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ओटीटी का नया फॉर्मूला:पुराने स्टार्स के साथ बन रहीं नई कहानियां; 35+ दर्शकों के भरोसे करोड़ों का दांव

ओटीटी का नया फॉर्मूला:पुराने स्टार्स के साथ बन रहीं नई कहानियां; 35+ दर्शकों के भरोसे करोड़ों का दांव

इंडियन एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में इन दिनों एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जहां सिनेमाघरों के लिए नई पीढ़ी के सितारों और फ्रेंचाइज फिल्मों का दबदबा बढ़ रहा है, वहीं ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर 90 के दशक और शुरुआती 2000 के दशक के सितारों की दूसरी पारी मजबूत होती जा रही है। सनी देओल, बॉबी देओल, माधुरी दीक्षित, जूही चावला, काजोल, रवीना टंडन, करिश्मा कपूर, अक्षय खन्ना और राजीव खंडेलवाल जैसे नाम दर्शकों के बीच चर्चा में हैं। हाल ही में घोषित ‘इक्का’ में सनी और अक्षय की जोड़ी हो, आर्यन खान के प्रोजेक्ट में बॉबी की मौजूदगी हो या ‘द रेलवे मेन’ में के.के. मेनन और आर. माधवन जैसे कलाकार हों। सभी प्रोजेक्ट चर्चा में हैं। इसके पीछे ओटीटी कंपनियों की पुराने चेहरों पर नई कहानियों के साथ करोड़ों के दांव की एक साफ रणनीति दिखाई दे रही है।
आखिर क्यों पुराने सितारों पर भरोसा जता रहे हैं बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म्स लंबे समय तक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में उम्र और स्टार इमेज के आधार पर कलाकारों की भूमिकाएं तय होती थीं। एक समय ऐसा था जब किसी एक्ट्रेस का मां के किरदार को निभाना उसके करियर के लिए जोखिम माना जाता था। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने इसी सोच को काफी हद तक बदल दिया है। अब कहानी और किरदार दोनों को प्राथमिकता दी जाती है। इसलिए कलाकार अपनी वास्तविक उम्र और अनुभव के अनुरूप भूमिकाएं निभा पा रहे हैं। वहीं दर्शकों ने भी इस बदलाव को स्वीकार किया है। आज के दर्शक केवल स्टारडम नहीं, मजबूत किरदारों की तलाश में हैं – पराग मेहता कास्टिंग डायरेक्टर पराग के अनुसार, इस ट्रेंड की शुरुआत भले नॉस्टैल्जिया से हुई हो लेकिन इसकी सफलता सिर्फ पुरानी यादों पर नहीं टिकी है। दर्शकों का इन कलाकारों से इमोशनल कनेक्ट आज भी बना हुआ है। लंबे समय तक प्रासंगिक बने रहने के लिए मजबूत किरदार जरूरी हैं। आज की कहानियां कलाकारों की उम्र, अनुभव और व्यक्तित्व के मुताबिक लिखी जा रही हैं। यही वजह है कि दर्शक अब माधुरी को सिर्फ ग्लैमरस या रोमांटिक भूमिकाओं में नहीं, बल्कि जटिल और भावनात्मक किरदारों में भी स्वीकार कर रहे हैं। इसी तरह बॉबी, अक्षय और रवीना भी अपनी पुरानी छवि से अलग भूमिकाएं निभा रहे हैं। आज का दर्शक केवल स्टारडम नहीं, बल्कि असरदार अभिनय और विश्वसनीय किरदार चाहता है। इसी वजह से अनुभवी कलाकारों को अवसर मिल रहे हैं।’ दूसरी पारी में 80-90 के दशक के ये सितारे कैसे बदल रहे गेम – सनी देओल बड़े डिजिटल/सीरीज स्पेस की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। – बॉबी देओल ग्रे और इंटेंस किरदारों से मजबूत पोजिशन बना चुके हैं। – माधुरी दीक्षित रोमांटिक इमेज से हटकर ग्रे शेड और निगेटिव रोल चूज कर रहीं। – काजोल लगातार ओटीटी का हिस्सा बन रहीं, साउथ में भी काफी एक्टिव हैं। – करिश्मा कपूर चुनिंदा लेकिन प्रीमियम कंटेंट, सोलो एक्शन बेस्ट रोल की तरफ झुकाव। क्यों बदल रहा है स्टार सिस्टम स्ट्रीमिंग इंडस्ट्री से जुड़े अनुमानों की तस्वीर भी दिलचस्प है। भारतीय ओटीटी दर्शकों में करीब 47% दर्शक 35 वर्ष से अधिक उम्र के हैं। यही वह वर्ग है जिसने 90 और 2000 के दशक में इन सितारों को उनके शिखर पर देखा था। दूसरी तरफ 18-34 आयु वर्ग भी लगभग 53% हिस्सेदारी रखता है। ऐसे में प्लेटफॉर्म्स के सामने चुनौती सिर्फ पुराने दर्शकों को लौटाना नहीं, बल्कि एक ही चेहरे से दो पीढ़ियों को जोड़ना है। यही वजह है कि आज अनुभवी सितारों को सिर्फ स्टार पावर नहीं, बल्कि लोअर मार्केटिंग कॉस्ट और हाई रिकॉल वैल्यू के रूप में देखा जा रहा है। ओटीटी ने बदले हैं कास्टिंग के नियम ओटीटी ने कास्टिंग के पारंपरिक नियम भी बदल दिए हैं। अब प्लेटफॉर्म उन कलाकारों पर भी बड़ा दांव लगा रहे हैं, जिन्हें कभी बीते दौर के सितारों के तौर पर देखा जाने लगा था। इसके पीछे सिर्फ नॉस्टैल्जिया नहीं, बल्कि बदलती ऑडियंस और उनके कंटेंट देखने की नई आदतों का बड़ा असर है। इसी वजह से अनुभवी कलाकारों को नए और प्रयोगधर्मी किरदार मिल रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, माधुरी का ‘मां बहन’ में ग्रे शेड और मां वाला किरदार।

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ओटीटी का नया फॉर्मूला:पुराने स्टार्स के साथ बन रहीं नई कहानियां; 35+ दर्शकों के भरोसे करोड़ों का दांव

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इंडियन एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में इन दिनों एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जहां सिनेमाघरों के लिए नई पीढ़ी के सितारों और फ्रेंचाइज फिल्मों का दबदबा बढ़ रहा है, वहीं ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर 90 के दशक और शुरुआती 2000 के दशक के सितारों की दूसरी पारी मजबूत होती जा रही है। सनी देओल, बॉबी देओल, माधुरी दीक्षित, जूही चावला, काजोल, रवीना टंडन, करिश्मा कपूर, अक्षय खन्ना और राजीव खंडेलवाल जैसे नाम दर्शकों के बीच चर्चा में हैं। हाल ही में घोषित ‘इक्का’ में सनी और अक्षय की जोड़ी हो, आर्यन खान के प्रोजेक्ट में बॉबी की मौजूदगी हो या ‘द रेलवे मेन’ में के.के. मेनन और आर. माधवन जैसे कलाकार हों। सभी प्रोजेक्ट चर्चा में हैं। इसके पीछे ओटीटी कंपनियों की पुराने चेहरों पर नई कहानियों के साथ करोड़ों के दांव की एक साफ रणनीति दिखाई दे रही है।
आखिर क्यों पुराने सितारों पर भरोसा जता रहे हैं बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म्स लंबे समय तक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में उम्र और स्टार इमेज के आधार पर कलाकारों की भूमिकाएं तय होती थीं। एक समय ऐसा था जब किसी एक्ट्रेस का मां के किरदार को निभाना उसके करियर के लिए जोखिम माना जाता था। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने इसी सोच को काफी हद तक बदल दिया है। अब कहानी और किरदार दोनों को प्राथमिकता दी जाती है। इसलिए कलाकार अपनी वास्तविक उम्र और अनुभव के अनुरूप भूमिकाएं निभा पा रहे हैं। वहीं दर्शकों ने भी इस बदलाव को स्वीकार किया है। आज के दर्शक केवल स्टारडम नहीं, मजबूत किरदारों की तलाश में हैं – पराग मेहता कास्टिंग डायरेक्टर पराग के अनुसार, इस ट्रेंड की शुरुआत भले नॉस्टैल्जिया से हुई हो लेकिन इसकी सफलता सिर्फ पुरानी यादों पर नहीं टिकी है। दर्शकों का इन कलाकारों से इमोशनल कनेक्ट आज भी बना हुआ है। लंबे समय तक प्रासंगिक बने रहने के लिए मजबूत किरदार जरूरी हैं। आज की कहानियां कलाकारों की उम्र, अनुभव और व्यक्तित्व के मुताबिक लिखी जा रही हैं। यही वजह है कि दर्शक अब माधुरी को सिर्फ ग्लैमरस या रोमांटिक भूमिकाओं में नहीं, बल्कि जटिल और भावनात्मक किरदारों में भी स्वीकार कर रहे हैं। इसी तरह बॉबी, अक्षय और रवीना भी अपनी पुरानी छवि से अलग भूमिकाएं निभा रहे हैं। आज का दर्शक केवल स्टारडम नहीं, बल्कि असरदार अभिनय और विश्वसनीय किरदार चाहता है। इसी वजह से अनुभवी कलाकारों को अवसर मिल रहे हैं।’ दूसरी पारी में 80-90 के दशक के ये सितारे कैसे बदल रहे गेम – सनी देओल बड़े डिजिटल/सीरीज स्पेस की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। – बॉबी देओल ग्रे और इंटेंस किरदारों से मजबूत पोजिशन बना चुके हैं। – माधुरी दीक्षित रोमांटिक इमेज से हटकर ग्रे शेड और निगेटिव रोल चूज कर रहीं। – काजोल लगातार ओटीटी का हिस्सा बन रहीं, साउथ में भी काफी एक्टिव हैं। – करिश्मा कपूर चुनिंदा लेकिन प्रीमियम कंटेंट, सोलो एक्शन बेस्ट रोल की तरफ झुकाव। क्यों बदल रहा है स्टार सिस्टम स्ट्रीमिंग इंडस्ट्री से जुड़े अनुमानों की तस्वीर भी दिलचस्प है। भारतीय ओटीटी दर्शकों में करीब 47% दर्शक 35 वर्ष से अधिक उम्र के हैं। यही वह वर्ग है जिसने 90 और 2000 के दशक में इन सितारों को उनके शिखर पर देखा था। दूसरी तरफ 18-34 आयु वर्ग भी लगभग 53% हिस्सेदारी रखता है। ऐसे में प्लेटफॉर्म्स के सामने चुनौती सिर्फ पुराने दर्शकों को लौटाना नहीं, बल्कि एक ही चेहरे से दो पीढ़ियों को जोड़ना है। यही वजह है कि आज अनुभवी सितारों को सिर्फ स्टार पावर नहीं, बल्कि लोअर मार्केटिंग कॉस्ट और हाई रिकॉल वैल्यू के रूप में देखा जा रहा है। ओटीटी ने बदले हैं कास्टिंग के नियम ओटीटी ने कास्टिंग के पारंपरिक नियम भी बदल दिए हैं। अब प्लेटफॉर्म उन कलाकारों पर भी बड़ा दांव लगा रहे हैं, जिन्हें कभी बीते दौर के सितारों के तौर पर देखा जाने लगा था। इसके पीछे सिर्फ नॉस्टैल्जिया नहीं, बल्कि बदलती ऑडियंस और उनके कंटेंट देखने की नई आदतों का बड़ा असर है। इसी वजह से अनुभवी कलाकारों को नए और प्रयोगधर्मी किरदार मिल रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, माधुरी का ‘मां बहन’ में ग्रे शेड और मां वाला किरदार।

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