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'भारत भाग्य विधाता’ में आतंक नहीं, नर्सों का साहस दिखाया:मनोज तापड़िया बोले- स्क्रिप्ट सुनते ही कंगना ने हामी भरी; विज्ञापन का सफर छोड़ बनाई फिल्म

'भारत भाग्य विधाता’ में आतंक नहीं, नर्सों का साहस दिखाया:मनोज तापड़िया बोले- स्क्रिप्ट सुनते ही कंगना ने हामी भरी; विज्ञापन का सफर छोड़ बनाई फिल्म

विज्ञापन जगत में 27 साल का लंबा सफर तय करने के बाद निर्देशक मनोज तापड़िया ने फिल्म ‘भारत भाग्य विधाता’ से सिनेमाई पर्दे पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। यह फिल्म 26/11 मुंबई हमले के दौरान कामा अस्पताल में नर्सों और स्टाफ द्वारा दिखाए गए अभूतपूर्व साहस की उस अनकही कहानी को बयां करती है, जो अब तक आम जनता के सामने नहीं आ पाई थी। फिल्म की रिलीज के बाद मनोज तापड़िया ने इसके निर्माण, कंगना रनोट के साथ काम करने और फिल्म की गहरी रिसर्च से जुड़े कई दिलचस्प अनुभव साझा किए। न्यूज आर्टिकल से मिला आइडिया, पर्दे पर उतारा साहस
मनोज तापड़िया खुद को यथार्थवाद (रियलिज्म) का फिल्मकार मानते हैं। उनका कहना है कि इस फिल्म का विचार किसी काल्पनिक कहानी से नहीं, बल्कि एक वास्तविक घटना से आया था। 26/11 हमले के दौरान वे खुद मुंबई में ही थे। हमले के कुछ समय बाद उन्होंने कामा अस्पताल से जुड़ी एक छोटी सी खबर पढ़ी, जिसने उनके दिल को छू लिया। फिल्म में आतंक के खौफ से ज्यादा इंसानी जज्बे को प्राथमिकता दी गई है। मनोज बताते हैं: “मेरा मकसद सिर्फ आतंकवादी हमला या गोलियों की गूंज दिखाना नहीं था, बल्कि मैं उस रात अस्पताल के भीतर मौजूद लोगों का मानसिक तनाव और उनका अनुभव दिखाना चाहता था। अगर सिर्फ हमला दिखाता तो वह एक घटना बनकर रह जाती, लेकिन जब दर्शक किरदारों के दर्द से जुड़ते हैं, तो फिल्म सीधे दिल पर असर करती है।” इस पूरी घटना में मनोज को जिस बात ने सबसे ज्यादा झकझोरा, वह था नर्सों का निहत्था साहस। जिन महिलाओं के पास आत्मरक्षा के लिए एक लाठी तक नहीं थी, उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर सैकड़ों मरीजों को सुरक्षित बचाया। वे चाहते तो पिछले दरवाजे से भाग सकते थे, लेकिन वे डटे रहे। यही इस फिल्म की असली आत्मा है, जिसे नर्सों के दृष्टिकोण से पर्दे पर उतारा गया है। बिना स्टार को सोचे लिखी कहानी, कंगना का शार्प स्क्रिप्ट सेंस
फिल्मों के लेखन को लेकर मनोज का एक सख्त नियम है वे कभी भी किसी स्टार को ध्यान में रखकर स्क्रिप्ट नहीं लिखते। उनका मानना है कि पहले कहानी और संवाद पूरी तरह तैयार होने चाहिए, उसके बाद ही किरदारों के लिए सही कलाकारों का चयन होना चाहिए। अगर किसी स्टार को सोचकर लिखा जाए और वह मना कर दे, तो पूरी कहानी प्रभावित होती है। ‘भारत भाग्य विधाता’ लिखते समय भी उनके दिमाग में कोई नाम नहीं था। जब स्क्रिप्ट पूरी हुई, तब कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा के जरिए यह कहानी कंगना रनोट तक पहुंची। मनोज के मुताबिक, उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वे इतनी आसानी से कंगना तक पहुंच पाएंगे। लेकिन कंगना का स्क्रिप्ट सेंस बेहद तेज है; उन्होंने कहानी सुनते ही इसके विजन को समझा और तुरंत फिल्म के लिए हामी भर दी। कंगना के आने के बाद फिल्म का स्केल बड़ा हुआ और निर्माता शैलेश सिंह व जयंतीलाल गड़ा भी इस प्रोजेक्ट से जुड़े। सेट पर सभी को सुझाव देने की आजादी थी, जिससे दृश्यों को और बेहतर बनाने में मदद मिली। 5 घंटे के इंटरव्यू और कोर्ट दस्तावेजों पर टिकी प्रामाणिकता
एक वास्तविक और संवेदनशील ऐतिहासिक घटना पर फिल्म बनाना बड़ी चुनौती थी, जिसके लिए विस्तृत रिसर्च की गई। दिलचस्प बात यह है कि मनोज ने खुद सीधे तौर पर पीड़ितों से मुलाकात नहीं की। इसके बजाय, उनकी टीम ने पत्रकारिता बैकग्राउंड के लोगों की मदद से वास्तविक किरदारों के इंटरव्यू रिकॉर्ड किए। राइटिंग टीम ने करीब 5 घंटे का वीडियो और ऑडियो मटेरियल महीनों तक बारीकी से देखा। रिसर्च का मकसद सिर्फ सूखे आंकड़े जुटाना नहीं, बल्कि पीड़ितों के हावभाव और उनके मानवीय पक्ष को समझना था।प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए पुलिस रिकॉर्ड, अदालती दस्तावेज और अस्पताल के मूल लेआउट का बारीकी से अध्ययन किया गया। इसी गहरी रिसर्च का नतीजा है कि फिल्म में इस्तेमाल की गई स्थानीय शब्दावली और नर्सों का व्यवहार पूरी तरह वास्तविक नजर आता है। 100 ड्राफ्ट्स की मेहनत और समीक्षकों को जवाब
फिल्म की स्क्रिप्टिंग प्रक्रिया बेहद सघन रही। शुरुआती लेखन भले ही दो महीने में पूरा हो गया था, लेकिन मनोज फिल्म की डबिंग खत्म होने तक इसमें बदलाव करते रहे। इसी वजह से फाइनल होने तक स्क्रिप्ट के लगभग 100 ड्राफ्ट तैयार किए गए। तकनीकी रूप से यह फिल्म जितनी सरल दिखती है, इसे शूट करना उतना ही जटिल था। अस्पताल के सीमित स्पेस में लगभग 70 मुख्य और सहायक कलाकारों के साथ समन्वय बिठाना चुनौतीपूर्ण था। बजट और सीमित संसाधनों के कारण पूरी टीम ने महज 35 दिनों के कड़े शेड्यूल में शूटिंग पूरी की। फिल्म रिलीज होने के बाद कुछ समीक्षकों का कहना था कि यह पूरी मुंबई के 26/11 के व्यापक माहौल को नहीं दिखा पाती। इस पर मनोज ने बहुत स्पष्टता से अपना नजरिया रखा। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य कभी भी पूरी मुंबई का हमला दिखाना था ही नहीं; उनका फोकस सिर्फ कामा अस्पताल के भीतर मौजूद नर्सों की मानसिक स्थिति और उस रात के तनाव को दर्शकों तक हूबहू पहुंचाना था। आगे के विजन पर बात करते हुए मनोज ने कहा कि वे भविष्य में भी ऐसी फिल्में बनाना चाहते हैं जो दर्शकों को मनोरंजन के साथ-साथ कुछ सोचने पर भी मजबूर करें।

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'भारत भाग्य विधाता’ में आतंक नहीं, नर्सों का साहस दिखाया:मनोज तापड़िया बोले- स्क्रिप्ट सुनते ही कंगना ने हामी भरी; विज्ञापन का सफर छोड़ बनाई फिल्म

विज्ञापन जगत में 27 साल का लंबा सफर तय करने के बाद निर्देशक मनोज तापड़िया ने फिल्म ‘भारत भाग्य विधाता’ से सिनेमाई पर्दे पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। यह फिल्म 26/11 मुंबई हमले के दौरान कामा अस्पताल में नर्सों और स्टाफ द्वारा दिखाए गए अभूतपूर्व साहस की उस अनकही कहानी को बयां करती है, जो अब तक आम जनता के सामने नहीं आ पाई थी। फिल्म की रिलीज के बाद मनोज तापड़िया ने इसके निर्माण, कंगना रनोट के साथ काम करने और फिल्म की गहरी रिसर्च से जुड़े कई दिलचस्प अनुभव साझा किए। न्यूज आर्टिकल से मिला आइडिया, पर्दे पर उतारा साहस
मनोज तापड़िया खुद को यथार्थवाद (रियलिज्म) का फिल्मकार मानते हैं। उनका कहना है कि इस फिल्म का विचार किसी काल्पनिक कहानी से नहीं, बल्कि एक वास्तविक घटना से आया था। 26/11 हमले के दौरान वे खुद मुंबई में ही थे। हमले के कुछ समय बाद उन्होंने कामा अस्पताल से जुड़ी एक छोटी सी खबर पढ़ी, जिसने उनके दिल को छू लिया। फिल्म में आतंक के खौफ से ज्यादा इंसानी जज्बे को प्राथमिकता दी गई है। मनोज बताते हैं: “मेरा मकसद सिर्फ आतंकवादी हमला या गोलियों की गूंज दिखाना नहीं था, बल्कि मैं उस रात अस्पताल के भीतर मौजूद लोगों का मानसिक तनाव और उनका अनुभव दिखाना चाहता था। अगर सिर्फ हमला दिखाता तो वह एक घटना बनकर रह जाती, लेकिन जब दर्शक किरदारों के दर्द से जुड़ते हैं, तो फिल्म सीधे दिल पर असर करती है।” इस पूरी घटना में मनोज को जिस बात ने सबसे ज्यादा झकझोरा, वह था नर्सों का निहत्था साहस। जिन महिलाओं के पास आत्मरक्षा के लिए एक लाठी तक नहीं थी, उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर सैकड़ों मरीजों को सुरक्षित बचाया। वे चाहते तो पिछले दरवाजे से भाग सकते थे, लेकिन वे डटे रहे। यही इस फिल्म की असली आत्मा है, जिसे नर्सों के दृष्टिकोण से पर्दे पर उतारा गया है। बिना स्टार को सोचे लिखी कहानी, कंगना का शार्प स्क्रिप्ट सेंस
फिल्मों के लेखन को लेकर मनोज का एक सख्त नियम है वे कभी भी किसी स्टार को ध्यान में रखकर स्क्रिप्ट नहीं लिखते। उनका मानना है कि पहले कहानी और संवाद पूरी तरह तैयार होने चाहिए, उसके बाद ही किरदारों के लिए सही कलाकारों का चयन होना चाहिए। अगर किसी स्टार को सोचकर लिखा जाए और वह मना कर दे, तो पूरी कहानी प्रभावित होती है। ‘भारत भाग्य विधाता’ लिखते समय भी उनके दिमाग में कोई नाम नहीं था। जब स्क्रिप्ट पूरी हुई, तब कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा के जरिए यह कहानी कंगना रनोट तक पहुंची। मनोज के मुताबिक, उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वे इतनी आसानी से कंगना तक पहुंच पाएंगे। लेकिन कंगना का स्क्रिप्ट सेंस बेहद तेज है; उन्होंने कहानी सुनते ही इसके विजन को समझा और तुरंत फिल्म के लिए हामी भर दी। कंगना के आने के बाद फिल्म का स्केल बड़ा हुआ और निर्माता शैलेश सिंह व जयंतीलाल गड़ा भी इस प्रोजेक्ट से जुड़े। सेट पर सभी को सुझाव देने की आजादी थी, जिससे दृश्यों को और बेहतर बनाने में मदद मिली। 5 घंटे के इंटरव्यू और कोर्ट दस्तावेजों पर टिकी प्रामाणिकता
एक वास्तविक और संवेदनशील ऐतिहासिक घटना पर फिल्म बनाना बड़ी चुनौती थी, जिसके लिए विस्तृत रिसर्च की गई। दिलचस्प बात यह है कि मनोज ने खुद सीधे तौर पर पीड़ितों से मुलाकात नहीं की। इसके बजाय, उनकी टीम ने पत्रकारिता बैकग्राउंड के लोगों की मदद से वास्तविक किरदारों के इंटरव्यू रिकॉर्ड किए। राइटिंग टीम ने करीब 5 घंटे का वीडियो और ऑडियो मटेरियल महीनों तक बारीकी से देखा। रिसर्च का मकसद सिर्फ सूखे आंकड़े जुटाना नहीं, बल्कि पीड़ितों के हावभाव और उनके मानवीय पक्ष को समझना था।प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए पुलिस रिकॉर्ड, अदालती दस्तावेज और अस्पताल के मूल लेआउट का बारीकी से अध्ययन किया गया। इसी गहरी रिसर्च का नतीजा है कि फिल्म में इस्तेमाल की गई स्थानीय शब्दावली और नर्सों का व्यवहार पूरी तरह वास्तविक नजर आता है। 100 ड्राफ्ट्स की मेहनत और समीक्षकों को जवाब
फिल्म की स्क्रिप्टिंग प्रक्रिया बेहद सघन रही। शुरुआती लेखन भले ही दो महीने में पूरा हो गया था, लेकिन मनोज फिल्म की डबिंग खत्म होने तक इसमें बदलाव करते रहे। इसी वजह से फाइनल होने तक स्क्रिप्ट के लगभग 100 ड्राफ्ट तैयार किए गए। तकनीकी रूप से यह फिल्म जितनी सरल दिखती है, इसे शूट करना उतना ही जटिल था। अस्पताल के सीमित स्पेस में लगभग 70 मुख्य और सहायक कलाकारों के साथ समन्वय बिठाना चुनौतीपूर्ण था। बजट और सीमित संसाधनों के कारण पूरी टीम ने महज 35 दिनों के कड़े शेड्यूल में शूटिंग पूरी की। फिल्म रिलीज होने के बाद कुछ समीक्षकों का कहना था कि यह पूरी मुंबई के 26/11 के व्यापक माहौल को नहीं दिखा पाती। इस पर मनोज ने बहुत स्पष्टता से अपना नजरिया रखा। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य कभी भी पूरी मुंबई का हमला दिखाना था ही नहीं; उनका फोकस सिर्फ कामा अस्पताल के भीतर मौजूद नर्सों की मानसिक स्थिति और उस रात के तनाव को दर्शकों तक हूबहू पहुंचाना था। आगे के विजन पर बात करते हुए मनोज ने कहा कि वे भविष्य में भी ऐसी फिल्में बनाना चाहते हैं जो दर्शकों को मनोरंजन के साथ-साथ कुछ सोचने पर भी मजबूर करें।

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