्रोन गलती से हमारे जहाज को निशाना न बना ले। रात में जब अलर्ट आते थे या ऊपर से लड़ाकू विमान गुजरते थे, तब मन में कई तरह के विचार आते थे। ऐसे समय में हम ईश्वर को याद करते थे और सुरक्षित रहने की प्रार्थना करते थे। सवाल: समुद्र में उतरते वक्त बड़े-बड़े सपने रहे होंगे और वहां जाकर मिसाइलें देखनी पड़ीं, पहली नौकरी का यह अनुभव कैसा रहा? जवाब: कॉलेज और एनसीसी के दौरान हमने कई आपात परिस्थितियों के बारे में पढ़ा और प्रशिक्षण लिया था कि संकट के समय कैसे काम करना चाहिए। लेकिन यह पहली बार था जब हमने ऐसी स्थिति को करीब से देखा। शुरुआत में काफी घबराहट थी और समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। बाद में सुरक्षा नियमों का पालन किया, आपात स्थिति में वहां से सुरक्षित निकलने की तैयारियां समझीं और एक-दूसरे की हिम्मत बढ़ाकर हालातों का सामना किया। सवाल: उस समय जहाज पर कितने लोग थे और आप लोग एक-दूसरे का मनोबल कैसे बढ़ाते थे? जवाब: हमारे जहाज पर कुल 22 क्रू मेंबर थे। उनमें सबसे कम अनुभव मेरा ही था, क्योंकि यह मेरी पहली समुद्री यात्रा और पहली नौकरी थी। हमने एक सरल तरीका अपनाया था कि युद्ध और तनाव के बारे में ज्यादा सोचने के बजाय अपने काम पर ध्यान केंद्रित करें। हमारा मानना था कि अगर हम अपना काम ठीक से करते रहेंगे तो डर हम पर हावी नहीं होगा। हमने स्थिति को एक समस्या की तरह देखा और उसके समाधान पर ध्यान दिया। इसी सोच के कारण हम युद्ध की परिस्थितियों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दे पाए। सवाल: क्या जहाज पर खाने-पीने या दूसरी जरूरतों की कोई समस्या हुई? जवाब: नहीं, जहाज में पर्याप्त राशन और जरूरी सामान मौजूद था। असली चुनौती मानसिक दबाव था। हर दिन अनिश्चितता के बीच गुजर रहा था और किसी को नहीं पता था कि हालात कब सामान्य होंगे। सवाल: फिर आप वहां से बाहर कैसे निकले? जवाब: मेरा 6 महीने का कॉन्ट्रैक्ट पूरा हो चुका था। इसी दौरान कंपनी ने हमारे लिए खास व्यवस्था की। एक सर्विस बोट के जरिए हमें बंदरगाह तक पहुंचाया गया। मैं और मेरे साथ नौ अन्य क्रू मेंबर जहाज से उतरे। इसके बाद हम दुबई पहुंचे और वहां से हवाई मार्ग से अपने-अपने घरों के लिए रवाना हुए। सवाल: अब होर्मुज फिर से बंद हो गया है, जब आप वहां फंसे थे तो आपका कैसा एक्सपीरियंस रहा था? जवाब: वह ऐसा एक्सपीरियंस था जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता। उस संकट के समय हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता पूरी टीम को सुरक्षित रखना थी। जहाज पर डर का माहौल न बने, इसलिए हम लगातार आपस में बात करते थे, एक-दूसरे का हौसला बढ़ाते थे और घर पर भी संपर्क बनाए रखते थे। इसी टीम वर्क की वजह से हम वहां से सही-सलामत निकल पाए। आज जब वहां फिर से रास्ता बंद होने की खबर सुनता हूं, तो वही सब आंखों के सामने आ जाता है। वहां फंसे लोगों से मेरा यही कहना है कि वे हिम्मत बनाए रखें और सेफ्टी नियमों का पूरा पालन करें। सवाल: घर पहुंचने पर परिवार की क्या प्रतिक्रिया थी? जवाब: जब मैं घर पहुंचा तो परिवार के लोग काफी खुश थे। वे लगातार मेरी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे, क्योंकि जिस क्षेत्र में हम फंसे थे, वहां की खबरें लगातार मीडिया में आ रही थीं। सुरक्षित घर लौटने पर सभी ने राहत महसूस की। मेरे माता-पिता भी काफी गर्व महसूस कर रहे थे। मुझे लगता है कि परिवार का समर्थन, उनकी दुआएं और लगातार संपर्क बनाए रखना इस पूरे दौर में मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा।
……………………….. ईरान-अमेरिका वॉर से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… दुबई में फंसे बिलासपुर के 3 दोस्त लौटे:9 दिन बाद वापसी, तड़के 3 बजे दिल्ली पहुंची फ्लाइट, भारत सरकार से मांगी थी मदद दुबई में पिछले 9 दिन से फंसे बिलासपुर के 3 दोस्त सुरक्षित लौट आए हैं। उनकी फ्लाइट दुबई से तड़के 3 बजे दिल्ली पहुंची है। यहां से वे रायपुर आएंगे। तीनों दोस्त घूमने के लिए दुबई गए थे, लेकिन सुरक्षा को लेकर स्थिति साफ नहीं होने के कारण उनकी वापसी में देरी हो रही थी। पढ़ें पूरी खबर…

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जैसे ही हमले का सायरन बजता, जहाज के सभी 22 कर्मचारी भागकर नीचे इंजन रूम में छिप जाते थे। आसमान में मिसाइलें, ड्रोन और फाइटर जेट चक्कर काट रहे होते थे और अंदर सब अपनी जान बचाने के लिए भगवान से प्रार्थना करते थे। रायपुर के रहने वाले रुद्रांश चौबे इस कार्गो शिप में असिस्टेंट कैप्टन और चीफ ऑफिसर हैं। उन्होंने मौत के इसी खौफ के बीच ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में 3 महीने बिताए, ईरान और अमेरिका के बीच चल रही जंग के दौरान उनका जहाज ठीक उसी इलाके में फंस गया जहां लड़ाई चल रही थी। कई बार मिसाइलें जहाज के बिल्कुल ऊपर से गुजरीं, एक ड्रोन का टूटा हुआ मलबा भी उनके जहाज पर आकर गिरा। 6 महीने का कॉन्ट्रैक्ट पूरा होने के बाद कंपनी ने एक स्पेशल बोट (नाव) भेजकर रुद्रांश और उनके साथियों को वहां से सुरक्षित बाहर निकाला। पढ़िए पूरा इंटरव्यू:- सवाल: उस समय वहां की स्थिति कैसी थी और आप कैसे फंस गए? जवाब: हम अपना कार्गो डिस्चार्ज करने के लिए होर्मुज स्ट्रेट में गए थे। इसके बाद हमें अगला कार्गो लेना था, तभी पता चला कि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ गया है और होर्मुज में आवाजाही बंद कर दी गई है। इसके बाद करीब 3 महीने तक हम उसी क्षेत्र में रहे। इस दौरान हमने कार्गो लोड और डिस्चार्ज भी किया और भारत लाने के लिए एक और कार्गो लोड किया। लंबे समय तक जहाज एंकर पर खड़ा रहा और हम वहीं फंसे रहे। सवाल: समुद्र के बीच 24 घंटे रहना पड़ता था, उस दौरान स्थिति कैसी थी? जवाब: समुद्र में रहने के दौरान हर समय सतर्क रहना पड़ता था। युद्ध शुरू होने के शुरुआती दिनों में ड्रोन, मिसाइल और लड़ाकू विमानों की गतिविधियां दिखाई देती थीं। रेडियो पर लगातार अलग-अलग तरह के अलर्ट और सूचनाएं मिल रही थीं। जीपीएस स्पूफिंग जैसी घटनाएं भी हो रही थीं। शुरुआत में स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण थी, क्योंकि हमें समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या करना है और कहां जाना है। बाद में डीजी शिपिंग, इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन और हमारी कंपनी की ओर से जारी सुरक्षा दिशा निर्देशों का पालन कर हमने स्थिति का सामना किया। सवाल: पहली ही नौकरी और घर से दूर सीधे युद्ध के मैदान में एंट्री, मौत के इस साए के बीच खुद को और घर वालों की चिंता को कैसे संभाला? जवाब: मेरी कोशिश रहती थी कि हर दिन घरवालों को अपनी स्थिति की जानकारी दूं। समाचारों में वे लगातार हमले और तनाव की खबरें देखते थे, इसलिए उन्हें यह बताना जरूरी था कि मैं सुरक्षित हूं। सैटेलाइट कम्युनिकेशन के जरिए हम संपर्क में रहते थे। हालांकि कई बार जीपीएस स्पूफिंग और तकनीकी समस्याओं के कारण चार-पांच दिन तक बात नहीं हो पाती थी, लेकिन हम किसी तरह एक छोटा मैसेज भेजकर अपने सुरक्षित होने की जानकारी दे देते थे। सवाल: क्या कभी ऐसा हुआ कि ड्रोन या मिसाइल का खतरा आपके जहाज के बेहद करीब पहुंच गया हो? जवाब: जी हां, एक बार जब हमारा जहाज बहरीन के आसपास था, तब हमारे जहाज के ऊपर एक ड्रोन विस्फोट हुआ था। उसके कुछ अवशेष जहाज पर आकर गिरे थे। इस घटना के बाद सभी लोगों को महसूस हुआ कि स्थिति वास्तव में गंभीर है। इसके अलावा मिसाइलें, ड्रोन और लड़ाकू विमान लगातार हमारे ऊपर से गुजरते दिखाई देते थे। शुरुआत में इससे काफी डर लगा, लेकिन बाद में हमने सुरक्षा प्रक्रियाओं का पालन किया और खुद को संभाला। सवाल: उस समय सबसे ज्यादा डर किस बात का लगता था? जवाब: डर यही था कि कहीं कोई मिसाइल या ड्रोन गलती से हमारे जहाज को निशाना न बना ले। रात में जब अलर्ट आते थे या ऊपर से लड़ाकू विमान गुजरते थे, तब मन में कई तरह के विचार आते थे। ऐसे समय में हम ईश्वर को याद करते थे और सुरक्षित रहने की प्रार्थना करते थे। सवाल: समुद्र में उतरते वक्त बड़े-बड़े सपने रहे होंगे और वहां जाकर मिसाइलें देखनी पड़ीं, पहली नौकरी का यह अनुभव कैसा रहा? जवाब: कॉलेज और एनसीसी के दौरान हमने कई आपात परिस्थितियों के बारे में पढ़ा और प्रशिक्षण लिया था कि संकट के समय कैसे काम करना चाहिए। लेकिन यह पहली बार था जब हमने ऐसी स्थिति को करीब से देखा। शुरुआत में काफी घबराहट थी और समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। बाद में सुरक्षा नियमों का पालन किया, आपात स्थिति में वहां से सुरक्षित निकलने की तैयारियां समझीं और एक-दूसरे की हिम्मत बढ़ाकर हालातों का सामना किया। सवाल: उस समय जहाज पर कितने लोग थे और आप लोग एक-दूसरे का मनोबल कैसे बढ़ाते थे? जवाब: हमारे जहाज पर कुल 22 क्रू मेंबर थे। उनमें सबसे कम अनुभव मेरा ही था, क्योंकि यह मेरी पहली समुद्री यात्रा और पहली नौकरी थी। हमने एक सरल तरीका अपनाया था कि युद्ध और तनाव के बारे में ज्यादा सोचने के बजाय अपने काम पर ध्यान केंद्रित करें। हमारा मानना था कि अगर हम अपना काम ठीक से करते रहेंगे तो डर हम पर हावी नहीं होगा। हमने स्थिति को एक समस्या की तरह देखा और उसके समाधान पर ध्यान दिया। इसी सोच के कारण हम युद्ध की परिस्थितियों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दे पाए। सवाल: क्या जहाज पर खाने-पीने या दूसरी जरूरतों की कोई समस्या हुई? जवाब: नहीं, जहाज में पर्याप्त राशन और जरूरी सामान मौजूद था। असली चुनौती मानसिक दबाव था। हर दिन अनिश्चितता के बीच गुजर रहा था और किसी को नहीं पता था कि हालात कब सामान्य होंगे। सवाल: फिर आप वहां से बाहर कैसे निकले? जवाब: मेरा 6 महीने का कॉन्ट्रैक्ट पूरा हो चुका था। इसी दौरान कंपनी ने हमारे लिए खास व्यवस्था की। एक सर्विस बोट के जरिए हमें बंदरगाह तक पहुंचाया गया। मैं और मेरे साथ नौ अन्य क्रू मेंबर जहाज से उतरे। इसके बाद हम दुबई पहुंचे और वहां से हवाई मार्ग से अपने-अपने घरों के लिए रवाना हुए। सवाल: अब होर्मुज फिर से बंद हो गया है, जब आप वहां फंसे थे तो आपका कैसा एक्सपीरियंस रहा था? जवाब: वह ऐसा एक्सपीरियंस था जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता। उस संकट के समय हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता पूरी टीम को सुरक्षित रखना थी। जहाज पर डर का माहौल न बने, इसलिए हम लगातार आपस में बात करते थे, एक-दूसरे का हौसला बढ़ाते थे और घर पर भी संपर्क बनाए रखते थे। इसी टीम वर्क की वजह से हम वहां से सही-सलामत निकल पाए। आज जब वहां फिर से रास्ता बंद होने की खबर सुनता हूं, तो वही सब आंखों के सामने आ जाता है। वहां फंसे लोगों से मेरा यही कहना है कि वे हिम्मत बनाए रखें और सेफ्टी नियमों का पूरा पालन करें। सवाल: घर पहुंचने पर परिवार की क्या प्रतिक्रिया थी? जवाब: जब मैं घर पहुंचा तो परिवार के लोग काफी खुश थे। वे लगातार मेरी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे, क्योंकि जिस क्षेत्र में हम फंसे थे, वहां की खबरें लगातार मीडिया में आ रही थीं। सुरक्षित घर लौटने पर सभी ने राहत महसूस की। मेरे माता-पिता भी काफी गर्व महसूस कर रहे थे। मुझे लगता है कि परिवार का समर्थन, उनकी दुआएं और लगातार संपर्क बनाए रखना इस पूरे दौर में मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा।
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