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विज्ञापनों में गुपचुप बढ़ रही एआई इन्फ्लुएंसर्स की भूमिका:ग्राहकों को इसकी भनक तक नहीं; कंटेंट क्रिएटर्स से अनुबंध करा रहीं कंपनियां

विज्ञापनों में गुपचुप बढ़ रही एआई इन्फ्लुएंसर्स की भूमिका:ग्राहकों को इसकी भनक तक नहीं; कंटेंट क्रिएटर्स से अनुबंध करा रहीं कंपनियां

सोशल मीडिया पर किसी प्रोडक्ट की तारीफ करता दिखने वाला मॉडल हमेशा असली हो, यह जरूरी नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक कई कंपनियां अपने उत्पादों के प्रचार के लिए एआई से बनाए गए नकली इन्फ्लुएंसर्स का इस्तेमाल कर रही हैं। ये वीडियो और तस्वीरें इस तरह तैयार की जाती हैं कि दर्शकों को लगे कि कोई असली ग्राहक अनुभव साझा कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ कंपनियां एआई कंटेंट बनाने वाले क्रिएटर्स से नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट (एनडीए) भी साइन करा रही हैं, ताकि वे इस बारे में सार्वजनिक रूप से न बताएं। विशेषज्ञों के मुताबिक इससे यूजर्स के लिए असली और नकली प्रचार में फर्क करना मुश्किल हो रहा है। वहीं, उपभोक्ता संगठन पारदर्शिता की मांग कर चेतावनी दे रहे हैं कि भविष्य में ये लोगों के भरोसे का संकट बन सकता है। एआई मॉडल को देख भ्रमित होने का जोखिम जांच में कई ऐसे उदाहरण मिले जहां कंपनियों ने प्रचार में एआई से बनाए गए चेहरे इस्तेमाल किए। अमेरिका की फोटो एप ‘वंस’ के प्रचार वीडियो में दुल्हनें अपने अनुभव बताती दिखीं, जबकि विश्लेषण में उनके एआई से बने होने की आशंका जताई गई। दुबई के फैशन ब्रांड ‘एशले’ ने भी ऐसे प्रचार चित्र पोस्ट किए, जिनमें एआई की गड़बड़ियां दिखाई दीं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे कंटेंट को देखकर सामान्य उपभोक्ता आसानी से भ्रमित हो सकता है। यही नहीं, इससे लोगों का उस प्रोडक्ट से भरोसा भी उठ सकता है। भारत में सख्ती, ब्रिटेन में अभी कोई स्पष्ट नियम नहीं फिलहाल ब्रिटेन में ऐसा कोई स्पष्ट नियम नहीं है जो कंपनियों को एआई से बने विज्ञापनों या इन्फ्लुएंसर्स की पहचान बताने के लिए बाध्य करे। दूसरी ओर भारत ने एआई से तैयार या संशोधित कंटेंट की पहचान को लेकर नियमों को सख्त किया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को ऐसे कंटेंट पर स्पष्ट लेबल लगाने और डीपफेक जैसी सामग्री पर कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

एनडीए के जरिए छिपाया जा रहा एआई का इस्तेमाल ब्रिटेन की एआई कंटेंट निर्माता क्लैरिसा मैन्सब्रिज का दावा है कि कई बड़े ब्रांड एआई कंटेंट तैयार कराने के बाद क्रिएटर्स से एनडीए साइन कराते हैं। इससे वे सार्वजनिक रूप से नहीं बता सकते कि विज्ञापन में दिख रहे लोग असली नहीं हैं। उनका कहना है कि कंपनियों के लिए एआई कंटेंट पारंपरिक फोटोशूट की तुलना में काफी सस्ता पड़ता है।

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सोशल मीडिया पर किसी प्रोडक्ट की तारीफ करता दिखने वाला मॉडल हमेशा असली हो, यह जरूरी नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक कई कंपनियां अपने उत्पादों के प्रचार के लिए एआई से बनाए गए नकली इन्फ्लुएंसर्स का इस्तेमाल कर रही हैं। ये वीडियो और तस्वीरें इस तरह तैयार की जाती हैं कि दर्शकों को लगे कि कोई असली ग्राहक अनुभव साझा कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ कंपनियां एआई कंटेंट बनाने वाले क्रिएटर्स से नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट (एनडीए) भी साइन करा रही हैं, ताकि वे इस बारे में सार्वजनिक रूप से न बताएं। विशेषज्ञों के मुताबिक इससे यूजर्स के लिए असली और नकली प्रचार में फर्क करना मुश्किल हो रहा है। वहीं, उपभोक्ता संगठन पारदर्शिता की मांग कर चेतावनी दे रहे हैं कि भविष्य में ये लोगों के भरोसे का संकट बन सकता है। एआई मॉडल को देख भ्रमित होने का जोखिम जांच में कई ऐसे उदाहरण मिले जहां कंपनियों ने प्रचार में एआई से बनाए गए चेहरे इस्तेमाल किए। अमेरिका की फोटो एप ‘वंस’ के प्रचार वीडियो में दुल्हनें अपने अनुभव बताती दिखीं, जबकि विश्लेषण में उनके एआई से बने होने की आशंका जताई गई। दुबई के फैशन ब्रांड ‘एशले’ ने भी ऐसे प्रचार चित्र पोस्ट किए, जिनमें एआई की गड़बड़ियां दिखाई दीं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे कंटेंट को देखकर सामान्य उपभोक्ता आसानी से भ्रमित हो सकता है। यही नहीं, इससे लोगों का उस प्रोडक्ट से भरोसा भी उठ सकता है। भारत में सख्ती, ब्रिटेन में अभी कोई स्पष्ट नियम नहीं फिलहाल ब्रिटेन में ऐसा कोई स्पष्ट नियम नहीं है जो कंपनियों को एआई से बने विज्ञापनों या इन्फ्लुएंसर्स की पहचान बताने के लिए बाध्य करे। दूसरी ओर भारत ने एआई से तैयार या संशोधित कंटेंट की पहचान को लेकर नियमों को सख्त किया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को ऐसे कंटेंट पर स्पष्ट लेबल लगाने और डीपफेक जैसी सामग्री पर कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

एनडीए के जरिए छिपाया जा रहा एआई का इस्तेमाल ब्रिटेन की एआई कंटेंट निर्माता क्लैरिसा मैन्सब्रिज का दावा है कि कई बड़े ब्रांड एआई कंटेंट तैयार कराने के बाद क्रिएटर्स से एनडीए साइन कराते हैं। इससे वे सार्वजनिक रूप से नहीं बता सकते कि विज्ञापन में दिख रहे लोग असली नहीं हैं। उनका कहना है कि कंपनियों के लिए एआई कंटेंट पारंपरिक फोटोशूट की तुलना में काफी सस्ता पड़ता है।

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